भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

पृष्ठ 185, कुल 811 में से

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पृष्ठ 185
सर्गः २ ]यात्राकाण्डम्१६९

रामायणान्यनेकानि पृथगग्रे मुनीश्वराः । भागान्भारतखण्डान्तर्गतांस्तन्मोद्भवाद्ययः ॥ ६९॥
करिष्यन्त्यत्र शतशस्तानि सर्वाणि पार्वति । वाल्मीकीयाद्विना देवि न ज्ञेयानि मनीषिभिः ॥ ७० ।
सारकाण्डं पुरा देवि यदुक्तं च मया तव वाल्मीकीयाच्च तच्चापि सारमुद्धृत्य वै मया ॥ ७१ ।
निवेदितं च सधुना पृष्टं रामकथानकम् सुविस्तारं वदस्वेति त्वया तन्मानस्योदितम् ॥ ७२॥
भानं रामचरित्रस्य शतकोटिप्रविस्तरम् पञ्चाननोऽप्यहं देवि दिव्यैर्वर्षार्बुदैरपि ॥ ७३॥
रामायणं सविस्तारं व्याख्यातुं न क्षमस्त्विह , यन्निर्मितं च मुनिना स्वतपोभिरनुत्तमम् ॥ ७४॥
अतः संक्षेपमात्रं हि सारं सारं त्रिगृह्य च । कथयिष्यामि तन्वङ्गि यात्राकाण्डं शुभावहम् ॥ ७५॥
रामदासो यथायग्रे हि विष्णुदायं वदिष्यति । शतकोटिमतान् ज्ञानदृष्ट्या चाहं तथा तव ॥ ७६ ।

इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गतश्रीमदानन्दरामायणे यात्राकाण्डे रामायणविस्तारकथनं नाम द्वितीयः सर्गः ॥ २ ॥


तृतीयः सर्गः

( गङ्गा-सागरसङ्गमपर जानेकी तैयारीके लिए दूतोंको रामकी आज्ञा )

पार्वत्युवाच

को रामदासः कुत्रस्थो विष्णुदासश्च कः स्मृतः कथं वदिष्यति गुरुस्तन्मां कथय विस्तरात् ॥ १ ॥

शिव उवाच

भारते दण्डकारण्ये गोदानावौ विगजिते । संवेऽब्जके नृसिंहाख्यो मुनिगग्रे भविष्यति ॥ २ ॥
रामनामा तु तत्पुत्रस्तच्छिष्यो विष्णुदित्यपि । गुरुशिष्यौ राममेवाभकौ नित्यं भविष्यतः ॥ ३ ॥
दास्यत्वाज्जानकीजानेस्तावभौ भूसुरोत्तमौ । रामदासोविष्णुदासाविति लोके परां प्रथाम् ॥ ४ ॥
गमिष्यतोऽग्रे भो देवि गौतम्या दक्षिणे तटे रामदासः पितुः श्राद्धं गयायां संविधाय च ॥ ५ ॥
पृथिव्यां यानि तीर्थानि तानि गत्वा यथाक्रमम् । अध्यापयिष्यति ञ्छात्रान् गोदानावौ गृहाश्रमी ६ ॥


भारतवर्षमें प्रचलित रामायणके झाउक आधारपर अगस्त्य आदि अन्य-न्य मुनि भा सेकड़ों रामायण लिखेंगे । पर विचारशील पुरुषोंको उन्हें वाल्मीकीय रामायणसे पृथक् न समझना चाहिये । ६९ । ७० । हे पार्वती ! पहले जो मैंने तुमको सारकाण्ड सुनाया वह भी वाल्मीकीय रामायणका सार ही था ॥ ७१ । उसके बाद जो तुमने रामकी सविस्तर कथा पूछी और मैंने सुनायी, उसका एक अरब श्लोकोंमे विस्तार है । हे देवि ! पञ्चमुखसे में दिव्य अरब वर्षोंमे भी सम्पूर्ण रामायणका व्याख्या करनाम समर्थ नहीं हूँ तब फिर औरोंका तो कहना ही क्या है । इसका रचना वाल्मीकि ऋषिने अपने तपोवलम किया ॥ ७२-७४ । इसलिये सारमात्र लेकर संक्षेपमे मैं तुम्हारी प्रसन्नताके हेतु मनोहार यात्राकाण्ड सुनाऊँगा , ७५ जिस सौ करोड़ श्लोकोंकी रामायणको आगे चलकर रामदास विष्णुदासको सुनाएंगे, वही में ज्ञानदृष्टिसे देख कर तुमको सुनाता हूँ ॥ ७६ । इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गतश्रीमदानन्दरामायणे यात्राकाण्डे 'ज्योत्स्ना' भाषाटीकायां रामायणविस्तारकथनं नाम द्वितीयः सर्गः ॥ २ ॥

पार्वतीजीने पूछा—हे महाराज ! रामदास कौन और कहाँके हैं ? ये विष्णुदास कौन हैं ? रामदास विष्णुदासको क्यों बिस्तारसे रामायण सुनायेंगे, यह भी कह सुनाइये ॥ १ ॥ शिवजीने उत्तर दिया कि भारतवर्षके दंडकारण्यमें गोदावरीके मध्यप्रदेशीय अम्बक क्षेत्रमे आगे चलकर नृसिंह नामके एक मुनि होंगे ॥ २ ॥ नृसिंहमुनिके पुत्र रामदास और रामदासके शिष्य विष्णुदास होंगे । वे दोनो गुरु-शिष्य निरन्तर रामकी भक्ति करनेवाले होंगे ॥ ३ सीतापति रामके अनन्य दास होनेके कारण ही ये दोनों रामदास तथा विष्णुदास नामसे संसारमें परम प्रसिद्धि प्राप्त करेंगे । हे देवि ! आगे चलकर वे ही रामदास गौतमी नदीके दक्षिण तटपर रहकर गयामें पिताका श्राद्ध करके पृथ्वीके समस्त तीर्थोंका भ्रमण करनेके बाद गृहस्थाश्रम स्वीकार करके

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