भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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१७० आनन्दरामायणे [ सर्गः ३

एकदा विष्णुदासः स शृण्वन्नानाविधाः कथाः । रामदासमुखात्सारकाण्डं रामायणोद्भवम् ॥ ७ ॥ श्रुत्वा किञ्चित्पृच्छमना रामदास वदिष्यति । विष्णुदास उवाच गुरो ते प्रष्टुमिच्छामि तत्त्वं वक्तुमिहार्हसि ॥ ८ ॥ सारकाण्डं मया त्वत्तः श्रुतं रामायणान्धितम् । न किंचिन्तोऽस्य लेशोऽपि जानक्या राघवस्य च । ९ ॥ श्रुतोऽत्र कापि राज्यस्य विस्तारोऽपि च न श्रुतः । कथं यागाः कृतास्तेन सन्ततिर्नास्य न श्रुता ॥ १० ॥ सुतानां बन्धुपुत्राणां विवाहादिकमश्रुतम् । तत्सर्वं विस्तरच्छ्रोतुमिच्छाम्यहं गुरो ॥ ११ ॥ तन्मे वद महाभाग रघुवीरस्य चेष्टितम् । रम्यं पवित्रमानन्ददायकं पातकापहम् ॥ १२ ॥ रामदास उवाच सम्यक् पृष्टं त्वया वत्स रामचन्द्रकथानकम् । मङ्गलं रघुनाथस्य प्रोच्यते यन्मविस्तरम् ॥ १३ ॥ सावधानमनास्त्वं तच्छृणु पातकनाशनम् । यथा श्रुतं मया पूर्वं तत्पशार्थं ते वदाम्यहम् ॥ १४ ॥ हन्त्वा दशाननं रामो राज्यं निहतकण्टकम् । अयोध्यायां मुक्तिपुर्यां शशास नीतिसंयुतः । १५ । न दुर्भिक्षं न चौर्यं च नापमृत्युर्न चोतयः । न दर्शद्द्रियं भयं चिन्ता व्याधयश्च कदाचन ॥ १६ ॥ न भिक्षार्थी न दुर्जनो न पापान्मा न निष्ठुरः । न क्रोधी न कृतघ्नोऽपि रामे राज्यं प्रशासति ॥ १७ ॥ एकदा जानकी कान्तमेकान्ते प्राह लज्जिता । स्मितवक्त्रा चारुनासा दिव्यालङ्कारमण्डिता ॥ १८ ॥ चामरव्यग्रहस्ता सा विनयावनतानना । शम राजीवपत्राक्ष शत्रुपारे मम प्रभो । १९ ॥ किञ्चिद्विज्ञापतुमिच्छामि यद्यनुज्ञां करोषि हि । विज्ञापयामि तर्हि त्वां धर्ममूलं महोदयम् ॥ २० ॥

गोदावरीके तटवर्ती गांवमें छात्रांको अनेक शास्त्रोंका अध्ययन कराते ॥ ४-६ उसी अवसरपर किसी दिन विष्णुदास रामदासके बहुतसे कथा सुनत-सुनते रामायणका सारकाण्ड सुनकर कुछ प्रश्न करनेकी इच्छासे कहते हे गुरो ! में आपस जो प्रश्न करना इच्छा करता हूं, उसका युक्तसंगत उत्तर देनमें आप समर्थ हैं । हे गुरो मैंने आपस रामायणान्तः सारकाण्ड तो सुन लिया, परन्तु आगे धन-कथा में भी महारानी जानकी अथवा राजा रामचन्द्रका कोई सुम्द संवाद नहीं सुना और न उनके राज्यका विवरण ही सुन पाया । उन्होंने कैसे और किस प्रकार यज्ञ किये ? उनकी संतानांका विस्तार भा नहीं सुननको मिला । राम तथा उनके भाइयोके पुत्रोंके विवाह आदिका वर्णन भी मैं नहीं सुन सका हे गुरो ! यह सब मैं आप श्रीमुखसे विस्तार-पूर्वक सुनना चाहता हूँ । ७-११ ॥ इसलिए हे महाभाग ! श्रीरामचन्द्रजीका वह मनोहर, पावन, आनन्ददायक तथा पापनाशक चरित्र आप मुझसे सुनाइए । १२ । रामदास बाले- हे वत्स ! तुमने रामचन्द्रकथा-विषयक यह बड़ा ही उत्तम प्रश्न किया है। रघुनाथके इस मांगलिक चरित्रको मैं विस्तारसे वर्णन करता हूँ ॥ १३ ॥ उनकी कथा श्रवणमात्रसे जन्म-जन्मान्तक पापकं नष्ट कर देती है। उसको मैंने जैसे सुना है. वैसा ही तुम्हारी प्रसन्नताके लिए कहता हूँ, अब सावधान होकर सुना । १४ ॥ रामचन्द्रजी दशानन रावणको मारकर मोक्षदायिनी अयोध्यानागरीमें रहने हुए शान्तिपूर्वक निष्कंटक राज्य करने लगे । १५ ॥ उनके राज्यमं कभी भी अकाल नहीं पड़ा और चोरी नहीं हुई । किसाका अकाल या कुत्सित मरण नहीं हुआ। अतिवृष्टि, अनावृष्टि, टिड्डी तथा मूषामे खतीका नाश, पक्षियांस लत्ताका विनाश और राजविद्रोहसे जायमान ईतियों (विपत्तियं) भी उनके राज्यभरमें लांगपर नहीं आया। उनके राज्यमें कोई दरिद्र, भयभीत, चिन्तातुर या रोगपीड़ित नहीं रहता था ॥ १६ ॥ उनके राज्यकालमें कोई भिखारी, दुराचारी, पापी, क्रूर, क्रोधी और कृतघ्न भी नहीं होता था । १७ ॥ ऐसे सुख-शान्तिक समय एक दिन हास्ययुक्तमुख-वाली, सुन्दर नासिकायुक्त एवं देवियोंके योग्य अलंकारामे विभूषित जानका कुछ लज्जापुरक एकान्तमें अपने प्रिय पति रामसे कहने लगी उस समय जानकीके हाथमें मनोहर चमर था । ऐसी दशामे वे विनयसे नीचेका मुख किये हुए बोली-हे कमलपत्रके समान नयनोंवाले रावणके शत्रु तथा मेरे नाथ राम ! यदि