भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 187
[ सर्गः ३ ]यात्राकाण्डम्१०१

तत्सीतावचनं श्रुत्वा जानकीं प्राह राघवः । हे मान्ये कञ्जनयने मम प्राणसमाश्रये ॥२१॥
शीघ्रं वदस्व यत्तेऽस्ति चित्ते तत्कारयाम्यहम् । इति राघवसम्मानवचनैर्जनकात्मजा ॥२२॥
नितरां तोषभूयैषा पाणिभ्यांऽऽश्लिषत्पतिम् ।

श्रीसीतोवाच

यदा त्वं राघवश्रेष्ठ दण्डकं वचनात्पितुः ॥२३॥
मया सौमित्रिणा साकं त्वं व्यगमस्तदाऽन्तः । शृङ्गवेरपुरं गत्वा जाह्नव्यास्तरणे यदा ॥२४॥
नौकायां स्थितमस्माभिर्भागीरथ्यां तदा पुरा । सङ्कल्पितं मया किञ्चित्तत्त्वां वक्ष्याम्यहं प्रभो ॥२५॥
देवि गङ्गे नमस्तेऽस्तु निवृत्ता वनवासतः । रामेण सहिताऽहं त्वां लक्ष्मणेन च पूजये ॥२६॥
सुरामांसोपहारैश्च नानाबलिभिरावृता । इत्युक्तं वचनं पूर्वं तज्ज्ञातं भवताऽपि च ॥२७॥
ततश्चतुर्दशे वर्षे विमानेन यदाऽऽगतम् । तदा भरतशत्रुघ्नकौसल्याविरहातुरा ॥२८॥
अहं विस्मृता रामा स्मृतिर्जाताऽद्य मे प्रभो । तन्मत्सङ्कल्पपूर्त्यर्थं गन्तुमर्हसि जाह्नवीम् ॥२९॥
मया मातृप्रभृतिभिस्त्वांश्चेति ते प्रार्थयाम्यहम् । रोचते यदि ते चित्ते न त्वामाज्ञापयाम्यहम् ॥३०॥
इति सीतांवचः श्रुत्वा प्रहस्य रघुनन्दनः । सीतामालिङ्ग्य बाहुभ्यां हर्षयन् तामृवाच सः ॥३१॥
एतद्वचनचातुर्यं कुतो जानासि मैथिलि । न तवे वचनं देवि गङ्गां प्रति ममैव तत् ॥३२॥
वचनात्तव वैदेहि श्वो गन्ता जाह्नवीं प्रति । क्व ते वाञ्छाऽस्ति दांपत्ये गङ्गां यन्तुं वदस्व मे ॥३३॥
तच्छ्रुत्वा तत्र वै स्थातुं सेनायोग्यसमं मृदु । ऋजुं कर्तुं हि पन्थानं दूतानाज्ञापयाम्यहम् ॥३४॥
ततः सीताऽब्रवीद्वाक्यं पुनः श्रीरामचोदिता । यत्र गङ्गा च सरयूः सङ्गताऽस्ति रघूद्वह ॥३५॥


आप मुझे आज्ञा दें तो मैं आपसे कुछ निवेदन करना चाहती हूँ। वह मेरा निवेदन धर्मसम्मत तथा अभ्युदयकारी होगा ॥१८-२०॥

राम सीताका बचन सुनकर कहने लगे हेकञ्जनयने ! हे मम प्राणसमाश्रय सीते ! तुम जो कहना चाहो, सो शीघ्र कहो। मै उस अभापूर करनेको वैय रहूँ। इस प्रकार रामक सम्मानभरे वचनास जनकनन्दिनी संतोषका सहगास नितरां लहलहा उठा और पतिम वन्दन लगे श्रीमाताजी बोलो-हे राघवश्रेष्ठ ! जब आप पिताके कहनेपर दण्डकावन जातक लिए मुझे तथा सुमित्रापुत्र लक्षमणको साथ लेकर अयोध्या नगर, से चले थे और जन शृंगवेरपुर जाकर जाह्नवी नदीमें नावपर हमलोग सवार हुए थे । उस समय भगवती भागीरथीका बीच धारामे मन में। संकल्प किया था। हे प्रभो ! वह मै आज आपको सुनाता हूँ ॥२१-२० ।

मै गंगाको नमस्कार करके कहा था-हे देवि ! जब मै राम तथा लक्ष्मणके साथ वनवासस लौटूँगी, उस समय सुराके, मांसके तथा अनेक प्रकारकी पूजासामग्रियोंस तुम्हारी पूजा करूंगी । उस समय कहे हुए इस बचनको आपने भी सुना था ॥२६। २७॥

पश्चात् चौदह वर्ष बाद जब हमलोग विमान द्वारा इसम लोगे तब भरत शत्रुघ्न और माता कौशल्याके वियोगस आतुर होकर तात्पर्ये मै उस बातको भूल गयी । हे प्रभो ! आज मुझे उस बातका पुन, स्मरण आया है । अतएव मरे उस संकल्पको पूरा करनेक लिए माताओं, भाइयों तथा मुझे लेकर आपके गंगाके तटपर चलना चाहिये । यही मेरा आपसे प्रार्थना है। यदि आप उचित समझें तो चलें । मै आपको इस दानका आज्ञा नही देतीं । क्योकि स्त्रीका पतिको आज्ञा देना अधर्म है किन्तु सविनय उचित परामर्श देना न्याय्य और धर्मसम्मत है । २८-३०॥

भार्याके इस वाक्यको सुनकर राम बडे प्रसन्न हुए और आलिङ्गन करके मातासे सहर्ष कहने लगे-॥ ३१ ॥

हे मैथिली ! इस प्रकारका बचनचातुर्य तुमने कहाँस आ गया? तुम्हारा यह वचन गंगाके प्रति नही, प्रत्युत मेरे ही प्रति का ॥३२॥

हे वैदेहि ! तुम्हारे कथनानुसार मै कल ही गंगाजी चलनेके लिए तैयार हूँ । हे प्रिये ! तुम्हारी जिस जगह और जिस तीर्थको चलनेकी इच्छा हो, वह कहो ॥ ३३ ॥

इस बातको जानकर मै वहाँ सेनाको ठहरनक लिए स्थान और मार्ग साफ-सुथरा करनेके लिए दूतोको आज्ञा दे दूँ ।३४।

इस प्रकार रामके पूछनेपर सीताने कहा-हे रघुनन्दन ! जहाँ गंगा और सरयूजीका संगम हुआ है, वहीपर गंगाजीके