श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 191, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः ४ ] यात्राकाण्डम् १७५
यात्रार्थे जाह्नवीतीरं गन्तुमिच्छामि भांश्वन् । अतो मुहूर्तं दातव्यं मय्यनुगृह्या विचिन्त्य च ॥४॥ तद्रामवचनं श्रुत्वा गोपालः प्राह राघवम् । पञ्चाङ्गञ्च विस्तार्य तत्र दृष्ट्वा बलाबलम् ॥५॥ राम राजीवपत्राक्ष शृणुष्वाद्य वचो मम । रविवारे महाऽह्वेषुः पुष्यनक्षत्रमंडितः ॥६॥ तस्य वक्ष्ये फलं राजन् सावधानमनाः शृणु । शृण्वन्तु मुनयः सर्वं शृणोतु ते गुरुर्महान् ॥७॥ न योगयोगं न च लग्नलग्नं न तारकाचन्द्रबलं गुरोश्च । योगिन्य सम्मुखे तर्हि काले सर्वाणि कार्याणि करन्ति पुष्यः ॥८॥ अस्मिन्नाम सुसंस्त्रं प्रस्थानं कुरु मेधया । दत्तो मया मुहूर्तोऽय यात्रार्थे रघूनायक ॥९॥ इति तस्य वचः श्रुत्वालक्ष्मणं राघवोऽब्रवीत् । भेरीमृदङ्गपणवकाहलाऽऽनकगोमुखैः ॥१०॥ तालघण्टादृढैर्भीभिर्भेषिध नवभिर्महान् । सेनायाः सूचनाथै हि कर्त्तव्यः प्रथमो ध्वनिः ॥११॥ तथेति रामवचनाल्लक्ष्मणाज्ञापयनदा । नववाद्यध्वनिं तेऽपि चक्रुर्मङ्गलसुस्वरम् ॥१२॥ ततो रामो द्विजैर्युक्तो वासिष्ठेन पुरोधसा । घृतेन प्रभुर श्राद्ध गणेशदीन् प्रपूज्य च ॥१३॥ पचार प्रोक्तविधाना रमिष्ट प्राह वं ततः । अग्निहोत्राणि संड्वैश्व स्थापितानि तु पुष्यके ॥१४॥ नेतुमर्हसि मे मातॄर्वेशुभिः पुरवामिनः । विमान करिणंचा पुष्पामालाऽतिशोभिता ॥१५॥ मोतांगस्पर्शनां मार्गो मां स्पृशंतु गजैरथम् । ततः पप्रच्छ वैदेही केन यानेन मैथिलि ॥१६॥ गमिष्यसि वद त्वं मां तदवाज्ञापयान्यहम् । तद्रामवचनं श्रुत्वा सीता ध्यात्वा तण हृदि ॥१७॥ सा प्राह मुदिता राम करिण्या गमनं मम । रोचने यदि ते चित्ते सर्वमस्तु रघूनायक ॥१८॥ तस्या वचनं श्रुत्वा दानमाज्ञाप्य लक्ष्मणम् । सीतायै दिव्यवस्त्राणि ददौ मातॄस्तथैव च ॥१९॥
मैं आपसे एक प्रश्न पूछता हूँ ॥२।३॥ आज मैं तथा यात्रा करनेके लिए गंगाजीके तटपर जाना चाहता हूँ । अतः अब खूब विचारकर कोई अच्छा मुहूर्त बतलाइए । ४ । रामचन्द्रजीके प्रश्न सुनकर गोपाल पण्डितने पञ्चाङ्ग देख तथा ग्रहोंके बलाबलका विचार करके रामसे कहा- ५ । हे कमलदलके समान सुन्दर नयननेवाले राम ! आज प्रथम प्रहरमें पुष्यनक्षत्रमे युक्त बडा अच्छा मुहूर्त है ॥ ६ उसका फल में आपसे कहता हूँ । हे राजन् ! आप, सब मुनि लोग तथा आपके गुरु वसिष्ठजी भी उसको ध्यानसे सुनें । ७ । अच्छे योगसे युक्त न हो, फिर भी, अच्छे लग्नमें लग्न न होकर भी तारा चन्द्रमा और गुरुके बलसे शून्य होनेपर भी, शुभ योगिनीके अभावम भी तथा अनिष्टकारी राहुके संनिकट होनेपर भी केवल एक पुष्य नक्षत्रके रहनेमात्रसे ही यात्राके सब दृष्ट कार्य सिद्ध होजाते हैं । ८ । हे राम इस शुभ नक्षत्रम आप सीताके साथ प्रस्थान करें । हे रघुनायक ! यात्राके लिए मैंने यह अच्छा मुहूर्त बतलाया है । ९ । उनका यह वचन सुनकर रामजीने लक्ष्मणसे कहा- हे लक्ष्मण ! समस्त सेनाको सूचना देनेके लिए भेरी, मृदंग, पणव नगाडे ढोल सुदृही, घण्टा तथा दुन्दुभी ये नौ प्रकारके बाजे जोरसे बजाये जायें ॥ १०। ११ । 'बहुत अच्छा' कहकर रामकी आज्ञाके अनुसार लक्ष्मणने दुहाई बजानेवाले उनहोंने मधुर रीतिसे नवौं बाजे बजवाये ॥ १२ ॥ इसके बाद रामने ब्राह्मण तथा अपने पुरोहित वशिष्ठजीके साथ रहकर गणपतिपूजन किया और घीसे अधिवासन श्राद्ध करके वशिष्ठजीसे कहा कि मेरा वेदोक्त रीतिसे स्थापित कराई अग्नियोंको, माताओंको तथा श्रेष्ठ पुरवासियांको विमानपर चढ़ाकर आप चलें । यहन लोगोंसे अतिशय सुशोभित तथा सीताके अङ्गस्पर्शसे पवित्र होकर रथको मार्गमें मिलें । इसके उपरान्त रामने पूछा- हे मैथिलि ! तुम किस सवारीपर सवार होना पसन्द हो, उस सवारके लिए मैं आज्ञा दे दूँ । रामचन्द्रजीके इस वाक्यको सुनकर सीताजीने एक क्षण मनमें विचार किया ॥१३-१७॥ फिर प्रसन्न होकर रामसे कहा-हे रघुनायक ! यदि आप कहें तो मेरी इच्छा हथनीपर चलनेकी है। १८ । सीताके इस इच्छाको जानकर रामजीने लक्ष्मणको सीताके लिये श्रेष्ठ उपहार करवानेकी आज्ञा दी। पश्चात् रामने सीताको तथा अपनी माताओंको पहिननेके लिए