भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

पृष्ठ 190, कुल 811 में से

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पृष्ठ 190
१७४आनन्दरामायणं[ सर्गः ४

रुक्ममाणिक्यरचितं सितच्छत्रोपशोभितम् । स्थापनीयं महादिव्यं मुक्ताहारविराजितम् ॥७१॥
सीतार्थं करिणीपृष्ठे नीलवर्णं महासनम् । रुक्मविद्रुमरत्नौघैरत्नमुक्ताविराजितम् ॥७२॥
मुक्ताफलहेमतन्तुगणैराच्छादितं वरम् । सिद्धं कार्यं महादिव्यं स्वर्णकुंभविराजितम् ॥७३॥
पुष्पमालास्तोरणानि बध्नीयानि वै पथि । नृत्यंतु वारवेश्याश्च स्तुतिं कुर्वन्तु वन्दिनः ॥७४॥
द्रव्यैर्वस्त्रैराभरणैः पूजाद्रव्यैश्च गोरसैः । पात्रैर्नानाविधैर्दिव्यैः पूर्णार्थ्याश्चोत्तमाः ॥७५॥
अन्यच्चापि मया नोक्तं यद्यद्योग्यं हि तत्पथि । सिद्धं कार्यं हि योगेन येन तुष्यति राघवः ॥७६॥
इति संदिश्य मेधावी लक्ष्मणः सह मंत्रिभिः । साय सन्ध्यादिकं कर्तुं जगाम निजमन्दिरम् ॥७७॥
सौमित्रेराज्ञया तदपि तथा चक्रुर्यथोदिताः । संतुष्टास्ते यथायोग्यं रामसन्तोषहेतवे ॥७८॥
रामोऽपि सीतया सार्द्धं मन्दिरे रत्ननिर्मिते । मञ्चके पुष्पशय्यायां सीतामालिङ्ग्य वै दृढम् ॥७९॥
रुक्मनेपथ्ययुक्ताभिर्दासीभिश्च मुहुर्मुहुः । वीजितौ बालव्यजनैर्निशि सुप्तः सुखं तदा ॥८०॥
इति श्रीमदानन्दरामायणे यात्राकाण्डे दूताज्ञाकरणं नाम तृतीयः सर्गः ॥ ३ ॥


चतुर्थः सर्गः

( रामका सरयूके दो खण्ड करना )

रामदास उवाच
राज्ञः प्रातः समुत्थाय श्रुत्वा वाद्यध्वनिं तथा । गायनं वन्दिभिर्गीतं सीतया सह राघवः ॥ १ ॥
कृत्वा नित्यविधिं सर्वं दत्त्वा दानानि विस्तृतम् । ज्योतिर्विदं समाहूय गोपालाभिख्यमुत्तमम् ॥ २ ॥
नमस्कृत्याऽथ संपूज्य गणकं गद्यवीक्ष्य तम् । भो गोपाल महाबुद्धे त्वां पृच्छेऽहं द्विजोत्तम ॥ ३ ॥


पीले, श्वेत और नीले रंगकी सुन्दर बनी हों। रामचन्द्रजीके लिए हाथपर हरे रंगके मखमलको गद्दा-तकिया लगाकर उसपर मुक्ताके हार टांग देने चाहिये और सोना तथा माणिक्योंसे रचित बहुमूल्य, दिव्य, परम सुन्दर तथा श्वेत छत्र भी लगा देना चाहिए। ७०-७१ । हे दूतम! हथियाके पीठपर महारूप दिव्य सुवर्ण, विद्रुम (मूँगे), वैदूर्यमणि, रत्न मोती तथा गजमुक्ता लगा हुआ हरा जरीदार एवं बहुमूल्य अच्छा विछावर तैयार करो और उसके होदेपर बहुतसी छोटे २ स्वर्णके कलश भी लगा दो जिससे कि वह अधिक सुन्दर प्रतीत होने लगे ॥ ७२-७३ । रास्तेमे फूलोंकी मालाएं और तोरण बाँध दो। रण्डियां नाचन तथा बन्दीगण स्तुतिपाठ करने लग जायँ ॥ ७४ ॥ बहुतसे स्थान वस्त्र, आभूषण, दुग्ध, दही, पूजाके द्रव्य तथा अच्छे-अच्छे बरतन आदि भर लिये जायें ॥ ७५ ॥ जो कुछ मैंने न कहा हो, सो भी सब जरूरी सुविधाएं सुलभ रहना चाहिए। जिन्हे देखकर रामचन्द्रजी प्रसन्न हो जावें । हे बुद्धिमान् लक्ष्मणजी आज्ञा देकर सायंकालीन संध्या-वन्दन करनेके लिए मंत्रियोंके साथ सभामवनसे बाहर आकर अपने महलमें चले गये ॥ ७७ । लक्ष्मणकी आज्ञाके अनुसार कारीगर लोगोंने प्रसन्नतासे रामजीके गुणके लिये यथायोग्य सब सामान ठीक कर दिया । ७८ । उधर रामचन्द्रजी भी अपने रत्ननिर्मित भवनमे फूलोकी शय्यापर सीताजीको दृढ़ आलिङ्गन करके रात्रिको सुखपूर्वक सोये। सोनेकी जरीदार साडियाको पहिन दासियां बार-बार उनपर बालव्यजन ( पंखा ) डुलाने लगीं ॥ ७९-८० । इति श्रीमदानन्दरामायणे यात्राकाण्डे भाषाटीकायां दूताज्ञाकरणं नाम तृतीयः सर्गः । ३ ॥

रामदास बोले—प्रातः कालके समय वन्दियोंके गायन और बाजोंके मधुर शब्दको सुनकर सीतासहित राम जागे । १॥ तब नित्यकर्मसे निवृत्त होकर उन्होंने अनेक तरहके दान दिये और गोपाल नामके ज्योतिषीको बुलवाकर रामने नमस्कार तथा पूजा करके कहा-हे ब्राह्मणोंमे श्रेष्ठ और महाबुद्धिमान् गोपाल महाराज !

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