भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 189

सर्गः ३ ] यात्राकाण्डम् [ १७३

एतानाज्ञापयामास तोषयित्वा धनादिभिः । समानिनान्य तीर्थेभ्यित्र कल्पयामास सादरम् ॥५४॥ समुद्योगो राघवस्य सीतायाः श्वो बलैः सह । ऋजुमार्गा विधातव्याः समाः कर्तुमयत्नितः ॥५५॥ निम्ना भूमिः समा कार्या उच्चा भूमिः समत्विच । छिद्यन्तां पावना वृक्षा मार्गस्था दुःखदायकाः ॥५६॥ वाप्यः कूपास्तडागाश्च शोधनायाः सहस्रशः । नवीनाश्चापि कर्तव्याः सतोया निर्जने वने ॥५७॥ सेनानिवेशस्थानानि योजनाद्वै सविस्तरे । कल्प्यं पानि सुगन्धिः पूरितान्यम्वारिभिः ॥५८॥ सुन्दर्यो रम्या विधातव्याः पाकशालाः सुभाजयः । वर्ष्मगवेहाणि कार्याणि तूर्णञ्चापि सहस्रशः ॥५९॥ आरक्तमुपरं गच्छद्वित्तानि चित्रितारिन हि । नानागृहाणि कार्याणि पूरितान्यम्ववारिभिः ॥६०॥ पुष्पाणां वाटिकाः कार्याः शतशोऽथ सहस्रशः । मार्ग मार्ग कौतुकार्थ चित्राण्यनेकशः ॥६१॥ नरस्कन्धगताश्चित्रवाटिकाश्च सहस्रशः । पुष्पाणां वाटिकाश्चारूत्स्वानिर्दिताः शुभाः ॥६२॥ मार्गे मार्गे गायकानां स्थलान्यपि सहस्रशः । सर्वानिवेशस्थानेषु हर्म्य्यश्चरथवाजिनाम् ॥६३॥ सहस्रशो विधाक्तव्याः शालाः पर्णाम्बुवारिभिः । सुगन्धचर्दनमार्गाः सेचनीयाः समंततः ॥६४॥ नेमिरेखाऽपि मा मार्गे विचित्रवर्मनर्गृहाः । पुष्पन्च्छादनीयास्ते हृद्याः सन्तु समंततः ॥६५॥ मृगैर्गर्गेतचित्रेय हस्त्युष्ट्ररथवाजिनः । वस्त्रासङ्घारघण्टाभिः शोभनीयाः सहस्रशः ॥६६॥ शकटेषु तथोष्ट्रेषु वृषलेषु व्यादेषु । शलक्यः परिघा बाणाः शक्तयः कार्मुकान्यपि ॥६७॥ स्थापनीयानि शतशो विधातव्या ध्वजा अपि । चतूर्ष्वपि विधातव्या ध्वजा रामरथेपु हि ॥६८॥ हनुमत्कोविदागण्डवैष्णवाङ्किताः शुभाः । चतूर्ष्वपि बध्नीयाः पताकाः स्यदनेषु हि ॥६९॥ हरितश्वेतपीतन लक्षणाः पन्चतीमनाः । गङ्गपृष्ठे शश्वदार्थं हरिद्रार्गाङ्कितान्वरम् ॥७०॥


निर्माणमे निपुण दर्जी, रंगरेज इन्जन जल छानवाले शिल्पी तथा अन्यान्य नाना कर्मोमें कुशल, रस्सी बटने-वाले और मुद्रार चलानेवाले आदिको एकत्र बुलाकर वस्त्र आदिसे सत्कार करके प्रसन्न किया और आदरपूर्वक उनसे कहा- ॥ ५४ ॥ कल राम सीता से इस रम्य तीर्थयात्राके लिए जानेवाले हैं। सो तुम लोग उनके सम्पूर्ण मार्गको कंकड पत्थर बीनकर साफ-सुथरा कर दो। ५५। रास्तेकी ऊंची-नीची जमीन बराबर कर दो। मार्ग में रुकावट पडते हु वृक्षोंको काट डालो ॥ ५६ ॥ रास्तेकी बावड़ी, कूपों तथा तालावोंको साफ कर दो और निर्जन वनमें नये सैकड़ा तालाब कूप आदि खाद दो ॥ ५७ ॥ आधे आधे योजनपर सेनाके लिए शिविर बनाकर अच्छे जलसे परिपूर्ण कर दो ॥ ५८ ॥ सुन्दर दशा में सही करके भोजनलय और चूल्हे तयार करो, जगह जगह घास तथा घासके भण्डार लगा दो ॥ ५९ ॥ पक्के हुए लाल कपड़ास छाये हुए चित्र विचित्र उत्तम प्रचुरभोजन अन्न फल संचित करके रक्खा हो । ६० ॥ मध्यम स्थान स्थानपर कपड़ा लगा हुआ तम्बुओंमें आनन्द करनेके लिए दीवारोंपर रंग बिरंगे चित्र खीच दो तथा मनाविनोदके लिए बाह्य बाष्प पुष्पवाटिकाएं लगा दो । ६१ ॥ नर पुतलियोंके कंधेपर रक्खे हुए सूर्यांग समान अथवा आभान्तर शोभा के फूलों से गमलोंको सजाकर स्थान स्थानपर सैकड़ों हजारों वाटिकाएं तयार कर दो । ६२ ॥ पथ-पथपर गायकोंको गायनशालायें रख दो। सेनाके हर एक संनिवेशस्थानपर दान तथा धाममें पूर्ण अनेक अश्वशालायें और हस्तिशालाये तयार कर रक्खो, चन्दन तथा गुलाब आदिके सुगन्धित जल सब रास्तेमें छिड़कवा दो तथा चित्र-विचित्र झारोवाले रुपेहले तम्बू बनाकर जगह-जगह गाड़ दो और उनपर विविध रंगके पुष्पमालाएँ टांग दो। उनके चारों ओर बाजार लगा हो ॥ ६३-६५ ॥ तमाम हाथी घोड़े, ऊँट तथा रथोंको वस्त्र अलंकारसे अलंकृत करक तथा घण्टे आदि वाधकर सुसज्जित कर दो ॥ ६६ ॥ बैलगाड़ियोंमें ऊँटोंपर और रथ आदिपर धनुष-बाण, मुद्गर, शक्तियें, तोप अथवा बन्दूकें रख दो। ६७ ॥ छतोंके चौतरफा और दरवाजे आदिपर ध्वजाएं गाड़ तथा बांध दो। रामजीके चारों रथापर भी ध्वजाएं बांध दो । ६८ ॥ उन चारों स्यन्दनोंपर हनुमान्, कोविदार, गरुड़ और बाणके चिह्नोंवाली पताकाएं होनी चाहिये ॥ ६९ ॥ वे ध्वजाएं हरे,