श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 195, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः ४ ] यात्राकाण्डम् १०९
तन्मुनेर्वचनं श्रुत्वा पुनस्तं प्राह राघवः । किं कृत्वा मेऽत्र वसतिर्भविष्यति मुने वद ॥७१॥
तद्रामवचनं श्रुत्वा राघवं प्राह मुद्गलः यद्यत्र सरयूगङ्गाः संगमो हि भविष्यति ॥७२॥
जाह्नव्या सदृशं चात्रं वन्द्ये राम यथार्जुनम् तत्तस्य वचनं श्रुत्वा राघवः प्राह तं पुनः ॥७३॥
किमर्थं सरयूः श्रेष्ठा कुतः प्राप्ता धरातलम् तन्मे वद महाभाग सविस्तारं मयाग्रतः ॥७४॥
तद्रामवचनं श्रुत्वा मुद्गलो वाक्यमब्रवीत् । तवैव चरितं राम सन्मुखाच्छ्रोतुमिच्छसि ॥७५॥
तर्हि ते संप्रवक्ष्यामि तच्छृणुष्व रघूत्तम । शङ्खासुरो महादैत्यो वेदान् पूर्वं जहार हि ॥७६॥
क्षिप्त्वा तांश्च समुद्रे हि स्वयमासीन्महोदधौ । तदर्थं च त्वया मात्स्यं वपुर्धृत्वा महत्प्रभु ॥७७॥
हतः शंखासुरो वेदास्त्वया दत्तास्तु वेधसे । ततो हर्षेण महता पूर्वरूपं त्वया धृतम् ॥७८॥
तदा हर्षेण नेत्रात्ते पतिताश्चाश्रुबिन्दवः । हिमालये ततो जाता नदी पुण्या शुभोदका ॥७९॥
साक्षान्नारायणस्येवेह आनन्दाश्रुसमुद्भवा । उर्वी तैर्विन्दुसारः प्राप्तं तस्माच्च मानसं ययौ ॥८०॥
एतस्मिन्नन्तरे राम पूर्वजन्मे महत्तमः । वैवस्वतो मनुर्यष्टुमुद्युक्तो गुरुमब्रवीत् ॥८१॥
अनादिमिद्धाऽयोध्धेयं विशेषेणापि वै मया रचिता निजवासार्थमत्र यज्ञं करोम्यहम् ॥८२॥
यदि ते रोचते चित्ते तच्छ्रुत्वा गुरुरब्रवीत् अत्र तीर्थं वरं नास्ति नास्ति श्रेष्ठा महानदी ॥८३॥
यद्यत्रेवास्ति ते रुच्यं यष्टुं नृपतिसत्तम । आनयस्व नदीं रम्यां मानसात्पातकापहाम् ॥८४॥
तद्गुरोर्वचनाद्राजा मनुर्वैवस्वतो महान् । टणकृत्य महच्चापं सन्दधे शरमुत्तमम् ॥८५॥
स शरो मानसं भित्त्वा तस्मान्निष्काश्य तां नदीम् । अयोध्याम्यानयामास पन्थानं दर्शयन्निव ॥८६॥
शरमार्गानुसारेणायोध्यायां प्राप वै नदी महोदधौ पूर्वदेशे मिलिता रघुनन्दन ॥८७॥
भूताया। आगे क्या करना है, सो कहिये ॥ ७० ॥ मुनिके इस वाक्यको सुनकर रामने कहा— हे मुने अब यह बताइये कि क्या करनेसे आप फिर इस आश्रममें निवास कर सकते हैं? ॥ ७१ ॥ रामके प्रेमपूर्ण वचनको सुनकर मुद्गल ऋषि बोले— यदि यहाँपर सरयू और गंगाका संगम हो जाय तो मैं बड़े सुखसे रह सकता हूँ। इस बातको सुनकर रामने पुनः उनसे प्रश्न किया— ॥ ७२ ॥ ७३ ॥ हे महाभाग ! सरयू नदीका इतना श्रेष्ठ माहात्म्य क्यों है और वह कहाँसे धरातलपर आयी है ? इन बातोंका विस्तारसे वर्णन करिए ॥ ७४ ॥ मुद्गलने कहा हे प्रभो ! आप अपना ही चरित्र यदि मेरे मुखसे सुनना चाहते हैं ॥ ७५ ॥ तो हे रघूत्तम ! मैं आपको सुनाता हूँ, सुनिए पवित्र कथा शंखासुर नामका एक बड़ा भारी राक्षस हुआ था। वह सब वेदोंको हर ले गया ॥ ७६ ॥ उसने समुद्रमें जाकर समुद्रमं डुबो दिया तथा स्वयं भी उसी महासागरमे छिप गया उसको मारनेके लिए आपने बड़े भारी मत्स्यका रूप धारण किया ॥ ७७ ॥ और उसको मारकर वेदोंकी रक्षा की। वेदोंको लाकर आपने ब्रह्माको दिया और प्रसन्नतापूर्वक पुन अपना पूर्वरूप धारण कर लिया ॥ ७८ ॥ उस समय आपके नेत्रोंसे आनन्दाश्रुकी बूंदे टपक पड़ीं। हिमालयपर गिरी हुई आप नारायणके उन हर्षाश्रुकी बूंदोंने एक पवित्र तथा निर्मल जलवाला नदीका रूप धारण कर लिया। आगे चलकर वे कासार और कासारसे मानसरोवरके रूपमें परिणत हो गयी ॥ ७९ ॥ ८० ॥ हे राम ! उसी समय आपके पूर्वज महात्मा वैवस्वत मनुने यज्ञ करनेकी इच्छा करके अपने गुरुसे कहा— ॥ ८१ ॥ इस अयोध्यापुरीके अनादिकालसे स्थित रहनेपर भी मैंने अपने निवासके लिए इसकी कुछ विशेषतापूर्वक रचना करवायी है। इस कारण यदि आप कहें तो मैं इस नगरीमे यज्ञ करूँ। तब गुरुने कहा कि रुशिए, न तो यहाँ कोई पवित्र तीर्थ है और न कोई बड़ी नदी ही है ॥ ८२ ॥ ८३ ॥ इसलिये यदि आपकी यहीं यज्ञ करनेकी इच्छा हो तो हे नृपतियोंमें श्रेष्ठ नृप ! मानसरोवरसे सुन्दर तथा पापोंको नष्ट करनेवाली एक नदीको यहाँ ले आइए ॥ ८४ ॥ गुरुके इस वचनको सुनकर महान् राजा वैवस्वत मनुने अपने विशाल धनुषका बड़ा तथा टंकोर करके बाण चलाया ॥ ८५ ॥ वह बाण मानसरोवरको भेदकर उसमेंसे निकली नदीके आगे-आगे चलकर रास्ता दिखाते हुए अयोध्या ले आया। बाणके मार्गका अनुसरण करती हुई वह नदी अयोध्या आयी तथा वहाँसे आगे जाकर पूर्वी महा-