भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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१८०आनन्दरामायणे[ सर्गः ४

आनीता सा शरैरेव सरयूरिति कथ्यते । सरोवरात्समुद्भूता सरयूरिति केचन ॥८८॥
ततो भगीरथेनेयं कपिलक्रोधवह्निना । विनिर्दग्धान् पूर्वजान् वै सागरात् प्रेषितुं दिवम् ॥८९॥
भागीरथी समानीता त्वत्पादाब्जसमुद्भवा । तपसा शङ्करं तोष्य सरय्वा मिलिताऽथ सा ॥९०॥
वरदानाच्छंभोर्गङ्गा ख्यातिं गमिष्यति । अग्रे सागरपर्यन्तमेनां गङ्गां वदन्ति हि ॥९१॥
तव पादसमुद्भूता या विश्वं पाति जाह्नवी । इयं तु नेत्रसंभूता किमत्राग्रे वदाम्यहम् ॥९२॥
कोटिवर्षसहस्रैश्च कोटिवर्षशतैरपि । महिमा सरयूनद्याः कोऽपि वक्तुं न वै क्षमः ॥९३॥
इति राम समाख्यातं यथा पृष्टं त्वया मम । मुनेस्तद्वचनं श्रुत्वा लक्ष्मणं प्राह राघवः ॥९४॥
सरयूमानयस्वात्र शरं मुक्त्वा ममाज्ञया । तथेति रामवचनाद्गत्वा चापं स लक्ष्मणः ॥९५॥
शरं मुक्त्वा तटं भित्त्वा सरयूमानयन्क्षणात् । सरयू सा द्विधा भूत्वा मुद्गलाश्रममाययौ ॥९६॥
जाह्नव्या मिलिता सावेक्षां दृष्ट्वा राघवोऽब्रवीत् । अत्र स्थित्वा लक्ष्मणेन दारितेयं महानदी ॥९७॥
अतो ददरीति नाम्नाऽत्र नगरी ख्यातिमेष्यति । ददरीयं जगतीमध्ये बदर्याश्च यथाधिका । ९८॥
भविष्यति न संदेहस्त्वत्र रामाग्निसेवनात् । ततः सीतां समाहूय राघवो वाक्यमब्रवीत् ॥९९॥
मुद्गल्याश्रम एवैषा नीता सरयूनदी । पश्य सौमित्रिणा मुक्त्वा शरं मन्नामचिह्नितम् ॥ १००॥
नारीभिर्मातृभिः सार्धं पुण्यकेनाभिभाष्यता । दृष्ट्वा मां सरयुर्यत्र संगताऽस्ति महानदी ॥१०१॥
जाह्नव्या संगमे स्वं दिगच्छस्व गुरुणा द्विजैः । पूरयित्वा सविस्तारं यथोक्तं वचनं पुरा ॥१०२॥
आगच्छस्व ततः शीघ्रमुत्र त्वं मम सन्निधौ । विशेषान्मुद्गलस्यापि सन्निधावथ वै पुनः ॥१०३॥
नवीनसरयूनद्या भागीरथ्यास्तु संगमे । पूजनं त्वं मया साकं कर्तुमर्हसि मैथिलि ॥१०४॥


सागरम मिल गयीं ॥८८॥८९॥ शरके द्वारा लायी आनम लोग उसको सरयू नदी कहने लगे । अथवा सरोवरसे निकलकर आनेके कारण उसका 'सरयू' नाम पडा, कुछ लागोंका ऐसा कथन है ॥ ८८ ॥ उसके बाद राजा भगीरथ कपिल मुनिका कोपामिसम अगाये गय अपन पूर्वज सगर पुत्रोंको स्वर्ग भेजनेकी इच्छासे आपके चरणारविन्दसे प्रादुर्भूत भागीरथी गङ्गाको ले आये । बादम शङ्करजीको तपसे प्रसन्न करके उस नदीको सरयूसे ला मिलाया । ८९ ॥९०। शङ्करभगवान्के वरदानस गंगाको बडी भारी प्रसिद्धि हुई तथा समुद्र तक उसको लोग गंगा कहन लगे ॥ ९१ ॥ हे प्रभो आपके चरणकमलोंसे निकली हुई गया समस्त विश्वको पवित्र करने लगी। वैसे ही आपके नेत्रजलसे उत्पन्न होकर यह सरयू भी लोगोंको पावन करने लगी । हे भगवन् ! अब मैं आगे क्या कहूँ ? ॥ ९२ ॥ करोड़ों वर्षोंमें भी इस सरयू नदीकी महिमाका वर्णन कोई नहीं कर सकता ॥ ९३ ॥ हे राम ! आपने जो पूछा था, सो मैंने कह सुनाया । मुनिके इस वाक्यको सुनकर रघुपति रामचन्द्रजीने लक्ष्मणसे कहा- ॥ ९४ ॥ तुम बाण छोड़ तथा सरयूके तटको भेदन करके उसे यहाँ ले आओ । लक्ष्मणने वैसा ही किया और वह सरयू दो भागोंमें विभक्त होकर क्षणभरमें मुद्गलऋषिके प्राचीन आश्रमम आ पहुंची ॥ ९५ ॥ ९६ ॥ उसको अकेली ही नहीं, किन्तु जाह्नवीके समम सहित आयी हुई देखकर रामने कहा कि लक्ष्मण दारण (चीर) करके इस नदीको यहाँ ले आये हैं ॥ ९७॥ इसलिए इस जगहपर दरी नामकी प्रसिद्ध नगरी बसेगी । वह दरी नगरी पृथ्वीतलमें बदरीनाथ धामम भी जीधर बढ़कर पुनीत होगी ॥ ९८ ॥ इसमें संदेह नहीं है । विशेष करके आपके यहाँ निवास करनेसे इसकी और भी अधिक ख्याति होगी । पश्चात् रामने सीताको बुलाकर कहा-॥६९॥ सीते ! देखो, सुमित्रापुत्र लक्ष्मण मेरे नामसे चिह्नित बाण छोड़कर सरयू नदीको यहाँ मुद्गल मुनिके आश्रमम ले आये हैं ॥ १०० ॥ अब तुम हमारी माताओं, अन्य स्त्रियों, गुरुजनों तथा ब्राह्मणोंके साथ स तथा इस पुण्यक विमानपर स्वार होकर जहाँ सरयू तथा गंगाका संगम है, वहाँ जाओ और अपनी प्रतिज्ञाके अनुसार विधिवत् उनकी पूजा कर आओ ॥ १०१ ॥ १०२ ॥ वहाँसे लौटकर शीघ्र ही मेर हवा इन मुद्गल मुनिके सम्मुख इस नवीन सरयू तथा भगवती भागीरथीके संगमका