भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 205

सर्गः ६ ] यात्राकाण्डम् १८९


घट्टं बबन्ध गङ्गायास्तटे रम्यं दृढन्मयम् । काश्यामद्यापि तन्नाम्ना घट्टोऽस्ति परमः शुभः ॥ ३६ ॥
तथा चकार रामोऽपि घट्टञ्चञ्चन्मृण्मयम् । दृश्यते प्रत्यहं यत्र काश्यां रामः ससीतया ॥ ३७ ॥
चकार पञ्चगङ्गायां कार्तिकस्नानमुत्तमम् । काशीवासं वर्षमेकं चकार धर्मतत्परः ॥ ३८ ॥
तीर्थवासिनः सर्वान् सन्तर्प्य च पृथक् पृथक् । रत्नैर्हिरण्यैर्वासोभिश्चाभरणैर्धेनुभिः ॥ ३९ ॥
विविधैश्च दक्षाऽन्नैः स्वर्णशृंग्यादिनिर्मितैः । अमृतस्वादुपक्वान्नैः पायसैश्च सशर्करैः ॥ ४० ॥
सगोभिरन्नदानैर्धान्यदानैरनेकशः । गन्धचन्दनकर्पूरैस्ताम्बूलैश्चामरैः ॥ ४१ ॥
सतूलैर्मृदुपर्यङ्कैर्दीपिकादर्पणासनैः । शिबिकादावदासीभिवाहनैः पशुभिर्गृहैः ॥ ४२ ॥
चित्रध्वजपताकाभिश्चूलोद्यद्यंत्रचारुभिः । नानावस्त्रैर्महाहैः सच्छत्राशफामादाभ्यः ॥ ४३ ॥
वर्णाश्रमप्रदानैश्च गृहोपस्करसंयुतैः । उपानत्पादुकाभिश्च यतेश्चापि तपस्विनः ॥ ४४ ॥
योग्यैः पट्टदुकूलैश्च मृत्स्नैश्चित्रेकम्बलैः । दण्डैः कमण्डलुयुतैराजनैर्मृगचर्मभिः ॥ ४५ ॥
कौपीनैरुच्चमञ्चैश्च परिवारककाञ्चनैः । मठाविद्यार्थिनाम्नेनाश्रयार्थं महाधनैः ॥ ४६ ॥
बहुषोधप्रदानैश्च भिषजां जीवनादिभिः । महत्पुस्तकसभारैर्लेखकानां च जीवनैः ॥ ४७ ॥
म्यायनेसमूल्यैश्च पत्रदानैरनेकशः । ग्रैष्म प्रपात्रद्यूषणहैमन्तेऽम्नाष्टकेन्धनैः ॥ ४८ ॥
छत्राच्छादनकार्यैश्च वर्षाकालोचितैर्बहु । रात्रौ पाठप्रदपैश्च शराभ्यञ्जनकादिभिः । ४९ ॥
पुराणपाठकांश्चापि प्रतिदेवालयं धनैः । देवालये नृत्यगानकराण्याचरन्नकशः । ५० ॥
देवालये सुधाकार्यैर्जीर्णोद्धारैरनेकशः । चित्रलेखनमून्यैश्च रङ्गशालादिसम्डनैः । ५१ ॥
जातीर्तिकर्पूग्मुलैश्च दशंशादिमुपूवकैः । कस्तूरिकार्थेश्च दत्वाचाचरन्नकशः । ५२ ॥


एक कल्याणकारी तीर्थ बनाया ॥ ३५ ॥ गङ्गाजीके तटपर उन्होंने सुन्दर पक्काका एक घाट बनवाया, जो कि अभी भो काशीम हनुमानघाट के नामसे प्रसिद्ध है ॥ ३६ ॥ इस प्रकार रामनन्दन भी उत्तम घाट बनवाया, जो कि आज दिन भा काशामे रामघट के नामसे वर्तमान है। पश्चात् रामन सताक साथ पञ्चगङ्गाम स्नान किया उस समय कार्तिकका उत्तम मास था। इस प्रकार रामनं १ वर्षभर काशाम धर्मतत्पर होकर निवास किया ॥ ३७ ॥ ३८ ॥ पश्चात् समस्त तीर्थवासियों को पृथक् पृथक् रत्न सुवर्ण, वस्त्र, अश्व, आभरण, गाय, सोना-चांदाक विभिन पत्र, अमृततुल्य पकवान तथा शर्कर मिश्रित दुग्धदानस प्रसन्न किया ॥ ३९ ॥ ४० ॥ व सयुक्त अन्नदान तथा धान्यदानस भो उन्ह सन्तुष्ट किया। बहुतको सुगन्धित चन्दन, कपूर, ताम्बूल, मनोहर चमर, कोमल तूला भरे हुए गर्म तकिए, दीवट, दर्पण, आसन, पालका, दास दासी, वाहन, पशु तथा भवन देकर प्रसन्न किया ॥ ४१ ॥ ४२ ॥ बहुतोको चित्र-विचित्र ध्वज-पताका, चन्द्रमाका नासिका समान निमल छतरी, शालिग्राम, बड़े-बड़े छत्र दान करक ध्वजारोपण, वर्णाश्रमदान तथा गृहस्थाका सामग्री देकर प्रसन्न किया। विप्राकी उपानह तथा संन्यासी यतियों और तपस्वियोंको खडाऊं, उनके योग्य कमलरोगरहित वस्त्र, कम्बल, दण्ड-कमण्डलु, चित्र-विचित्र मृगचर्म, कौपीन, ऊंचे-ऊंचे खटोले, सदक, मठ, उसका रत्ताक लिए तथा विद्यार्थी और अतिथिसत्कारक लिए सुवर्ण तथा बहुत-सा धन देकर संतुष्ट किया ॥ ४३-४६ ॥ वैद्याको उनकी जीविकाक साधनभूत बहुतसे औषध दान देकर, लेखकोंकी जीविकाके साधनभूत बहुतसे पुस्तकसमूह देकर, बहुतोंको बहुमूल्य रसायन दान देकर और बहुतोंके लिए अन्नक्षेत्र खोलकर सन्तुष्ट किया। बहुतोंका ग्रीष्मऋतुमे पीनेके वास्त जन दकर तथा बहुतोंको हेमन्तक योग्य काष्ठ बादिके वास्ते द्रव्य देकर प्रसन्न किया ॥ ४७ ॥ ४८ ॥ बहुतोंको वर्षाकालोचित छत्र तथा आच्छादन देकर आनन्दित किया । बहुतोंको रात्रिके समय पढ़नेके लिए दीवादिका प्रबन्ध कर दिया। बहुतोंको शरीरमें अभ्यङ्ग ( मालिश ) करनेके लिए तैल आदि सुगन्धित द्रव्योंका दान देकर राजी किया। ४९ ॥ हर एक देवालयमे पुराणपाठ करनेवालोंको धन देकर संतुष्ट किया। देवालयोंमें अनेक नृत्य गीत करवाये। उनका जीर्णोद्धार करवाकर चूना पुतवा दिया। उनमें बहुतेरे चित्र बनवा दिये। उनमें केशर बादि रङ्ग तथा माला आदिका प्रबन्ध करवा दिया ॥ ५० ॥ ५१ ॥ देवपूजाके