भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 206

१२० आनन्दरामायणे [ सर्गः ६

पञ्चामृतानां स्नपनैः सुगन्धस्नपनैरपि । देवार्थं मुख्यताम्बूलैः देवोद्यानैर्नैकशः ॥५३॥ महापूजार्थं माल्यादिगुम्फनार्थं त्रिकालतः । शङ्खभेरीमृदङ्गादिवाद्यनादैः शिवालये । ५४॥ घण्टामृदङ्गकुम्भादिस्नानोपकरणाननैः । श्वेतमार्जनवस्त्रैश्च सुगन्धैर्यक्षकर्दमैः ॥५५॥ जपहोमैः स्तोत्रपाठैः शिवनामोच्चचारणैः । रासक्रीडादिसंयुक्तश्चामरैः प्रदक्षिणैः ॥५६॥ एवमादिभिरुद्दण्डैः क्रियाकाण्डैर्नैकशः वर्षमेकमुषित्वा तु कृत्वा तीर्थान्यनेकशः ॥५७॥ दीनानाथांश्च सन्तर्प्य नत्वा विश्वेश्वरं विभुम् । ब्रह्मचर्यादिनियमैर्ऋतुकालगमेन च ॥५८॥ मत्स्यसम्भाषणेनापि तीर्थमेवं प्रभाव्य च । नत्वा पुनर्विश्वनाथं कालराजं गणाधिपम् ॥५९॥ अन्नपूर्णां दण्डपाणिं दृष्ट्वा स्तुत्या प्रणम्य च । अनुज्ञातः शिवेनाथ विमानेन रघूत्तमः ॥६०॥ ययावाकाशमार्गेण गङ्गाया दक्षिणे तटे । कर्मनाशां नदीं दृष्ट्वा च्यवनस्याश्रमं ययौ ॥६१॥ रामचन्द्रः पुष्पकस्थः स्नात्वा नत्वा मुनीश्वरम् रामतीर्थं च रामेशं चकार तत्र राघवः । ६२। निजबाणकृतां रेखां दर्शयामास तान् जनान् । काश्या अप्यधिकान्यत्र दत्त्वा दानान्यनेकशः ६३॥ ययौ यानेन दिव्येन स्वर्णभद्रस्य सङ्गमम् । यानि यानि हि तीर्थानि राघवश्च गमिष्यति । ६४॥ उत्तरोत्तरतस्तेषु दानाधिक्यं करिष्यति । यत्र यत्र रघुश्रेष्ठो गमिष्यति ससीतया । ६५॥ तत्र तीर्थान्यनेकानि भविष्यन्ति महान्ति च शेषोऽपि तेषां संख्यां हि वक्तुं नात्र क्षमो भवेत् ॥६६॥ तेषु तीर्थानि श्रेष्ठानि षड् ज्ञेयानि मनीषिभिः । बन्धूनां चैव चत्वारि सीतायाः पञ्चमं स्मृतम् । ६७॥ षष्ठमञ्जनिपुत्रस्य सर्वत्रैव विनिश्चयः । रामः स्नात्वा स्वर्णभद्रगङ्गयोः सङ्गमे मुदा ।६८। त्रिरात्रं समतिक्रम्य गण्डकीसंगमं ययौ । कस्मिंस्तीर्थे त्रिरात्रं च पञ्चरात्रमथ क्वचित् ।६९॥


दिए आरती गुगुल दशांग, धूप, दीप, कपूर आदि अनेक वस्तुयें दिलवायीं ॥ ५२ ॥ देवताओंके लिए पंचामृतके स्नानका प्रबन्ध, सुगंधित गुलाबजल आदिसे स्नानका प्रबन्ध मुख्यताम्बूल पान आदिका प्रबन्ध, तथा उनके लिए उद्यान आदिका प्रबन्ध भी करवा दिया ॥ ५३ ॥ सब शिवालयोंमें त्रिकाल पूजाके लिए माला गूँथनेका प्रबन्ध, शंख, नगाड़ा मृदंग आदि बाजोंका प्रबन्ध एवं घडी घंटा कलश गड़वा तथा स्नानके सामानका प्रबन्ध कर दिया। मार्जनके लिए श्वेत वस्त्र तथा सुगंधित द्रव्य चन्दन, केशर, अगर, तगर, कपूर आदिके लेपनका भी स्वयं ही प्रबन्ध करवा दिया। उसी प्रकार देवालयोंमें जप, होम, स्तोत्रपाठ, उच्च शिवनामोच्चारण प्रदक्षिणा तथा चँवर लेकर रासक्रीड़ा आदि अन्यान्य क्रियायें करते हुए रामने काशीमें एक वर्ष बिताया वहाँके अनेक तीर्थ किये । उन्होंने दीनानाथ विश्वेश्वर भगवान् शिवका सन्तुष्ट किया, ऋतुकालमें ही ब्रह्मचर्य धारणकर तथा मत्स्यसंभाषणका अनुष्ठान करके वीर्यके नियमोंका पालन किया। अनन्तर विश्वनाथको, कालभैरवको, गणाधिपको, अन्नपूर्णाको तथा दण्डपाणिको बारंबार नमस्कार करके तथा उनकी स्तुति करके उनसे जानेकी आज्ञा माँगी । उनसे अनुज्ञात होकर रघूत्तम राम विमानपर सवार हुए ॥ ५४-६० ॥ और आकाशमार्गसे गङ्गानदीके दक्षिण तटकी ओर चल दिये । रास्तेमें उनको कर्मनाशा नदी मिली । बादमें च्यवनमुनिके आश्रमपर पहुँचे ॥ ६१॥ पुष्पक विमानसे उतरकर रामचन्द्रजीने स्नान करके मुनिके दर्शन किये और यहाँ अपने नामसे रामेश्वर तथा रामतीर्थ स्थापित किया ॥ ६२ ॥ वहाँ अपने साथवालोंको अपनी बनायी हुई बाणका रेखा दिखलायी अन्तमें वहाँपर काशीसे भी अधिक दान पुण्य करके दिव्य विमानके द्वारा शोणभद्र तथा गङ्गाके सङ्गमपर गये। उसी प्रकार आगे भी राम जिन-जिन तीर्थोंमें जायेंगे, वहाँ-वहाँ उत्तरोत्तर अधिक दान करेंगे जहाँ जहाँ राम सीताके साथ पधारेंगे वहाँ वहाँ अनेक बड़े बड़े तीर्थ बनेंगे । जिनकी संख्याको शेष-नाग भी नहीं बता सकते ॥ ६३-६६॥ परन्तु विचारशील लोगोंको उनमें भी छः तीर्थोंको मुख्य समझना चाहिये। चार चार भाइयोंके, पाँचवाँ सीता तथा छठवाँ हनुमानका। इनके विषयमें कभी भी संदेह नहीं करना चाहिये । श्रीराम शोणभद्र तथा गङ्गाके सङ्गममें स्नान करनेके पश्चात् वहाँ तीन रात निवास करके प्रसन्न मनसे