श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
१२० आनन्दरामायणे [ सर्गः ६
पञ्चामृतानां स्नपनैः सुगन्धस्नपनैरपि । देवार्थं मुख्यताम्बूलैः देवोद्यानैर्नैकशः ॥५३॥ महापूजार्थं माल्यादिगुम्फनार्थं त्रिकालतः । शङ्खभेरीमृदङ्गादिवाद्यनादैः शिवालये । ५४॥ घण्टामृदङ्गकुम्भादिस्नानोपकरणाननैः । श्वेतमार्जनवस्त्रैश्च सुगन्धैर्यक्षकर्दमैः ॥५५॥ जपहोमैः स्तोत्रपाठैः शिवनामोच्चचारणैः । रासक्रीडादिसंयुक्तश्चामरैः प्रदक्षिणैः ॥५६॥ एवमादिभिरुद्दण्डैः क्रियाकाण्डैर्नैकशः वर्षमेकमुषित्वा तु कृत्वा तीर्थान्यनेकशः ॥५७॥ दीनानाथांश्च सन्तर्प्य नत्वा विश्वेश्वरं विभुम् । ब्रह्मचर्यादिनियमैर्ऋतुकालगमेन च ॥५८॥ मत्स्यसम्भाषणेनापि तीर्थमेवं प्रभाव्य च । नत्वा पुनर्विश्वनाथं कालराजं गणाधिपम् ॥५९॥ अन्नपूर्णां दण्डपाणिं दृष्ट्वा स्तुत्या प्रणम्य च । अनुज्ञातः शिवेनाथ विमानेन रघूत्तमः ॥६०॥ ययावाकाशमार्गेण गङ्गाया दक्षिणे तटे । कर्मनाशां नदीं दृष्ट्वा च्यवनस्याश्रमं ययौ ॥६१॥ रामचन्द्रः पुष्पकस्थः स्नात्वा नत्वा मुनीश्वरम् रामतीर्थं च रामेशं चकार तत्र राघवः । ६२। निजबाणकृतां रेखां दर्शयामास तान् जनान् । काश्या अप्यधिकान्यत्र दत्त्वा दानान्यनेकशः ६३॥ ययौ यानेन दिव्येन स्वर्णभद्रस्य सङ्गमम् । यानि यानि हि तीर्थानि राघवश्च गमिष्यति । ६४॥ उत्तरोत्तरतस्तेषु दानाधिक्यं करिष्यति । यत्र यत्र रघुश्रेष्ठो गमिष्यति ससीतया । ६५॥ तत्र तीर्थान्यनेकानि भविष्यन्ति महान्ति च शेषोऽपि तेषां संख्यां हि वक्तुं नात्र क्षमो भवेत् ॥६६॥ तेषु तीर्थानि श्रेष्ठानि षड् ज्ञेयानि मनीषिभिः । बन्धूनां चैव चत्वारि सीतायाः पञ्चमं स्मृतम् । ६७॥ षष्ठमञ्जनिपुत्रस्य सर्वत्रैव विनिश्चयः । रामः स्नात्वा स्वर्णभद्रगङ्गयोः सङ्गमे मुदा ।६८। त्रिरात्रं समतिक्रम्य गण्डकीसंगमं ययौ । कस्मिंस्तीर्थे त्रिरात्रं च पञ्चरात्रमथ क्वचित् ।६९॥
दिए आरती गुगुल दशांग, धूप, दीप, कपूर आदि अनेक वस्तुयें दिलवायीं ॥ ५२ ॥ देवताओंके लिए पंचामृतके स्नानका प्रबन्ध, सुगंधित गुलाबजल आदिसे स्नानका प्रबन्ध मुख्यताम्बूल पान आदिका प्रबन्ध, तथा उनके लिए उद्यान आदिका प्रबन्ध भी करवा दिया ॥ ५३ ॥ सब शिवालयोंमें त्रिकाल पूजाके लिए माला गूँथनेका प्रबन्ध, शंख, नगाड़ा मृदंग आदि बाजोंका प्रबन्ध एवं घडी घंटा कलश गड़वा तथा स्नानके सामानका प्रबन्ध कर दिया। मार्जनके लिए श्वेत वस्त्र तथा सुगंधित द्रव्य चन्दन, केशर, अगर, तगर, कपूर आदिके लेपनका भी स्वयं ही प्रबन्ध करवा दिया। उसी प्रकार देवालयोंमें जप, होम, स्तोत्रपाठ, उच्च शिवनामोच्चारण प्रदक्षिणा तथा चँवर लेकर रासक्रीड़ा आदि अन्यान्य क्रियायें करते हुए रामने काशीमें एक वर्ष बिताया वहाँके अनेक तीर्थ किये । उन्होंने दीनानाथ विश्वेश्वर भगवान् शिवका सन्तुष्ट किया, ऋतुकालमें ही ब्रह्मचर्य धारणकर तथा मत्स्यसंभाषणका अनुष्ठान करके वीर्यके नियमोंका पालन किया। अनन्तर विश्वनाथको, कालभैरवको, गणाधिपको, अन्नपूर्णाको तथा दण्डपाणिको बारंबार नमस्कार करके तथा उनकी स्तुति करके उनसे जानेकी आज्ञा माँगी । उनसे अनुज्ञात होकर रघूत्तम राम विमानपर सवार हुए ॥ ५४-६० ॥ और आकाशमार्गसे गङ्गानदीके दक्षिण तटकी ओर चल दिये । रास्तेमें उनको कर्मनाशा नदी मिली । बादमें च्यवनमुनिके आश्रमपर पहुँचे ॥ ६१॥ पुष्पक विमानसे उतरकर रामचन्द्रजीने स्नान करके मुनिके दर्शन किये और यहाँ अपने नामसे रामेश्वर तथा रामतीर्थ स्थापित किया ॥ ६२ ॥ वहाँ अपने साथवालोंको अपनी बनायी हुई बाणका रेखा दिखलायी अन्तमें वहाँपर काशीसे भी अधिक दान पुण्य करके दिव्य विमानके द्वारा शोणभद्र तथा गङ्गाके सङ्गमपर गये। उसी प्रकार आगे भी राम जिन-जिन तीर्थोंमें जायेंगे, वहाँ-वहाँ उत्तरोत्तर अधिक दान करेंगे जहाँ जहाँ राम सीताके साथ पधारेंगे वहाँ वहाँ अनेक बड़े बड़े तीर्थ बनेंगे । जिनकी संख्याको शेष-नाग भी नहीं बता सकते ॥ ६३-६६॥ परन्तु विचारशील लोगोंको उनमें भी छः तीर्थोंको मुख्य समझना चाहिये। चार चार भाइयोंके, पाँचवाँ सीता तथा छठवाँ हनुमानका। इनके विषयमें कभी भी संदेह नहीं करना चाहिये । श्रीराम शोणभद्र तथा गङ्गाके सङ्गममें स्नान करनेके पश्चात् वहाँ तीन रात निवास करके प्रसन्न मनसे
सर्गः ६] यात्राकाण्डम् १९१
सप्तरात्रं क्वचिच्चापि पक्षमेकमथ क्वचित्। अष्टादशैकविंशद्वा त्रिमासं च क्वचित्प्रभुः ॥७०॥
चकार वासं तीर्थेषु धर्मान् कुर्वन् यथामखम्। गंडकीसंगमे स्नात्वा नेपाले जगदीश्वरम् ॥७१॥
दृष्ट्वा हरिहरक्षेत्रं ययौ रघुकुलोद्वहः। एवं कुर्वन् स तीर्थानि सर्वाणि रघुनन्दनः ॥७२॥
पुनः पुनः सगाम च ययौ जाह्नविदक्षिणे। वैकुण्ठनगरं गत्वा जरासन्धपुरं ययौ ॥७३॥
वैकुण्ठाख्ये जले स्नात्वा ततो रामो ययौ गयाम्। फल्गुनद्यास्तटे पूर्व मुक्त्वा तद्यानमुत्तमम् ॥७४॥
नत्वा विष्णुपदं दिव्यं पुनर्यानान्तिकं ययौ। तां निशां गमयित्वाथ प्रभाते रघुनन्दनः ॥७५॥
स्नातुं फल्गुनदीतीर्थे ययौ तीर्थं द्विजैः सह। एतस्मिन्नन्तरे सीता सखीभिः परिवेष्टिता ॥७६॥
ययौ स्नातुं फल्गुन्यां स्नात्वा पूज्य सुवामिनीः। सैकते सा क्षणं तस्थौ पूजनार्थं महेश्वरीम् ॥७७॥
वालुकापञ्चपिंडैश्च दुर्गां कर्तुं समुद्यता। गृहीत्वा वामहस्तेन माद्रीं सा सिकतां तदा ॥७८॥
सव्येन कृत्वा पिंडं तु यावत्सा पाणिना भुवि। स्थापयामास तावत्तु ददर्श अगतीतलात् ॥७९॥
विनिर्गतं हस्तमथ श्वशुरस्य करं शुभम्। दक्षिणं निजहस्तात्तु गृहीत्वा विष्णुरूपधृक् ॥८०॥
गच्छन्तं भूतलं रम्यं तद्दृष्ट्वा कौतुकं पुनः। द्वितीयं स्थापयामास भुवि पिंडं तु सैकतम् ॥८१॥
सोऽपि नीतः पूर्ववच्च ह्यवमष्टात्तरं शतम्। ददौ पिडान कौतुकेन ततः श्रान्ता विदेहजा ॥८२॥
मनसा पूज्य दुर्गां सा ययौ यानं स्वरान्विता। तद्वृत्तं न सखीभिस्तु ज्ञातं रामेण वाऽपि न ॥८३॥
तथापि कथितं नैव किं रामो मां वदिष्यति। इति भीत्या ततो रामः पञ्चतीर्थं विगाह्य च ॥८४॥
प्रेतपर्वतमासाद्य पिंडदानमथाऽकरोत्। कनिष्ठिकाया निष्कास्य निजनामांकितां शुभाम् ॥८५॥
कांचनीं मुद्रिकां गव्यां दक्षिणाभिमुखस्तदा अपहतेति मंत्रेण चकार भुवि राघवः ॥८६॥
गंडकीके सङ्गमकी ओर सिधारे। श्रीराम प्रथम जिस स्थानपर तीन रात, कहीं पाँच रात कहीं सात रात, कहीं एक पक्ष, कहीं अठारह दिन, कहीं इक्कीस दिन और कहीं तीन मास पर्यन्त सुखसे निवास किया। गंडकीके सङ्गममें स्नान करके श्रीहरि नेपालम पशुपतिनाथका दर्शन के गये। ६७-७०॥ बादन रघुकुलभूषण राम हरिहरक्षेत्र गये। इस प्रकार रघुनन्दन राम तं र्थाटन समय बीच बीचम बार-बार गङ्गाके दक्षिण सङ्गमपद पधारत थे। बाइस वैकुण्ठ नगर होते हुए जरासन्धक राजगृह नगर गये ॥ ७१ ७३ ॥ पश्चात् वैकुण्ठके जलमे स्नान करके गयाजी गये, फल्गुनदीक पूर्वतटपर विमानको छोड़कर दिव्य विष्णुपदके दर्शनार्थ गये। दर्शन करनक बाद पुनः यानके पास लौट आय और रात्रिको वही व्यतीत करके सवेरे ब्राह्मणोके साथ फल्गुनदीके पवित्र तीर्थमे स्नान करन गये। इसाम सखियोंग घिरा हुई साताजी फल्गुतीरपर स्नानार्थं पधारौं। वहाँ उन्होने स्नान करके सोहागिन स्त्रियोंकी पूजा की। पश्चात् देवी महेश्वरीकी पूजा करनेके लिए सैकत-प्रदेशमें जाकर बालूके पाँच पिण्डोंमें दुर्गाजीकी प्रतिमा बनानेको उद्यत हुई। बायें हाथमें गीली बालुका लेकर उन्होंने दाहिने हाथसे पिण्ड बनाकर ज्यों ही पृथ्वीपर रखना चाह, त्या ही उन्हें पृथ्वीतलसे निकलता हुआ अपने श्वशुर महाराज दशरथका सुन्दर हाथ दिखायी दिया। उनका दाहिना हाथ सीताके हाथसे उस उत्तम पिण्डको लेकर पुनः धरतीमे प्रविष्ट हो गया। यह देखकर सीताके मनमें बड़ा कौतूहल हुआ। बादमें फिर सीताने पिण्ड बनाकर जमीनपर रक्खा, उसको भी पूर्ववत् वह हाथ ले गया। इस प्रकार सीताने एक-एक करके एक सौ आठ पिण्ड दुर्गाकी पूजाके लिये रक्खे और उन सबको श्वशुरका हाथ ले गया। यह देखकर सीता हार गयीं ॥ ७४-८२ ॥ अन्तमें उन्होंने दुर्गाका मन ही मन पूजा की और विमानके पास लौट आयीं। उस वृत्तान्तको न तो सखियें जान सकीं और न राम ही जान पाये ॥ ८३ ॥ सीतानें भा राम हमको क्या कहेंगे, इस डरके मारे उस वृत्तान्तको छिपा रखा बादमे रामने जब पञ्चतीर्थ करके बाद प्रेतशिलापर जाकर पिण्डदान दिया और उन्होंने अपने हाथकी अनामिका अँगुलसि रामनाम खुदी हुई सुन्दर सुवर्णकी अँगूढी निकालकर दक्षिण-की ओर मुख करके 'अपहता' इत्यादि मंत्रसे जमीनपर खींच रेखाएं खींची, जो कि यहाँ अभी भी स्पष्ट
११२ आनन्दरामायणे [ सर्गः ६
रेखात्रयं तदद्यापि दृश्यते तत्र वै स्फुटम् । आस्तीर्य स कुशांस्तत्र पिण्डान् मक्तुमयाञ्छुभान् ॥८७॥ तिलाज्यमधुसंयुक्तान् दातुं रामः समुद्यतः । सव्येन पाणिना पिण्डं गृहीत्वा रघुनन्दनः ॥८८॥ यावत्पश्यति भूम्यौ तु न ददर्श पितुः करम् । तदाश्चर्येण विप्रास्ते राममूचुस्त्वरान्विताः ॥८९॥ निष्क्रामन्त्यत्र सर्वेषां पितॄणां दक्षिणाः कराः । न दृश्यते तव पितुः कारणं नात्र विद्महे ॥९०॥ रामोऽपि विस्मयाविष्टश्चकितः प्राह लक्ष्मणम् । जानीषे कारणं किंचिदत्र त्वं बुद्धिमानसि ॥९१॥ स प्राह राघवास्माभिर्यदा गोदावरीं गतम् । इङ्गुदीफलपिण्याकपिण्डदाने तदा करः ॥९२॥ अस्माभिः स्वपितुर्दृष्टः सोऽत्र नैव प्रदृश्यते । ममापि ज्ञानमाश्चर्यं सीतां त्वं प्रष्टुमर्हसि ॥९३॥ तच्छ्रुत्वा जानकी शीघ्रं प्राह किंचिद्भयातुरा । मयाऽपराधिकं किंचिन्नखमस्व रघूत्तम ॥९४॥ वत्तस्या वचनं श्रुत्वा राघवः प्राह तां पुनः । वद तथ्यं न भेतव्यं कारणं किं ममातिकम् ॥९५॥ यथा श्रुतं तया सर्वं राघवाय निवेदितम् । तच्छ्रुत्वा राघवः प्राह कः साक्षी तव कर्मणि ॥९६॥ सा प्राह चूतवृक्षोऽस्ति दृष्टः स नेत्युवाच ह । तदा शप्तः सीतया स फलहीनः स कीटतः ॥९७॥ भव मे वचनाज्झट भतो मिथ्या त्वयेरितम् । पुनः सा राघव प्राह फल्गुः साक्ष्यं प्रदास्यति ॥९८॥ साऽपि रामेण पृष्टाऽथ नेत्युवाच भयातुरा । साऽपि शप्ता रामपत्न्याऽधोमुखी भव वाक्यतः ॥९९॥ बह यस्मान्मृषा चोक्तं त्वया मन्येपि कर्मणि । ततः सीता पुनः प्राह साक्ष्यं मेऽत्र निवासिनः ॥१००॥ दास्यंति मे द्विजाः सर्वे तदा मन्निकटस्थिताः । तेऽपि पृष्टा राघवेण नेत्युचुर्भयविह्वलाः ॥१०१॥ दृष्टः साक्ष्यं नहिं रामः शापं नप्तु प्रदास्यति । निवारिता कथमियं तदा सीतेति चिन्त्यते ॥१०२॥ ताँस्तदा जानकी शापं ददौ तीर्थनिवासिनः । युष्माकं नात्र मद्धत्तिः कदा दूर्यर्थमविष्यति ॥१०३॥
दिखायी देती हैं। पश्चात् उन्होंने कुशा बिछाकर उसपर तिल घृत मधुचादिसं युक्त सत्तूका पिंड रखना प्रारम्भ किया। रामने जब दाहिने हाथमें पिण्ड लेकर अथात्रकी ओर देखा तो उन्हें अपने पिताका हाथ नहीं दीखा। महकि ब्राह्मण भी आश्चर्यान्वित होकर रामसे कहने लगे—॥८७-८८॥ यहाँ सब लोगोंके पितरोंके दाहिने हाथ पिंड लेनेके लिये निकलते हैं, पर आपके पिताका हाथ क्यों नहीं निकला। इसका कारण समझमें नहीं आता ॥९०॥ तब रामने विस्मित होकर लक्ष्मणसे पूछा—हे लक्ष्मण! तुम बुद्धिमान् हो, क्या कुछ इसका कारण जानते हो? ॥९१॥ लक्ष्मणने कहा—हाँ भाई ! जब हम लोग गोदावरा गय थे, तब तो इङ्गुदीफलके पिसानका पिण्डदान देते समय अपने पिताका हाथ दिखाई दिया था, वह यहाँ नहीं दिखाई देता। इस बातका हमको भी आश्चर्य है, आप इसका कारण जानकीसे तो पूछें॥९२। ६३॥ यह सुनकर जानकानी घबड़ा उठीं और बोलीं-हे रघुराज! आप क्षमा करें। मुझसे कुछ अपराध हो गया है। ९४॥ यह सुनकर रामने कहा कि घबराने तथा डरनेकी कोई बात नहीं है जो हो, सो साफ-साफ कहो ॥९५॥ तब जानकीने जो घटना घटी थी, सो स्पष्ट कह सुनायी । यह सुनकर रामने पूछा--इस बातका साक्षी कौन है कि हमारे पिताने तुम्हारे हाथसे पिण्डदान ग्रहण किया है ? ॥९६॥ सीताने अपना गवाह पासके आम्रवृक्षको बताया, परन्तु उससे पूछनेपर वह इन्कार कर गया। तब सीताने उसका शाप दिया कि अरे दुष्ट! तू झूठ बोला है इसलिए मध्यदेशम तू फलशून्य होकर रहेगा। तब सीताने फल्गुनदीको अपना साक्षी बताया ॥९७॥९८॥ परन्तु रामके पूछनेपर वह भी भयसे इंकार कर गयी। इसपर सीताने उसको भी शाप दिया कि तू सत्य बातमें भी झूठ बोली है, इसलिए तू मधापुखी (अन्तःमुखी) होकर बहेगी। तब सीताने कहा कि मेरी साक्षी यहाँके रहनेवाले उस समय मेरे पास खड़े ब्राह्मण देंगे। उन्होंने भी विह्वल होकर रामके पूछनेपर ना कर दिया ॥९९ १०१॥ वे लोग विचारने लगे कि "यदि ऐसा था तो तुम लोगोने सीताकी उस समय पिण्ड देनेसे रोका क्यों नहीं। ऐसा कहकर कही हरय कहनेपर राम हमको शाप न दे दें" सोताने उनको भी शाप दिया कि आओ, तुमलोग द्रव्यसे कभी तृप्त न होकर मारे-मारे फिरोगे। इस बातकीने
| [सर्गः ६ ] | यात्राकाण्डम् | १९३ |
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द्रव्यार्थं सकलान् देवान् भ्रमध्वं दीनरूपिणः। ततः सा जानकी प्राह ओतुःसाक्ष्यं प्रदास्यति ॥१०४॥ सोऽपि पृष्टो नेत्युवाच रामं सीता शशाप तम्। पुच्छाद्य स्वपुरः कृत्वा परा मन्मर्कटोऽपि सन् ॥१०५॥ भूयोऽति यत्तत्त्वन्मात्पुच्छे सम्पूर्य्यतां भव। ततः सा जानकी प्राह गौर्मे साक्ष्यं प्रदास्यति ॥१०६॥ साऽपि पृष्टा नेत्युवाच रामं सीता शशाप ताम्। अपवित्रा भवाऽद्ये त्वं मम वाक्येन धेनुके ॥१०७॥ ततः सीताऽश्वत्थवृक्षं साक्ष्यार्थं प्राह राघवम्। स पृष्टो नेत्युवाचाथ तं सीताऽशापक्रुधा ॥१०८॥ भवाचलदलस्त्वं हि मदिराऽभ्यन्यपादप। पुनः सीता पतिं प्राह मम साक्षी प्रभाकरः ॥१०९॥ स पृष्टः प्राह तथ्यं हि सुप्तिर्जाता पितुस्तव । एतस्मिन्नन्तरे तत्र विमानेनार्कवर्चसा ॥११०॥ राजा दशरथो राममागम्यालिङ्ग्य वै दृढम् ॥
प्राह त्वया तारितोऽहं नरकादतिदुस्तरात् । मैथिल्याः पिण्डदानेन जाता मे तृप्तिरुत्तमा ॥१११॥ तथापि लोकशिक्षार्थं गयाश्राद्धं त्वमाचर । पितरं प्राह रामोऽपि किमर्थं हि त्वयाऽत्र वै । ११२॥ त्वरया सिक्तापिण्ड संगृहीतो वदस्व माम्। स प्राहारत्र गयायां तु बहुविघ्नानि राघव ॥११३॥ मर्त्तवि श्राद्धसमये कृता तस्मात्त्वरा मया । इति रामं समाभाष्य गृहीत्वा राघवादपि ॥११४॥ किञ्चित्कव्यं विमानेन ययौ दशरथस्तदा । ततो रामः प्रेतगिरौ पिण्डदानं विधाय च ॥११५॥ गत्वा प्रेतशिलायां च दत्त्वा काकबलिं ततः धर्मारण्यं ततो गत्वा कुर्व्वकोनपदेषु हि ॥११६॥ सक्तूना च तिलानाञ्च पायसैश्च सशर्करैः । पृथग्वे पिण्डदानानि वटश्राद्धं विधाय च ॥११७॥ अष्टतीर्थी ततः कृत्वा ततः संध्यां स्थलत्रये कृत्वा यथाविधानेन दत्त्वा दानान्यनेकशः ॥११८॥ गदाधरं ततः पूज्य महाविभवपूर्वकम् । सेचनायाम तोयैश्च नृत्त्येभं सर्कर्कटम् ॥११९॥ एको मुनिः कुमकुशाम्रदलश्रुतस्य मूले मलिन्नं दधार। आश्रम भिक्तः पितरश्च तृप्ता एका क्रिया द्वयर्थकरे प्रसिद्धा ॥१२०॥
बिलावको साक्षी देनेके लिए कहा । उसने भी पूछनेपर ना कह दिया। सीताने उसे भी शाप देते हुए कहा कि उस समय मेरे समक्ष पूंछ किये खड़े रहनपर भी आ मून ना कर दिया है। इसलिए आज तेरी पूंछ भञ्जन हो जायगी। तब जानकीजीने गौका साक्षी देनेके लिए कहा । १०२-१०६ ॥ रामके पूछनेपर उसने भी ना कह दिया । सीताने कहा हे धेनु ! मर शापसे तेरा मुख अपवित्र हो जायगा । १०७ ॥ पश्चात् सीताने पीपलके वृक्षको साक्षी देनेके लिए रामके सम्मुख उपस्थित किया । जिसका नाम अश्वत्थ था, परन्तु जब वह भी इन्कार कर गया तो सीताने श्राप करके शाप दिया कि तू आजसे चञ्चलदल हो जायगा । तब अन्तमें सीताने कहा कि सूर्य मेरी साक्षी देंगे । रामके पूछनेपर सूर्यने कहा कि यह बात सत्य है । इस कार्यसे आपके पिता अवश्य सन्तुष्ट हुए हैं। इतनेमें सूर्यके समान कान्तिमान् विमानपर सवार होकर स्वयं महाराज दशरथ वहीं आ पहुंचे। रामका दृढ़ आलिङ्गन करके वे बोले हे राम ! तुमने यथार्थमें हमको तार दिया है। मैथिलीके पिण्डदानसे हमें बड़ी ही तृप्ति मिली है ॥ १०८-१११ । तो भी लोकशिक्षाके लिए तुम गयाश्राद्ध अवश्य करो । रामने पितासे पूछा कि आपने यहाँ इतनी जल्दी बालूकापिंड क्यों ग्रहण किया ? इसका क्या कारण है ? दशरथने कहा हे राम ! गयामें पिंडदानके समय बड़े बड़े विघ्न उपस्थित होते हैं । इसीलिए मैंने त्वरा की थी । इतना कहकर राजा दशरथ रामके हाथसे भी कुछ कव्य (पितृ-अन्न ग्रहण करके विमान द्वारा वहाँसे चले गये । पश्चात् रामने प्रेतपर्वतपर पिण्डदान दिया ॥ ११२-११५ ॥ वहाँसे वे प्रेतशिला गये। वहाँ काकबलि देनेके बाद धर्मवन गये । वहाँ एकोनपद् स्थानोंमें तिल-पायस तथा शर्करासे युक्त सत्तूके पृथक्-पृथक् करके अनेक पिंड दिये और वटश्राद्धाव भी सम्पादन किया ॥ ११६ ॥ ११७ ॥ तदनन्तर अष्टतीर्थी की । तीनों नियतस्थानोंमें सन्ध्यावन्दन करनेके बाद विधिवत् बहुतसे दान दिये ॥ ११८ ॥ अनेक विभवोंसे गदाधरकी पूजा की और मतंगेश्वरस्य आम्रवृक्षका जलसे सेचन किया ॥ ११९ ॥ कहा भी है किसी
| १९५ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः ६ |
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कृत्वा विष्णुपदे पूजां विमानारोहणादिभिः । मासत्रयमतिक्रम्य गयायां रघुनन्दनः ॥१२१॥ विमानेन ययौ प्राचीं दिवि सन्तोषयन् जनान् । फल्गुतीरात्तटे पूर्वं विमानं यत्र संस्थितम् ॥१२२॥ तत्र रामगयानाम्नी भूमिविप्रेरुदाहृता । रामेश्वरो रामतीर्थं वर्तते तत्र पावनम् ॥१२३॥ रामोऽपि फल्गुनाद्याश्च गङ्गायाः संगमं ययौ । गयाबहिः फल्गुरेव ज्ञेया सा तु महानदी ॥१२४॥ ततो ययौ मुद्गलस्य नूतनाश्रममुत्तमम् । यस्मिन्नुदग्वहा गङ्गा जाह्नवी पापनाशिनी ॥१२५॥ ततोऽग्रे जानकीं ज्ञात्वा भूमौ दिव्यं प्रदास्यति । तस्या दिव्यस्थले रामस्तीर्थपादौ चकार सः ॥१२६॥ भ्रातॄणां च पृथक् तत्र मत्रि तीर्थानि सर्वतः । सीतया च कृतं तत्र स्वनाम्ना तीर्थमुत्तमम् ॥१२७॥ ज्ञात्वा भविष्यदग्रे मत्तीर्थं चेति सविस्तरम् । यदा भूमौ प्रहास्यामि दिव्यं तीर्थं तदाऽस्तु मे ॥१२८॥ रामस्ततो विमानेन गतश्चोत्तरवाहिनीम् । नाम्ना पुरीं तथा गङ्गां यत्रास्ति परमांगदा ॥१२९॥ पर्वतो यत्र गङ्गायामस्ति विन्ध्येश्वरोऽपि च । ततः श्रीवैद्यनाथेशं नत्वा रावणनिर्मितम् ॥१३०॥ ततः पुनर्विमानेन पश्यन्नानास्थलानि सः । ययौ भागीरथीमप्यात्र भिन्ना भिन्ना पुनः ॥१३१॥ प्रयागाद्योजनशतान् देशे रघूद्वहः । ततो गङ्गाब्धिसमीपं संगमञ्च पुष्षकेन सः ॥१३२॥ गत्वा स्नात्वा ततो यत्र कालिंदी संगताऽर्णवे । तत्र गत्वा रघुश्रेष्ठस्ततः पश्यन् स्थलानि सः ॥१३३॥ नानापुण्यानि तीर्थानि दृष्ट्वा श्रीपुरुषोत्तमम् । पूर्वसागरतीरस्थं दत्त्वा दानान्यनेकशः ॥१३४॥ ततः शनैः पुष्षकेण दृष्ट्वा नानाविधान् सुरान् । दृष्ट्वा नाना नदीः सर्वा नानादेशान्विलङ्घ्य च ॥१३५॥ गोदातीरे स्वनाम्ना तु कृत्वा गिरिममुत्तमम् । सप्तगोदावरीभेदसंगमेषु महोदधौ ॥१३६॥
एक मुनिने कुशयुक्त हाथमें जलका घड़ा लेकर आम्रवृक्षके मूलमें जल दिया। उसमे आम्रवृक्ष सिंच गया और पितर भी तृप्त हो गये। इसीके आधारपर 'एक क्रिया द्वयर्थकरी' यह कहावत प्रचलित हुई ॥ १२० ॥ इसी प्रकार प्रतिदिन विष्णुपदकी पूजा करते और विमानपर चढ़कर घूमत फिरत हुए रामने गयामे एक वर्ष व्यतीत किया ॥ १२१ ॥ पश्चात् सब लोगोको आश्वासन दे तथा विमानपर सवार होकर रघुनन्दन पूर्वकी ओर चल दिये। फल्गुनदीके किनार जहाँ रामका विमान खड़ा हुआ था ॥ १२२ ॥ उस जगहको वहाँके विप्र रामगया कहन लगे। पवित्र रामेश्वर नामका रामतीर्थ अभी भी वहाँ विद्यमान है ॥ १२३ ॥ राम वहाँसे चल-कर फल्गु तथा गंगाके सङ्गमपर आये। गयाके बाह्री भागमे फल्गुनदी है उसका विस्तार बहुत बड़ा है ॥ १२४ ॥ बादमे मुद्गल ऋषिके नवीन आश्रमकी ओर गये। जहाँपर पाप हरण करनेवाली गंगा उत्तरवाहिनी होकर बहती है ॥ १२५ ॥ आगे चलकर एक जगह जहाँ कि उन्हें विश्वास था कि यहाँ जानकी भूमिमे प्रवेश करके दिव्य रूप धारण करेगी, अपने नामका एक उत्तम तीर्थ स्थापित किया ॥ १२६ ॥ उसके बाद लक्ष्मण आदि भाइयोके नामसे भी उनके तीर्थ स्थापित किये। सीताने भी वहीं, यह विचारकर कि भविष्यमे मेरे नामका यहाँ बड़ा भारी तीर्थ होगा एक अपने नामका तीर्थ स्थापित किया। उन्होने यह विचार कि जब मै दिव्य रूप धारण करूंगी, तब यहाँ दिव्य तीर्थ होगा ॥ १२७ ॥ १२८ ॥ पश्चात् राम विमानमे बैठकर उस जगह गये, जहाँ कि कल्याणकारिणी उत्तरवाहिनी नामकी गंगा तथा एक नगरी विद्यमान थी ॥ १२९ ॥ और जहाँपर बीच गंगामे विन्ध्येश्वर नामका पर्वत खड़ा है। वहाँसे आगे चलकर श्रीरामने रावण द्वारा स्थापित वैद्यनाथजीका दर्शन किया ॥ १३० ॥ तदनन्तर विमानमें बैठकर अनेक वनोंकी शोभा देखत हुए वहाँ गये, जहाँपे कि श्वेतजल युक्त गंगा बीचोबीचसे दो भागोमे बँट गयी है ॥ १३१ ॥ वह स्थान प्रयागसे सौ योजनकी दूरीपर था। पश्चात् राम विमानके द्वारा वहाँ जा पहुँचे, जहाँ कि गंगा सहस्रमुखी हो-कर समुद्रमे मिली है ॥ १३२ ॥ उस जगह गंगा-समुद्रसङ्गममें स्नान करनेके बाद कालिन्दी-समुद्रके सङ्गममे स्नान किया। वहींपर रामने अनेक मनोहर पुष्पित वनोपवन देखे, अनेक तीर्थोके दर्शन किये और साथ ही पूर्वी सागरके तटपर स्थित भगवान् परम पुरुषोत्तमके भी दर्शन किये तथा अनेक दान दिये ॥ १३३ ॥ १३४ ॥ बहुरि चलकर अनेक देवताओके दर्शन करते हुए अनेक नदियोको लाँघकर गोदावरीके
सर्गः ७ ] यात्राकाण्डम् [ १०५
सर्गः ७ ] यात्राकाण्डम् [ १०५
स्नात्वा दक्षिणाशां च ततो रामो ययौ पुनः । पूर्वदेशे नृपैर्निमानितः पूजितोऽपि च ॥१३७॥
गृहीत्वा स्वकरं तेभ्यस्तैः सहैव शनैः शनैः । विमानेन सुखेनैव तीर्थान्यन्यानि सेवितुम् ॥ १३८॥
श्रीरामो याम्यदिग्भ्रान्ति दक्षिणाभिमुखो ययौ, एवं प्रोक्ता पूर्वदेशयात्रा रामेण या कृता ॥१३९ ।
इति श्रीमदानन्दरामायणे यात्राकाण्डे पूर्वदेशतीर्थयात्रावर्णनं नाम षष्ठः सर्गः । ६ ।।
सप्तमः सर्गः
( श्रीरामके द्वारा दक्षिणभारतकी तीर्थयात्रा )
श्रीरामदास उवाच
ततो रामः समुल्लङ्घ्य मत्स्यनीथं मनोरमम् । तीर्त्वा महानदीं कृष्णां पश्यन् पुण्यस्थलानि सः ॥ १ ॥
ततो ययौ नार्गलहं रामः पानकनामकम् । कृष्णाब्धिसंगमे स्नात्वा दत्त्वा दानं निजेच्छया ॥ २॥
पश्यन्नानास्थलच्छेयं ययौ श्रीशैलपर्वतम् । स्नात्वा स नीलगङ्गायां दृष्ट्वा श्रीमल्लिकार्जुनम् ॥ ३ ॥
तत्रैव कृष्णा सा गङ्गा नीलगङ्गेति नामतः श्रीमल्लेशशिरो दृष्ट्वा पुनर्जन्मनिवारकम् ॥४।
शिखरेश्वरस्य शिखराद्ब्रह्मकुण्डे विगाह्य च भीमकुण्डे ततः स्नात्वा नयां निर्वृतिसंगमे ॥५॥
तुङ्गभद्रासंगमेऽपि महानदीसरोवरे विगाह्य भवनाशिन्यां वशो दृष्ट्वा महोबलम् । ६।।
नारसिंह ततो नत्वा कृत्वा स्तम्भप्रदक्षिणाः गत्वा पुष्पगिरी तत्र पिनाकीमगदात्तथा ॥७॥
पश्यन् पुण्यस्थलानीशं च दृष्ट्वा पम्पामरोवरम् । किष्किन्धायां ततो गत्वा सुग्रीवाद्यैः सुपूजितः ॥८॥
सुग्रीवाद्यैर्वानरैश्च विमानेन विहायसा । प्रवर्षणगिरिं स्वीयगुहां रम्यां प्रदर्शयन् ॥९॥
वैदेहीं कौतुकाद्रामः किंचित्कृत्वा विमाननम् द्वितीये भीमकुण्डेऽथस्नात्वा गत्वा षडाननम् ।१० ।
स्नात्वाऽगस्त्यकुण्डमध्ये षडाननार्चार्थमनेकशः कनकगिरिस्थं शंभुं नत्वा सुपूज्य राघवः ।।११।
किनारे आये। वहाँ उन्होंने अपने नामका एक उत्तम पर्वत नियत किया। बादमें सागरके साथ गोदावरी-सङ्गममें स्नान किया पश्चात् वे दक्षिणापांत पूर्वकी ओर आ गये। वहाँ अन्य राजाओं द्वारा पूजित तथा सम्मानित होकर और उनसे कर लेत हुए उनको भी साथ लेकर धीरे धीरे विमानके द्वारा अन्यान्य तीर्थोंको देखनेकी इच्छा से दक्षिण भारतकी ओर बने । इस प्रकार रामकी पूर्वप्रदेशकी यात्रा समाप्त हुई ॥१३५-१३९॥
इति श्रीमदानन्दरामायणे यात्राकाण्डे 'ज्योत्स्ना' भाषाटीकायां पूर्वदेशयात्रावर्णनं नाम षष्ठः सर्गः ॥ ६ ॥
श्रीरामदासने कहा — वहाँसे राम मनोहर मत्स्य देशसे होते हुए महानदी तथा कृष्णाको पार करके अन्यान्य पवित्र स्थानोंको देखते हुए पानक नृसिंहतीर्थ गये। पश्चात् कृष्णा तथा समुद्रके सङ्गममें स्नान करके उन्होंने अनेक दान पुण्य किये ॥ १ । २ । वहाँसे विविध वनोंका सौन्दर्य देखते हुए राम श्रीशैल पर्वतपर पधारे। वहाँ नीलगङ्गामें स्नान करके श्रीमल्लिकार्जुनके दर्शन किये ॥ ३ ॥ यहाँपर कृष्णा नदीका ही नाम नीलगङ्गा पड़ गया है । पुनर्जन्मके निवारक श्रीशैलशिखरको देखकर शिखरेश्वरके शिखरसे निकले हुए ब्रह्मकुण्डमें स्नान किया । इसके अतिरिक्त भीमकुण्ड, निवृत्तिसङ्गम, तुङ्गभद्राके सङ्गम, महानदीके सरोवर और भवनाशिनीमें स्नान किया। वहाँ महाप्रतापी नरसिंहजीका दर्शन किया तथा स्तम्भकी प्रदक्षिणा की। वहाँसे मार्ग पुष्पगिरिपर आकर पिनाकिनी नदीमें स्नान किया ॥४-७॥ बादमें अनेक आश्रमों तथा विविध पुण्यवनोंको देखते हुए पंपासरोवर और वहींसे किष्किन्धा गये। वहाँ सुग्रीव आदिन रामका विधिवत् पूजन-सत्कार किया ॥ ८ ॥ वहाँसे सुग्रीव आदि वानरोंका साथ ले तथा विमानपर आरूढ़ होकर आकाश-मार्गसे प्रवर्षण गिरिपर पधारे। वहाँ जानकीको अपना निवासगुफा दिखलाकर आराम कुछ हँसे। फिर भीमकुण्डमें स्नान करके षडानन कार्त्तिकेय स्वामीका दर्शन करनेके लिए गये ॥९ । १०॥ अगस्त्यकुण्डमें
१९६ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः ७
श्रीमन्तं त्वा रङ्गं नमस्कृद्वेङ्कटं भुवि । गोविन्दराजं तं नत्वा तृत्तिपत्तत्त्वसंस्थितम् ॥१२॥ स्नात्वा कपिलधारायां नांधयादं विधाय च । ततः शेषाचलं गत्वा स्नात्वा पुष्करिणीजले ॥१३॥ वेङ्कटेशं पूजयित्वा पंचतीर्थावगाह्य च । सुवर्णमुखरीप्रान्तस्थं श्रीकालहस्तिनम् ॥१४॥ पूजयित्वा ययौ काञ्च्यां रामः शिवह्रदाभिधम् । एकाम्रनाथं पूज्य सर्वतीर्थं विधाय च ॥१५॥ कामाक्षीमंबिकां नत्वा स्नात्वा वैगावतीजले । नत्वा वरदराजं च पक्षितीर्थं ततो ययौ ॥१६॥ पद्मं विधुं नामानौ पक्षिणौ बहुवर्षशः । पूजयन्तौ ततः शीघ्रं धीरनद्यां विगाह्य च ॥१७॥ नत्वा त्रिविक्रमं तत्र गतोऽरुणाचलं नलः । मुक्तिदं स्मरणान्नत्वा नत्वा मणिनदीतटम् ॥१८॥ मणिमुक्तानदीतीरे वृद्धाचलमगात्ततः । वृद्धाचलेशं संपूज्य वटशैलं ततो ययौ ॥१९॥ वटशालेश्वरा पूज्य ततः श्रीमृष्टिमथागात् । तत्र यज्ञवराहं च संपूज्य जगदीश्वरम् ॥२०॥ चिदम्बरमथागात्तद्दर्शनादेव मुक्तिदम् । लिखिता यत्र शेषेण शिलायां ताण्डवाकृतिः ॥२१॥ कावेरीं च ततस्तीर्त्वा सिंहक्षेत्रं ततो ययौ । नत्वा अन्नपुरेशं च वैद्यनाथं प्रणम्य सः ॥२२॥ श्वेतारण्यं ततो गत्वा शंखकुण्ड्यां विगाह्य च । छायावनं ततो दृष्ट्वा ययौ गौरीमयूरकम् ॥२३॥ वेदारण्यं ततो गत्वा नत्वा मध्यार्जुनं शिवम् । स्नात्वाऽथ वृद्धकावेर्यां कुंभकोणं विलोक्य च ॥२४॥ श्रीनिवासं ततो दृष्ट्वा दृष्ट्वा वृन्दावनं शुभम् । मारनाथं ततो दृष्ट्वा श्रीरङ्गं च ददर्श सः ॥२५॥ प्रयागमाधवं नत्वा गत्वाऽऽग्रशिरसः स्थलम् । विलोक्याकृष्णनीलाभं यत्वाऽथ कमलालयम् ॥२६॥ त्यागेश्वरं समभ्यर्च्य गयातीर्थे विगाह्य च । दक्षिणारकाख्यां च श्रीगोविंदं प्रणम्य सः ॥२७॥ जैपालाख्यं पुरं गत्वा गत्वा चामयडेश्वरम् । सिद्धेश्वरं नमस्कृत्य पुन सम्धारितं स्वयम् ॥२८॥ स्नात्वा वै नवपाषाणे ययौ वेद्याश्च पूजनम् । स्नात्वा वेतालतीर्थे वै तीर्त्तार्यं सागरस्य च ॥२९॥
स्नान करके अंतक तर्पण दिया। अनन्तर श्रीरंगपर विराजमान रामका दर्शन करके उनका पूजन की ॥ १२॥ बादमें श्रीरंगका दर्शन करके पृथ्वीपर प्रसिद्ध श्रीवेङ्कटको नमस्कार किया। तदनन्तर तृप्तिपत्तन (तिरूपति नगर) में स्थित गोविन्दराजके दर्शन किये ॥ १२ ॥ वहीं कपिलधारापर स्नान करके संध्यावंदनादि किया। बहुरि शेषाचलपर जाकर पुष्करिणीके जलमें स्नान किया ॥ १३ ॥ वेङ्कटेश भगवान्की पूजा-अर्चा करनेके बाद पंचतीर्थमें स्नान किया। इसके सुवर्णमुखरीके तीरपर विराजमान श्रीकालहस्तीश्वरका पूजन करके राम शिव तथा विष्णुके प्रिय शिवकंचीकी ओर विदाव हो गये। वहाँ एकाम्रेश्वरकी पूजा करके सभी तीर्थोंमें अवगाहन किया ॥ १५ ॥ तब कामाक्षी देवीको नमस्कार करके वेगवतीके पवित्र जलमें स्नान किया। वहाँसे आगे वर- दराजका दर्शन करके पक्षितीर्थ गये ॥ १५ ॥ १६ ॥ वहीं पूषा तथा विधाता नामक दो पक्षियोंकी पूजा करके सीताके साथ विमानेपर बैठकर शीघ्र ही धीरनदीपर पधारे, वहाँ स्नान कर और त्रिविक्रमका दर्शन करके अरुणाचल गये । स्मरणमात्रसे मुक्ति देनेवाले अरुणाचलको नमस्कार करके मणिमुक्ता नदीके तटपर स्थित वृद्धाचलपर गये। वहाँ वृद्धाचलेश्वरकी पूजा करके वटशाल गये ॥ १७-१९ ॥ वहाँ वटपालेश्वरीकी पूजा करके सृष्टि- तीर्थ गये । वहीं यज्ञवराहकी पूजा करके दर्शनमात्रसे निर्वाण पद देनेवाले चिदम्बरेश्वरके दर्शनार्थ पधारे। वहाँपर शिलामें शेषनागकी लिखी हुई तांडवचित्रावली देखी ॥ २० ॥ २१ ॥ पश्चात् कावेरीको पार करके सिंहक्षेत्र गये। बादमें अन्नपुरेश और वैद्यनाथको प्रणाम करके श्रीराम श्वेताण्य पधारे वहाँ शंखकुण्डीमें स्नान किया। वहाँसे छायावन होकर गौरीमयूर गये । वहाँसे वेदारण्य आकर मध्यार्जुन शिवका दर्शन किया। पश्चात् वृद्धकावेरीम स्नान करके कुम्भकोण देखा। २२-२४ ॥ वहाँसे आगे श्रीनिवासका दर्शन करके चित्ताकर्षक वृन्दावनकी ओर गये । तदनन्तर सारनाथका दर्शन करके श्रीरंगमके दर्शनार्थ आगे बड़े ॥ २५ ॥ वहाँ प्रयागमें वेणीमाधवका दर्शन करके बालशिरस नामक स्थानपर गये । वहाँही अंतमें चाकाशके समान लीलाकमलालय देखा ॥ २६ ॥ बादमें त्यागेश्वरकी पूजा करके गयातीर्थमें स्नान किया और दक्षिण द्वारका और श्रीगोविन्दको प्रणाम किया ॥ २७ ॥ वहाँसे जैपाल नामक नगरमें जाकर
सर्गः ७ ] यात्राकाण्डम् १९७
स स्नात्वा भैरवे तीर्थे प्रार्थेकांश्च स्थितो निजम् । अवरुह्य विमानाञ्च पदाभ्यां सर्वजनैः सह ॥ ३० ॥
गत्वा लक्ष्मणकुण्डेऽथ स्वकुण्डेऽपि विगाह्य च । अग्नितीर्थे ततः स्नात्वा धनुष्कोट्यां विगाह्य च ॥ ३१ ॥
स्नात्वा जटापुनीर्थे हि गत्वा तं गन्धमादनम् । आदौ नत्वा विश्वनाथं पुङ्गानीतं हनूमता ॥ ३२ ॥
रामेश्वरं ततो नत्वा कृत्वा गंगाभिषेचनम् । काश्यादिकं त्यक्त्वा धनुष्कोट्यां रघूत्तमः ॥ ३३ ॥
कोटितीर्थं धनुष्कोट्यां चकार कूपमुत्तमम् । क्षेत्रपापप्रशांत्यर्थं दृष्ट्वा श्रीसेतुमाधवम् ॥ ३४ ॥
नानादानादिकं कृत्वा स ममेकं विलंघ्य च । बह्वाह्लाददेवानां महोत्साहान्विधाय च ॥ ३५ ॥
क्षेत्रपापप्रशांत्यर्थं कोटितीर्थं विगाह्य च । नत्वा द्वाग्गन्धमगम तीर्त्वाऽथ जलधेः पुनः ॥ ३६ ॥
विहारस्य विमानेन स दर्भशयनं ययौ । स्नात्वा निक्षेपिकायां च ताम्रपर्णीब्धिसंगमे ॥ ३७ ॥
गत्वा स्नात्वा रामचन्द्रो ददौ दानान्यनेकशः । ततोऽब्धितटमभ्येत्य तं स्कन्द मपूजय राघवः ॥ ३८ ॥
ताम्रपर्णीतटेनैव पश्यन्पुण्यस्थलानि सः । नववेंकटनाथांश्चाभ्यर्च्य तोताद्रिमपयौ ॥ ३९ ॥
कन्याकुमारिकां दृष्ट्वा सिन्धुतीरनिवासिनीम् । प्रतीक्षतीं स्वीयमार्गं बिभ्रतीं मालिकां करे ॥ ४० ॥
तामाह रघुपतिश्च वरं वरय सुव्रते । सा प्राह राघवं नत्वा चिरमस्मि प्रनस्थिता ॥ ४१ ॥
अहं मुनिसुता पित्रा सुरेन्द्राय विनिर्मिता । विवाहार्थं समानातः सुरेन्द्रो योजन स्थितः ॥ ४२ ॥
तव श्रोत्रोपमं श्रुत्वा मया चित्ते विनिश्चितम् । आगमिष्यति रामोऽत्र वरयिष्याम्यहं तदा ॥ ४३ ॥
पित्रा मन्निश्चयं ज्ञात्वा सुरेन्द्रो विनिवर्तितः । सोऽपि मन्त्खेदित्स्वास्तु योजनेऽद्यापि वर्तते । ४४ ॥
विवाहोपकरणादि मन्मात्रा यत्कृतं पुरा । पित्रा तन्सागरे क्षिप्तं क्रोधाविष्टेन राघव ॥ ४५ ॥
अग्रयतेश्वरका दर्शन किया । पश्चात् रामचन्द्रने पूर्वसमयमे अपने द्वारा स्थापित विश्वेश्वरका दर्शन किया ॥ २८ ॥ वहाँके नवपाषाणसरमे स्नान करके टंक नगर गये । फिर वैतान्तीर्थमें स्नान करके सागरके अगाध जल-प्रवाहको पार करके । २६ ॥ एकान्तमें स्थित भैरवतीर्थ गये । वहाँसे पैदल चलते हुए सबके साथ आगे बढ़े । आगे जाकर लक्ष्मणकुंद, रामकुड, अग्नितीर्थ, धनुष्कोटितीर्थ और जटापुनीर्थमे स्नान किया । वहाँसे गन्धमादन पर्वतपर गये । वहाँ पूर्वसमयम हनुमान्के द्वारा लाये हुए विश्वनाथका दर्शन किया ॥ ३०-३२ ॥ पश्चात् रामेश्वरको नमस्कार करके उन्ह गंगा जलसे स्नान कराया । बादम राजन् काशो काँवरके घड़ेको धनुष्कोटि तीर्थमे फेंक दिया ॥ ३३ ॥ उस धनुष्कोटि तीर्थमे रामने कोटितीर्थ नामका एक कूप खुदवाया । बादमें क्षेत्रपापकी शान्तिके लिए श्रीसेतुबंध माधवका दर्शन किया ॥ ३४ ॥ वहींपर अनेक दानपुण्य करते हुए रामने एक मास निवास किया । अनेक बह्वाह्लाद देवताओका महोत्सव भी वही कराया ॥ ३५ ॥ पश्चात् पुनः क्षेत्रपापकी शान्तिके लिए कोटितीर्थमे स्नान किया । द्वारपाल वगन्धामको नमस्कार कर तथा विमानके द्वारा समुद्र पार करके दर्भशयन नामके तीर्थको गये वहीं निक्षेपिकाके जलमे और ताम्रपर्णी तथा सागरके संगममे स्नान किया ॥ ३६ ॥ ३७ ॥ वहीं भी अनेक दान दिये । पश्चात् रामने समुद्रके तटपर विराजमान कार्तिकेय स्वामीकी पूजा की ॥ ३८ । बादमे ताम्रपर्णीके किनारे किनारे राम अनेक पवित्र स्थानोको देखते तथा नववेंकटेशोंकी पूजा करते हुए तोताद्रि गये ॥ ३९ ॥ पश्चात् सिन्धुतीर-निवासिनी कन्याकुमारीके दर्शन किये, जो कि हाथम माला लिये उन्हीं (राम) की राह देख रही थीं ॥ ४० ॥ रामजीने उससे कहा हे सुव्रते ! वर माँगो तब उसने रामको नमस्कार करके कहा हे राघव ! मै बहुत दिनांसे व्रत धारण करके आपकी प्रतीक्षा मे यहीं खड़ी हूँ । ४१ ॥ मैं एक मुनिकन्या हूँ । मेरे पिताने मुझे सुरेन्द्रको देना निश्चित किया ओर उनको विवाहके लिए बुलाया भी था । जो कि अब भी यहाँसे एक योजनकी दूरीपर विद्यमान है ॥ ४२ । परन्तु मैने जब आपकी तीर्थयात्राका समाचार सुना तो मनमें यह निश्चय कर लिया कि राम जब यहाँ यात्राके निमित्त आयेंगे, तब मै उन्हीसे विवाह करूँगी ॥ ४३ ॥ पिताने जब मेरा यह दृढ़ निश्चय देखा तो सुरेन्द्रको लोटा दिया । वह मेरे लिए दुखित होकर एक योजनपर अब भी खड़ा है ॥ ४४ ॥ हे राघव ! मेरी माताने विवाहके लिए जो सामग्री एकत्रित की थी, वह सब मेरे
१९८ आनन्दरामायणे [ सर्गः ७
४५.प इत्यन्ते पश्य तरङ्गान्निर्गतं बहिः। अद्य त्वया तारिताऽहं मां दासीं कर्तुमर्हसि ॥४६। ज्ञात्वा मत्या ह्यभिप्रायं तामाह रघुनन्दनः । एकपत्नीव्रतं मेऽस्मिञ्जन्मन्वस्ति कुमारिके । ४७। मम कृष्णावतारे त्वं भज मां नात्र संशयः । तद्रामवचनादेव यमैश्च नियमैरपि ।४८।। यावद्रामः स्थितो भूम्यां तावद्बन्धा कलेवरम् । ततोऽनेन देहान्ते जाम्बवती भविष्यसि ॥४९। जांबवतीति नाम्ना सा कृष्णपत्नी भविष्यति । रामो ययौ सुरेंद्र च पयोष्णीं सरितं ह्य सः ॥५०। आद्यन्तं ततो गत्वा ताम्रपर्णीतटे स्थितम् । विनिद्रितं शेषपृष्ठे लक्ष्मीरूढसेवितम् ॥५१। ज्ञानदद्या ताम्रपर्णी मा त्यक्त्या पश्चिमवाहिनी । अनन्तशयनं गत्वा पयोष्णीं विगाह्य च ॥५२। पयोष्णीं मत्स्यनद्यां विगाह्य मीनया प्रभुः । ततो गत्वा विमानेन धर्माधर्मसरोवरे ॥५३॥ स्नात्वा जनार्दनं गत्वा पश्चिमे सन्धिगोपधि। दर्शोश्च पौर्णिमायां च गंगासागरसङ्गमम । ५४॥ स्नात्वा जनार्दनं पूज्य नारीराज्यं विलोक्य च । अद्य श्रीरामचन्द्रः स न ययौ लोकशिक्षया ।५५॥ निवृत्य ततो रामो घृतमालां विगाह्य च। कृतमालां ततः स्नात्वा सिन्धुन्दां विगाह्य च ॥५६॥ गत्वा गजेन्द्रमोक्षं च ताम्रपर्णीतटस्थितम् । ताम्रपर्ण्युद्गमे स्नात्वा गत्वा शैवालतीर्थकम् ॥५७। गत्वा चन्द्रकुमाराख्यं गिरि श्रीरघुनन्दनः । ततो ययौ विमानेन दृष्ट्वा दक्षिणकाशिकाम् ॥५८॥ नत्वा काश्याविश्वनाथं चंपकारण्यमाययौ । चित्रगंगाजले स्नात्वा नत्वा हरिहरं शुभम् ॥५९॥ ततो रामो विमानेन मधुपूरीं विवेश सः । वेगवन्त्या जले स्नात्वा नत्वा तं सौन्दरेश्वरम् ॥६०॥ मीनाक्षीमंबिकां नत्वा व्यंकटं द्राविडे गिरौ । कावेरीमध्यनिलयं श्रीरङ्गशयनं ययौ ॥६१॥ मातृभूतेश्वरं नत्वा नत्वा तं जंबुकेश्वरम् । रङ्गनाथं नमस्कृत्य दक्षिणाशां ततो ययौ । ६२॥
चित्तार्न कह शंकर मधुपद्म करूणा री ४५ । वह साप आजाभी तरंगोंके द्वारा उछल-उछल कर बाहर आ रहा है। हे प्रभो ! आज यहां आकर आपने मुझको तार दिया है। अब कृपा कृपा करके मुझे अपनी दासी बनाओ ॥ ४६ ॥ उसके अभिप्रायको जानकर रघुनन्दन कहने लगे - हे कुमारिके ! इस जन्ममें तो मैंने अविरुद्ध एकपत्नी-व्रत धारण कर रक्खा है ॥ ४७ । मम युष्माक कृष्णावतारामें में तुम अवश्य प्राप्त होऊँगा। इसमें संदेह नहीं है। रामचन्द्र के कथनानुसार जबतक राम पृथ्वीपर रहे, तबतक वह यम-नियमपालनपूर्वक जीती रही। तदनन्तर आगे तपोबल से शरीर छूट जानेपर उस देहसे उत्पन्न होकर जाम्बवती नामकी कृष्ण-पत्नी बनी । वहांसे राम सुरेन्द्र गये तथा पयोष्णीमें स्नानकर ताम्रपर्णीके तटपर स्थित अनाद्यन्त ध्येय पधारे, जहाँ भगवान् विनिद्रावस्था तथा सहित होकर शेषनागपर शयन कर रहे थे ॥ ४८-५१ ॥ उनके दर्शन करके पश्चिमावाहिनी ताम्रपर्णीतटपर गये। वहाँ स्नान करके पयोष्णी-तटपर अनन्तशयनके दर्शनार्थ गये ॥ ५२ ॥ मत्स्य सहित भगवान्ने प्रफुल्ल होकर मत्स्यनदी में स्नान किया और बाद में वहीं से विमान-पर सवार होकर धर्माधर्मनामक सरोवरपर गये। वहाँ स्नान करके पश्चिम समुद्रतटपर विराजमान जनार्दन-के दर्शन किये। अमावश्या तथा पूर्णिमाको गंगा तथा समुद्रके सङ्गमपर स्नान करके उन्होंने जनार्दन भगवान्-की पूजा की। उसके आगे स्त्री राज्य देखकर श्रीराम लोकको शिक्षा देनक निमित्त आगे नहीं बढ़े । ५३-५५ ॥ वहाँ से लौटकर रामने घृतमाला, कृतमाला तथा सिन्धुनदमें स्नान किया ॥ ५६ ॥ तत्पश्चात् ताम्रपर्णीके तटपर स्थित गजेन्द्रमोक्ष गये । जहाँ से ताम्रपर्णी निकली है, उस जगह स्नान किया। वहाँ से शैवाल तीर्थ गये ॥ ५७॥ वहाँ से चन्द्रकुमार पर्वतपर गये । पश्चात् विमानके द्वारा दक्षिणकाशी गये ॥ ५८ । वहाँ विश्वनाथका वन्दन करके चम्पकारण्य पधारे । वहाँ चित्रगङ्गा में स्नान करके दर्शनमात्रसे कल्याण करनेवाले हरिहरका दर्शन किया ॥ ५९ ॥ बाद में रामने विमानपर बैठकर मधुपूरीमें प्रवेश किया । तदनन्तर वेगवतीके पवित्र जल में सर्वगाहन करके जगद्विख्यात सौन्दरेश्वरके दर्शन किये ॥ ६० ॥ तदनन्तर मीनाक्षी देवीके दर्शन किये। द्रविड़गिरिपर वेंकटेश्वरके दर्शन किये और कावेरीके मध्यमें निवास करनेवाले श्रीरंगशयनका दर्शन किया ॥ ६१ ॥ पश्चात् मातृभूतेश्वरका दर्शन करके जंबुकेश्वरके दर्शनार्थ पधारे। वहाँ से रङ्गनाथ जाकर
सर्गः ७ ] यात्राकाण्डम् १००
श्रीगणेशं गत्वा स्नात्वा हैमवतीजले । शालिग्रामं नमस्कृत्य रामनाथपुरं ययौ ॥ ६३ ॥
स्नात्वा कुमारधारायां सुब्रह्मण्यं प्रपूज्य च । उदरनामकं तरुं कृत्वा नत्वा शृङ्गाचलं ययौ ॥ ६४ ॥
तुङ्गभद्रातटे भृगिगिरौ नत्वा तु शारदाम् । कुम्भकोणीं ततो गत्वा गत्वा कोटीश्वरं शिवम् ॥ ६५ ॥
नत्वा मूकांबिकां देवीं नत्वा मुण्डेश्वरं हरम् । गुणवनेश्वरं नत्वा नत्वा धानेश्वरं ततः ॥ ६६ ॥
गौरीश्वरं नमस्कृत्य नत्वा मणेश्वरं शिवम् । गोकर्णं च ततो गत्वा तं प्रणम्य महाबलम् ॥ ६७ ॥
हरिहरेश्वरं गत्वा पश्यंस्तीर्थान्यनेकशः । जगद्गम्यं महेन्द्राद्री नत्वा भीमेश्वरं ययौ । ६८ ।
धीरो महाबलं नत्वा ययौ कोल्हापुरं ततः । करवीरपुरं गत्वा कृष्णावेण्यास्तु सङ्गमम् ६९
स्नात्वा रामो विमानेन गद्दालक्ष्मीश्वरं ययौ । स्नात्वा घटप्रभायां तु पश्यन् पुण्यस्थलानि हि । ७० ।
महादेवं नमस्कृत्य नत्वा महालिङ्गीश्वरम् । कागनदीतटस्थं च वक्रतुण्डं विलोक्य च । ७१
नागनदीजले स्नात्वा नारसिंहं प्रपूज्य च । पांडुरंगं नमस्कृत्य चंद्रभागां विगाह्य च . ७२
ययौ भीमानदीं संगमं तु चन्द्रां च ततो ययौ । ततः प्रेमपुरं गत्वा नत्वा मार्तण्डभास्करम् ७३ ।
नीलगङ्गां विलोक्याथ नाना पुण्यस्थलानि हि । तुलजापुरसंस्थां तां देवीं नत्वा ययौ ततः ७४ ।
माणिक्यामंबिकां दृष्ट्वा पश्यन्तीर्थानि राघवः । योगेश्वरीं चाम्बायां दृष्ट्वा शत्रुमद्दिताम् ॥ ७५ ।
पंचनाथं नमस्कृत्य ब्रजगामश्रमं ययौ । नागेशं च विलोक्याथ विमानेन स राघवः ॥ ७६ ।
स्नात्वा पूर्णसंगमे तु गोदाया उत्तरे तटे । स्वनाम्नाऽथ पुरीं कृत्वा मुद्गलश्रममाययौ ॥ ७७
वाणतीर्थे ततः स्नात्वा बिन्दुफेनामृतसंगमे । गोदानाभ्रावतज्ज्ञेऽथ स्नात्वा नत्वा त्रिविक्रमम् ७८ ।
कृत्वा परां स्वनाम्ना तु पुरीं गोदाउदंगतटे । अंबकां तु नमस्कृत्य चंडिकां परिपूज्य च ॥ ७९ ॥
उनकी पूजा की। बादमें अविनाशी तीर्थकी ओर गये ॥ ६२ ॥ श्रीगणेशजीके दर्शनके बाद हैमवतीके पवित्र जलमें जाकर स्नान किया । पश्चात् शालिग्रामको नमस्कार करके रामनाथपुर पधारे ॥ ६३ ॥ वहीं कुमार-धारामें अवगाहन करके अनन्तर सुब्रह्मण्यदेवकी भक्तिपूर्वक पूजा की। पश्चात् उदरी नामक कृष्णतीर्थं गत्वा करके शृङ्गाचल आश्रमकी ओर पधारे ॥ ६४ ॥ वहीं तुङ्गभद्रा नदीमें स्नान करके भृङ्गिगिरिपर विराजमान शारदादेवीके दर्शन किये । पश्चात् कुम्भकोणी होते हुए कोटेश्वर गये ॥ ६५ । वहाँपर मूक विका देवीके दर्शन करते हुए मुण्डेश्वर शिवके दर्शनार्थ पधारे । पश्चात् गुणवनेश्वर और इसके उपरान्त धाणेश्वरके दर्शन किये ॥ ६६ । फिर गौरीश्वर तथा मणेश्वरके दर्शन किये फिर गोकर्णेश्वर, जगद्रम्य तथा महेन्द्र पर्वतपर विराजमान भीमेश्वरके दर्शन किये ॥ ६७ ॥ ६८ । तदनन्तरन् धीर और महाबलका दर्शन करके श्रीराम कोल्हापुर पधारे । पश्चात् करवीरपुर जाकर कृष्णा और वेणाके संगमम स्नान किया ॥ ६९ । तदनन्तर विमानारूढ़ होकर राम गद्दालक्ष्मीश्वरके दर्शनार्थ पधारे । वहाँ घटप्रभाम स्नान करके वहाँके अन्यान्य पुण्यस्थल देखे ॥ ७० ॥ फिर महादेवको नमस्कार करके महालिङ्गीश्वरके दर्शनार्थ गये। बादमें कागनदीके तटपर विद्यमान अर्द्धटुकराल वक्र-तुंडके दर्शन किये ॥ ७१ ॥ बादमें नीरा नदीमें स्नानकर तथा नरसिंहका पूजन करके पाण्डुरङ्गका पूजन और चन्द्रभागामें स्नान किया ॥ ७२ ॥ तदनन्तर भीमानदीके सङ्गम तथा चन्द्रमामें स्नान किया । फिर प्रेमरणम जाकर उन्होंने मार्तण्ड प्रभुका दर्शन किया ॥ ७३ ॥ वहाँ नीलगङ्गाका दर्शन करके बहुतसे स्थानोंका अवलोकन किया । पश्चात् तुलजानगरमें जाकर वहाँ देवीके शुभ दर्शन किये और बादमें आगे बढ़े । ७४ ॥ आगे जाकर माणिक्य अंबके दर्शन करके अन्यान्य पवित्र तीर्थोंमें श्रीरामाने भ्रमण किया। पश्चात् अंबापुरमें विराजमान योगेश्वरी अम्बाका दर्शन किया ॥ ७५ ॥ बादमें वैजनाथको नमस्कार करके ब्रजगामाश्रमपर पधारे। वहाँसे विमान द्वारा नागेश्वरके दर्शनार्थ गये ॥ ७६ ॥ पूर्णाके संगममें स्नान करके मारुतीके उत्तरी किनारेपर अपने नामसे रामने एक पुरी बनायी । वहाँसे मुद्गल ऋषिके आश्रम-पर होते हुए वाणतीर्थ गये । वहाँ स्नान करके बिन्दुफेनार्क मनोहर संगमपर गये । तत्पश्चात् गोदावरी और अम्बक नदीमें स्नान करके त्रिविक्रमके दर्शन किये ॥ ७७ ॥ ७८ ॥ वहाँपर भी गोदावरीके तटपर
२०७ आनन्दरामायणे [ सर्गः ८
आत्मतीर्थे ततः स्नात्वा नत्वा विज्ञानमीश्वरम् । महालक्ष्मीं विलोक्याथ वडवासंगमं ययौ ॥८०॥ प्रतिष्ठानं विलोक्याथ स्नात्वा वृद्धैल्मसंगमे । शिवनंदासंगमेऽथ नृसिंहं परिपूज्य सः ॥८१॥ स्वकीयनाम्ना ख्याततीर्थे प्रवरासंगमं ययौ । सिद्धेश्वरं नमस्कृत्य निवासाख्यं पुरं ययौ ॥८२॥ नृसिंहाख्यं पुरं गत्वा दृश्यस्थानान्यमलानि सः । ययौ गोदातटेनैव पुण्यस्तंभं रघूद्वहः ॥८३॥ गत्वा कङ्कसंगमे तु विनतासंगमं ययौ । जनस्थानं ततो गत्वा ययौ त्र्यंबकमीश्वरम् ॥८४॥ दाक्षिणात्यैर्नृपैर्मित्रैर्मानितः पूजितोऽपि च । गृहीत्वा करभारं स्वं तैस्सैन्यैः सहितो ययौ ॥८५॥ इयं दक्षिणयात्रेयं या कृता राघवेण वै । सा मया विस्तरेणैव कथिता त्र्यम्बकऋषे ॥८६॥ इति श्रीमदानन्दरामायणे यात्राकाण्डे दक्षिणतीर्थयात्रावर्णनं नाम सप्तमः सर्गः ॥ ७ ॥
अष्टमः सर्गः
( राम द्वारा भारतवर्षके पश्चिमी प्रदेशकी तीर्थयात्रा )
विष्णुदास उवाच
गुरो जातोऽस्ति संदेहो मम चित्ते वदाम्यहम् । स त्वया छिद्यतां स्वामिन् साधवो हि कृपालवः॥ १ ॥ यानारूढा न कर्तव्या यात्रा चेति श्रुतं मया । कथं यानेन रामेण कृता यात्रा स्वप्रेरिता ॥ २ ॥ इति जातोऽस्ति संदेहो मम तं त्वं निवारय । इति शिष्यवचः श्रुत्वा गुरुः प्राहार्थ तं पुनः ॥ ३ ॥
श्रीरामदास उवाच
पदा यात्रा न कर्तव्या छत्रचामरधारिभिः । गता द्वीपाधिपत्येन कार्या मांडलिकेन तु ॥ ४ ॥ पृथिवीशस्य देवस्य लग्नोद्वाहकवरस्य च । तथा मठाधिपस्यापि गमनं न पदा स्मृतम् ॥ ५ ॥ तस्मान्नात्र त्वया कार्यः संदेहो राघवं प्रति । आतृषा रामचंद्रस्य कृपयाऽपि च तैर्जनैः ॥ ६ ॥
अपने नामकी पुरी बसायी । फिर मन्त्रिका तथा चण्डिकाकी पूजा की ॥ ७९ ॥ पश्चात् आत्मतीर्थमें जाकर स्नान किया । बादमें विज्ञानेश्वरका दर्शन करके वडवासंगमपर स्नान किया ॥ ८० ॥ फिर प्रतिष्ठानपुरको देखकर वृद्धैसङ्गममें स्नान किया । शिवनन्दाके संगमर्म स्नान करके उन्होंने नृसिंहकी पूजा की ॥ ८१ ॥ तदनन्तर अपने नामके रामतीर्थको देखकर प्रवराके संगमपर गये । वहाँ सिद्धेश्वरको नमस्कार करके निवाससंज्ञकपुर गये । ८२ ॥ वहाँसे नूपुरनगर गये तथा और भी बहुतस स्थान देखे । गोदावरीके तटपर होते हुए रघूद्वह राम पुण्यस्तम्भ गये । ८३ । वहाँसे कङ्कके संगमपर गये । वहाँसे आगे विनताके संगमपर गये । वहाँसे जनस्थान और वहाँसे त्र्यंबकेश्वर गये ॥ ८४ ॥ रास्तेमे दाक्षिणात्य राजाओके द्वारा सम्मानित और पूजित होते हुए राम उनसे अपना कर उगाहल और उनका साथ संत हुए आग बड़े ॥ ८५ ॥ इस प्रकार त्र्यम्बकऋषि को हुई रामकी दक्षिण भारतकी तीर्थयात्रा मैने तुमको कह सुनायी ॥ ८६ ॥ इति श्रीमदानन्दरामायणे यात्राकाण्डे 'गोदा'मम्घाटीशार्या दक्षिणतीर्थयात्रावर्णनं नाम सप्तमः सर्ग ॥ ७ ।
विष्णुदासने कहा--हे गुरो मेरे हृदयमे एक संशय है । वह मैं आपके सम्मुख कहता हूँ। आप उसको दूर करें । क्योंकि साधु-महात्मा स्वभावसे कृपालु होते हैं ॥ १ ॥ मैंने सुना है कि सवारोपर बैठकर यात्रा नहीं करनी चाहिये । फिर आपने जो कहा कि श्रीरामने विमानपर सवार होकर यात्रा की सो क्यों ? ॥ २॥ यही मुझे संदेह है, इसे आप निवृत्त करे । शिष्यके वचनको सुनकर गुरुने कहा । ३ ॥ श्रीरामदास बोले-शास्त्रम यह भी लिखा है कि ऐसे छत्रचमरधारी पुरुषको पैदल यात्रा नहीं करनी चाहिए, जो किसी द्वीपका अधिपति राजा हो। हाँ, मांडलिक अर्थात् किसी एक मंडलके राजाको तो पैदल ही यात्रा करना उचित है ॥ ४ ॥ बड़े पृथ्वीपतिको, देवताको, जिसका विवाह होना हो ऐसे वरको तथा मठाधीशको पैदल चलकर यात्रा नहीं करनी चाहिए ॥ ५ ॥ अतः तुमको श्रीरामकी विमान द्वारा यात्रामें किसी प्रकारका संदेह नहीं
सर्गः ८ ] यात्राकाण्डम् २०१
मधिष्ठितं पृथ्व्यं तु यो वेदेत्यभिप्रेरितम् । इदानीं रामचंद्रस्य शृणु तां प्राक्तनीं कथाम् ॥ ७ ॥ त्र्यंबकाद्रामचंद्रस्तु पुरा यत्र तु निद्रितम् । सीतया पर्वते तत्र गत्वा स्थित्वा दिनत्रयम् ॥ ८ ॥ सप्तशृंगगिरिं गत्वा गत्वाऽगस्त्येस्तु चाश्रमम् । सुतीक्ष्णस्याश्रमं गत्वा ययौ चैलपुरं ततः ॥ ९ ॥ धुण्डेश्वरं नमस्कृत्य शिवतीर्थे विगाह्य च । दृष्ट्वा रम्यं देवगिरिं विरजाक्षेत्रमाययौ ॥१०॥ मत्तापुरस्थां देवीं तां नत्वा पश्यन्स्थलानि सः । देवघाटं नारसिंहं नत्वा रामश्च सीतया ॥११॥ चकार विधिवत्स्नानं पयोष्ण्यां बन्धुभिर्जनैः । स्नात्वा ताप्त्युदके रामः स्नात्वाऽन्तःपर्वतोजलम् ॥१२॥ गत्वा स्नात्वाऽथ रेवायांमोंकारं परिपूज्य च । पश्चिमाभिमुखः पश्यन्स्थानान्पुण्यस्थलानि हि ॥१३॥ ताप्याश्च संगमे स्नात्वा नर्मदायाश्च संगमे । महानदीजले स्नात्वा प्रभासं च ततो ययौ ॥१४॥ पद्मसरस्वतीनां च संगमेषु विगाह्य च । सौराष्ट्रञ्च सोमनाथं दृष्ट्वाऽथ भवतीं नदीम् ॥१५॥ पश्यन्स्थानान्यनल्पानि द्वारावत्यां ययौ ततः । गोमत्यां विधिवत्स्नात्वा द्वारावत्यां विवेश सः ॥१६॥ अनादिसिद्धां समतुं पुरीषु प्रसिद्धां शुभाम् । दृष्ट्वा कृत्वा तीर्थविधिं दत्त्वा दानान्यनेकशः ॥१७॥ पश्यंस्तीर्थानि सर्वाणि पुण्यानि रघुनंदनः । पश्चिमात्यैर्नृपैश्चापि मानितः पूजितोऽपि च ॥१८॥ गृहीत्वाऽऽज्ञां स्व तेभ्यस्तैः सहितो ययौ । सरस्वत्यास्तटेनैव पश्यन्पुण्यस्थलानि सः ॥१९॥ पुष्करस्थः शनैः सीतां दर्शयन् कौतुकानि च । ययौ पुष्करतीर्थं वै नृपैः सर्वैश्च संवृतः ॥२०॥ विमाने प्रत्यहं रामः कोटिशो ब्राह्मनान् सदा । भोजयामास दिव्यान्नैः पायसैः शर्करादिभिः ॥२१॥ विमाने ये स्थिताः पूर्वमयोध्यापुरवासिनः । तथा ये पूर्वदेशीया दाक्षिणात्या नृपाश्च ये ॥२२॥ पश्चिमात्या नृपा एवं ते सर्वैर्वाहनैः सह । रामेणातिथिसत्कार्यं वसन्त्याख्यानादिभिः ॥२३॥
करना चाहिए। उन्हीं रामचन्द्रके आज्ञाके अनुसार और लोग भी विश्वेश्वर सवार हुए ॥ ६ ॥ ईश्वरकी चेष्टा को कौन समझ सकता है? अब तुम श्रीरामकी प्राचीन कथा सुनो ॥ ७॥ त्र्यम्बक धामसे चलकर श्रीराम उस पर्वतपर गये, जहाँ सीताके साथ उन्होंने प्रथम निद्रा ली थी। वहाँपर उन्होंने तीन रात्रि निवास किया ॥ ८ ॥ सप्तशृङ्ग पर्वतपर जाकर अनेक मनोहर स्थानोंमें भ्रमण किया। वहाँसे अगस्त्य मुनिके आश्रमको गये बादमें सुतीक्ष्ण मुनिके आश्रममें पधारे। पश्चात् चैलपूर गये ॥ ९ ॥ वहाँ धुण्डेश्वरका नमस्कार किया, शिवतीर्थमें स्नान किया, रमणीक देवगिरि देखा और वहाँसे विरजाक्षेत्रम गये । १०॥ वहाँ मत्तापुरनिवासिनी देवीको नमस्कारकर अनेक स्थानोंको देखते हुए देवताराव आकर नरसिंहको प्रणाम किया। सीता सहित रामने आकर पयोष्णी नदीमें विधिवत् स्नान करके बन्धुसहित तापीके उदकप्रवाहमें स्नान किया। पश्चात् अन्तःपर्वतपर आकर रेवामें स्नान करके ओंकारेश्वरकी पूजा की और पश्चिमकी ओरके अनेक स्थान देखे, जो कि बड़े पवित्र थे ॥ १३-१४ ॥ तदनन्तर तापी तथा नर्मदाके संगममें स्नान करके महानदके जलमें स्नान किया और वहाँसे प्रभासक्षेत्र गये ॥ १४ ॥ वहाँ पद्मसरस्वतीके संगममें स्नान करके सौराष्ट्र (गुजरात) में सोमनाथजीका दर्शन किया। बहुसि भवती नदी गये। रास्तेमें अनेक स्थानोंको देखते हुए द्वारकादार द्वीप गये। वहाँ गोमतीमें विधिपूर्वक स्नान करके द्वारावती (द्वारिका) में प्रवेश किया ॥ १५ ॥ १६ ॥ जो कि सब पुरियोंमें अनादिसिद्ध, प्रसिद्ध और बड़ी ही सुन्दर पुरी है। वहाँ तीर्थविधि सम्पन्न करके अनेक दान दिये ॥ १७ ॥ इस प्रकार अनेक तीर्थोंको देखते तथा पश्चिमके राजा-महाराजाओंसे सम्मानित और पूजित होकर तथा उनसे आज्ञा कर लेते और उनके साथ पुण्य स्थानोंको देखते हुए राम सरस्वतीके किनारे-किनारे चले गये। पुष्करपर स्थित राम महारानी सीताको रास्तेमें अनेक कौतुक दिखाते तथा राजाओंके साथ वे पुष्करराज जा पहुँचे । १८-२० ॥ रामचन्द्रजी विमानपर भी प्रतिदिन करोड़ों ब्राह्मणोंको सुन्दर दिव्य अन्न मालपूआ आदि तथा विधिपूर्वक खीर भोजन कराते थे ॥ २१ ॥ इतना ही नहीं, बल्कि जो भी अयोध्यापुरवासी लोग विमानपर पहलेसे ही गये हुए थे तथा अन्य भी जो दक्षिण देशके
२०२ आनन्दरामायणे [ सर्गः ८
पूजिता मानिता आसन् सादरं ते यथासुखम् । न कश्चिद्भिन्नपाकं हि चकार पुष्पके नरः ॥२४॥ चिन्ता काष्ठतृणादीनां जलस्यापि न कस्यचित् । एका चिन्ता तु तत्रास्ति क्षुद्बोधो मे कथं भवेत् ॥२५॥ वांञ्छन्ति सर्वे तत्रैके भिषक् चूर्णं प्रदास्यति । निद्रायास्तत्र शङ्केयं वाद्यघोषैर्निरन्तरम् ॥२६॥ श्राम्यन्नत्र महान्त्वादिमान वास्यापिताशु । गीतेर्नैत्रकटाक्षैश्च क्रीडाभिश्चैवनादिभिः ॥२७॥ मणिदीपैर्दिनं रात्रिं न जानाति स्म तत्र वै । गच्छद्दिने कदा यानं याति रात्रावपि क्वचित् ॥२८॥ एतस्मिन्नन्तरे शिष्य पुष्करस्थैर्जनैस्तदा । महानादः श्रुतो रम्यो मंजुलः श्रुतितोषकृत् ॥२९॥ वारांगनापुराङ्गनः क्वणत्कंकणजीरवै च । कराताडनगीतादिसुदंगगणतोद्भवः ॥३०॥ नववाद्यसमुद्भूतो घंटीयंत्रसमुद्भवः । यानघंटाकिंकिणीनां पताकारवसम्भवः ॥३१॥ वारांगनाकटितटीकिंकिणीसंभवोऽपि च , वारणाश्वायुधोत्प्रादिसमुत्कपिसम्भवः ॥३२॥ वीरभ्यो वेदघोषभ्यः शिष्येभ्यश्च समुत्थितः । नटनाट्यवंदिभ्यो मागधेभ्यः समुत्थितः ॥३३॥ गोदोहमभवश्चापि बजासहिपिदोहन । दधिमंथनमद्भूतः शिशूनां रोदनोद्भवः ॥३४॥ निक्षुमत्रकमञ्जुमृखलास्थः समुत्थितः नानात्तूरोद्भवाश्चापि पिष्टचक्रसमुद्भवः ॥३५॥ घृतपाचितपक्वान्नप्रकारकरणोत्थपः । नारदादिमुनिश्रेष्ठतृतीणादिसंभवः ॥३६॥ पुराणकथनोद्भूतो हरिकीर्तनसंभवः । रामनाममहिमाद्विस्तोत्रपाठसमुद्भवः ॥३७॥ नारीपूरुषपेषणकार्ये कणणभवः । पादप्रक्षालनायादिनानाकार्यसमुद्भवः ॥३८॥
राजा श्रीमन् पुष्पदशक राजा लोग तथा पश्चिम देशके राजालोग थे । इन सबका भी सेनाओं और वाहनों सहित राघव विधिवत् अस्त्र-शस्त्र-आभूषण आदिसे सब सत्कार किया । उन्हें पूर्ण आदर और सुख दिया । पुष्पक विमानपर कोई भी मनुष्य पृथक् भोजन नहीं बनाता था । सब समूहरूप भोजनालयमें भोजन करते थे । इसलिए न तो किसीको काष्ठ तथा तृणकी चिन्ता थी और न जलका । यदि वहां किसीको कोई चिन्ता थी तो केवल यही कि अच्छी भूख कैसे लगे । जिससे कि खूब अच्छा अच्छा भोजन करें ॥ २४-२५ ॥ तहाँ सब लोग वैद्यसे चूर्ण मांगते फिरते रहते थे । यह संदिग्ध था ना केवल निद्राकी । क्योंकि हर समय नाना प्रकारके बाजोंकी ध्वनि हुआ करती थी ॥ २६ ॥ वहां यदि कोई भय था तो केवल वारांगनाओंका विमानस्थ लोगों का बाणोंऔर गीत, नेत्रकटाक्ष, अनेक क्रीड़ाओं, मधुर वचनों तथा मणिमय दीपोंके कारण रात-दिन एक-सा प्रभात होता था । यान कभी दिनमें यात्रा करता था और कभी रातमें ॥ २७ ॥ २८ ॥ इतनेमें हे शिष्य पुष्पकनोदक समय में एक बड़ा कोमल, मनोहर और श्रवणसुखकारी शब्द सुनायी पड़ा ॥ २९ ॥ जिसमें वरवाउक नूपुर बजने से कंकण बजने से तालियां बजती थी गान हो रहा था, मृदङ्ग तथा नगाड़े आदि वाद्यसमूह बज रहे थे, घटिया बज रही थीं, यानके घट बज रहे थे और झंडे फड़फड़ा रहे थे ॥ ३० ॥ ३१ ॥ वारांगनाओंकी कण्ठमें कमनीय बँधी हुई क्षुद्रघंटिकाएं बज रही थी और हाथी चिंघाड़ रहे थे। घोड़े हिनहिना रहे थे, आयुध खनखना रहे थे। ऊंट गलगला रहे थे। भाट केवल वाणी बोल रहे थे ॥ ३२ ॥ योद्धा लोग हुँकार लगा रहे थे। वेदपाठ हो रहा था। छात्रगण अध्ययन कर रहे थे। नटोंका नाटक हो रहा था। चारण तथा भाट विरुदावली बखान रहे थे ॥ ३३ ॥ गौका शङ्खका घघर शब्द हो रहा था। बकरियों तथा भैंस के दोहनका शब्द भी सुनायी दे रहा था। छाछ विलोनेका घरर-घरर निनाद हो रहा था। बालक रो रहे थे। बाल्संग्रह झूलोंकी सिकड़ियों का शब्द हो रहा था। अनेक बाजे बज रहे थे। आटा पीसनेकी चक्कियोंकी घरघरघूहट हो रही थी ॥ ३४ ॥ ३५ ॥ घीमें पक्वये जात तथा तले जात पक्वानोंका छुं छुं शब्द हो रहा था। नारदादि मुनियोंका वीणादिका मधुर शब्द हो रहा था ॥ ३६ ॥ पुराण बांचे जा रहे थे हरिकीर्तनकी ध्वनि हो रही थी । विष्णुसहस्रनाम तथा शिवमहिम्नस्तोत्रादिके पाठका घोष हो रहा था। नारियोंके कोई वस्तु कूटने तथा मेहन्दी आदि पीसनेके समय कङ्कणका शब्द हो रहा था। उनके पाद-प्रक्षालनके समय झांझरका झंकार, कड़ोंकी कणकणाहट, छड़ोंका छनछनाहट, बिछुओंकी छमछमा-
सर्गः ९ ] यात्राकाण्डम् २०३
सर्गः ९ ] यात्राकाण्डम् २०३
एवं नानाविधं श्रुत्वा पुष्करस्था जना ध्वनिम् । निशीथे पश्चिमामाशां किमेतद्विवि विह्वलाः ॥ ३९ ॥
केचिदूचुर्नन्दिघंटास्वनोऽयं श्रूयते महान् । केचिदूचुर्विमानेन गच्छतीन्द्रो दिवं प्रति ॥ ४० ॥
केचिदूचुः समायांति रंभाद्यप्सरसश्च खे । केचिन्मेघध्वनिं प्रोचुः केचिदैरावतं स्थिति ॥ ४१ ॥
केचिञ्चोचुः समायाति सागरः किं लयं विना । केचित्प्रोचुस्त्विदं ज्ञेयं वायुपुत्रस्य शब्दितम् ॥ ४२ ॥
केचिन्मन्त्रिराजस्व शब्दितं प्रोचुरूत्तमम् । केचित्प्रोचुश्च गंधर्वा विमानस्था भटंति खे ॥ ४३ ॥
केचिञ्चोचुर्नागकन्याः कुर्वन्तीदं सुगायनम् । कुर्वन्तश्चेति तर्कांश्च ददृशुः पुष्पकं महत् ॥ ४४ ॥
राममागतमाज्ञाय तोषपूर्णा बभूविरे उपायनानि संगृह्य प्रेमनिर्भरमानसाः ॥ ४५ ॥
प्रत्युज्जग्मुस्तदा रामं दृष्ट्वा नत्वा रघूत्तमम् । मेनिरे जन्मसाफल्यं राघवेणाभिमानितः ॥ ४६ ॥
राघवोऽपि विमानाग्र्यादवरुह्य द्विजोत्तमान् प्रणिपत्य समाभाष्य प्रतिपूज्य सविस्तरम् ॥ ४७ ॥
तैस्तीर्थवासिभिर्युक्तो ययौ पुष्करमुत्तमम् स्नात्वा सचैलं विधिना तीर्थश्राद्धं विधाय च ॥ ४८ ॥
दत्त्वा दानान्यनेकानि काश्याःकोट्यधिकानि तु । द्रव्यालंकारवस्त्राद्यैस्तोषयामास भूसुरान् ॥ ४९ ॥
ततस्तैरभ्यनुज्ञातो विमानेन ययौ पुनः । एवं पश्चिमयात्रा ते वर्णिता राघवस्य हि ॥ ५० ॥
इति श्रीमदानन्दरामायणे यात्राकाण्डे पश्चिमयात्रावर्णनं नामाष्टमः सर्गः ॥ ८ ॥
नवमः सर्गः
( रामकी उत्तरभारतीय तीर्थयात्रा और वहाँसे लौटकर अयोध्या आगमन )
रामदास उवाच
उत्तराभिमुखो रामस्ततः पश्यन् स्थलानि सः । ययौ पर्वततीर्थं च ततो ज्वालामुखों ययौ ॥ १ ॥
हृष्ट तथा पायजेबका मनोहारी निनाद हो रहा था ॥ ३७ ॥ ३८ ॥ इस प्रकार अनेक प्रकारके शब्दसे मिश्रित तथा वशीभूत ध्वनिको रात्रिके शांत समयमें पश्चिमकी ओर सुनकर पुष्करनिवासी लोग चकित हो गये ॥ ३९ ॥ कोई कहने लगा कि नन्दीश्वरके घंटका यह शब्द सुनाई देता है। कोई कहन लगा कि इन्द्र विमानपर बैठकर स्वर्ग जा रहे हैं ॥ ४० ॥ कोई कहने लगा कि रम्भादि अप्सराएं आकाशमें जा रही हैं। कोई मेघकी गर्जना बतलाने लगे। कोई ऐरावतकी चिघाड़ कहने लगा ॥ ४१ । कोई कहने लगा कि विना प्रलयकालके ही समुद्र उमड़ा आ रहा है। कोई कहने लगा कि वायुपुत्र हनुमान्का गर्जन हो रहा है ॥ ४२ ॥ कोई कहने लगा कि पक्षिराज गरुडका शब्द हो रहा है। कोई बोला कि ये सो गन्धर्व लोग विमानपर बैठकर आकाशमें घूम-फिर रहे हैं । ४३ ॥ कोई कहने लगा कि नागकन्याएं गान कर रही हैं। इस प्रकारके अनेक तर्क-वितर्क करते हुए वे लोग पुष्पकको देखने लगे ॥ ४४ ॥ बादम जब रामचन्द्रजाको आते देखा तो सब लोग बड़े ही प्रसन्न हुए । रामको देखकर सब लोग हाथमें अनेक तरहकी भेंट ले-लेकर प्रेमपूर्वक उनके सामने गये । श्रीरामको प्रणाम करके उन्होंने अपना जन्म सफल माना श्रीरामने भी उन सबका सत्कार किया ॥ ४५ ॥ ४६ ॥ पश्चात् श्रीरामने विमानसे नीचे उतरकर द्विज लोगोंमें श्रेष्ठ ब्राह्मणोंका नमस्कारपूर्वक पूजन किया ओर बादमें उन तीर्थवासियोंके साथ विस्तारसे वार्तालाप करते हुए उत्तम पुष्कर नगरमें प्रवेश किया । वहाँ सचस्त्र स्नान करके विधिवत् तीर्थश्राद्ध किया ॥ ४७ ॥ ४८ ॥ वहाँपर रामने काशीसे कोटिगुणा अधिक दान-पुण्य किया द्रव्य अलंकार, वस्त्र तथा अन्नादिसे ब्राह्मणोंको संतुष्ट किया बादमें उनसे आज्ञा लेकर वे विमान द्वारा आगे बढ़े। इस प्रकार हे पार्वती ! मैंने रामकी पश्चिम भारतकी तीर्थयात्रा कह सुनायी ॥ ४९ ॥ ५० ॥ इति श्रीमदानन्दरामायणे यात्राकाण्डे 'ज्योत्स्ना' भाषाटीकायां पश्चिमयात्रावर्णनं नामाष्टमः सर्गः ॥ ८ ॥
श्रीरामदासने कहा—बादमे श्रीराम अनेक स्थलों एवं उत्तरके पर्वतों तथा तीर्थोंको देखते हुए वहाँसे
२०४ आनन्दरामायणे [ सर्गः ९
पश्यन् स्थलानि संप्राप्त स्ततो श्रीमत्कर्णिकाम् । करतोयानदीतोये स्नात्वाऽग्रे न ययौ विभुः ॥ २ ॥ तत्तणे दोषमाकर्ण्य पर्यवर्त्तत राघवः । कर्मनाशानदीस्पर्शात्करतोयाविलङ्घनात् ॥ ३ ॥ गण्डकीबाहुतरणाद्धर्मः स्खलति कीर्त्तनात् । गत्वा देवप्रयागं चालकनन्दातटेन वै ॥ ४ ॥ नरनारायणौ गत्वा दर्शनान्मुक्तिदौ नृणाम् । बदरिकाश्रमे रामः केदारेशं विलोक्य सः ॥ ५ ॥ हिमाद्रौ देवगन्धर्वसंविते धातुमण्डले । महापथं ततो गत्वा ययौ तन्मानसं सरः ॥ ६ ॥ यस्माद्विनिर्गता गंगा सरयूः पापनाशिनी । कञ्जने यत्र हेमाभि यत्र हंसाः सहस्रशः ॥ ७ , रक्तनेत्रांघ्रिवदना मुक्ताभक्षणतत्पराः । यत्प्रदेशेषु चित्रभूम्यौ देवगंधर्वकिन्नराः ॥ ८ ॥ अप्सरोभिस्स्वकीयाभिः क्रीडां कुर्वन्त्यहर्निशम् । तत्र स्नात्वा मानसेऽथ गत्वा बिन्दुसरोवरम् ॥ ९ ॥ स्नात्वा दानादिकं कृत्वा हिमालयगिरिस्थिताम् । दृष्ट्वा ब्रह्मसभां दिव्यां मेरुपृष्ठसदृशीं पराम् ॥ १०॥ राघवः सीतया भ्रातृभिरुह्य स पुष्षकात् प्रणमंतं सुरेंद्रार्यरालिग्य चतुगननम् ॥ ११ ॥ ब्रह्मणा सहितान्देवान्पूजयामास विस्तरैः विधिरतं पूजयामाम कामधेनुं न्यवेदयत् । १२। विमानाग्रे कामधेनु मस्थाप्य रघुनंदनः सुरेंद्रादिभिः साक केलासमगमत्तदा । १३ ॥ राममागमनमाज्ञाय कैलासे गिरिजापतिः । प्रत्युज्जगाम पार्वत्या रामचंद्रं वृषस्थितः ॥ १४ ॥ अभ्यागतमाज्ञाय राघवः पुष्षकाज्जवात् । अवरुह्य नमस्कृत्य शिवेनालिंगितः स्थितः । १५॥ उमाऽपि सीतामालिग्य दिव्यालंकारचंदनैः । पूजयामास वस्त्राद्यैः सूर्यकोटिसमप्रभैः । नाटके नूपुरे दिव्ये केयूरे चूडकद्वयम् । १६। किंकिणीणवमयुक्तरशनां चन्द्राश्ककंगौ । सीमंतभूषणौ डारन्मणिमुक्ताविचित्रितान् । १७।।
जटाशायुत्री गये १। वहाँ अनेक दुर्तेरे स्थानोंको देखते हुए श्रीमत्कर्णिका तीर्थपर जा पहुंचे । वहाँ करतोया नदीमे स्नान किया, परन्तु उसको पार करक आगे नहीं गये ॥ २ ॥ श्रीराम करतोयाका पार करनेमें प्राय- श्चित्त सुनकर वहींसे लौट पड़े। क्योंकि शास्त्रोक्त दिशा है- कर्मनाशा नदीके स्पर्शमात्रसे करतोयाके लांघनेसे, गंडकी में हाथोंद्वारा तैरनेसे तथा धर्मका अपने मुखसे बखान करनाम प्राणीका किया हुआ धर्म नष्ट हो जाता है। वहाँ से देवप्रयाग गये । पश्चात् अलकनन्दाके किनारे किनारे चलकर मनुष्यांका दर्शनमात्रसे मुक्ति देनेवाले नर-नारायणका दर्शन किया। श्रीरामाने बदरिकाश्रमके बाद केदारेश्वरका दर्शन किया ॥ ३-५ । इसके अनन्तर राम अनेक धातुओंम मंडित हिमाद्रिपर गये, जहाँ कि अनेक देवता तथा गन्धर्व निवास करते हैं। बादमें महापथ गये और वहाँसे उस मर्यादित मानसरोवरपर पधारे ॥ ६ । जहाँसे कि पापोंको नष्ट करनेवाली गंगा तथा सरयू निकली है। उस मानसरोवरमे अनेक सुवर्णकमल खिले हुए थे वहाँ मोती चुगनमें तत्पर, लाल नेत्र, लाल पग तथा लाल मुखवाले हजारों राजहंस निवास करते थे। उस प्रदेशकी चित्र विचित्र भूमिपर अप्सराओं तथा स्त्रियांक सहित अनेक देव गन्धर्व और किन्नरांक समूह क्रीड़ा कर रहे थे। उस मानसरोवरमें स्नान करके श्रीराम बिन्दुसरोवर गये ॥ ७-९ । वहाँपर स्नान करक तथा अनेक दान देकर हिमालयपर गये। वहाँ मेरुपर्वतपर स्थित ब्रह्मसभाके समान एक दूसरी मनोहर ब्रह्मसभा देखी ॥ १० ॥ वहाँ राम सीता तथा अन्य सब लोगोंके साथ विमानपरसे उतर पड़े और इन्द्रादिकांको साथ लेकर प्रणाम करते हुए चतुर्मुख ब्रह्माका आलिंगन किया। ब्रह्मा सहित अन्य सब देवताओंकी रामने विस्तारसे पूजा की। पश्चात् ब्रह्माने भी श्रीरामका विधिवूवर्क पूजन किया और उन्हें सादर कामधेनु समर्पित की ॥ ११ ॥ १२ ॥ बादमें रघुनन्दन सब देवताओं सहित ब्रह्माको तथा उस कामधेनुको विमानपर रखकर कैलास पर्वतपर पधारे ॥ १३ ॥ कैलासपर श्रीरामको आते जानकर गिरिजाके पति शिवजी पार्वतीके साथ नन्दीश्वरपर सवार होकर रामचन्द्रको लेने आये । १४ ॥ राम शिवजीको आते देखकर पुष्पकपरसे नीचे उतर गये और शिवजीको प्रणाम किया। शिवजीने रामका आलिङ्गन किया। पार्वती ने भी सीताका आलिङ्गन करके दिव्य चन्दन आदिसे पूजा की । तदनन्तर प्रसन्न होकर उमादेवीने सीता महारानीको सूर्यके समान दीप्तिवाले अनेक आभूषण और वस्त्र दिये।
सर्ग ९] यात्राकाण्डम् २०५
सर्ग ९] यात्राकाण्डम् २०५
ददौ जनकनन्दिन्यै पार्वती तोषपूरिता। ततः शम्भुस्तदा प्राह राघव पूज्य वैभवैः ॥१८॥ राम त्वन्नाभिकमले ब्रह्माऽभूच्चतुराननः। ततो जातो विषंश्चाहं रुदनाद्रुद्रसंज्ञकः ॥१९॥ पौत्रस्तव रघूश्रेष्ठ तवाज्ञापरिपालकः। संहारः क्रियते राम आज्ञया तव चादरात् ॥२०॥ यदा मया तु प्रलये तदा शापं क्व ते मनम्। यत्प्रशस्यवधाच्चापि स्तीर्णश्चाश्वारथां करोषि हि। २१। क्रीडेयं तव राजेन्द्र सुखं कांडस्व सीतया। क्रियत लोकाङ्गुष्ठार्थे जानामि तव चेष्टितम् ॥२२॥ एवं नानाविधैस्तस्य चारित्रैर्गह्वरस्य राघवम्। ददौ सिंहासनं छत्रं चामरे चंपकप्रभम् ॥२३॥ पानपात्रं भोजनस्य पात्रं ह्येवं मनोरमम्। कण्ठे कुण्डले बाहुभूषणे मुकुटोत्तमम् ॥२४॥ राम प्रस्थापयामास बद्धात्वा चिन्तामणिं हृदि। हृदि चिन्तामणिं दृष्ट्वा राघवस्य विदेहजा ॥२५॥ प्राहातिलज्जिता रामं गौर्ये चिन्तामणिस्तव। तथेति राघवोऽप्युक्त्वा विमानेन जनैः सह ।२६। ययौ नत्वा शङ्करं हि कृत्वा यज्ञाधेश्चचनात्। आकाशे विम्वारुह्य विधिं मार्गेकेनाभवत् हि ।२७। भागीरथ्यास्तटेनैव हरिद्वारं ययौ जवात्। कुरुक्षेत्रं विगाद्याथ इन्द्रप्रस्थं ततो ययौ ॥२८॥ दृष्ट्वा मधुवनं रम्यं ययौ वृन्दावनं ततः। गोकुलं वीक्ष्य रामस्तु गोवर्धनमगाच्छनैः ॥२९॥ गत्वाऽथावन्तिकां पुण्यां क्षिप्रातीरेविराजिताम्। महाकाल पुरस्कृत्य पश्यंस्तीर्थान्यनेकशः ॥३०॥ दृष्ट्वा गजद्वयं क्षेत्रं सागरं कूपमेव च। ययौ स नैमिषारण्ये गोमत्यां स विगाह्य च ॥३१॥ सूतं पौराणिकं दृष्ट्वा शौनकादीन् प्रपूज्य च। स्नात्वा तद्रत्नतीर्थेऽसौ रघूत्तमः ॥३२॥ तमसां तां विगाद्याथ ददर्श नगरीं निजाम्। रम्यामागतमाज्ञाय सुमंत्रो वेगवत्तरः ॥३३॥
दो कर्णफूल, दो सुन्दर चूड़िएं, छाट-छाट घुंघरुवाले शब्दसे युक्त करधनी, चन्द्रमाके समान कान्ति- मान दो सीमन्तभूषण और मणि तथा मोतियोंके हार भी दिये । पश्चात् शिवजीने भी अनेक विधियोंसे रामका पूजन करके उनसे प्रश्न किया ॥ १८-१९॥ हे राम ! आपके नाभिकमलसे चतुरानन ब्रह्मा हुए। उन ब्रह्मासे मैं पैदा हुआ और रोदन करनेके कारण मेरा नाम रुद्र पड़ा ॥ १९ ॥ हे रघुनाथ ! इस प्रकार मैं आप- का पौत्र हुआ। हे राम ! आपकी आज्ञाका पालन करते हुए आपके सांकेतिक अनुमार मैं प्रलयकालमें तीनों लोकोंका संहार करता हूँ । तब क्या यह पाप आपका नहीं लगता, जो आज आप साक्षात्परब्रह्म होकर भी रावणवधरूप ब्रह्महत्यारूपी लोकापवादके भयसे प्रायश्चित्तरूपी अश्वमेध यज्ञ करते हैं ? ॥ २० । २१ ॥ अथवा ठीक ही है, मैं समझ गया। हे प्रभो ! आप यह सब लोकशिक्षाके लिये क्रीड़ा मात्र कर रहे हैं। यदि ऐसा है तो आप धन्य हैं! सीताके सहित क्रीड़ा करें। लोकमर्यादाको स्थापित करनेके अतिरिक्त और कुछ भी आपकी क्रीड़ाका प्रयो- जन नहीं है ॥ २२ ॥ इस प्रकार अनेक रामचरित्रोंका थोराभका स्तुति करनेके बाद शिवजीने उन्हें सिंहासन, एक छत्र, दो चमर, एक उत्तम शय्या, पानका डिब्बा, भोजन करनेके लिये सुन्दर सोनेका थाल, कंकण, कुण्डल, बाहे और मुकुट दिये ॥ २३।२४ ॥ तदनन्तर रामने गलय चिन्तामणि बाँधकर उन्हें विदा किया। सीताने रामके हृदयपर चिन्तामणि देखकर उनसे कुछ लज्जापूर्वक कहा- अच्य, यह चिन्तामणि आपका रही और यह कामधेनु मेरी । श्रीराम भी 'बहुत अच्छा' कहकर वहांसे सब लोगोंके साथ विमानपर सवार हो शंकर भगवान्को नमस्कार करके चल दिये । चलते समय वे शंकर भगवान्को भावी यज्ञकी सूचना देत गये। ब्रह्माका भी एक मासके बाद होनेवाले यज्ञमें अयोध्या आनेके लिए कहा ॥ २४-२७॥ वहाँसे भागीरथीके किनारे- किनारे हरिद्वार गये । वहाँसे शीघ्र ही कुरुक्षेत्रमें स्नान करके इन्द्रप्रस्थ (दिल्ली) गये ॥ २८ ॥ यहाँसे मनोहर मधुपुरीपुरी देखकर वृन्दावन पधारे । गोकुल देखकर वे गोवर्धन पर्वतपर गये ॥ २९ ॥ बादमें क्षिप्रा नदीके परम पवित्र अवन्तिका (उज्जैन) नगरीको गये, जो कि क्षिप्रा नदीके किनारेपर विद्यमान है। वहाँ महा- कालेश्वरका दर्शन-पूजन करके अनेक शुभ तीर्थ देखते हुए गजद्वय (हस्तिनापुर) क्षेत्र तथा सागर कूपको देखे। पश्चात् नैमिषारण्य गये। वहाँ गोमतीमें स्नान किया ॥ ३० ॥ ३१ । फिर पौराणिक सूतका दर्शन करके
२०६ आनन्दरामायणे [ सर्गः ९
अयोध्यां धूपयामास प्रोच्छ्रितानांविधध्वजैः। तोरणैश्च पताकाभिः पुष्पहारैर्मनोरमैः ॥३४॥ शोधयित्वा राजमार्गांन् सेचयित्वा तु चन्दनैः । विकीर्णकुसुमं दैव्यैर्बलिदीपैर्विराजितान् ॥३५॥ वप्रणेंद्रं पुरस्कृत्य सेनया परिवेष्टितः । प्रत्युज्जगाम राजेंद्रं पुष्पकस्थं त्वरान्वितः । ३६ । दण्डवत्प्रणिपत्याथ दत्त्वा चोपायनानि तन् । आलिङ्गितो राघवेण मेने स कृतकृत्यताम् ।३७। ततो वाद्यनिनादैश्च नर्तनैर्वारयोषिताम् । वेदघोषैर्द्विजानां च रामतीर्थं ययौ शनैः ॥३८॥ स्नात्वा तन्मग्ग्नयोये यत्न तीर्थे सुपपुण्यदम् । स्वयमेव कृतं पूर्वं नित्यकर्मार्थमादरात् ॥३९॥ वसिष्ठोक्तविधानेन कृत्वा चैकमुपोषणम् । दधिश्राद्धं विधायाथ दत्त्वा दानान्यनेकशः ॥४० । तृतीये दिवसे रामो विमानेन विहायसा । पुर्यां विलोक्य प्राकारम् हेमरत्नविनिर्मितान् ॥४१ । अयोध्यां शोभितां रम्यां गोपुराट्टालमंडिताम् । वीथीहट्टप्रभायुक्तां चतुष्पथविराजिताम् ॥४२॥ पश्यन् स्वकीयं राजसभाद्वारं प्राप रघूत्तमः । यानं भूमंडल प्राप्य सुखमासीत्स्थिरं तदा ॥४३॥ ततः सुमंत्रपत्नीभिर्दध्योदनविनिर्मिताः । बलयः कांस्यपात्रस्था जलनैर्घटास्तथा ॥४४॥ सीताराघवयोर्देहादुत्तार्य घृतकम्बदा । नीत्वा व्यक्त्वा विदूरे तु स्नात्वा रामगृहं ययुः ॥४५॥ ततो रामो विमानाऽथादवरुह्य स बन्धुभिः । नागरैर्नरभूपैर्नृपतिभिः सभायां सविवेश ह ॥४६॥ तस्थौ सिंहासने रम्येचिन्तामणिविराजितः । तस्यूर्नृपाः सभायां श्रीराघवेणातिमानिताः ॥४७॥ सीताऽपि निजगेह सा विचित्ररत्ननिर्मितम् । कामधेनुं पुरस्कृत्य प्रविष्टज्ञातिहर्षिता ॥४८॥ ततो रामः कामधेनुप्रभूनैस्तपस्तितैः । परमान्नैः षड्रसेश्च भोजयामास भूसुरान् ॥४९॥
शौनकादि ऋषियोंका पूजन और वह्नितीर्थ नामके सरोवरमें स्नान किया ॥ ३२ । तमसा नदीमें अवगाहन करके राम अपनी नगरीको चल पड़े। उधर श्रीरामको आते सुनकर सुमंत्रने झटपट अनेक प्रकारकी बड़ी बड़ी पताकाओं तथा ध्वजाओंसे अयोध्या नगरीको सजवा दिया। अनेक तोरण बँधवा दिये । ३३ ॥ ३४ ॥ राजमार्गोंको साफ कराकर चन्दनके जलसे छिड़काव करा दिया। उनपर दिव्य और नाना रंगके फल बिछवा दिये । जगह-जगह चौराहोंपर दीपक तथा पूजाकी सामग्री रखवा दी । ३५ । पश्चात् सुमन्त्रजी बाणेन्द्र (हाथी) को आगे करके सेनासहित स्वयं पुष्पकस्थित राजा रामकी अगवानी करने गये ॥ ३६ । उन्होंने उन्हें दण्डवत् प्रणाम करके अनेक उपहार दिये। बादमे मंत्री सुमंत्र रामसे आलिङ्गित होकर अपने आपको कृतकृत्य समझने लगे ॥ ३७। तदनन्तर बाजे-गाजे करांगनाओंके नृत्य तथा ब्राह्मणोंके वेदघोषके साथ राम धीरे-धीरे रामतीर्थपर गये ॥३८ वहाँ जाकर उन्होंने सरयूके जलमें स्नान किया। वह बड़ा पवित्र तथा उत्तम तीर्थ स्वयं रामके ही नित्यकर्मके लिये निर्मित हुआ था ॥ ३९ ॥ वहाँ उन्होंने वसिष्ठजीके कथनानुसार विधिवत् एक उपवास किया, दधिश्राद्ध किया तथा अनेक दान दिये ॥ ४० ॥ तीसरे दिन श्रीराम विमानके द्वारा आकाशमार्गसे नगरके सुवर्णनिर्मित प्राकारोंको देखकर पुरद्वार तथा सुन्दर अटारियोंसे सुशोभित मनोहारिणी अयोध्यामें पधारे। जो गलियों, सड़कों, बाजारों तथा चौराहोंसे बढ़ी ही भली लग रही थी ॥ ४१ ॥ ४२ ॥ बहुत दिनों बाद आज उन्हें अपनी राजसभाके द्वारका दर्शन प्राप्त हुआ। वहाँ आकर वे यानपरसे उतर पड़े। विमान भी भूतलपर उतरकर सुखपूर्वक खड़ा हो गया ॥ ४३ ॥ तब सुमंत्रकी स्त्रियें दधि-ओदन-से युक्त काँसेके पात्रमें रक्खी हुई बलिर्ग तथा जल-तेलसे पूर्ण सैकड़ों घट सीता तथा रामके देहपरसे उतार तथा दूर ले जाकर छोड़ आयीं और स्नान करके रामके महलमें गयीं ॥ ४४ ॥ ४५ ॥ श्रीराम भी विमानपरसे उतरनेके बाद नागरिकों तथा अन्य राजाओंके साथ सभाभवनमें पधारे ॥ ४६ ॥ चिन्तामणिसे सुशोभित होनेवाले राम सिंहासनपर जा विराजे तथा उनसे सम्मानित होकर अन्य राजे भी यथास्थान बैठ गये ॥ ४७ ॥ महारानी सीता भी कामधेनुको लेकर प्रसन्नतापूर्वक चित्र-विचित्र रत्नोंसे निर्मित अपने महलमें गयीं ॥ ४८ ॥ पश्चात् श्रीरामने कामधेनुसे प्राप्त घृतसे निर्मित षड्समय उत्तम पक्वानों द्वारा
सर्गः ९ ] यात्राकाण्डम् २०७
अचाण्डालांस्तर्पयित्वा स्वयं कृत्वाऽशनं तदा ।
निद्रार्थं नृपतीन् याने स्थलमाज्ञापयत्तदा ॥ ५० ॥
पञ्चरात्रं नृपान् प्रीत्या स्थापयित्वा स्ववेश्मनि ।
वस्त्रालङ्कारतुष्टैस्तोष्ययित्वा भटैस्ततम् ॥ ५१ ॥
तान् प्रोवाच रमानाथः प्रवृद्धकलशपुरान् ।
मम यज्ञानुगं दृष्ट्वा सन्तृप्तैर्गोः पुनः ॥ ५२ ॥
आगन्तव्यं जनपदैः स्वसैन्यैर्नागरैः सह ।
इत्यज्ञां नृपतीगम्य संगीकृत्य नृपोत्तमाः ॥
ययुः स्वं स्वं पुरं देशं स्वबलैः परिवेष्टिताः ॥ ५३ ॥
सुग्रीवाद्यान्वानरांश्च परिवारसमन्वितान्
आज्ञापयित्वा नद्यानि स्थापयामास स्वानिके ॥ ५४ ॥
राजिमेधानन्तरं हि प्रेषयिष्याम्ब्यहं त्विति ।
अतो दुन्दुभिनिर्घोषं स्वपुर्यां घोषयत्तदा ॥ ५५ ॥
मन्नारम्य जनैः सर्वैरयोग्यमानगर्गस्खिनैः ।
यैः कैश्चिदत्र पथिकैर्भिक्षापार्कर्न युज्यताम् ॥ ५६ ॥
यावत्कण्डम्यहं भूम्यां राज्यं सीतासमन्वितः ।
निजगार्हस्थ्यमालम्ब्य ये वर्तन्ते नरोत्तमाः ॥ ५७ ॥
ते कुर्वन्तु सुखं पार्क स्वस्वगेहेषु भक्तितः
निबंधो मम न ह्येयो वर्तितव्य यथासुखम् ॥ ५८ ॥
इत्याज्ञाप्य जनान् रामः सुखं तस्थौ त सीतया ।
अयोध्यायां तु सर्वत्र वेदघोषो गृहे गृहे ॥ ५९ ॥
मङ्गलानि समुत्साहा नर्तनं वारयोषिताम् ।
बभूवुश्च पुराणानि कीर्तनानि हरेः कथाः ॥ ६० ॥
एवमासीत्सुसंतुष्टा साकेतनगरी शुभा ।
एवं प्रोक्तं मया शिष्य यत्राकाण्डमनुत्तमम् ॥ ६१ ॥
ये शृण्वंति नरा भक्त्या तेषां यात्राफलं भवेत् ।
यात्रार्थनार्थनोयोगे यात्राकाण्डमिदं वरम् ॥ ६२ ॥
पठित्वा ये तु गच्छंति सुखनायांति ते गृहम् ।
ब्रह्महत्यादिपापानि कृतानि भनवैः सकृद् ॥ ६३ ॥
यात्राकाडमिदं जप्त्वा शुद्धिस्तेभ्यो भविष्यति ।
सर्वतीर्थावगाहेन यत्फलं परिकीर्तितम् ॥ ६४ ॥
यात्राकाण्डमिदं श्रुत्वा तत्फलं प्रतिपद्यते ।
धनार्थी धनमाप्नोति कामी कामानवाप्नुयात् ॥ ६५ ॥
ब्राह्मणोंसे लेकर चाण्डाल तकको यथोचित भोजन कराके तृप्त किया । बादम राजाओक हाथ स्वयं भोजन करके राजाओको अपनेपने विश्रामके तथा अन्यान्य महलोंमे जानेकी आज्ञा दी ॥ ५० ॥ इस प्रकार पाँच दिन तक उन लोगोंको बड़े ही प्रेम तथा सत्कारसे रामने अपने भवनमें रक्खा । बादम वस्त्र, अलंकार तथा अश्व आदि दे और उन्हें भलीभाँति प्रसन्न करके अपने-अपने स्थानको आनकी आज्ञा दी । जब वे हाथ जोड़कर जानेके लिए सम्मुख खड़े हुए, तब रमानाथ रामने फिरसे उन यज्ञके मुख्यमुख्यगणपर मस्तक संभूत अश्वके पीछे-पीछे चलनेके लिए ससैन्य और प्रजा सहित आनिक लिये कहा । वे उन इस आज्ञाक स्वीकार करक अपनी-अपनी सेन के साथ अपने-अपन देश तथा नगरकी ओर चल दिये । परिवार सहित सुग्रीव आदि वानरोको रहनेके वास्ते बहुतसे भवन देकर अरने यहाँ रक्खा और कहा कि अश्वमेध यज्ञके पश्चात् तुम लोगोंको विदा करेंगे। बादमें श्रीरामने अपने नगरमें डिंडोरा पिटवाकर कहला दिया कि आजसे लेकर मेरे नगरवासियों तथा अन्य यान्नी लोगोको अल्य भोजन बनाकर नहीं खाना चाहिये। सब लोग तबतक हमारे भोजनालयम भोजन करें, जब तक कि मै भूमिपर राज्य करूँ । हाँ, जो गृहस्थाश्रमी हों, वे भले ही अपने-अपने घरोंमें भक्तिपूर्वक सुखसे भोजन बनाएँ । उनके लिय मेरा आग्रह नहीं है। ५१-५८ ॥ यह आज्ञा देकर राम सीताके साथ सुख-पूर्वक रहने लगे । तबसे अयोध्या नगरीमे घर-घर वेदध्वनि होने लगी । ५९॥ मङ्गलगान होने लगे, सोत्साह वारंगनाओंका नृत्य होने लगा तथा पुराणपाठ और हरिकथाएं होने लगीं ॥ ६० ॥ इस प्रकार वह समस्त पुरी आनन्दित हो उठी । हे शिष्य मैंने तुमको भली भाँति उत्तम यात्राकांड सुनाया ॥ ६१ ॥ जो मनुष्य इस यात्रा-काण्डको भक्तिपूर्वक श्रवण करेगा, उसे समस्त यात्रायें करनेका फल प्राप्त होगा। यदि मनुष्य यात्रामे जानेके समय अथवा धन कमानेके लिये जाते समय इसको सुनकर जाय तो वह सुखपूर्वक और कृतार्थ होकर लौटेगा। यदि मनुष्यने ब्रह्महत्यादि जैसे घोर पाप किये हों तो वे भी इसकी मुजन्स दूर हो जाते हैं और प्राणी शुद्ध हो जाता है। सब तीर्थोंकी यात्रा करनेसे जो फल होता है, वह इस यात्राकाण्डको पढ़ने तथा सुननेसे प्राप्त हो जाता है । धनकी इच्छावालेको धन और कामकी इच्छावालेको काम मिलता है ॥ ६२-६५ ॥ इस
२०८ आनन्दरामायणे [ सर्गः ९
पापी पूतो भवेत्सद्यो यात्राकाण्डश्रवादिना । यः कश्चित्प्रातरुत्थाय कृतशौचविधिर्नरः ॥ ६६ ॥
तीर्थांशं च वरं काण्डमिदं पुण्यं पठिष्यति । तस्य रामश्च संतुष्टः पूरयिष्यति वांछितम् ॥ ६७ ॥
सर्वतीर्थावगाहस्य फल तस्य भवेद्ध्रुवम् । यानि कानि च पापानि जन्मांतरकृतानि च ॥ ६८ ॥
तानि सर्वाणि नश्यन्ति यात्राकाण्डश्रवादिना ॥ ६९ ॥
इति श्रीशतकोटिरामचरितांतर्गतश्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये यात्राकाण्डे
रामोत्तरयात्रा-नगरप्रवेशो नाम नवमः सर्गः ॥ ६ ॥
यात्राकांडे च सर्गा वै नव प्रोक्ता मनीषिभिः ।
पंचत्रिंशोत्तराः सप्तशतश्लोका भवापहाः ॥ १ ॥
कांडको सुननेसे पापी पुरुष भी पवित्र हो जाता है । जो प्राणी प्रातःकाल उठ तथा स्नानादि करके इस पवित्र यात्राकाण्डको पढ़ेगा तो श्रीरामकी अनुकम्पासे उसके सब मनोरथ पूरे होंगे ॥ ६६ ॥ ६७ ॥ उसे सब तीर्थोंकी यात्राका फल मिलेगा जन्म-जन्मान्तरके जो कुछ पाप होंगे वे सब इस यात्राकाण्डको सुननेसे अवश्य नष्ट हो जायेंगे ॥ ६८ ॥ ६९ ॥ इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गतश्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये यात्राकांडे पं० रामतेजपाण्डेयकृत'ज्योत्स्ना'भाषाटीकायां रामोत्तरयात्रा-नगरप्रवेशो नाम नवमः सर्गः ॥ ६ ॥
इस यात्राकांडमें नौ सर्ग और भवभयको दूर करनेवाले ७३५ सात सौ पैंतीस श्लोक कहे गये हैं ॥ १ ॥
* इति श्रीमदानन्दरामायणे यात्राकाण्डं समाप्तम् *
श्रीरामचन्द्रार्पणमस्तु
श्रीरामचन्द्रो विजयतेतराम्
श्रीवाल्मीकिमहामुनिकृतशतकोटिरामचरितान्तर्गतं
आनन्दरामायणम्
'ज्योत्स्ना'ऽऽह्वया भाषाटीकयाऽऽटीकितम्
यागकाण्डम्
प्रथमः सर्गः
(अश्वमेध यज्ञके लिए सामग्री एकत्र करनेका निर्देश)
श्रीरामदास उवाच
अथ रामः सभाध्ये एकदा गुरुमब्रवीत् । कुम्भोदरमुनेर्वाक्यात्तीर्थयात्रा मया कृता ॥ १ ॥
इदानीं तस्य वाक्येन वाजिमेधं करोम्यहम् । यज्ञोपकरणानि त्वं लक्ष्मणाय वदस्व हि ॥ २ ॥
सुमुहूर्ते शुभे लग्ने श्यामकर्णस्त्रिपुच्छकः । तुरङ्गो दिव्यवस्त्राद्यैर्भूषयित्वा विमुच्यताम् ॥ ३ ॥
पृथ्वीप्रदक्षिणार्थं हि तत्पृष्ठेऽयुतसंख्यया । सेनया सह शत्रुघ्नः सुमंत्रेण महाद्युतिः ॥ ४ ॥
तद्राघववचं श्रुत्वा वसिष्ठो मुनिसत्तमः । ज्योतिर्विद्भिःसहितो दृष्ट्वा सुमुहूर्तं शुभोदयम् ॥ ५ ॥
आज्ञापयत्स सौमित्रिं सभायां राजसन्निधौ । सौमित्रेऽद्यदिनात्सप्तमेऽह्नो मुहूर्त्तः सप्तमेऽहनि ॥ ६ ॥
दीक्षार्थं रामचन्द्रस्य वाजिमेधाख्यकर्मणि । रामतीर्थे यज्ञभूमिः शोधनीया हलादिभिः ॥ ७ ॥
सुवर्णनिर्मितैर्दिव्यैर्ब्राह्मणैः सह सत्वरम् । दशक्रोशमिताऽयोध्याबहिः सर्वत्र लक्ष्मण ॥ ८ ॥
समा कंकरहीना तु लिप्ता चन्दनजातिभिः । मण्डपश्च विधातव्यः सर्वदोषखण्डितः शुभः ॥ ९ ॥
श्रीरामदासने कहा इसके अनन्तर एक दिन सभामें रामचन्द्रजी गुरु वसिष्ठसे कहने लगे—हे गुरो ! कुम्भोदर ऋषिके कथनानुसार मैंने तीर्थयात्रा की । अब उन्हींकी बातसे मैं अश्वमेध यज्ञ भी करना चाहता हूँ । यज्ञकी जो-जो आवश्यक वस्तुएँ हों, कृपया आप लक्ष्मणको बतला दीजिए ॥ १ ॥ २ ॥ किसी अच्छे मुहूर्त और शुभ लग्नमें श्याम रङ्गवाले जिसके कान, पैर और पूँछ हों, ऐसे घोड़ेको सुन्दर वस्त्रों और आभूषणोंसे सुसज्जित करके पृथ्वीप्रदक्षिणाके लिए छोड़ा जाय ॥ ३ ॥ तदनन्तर उस यज्ञीय घोड़ेकी रक्षा करनेके लिए दस हजार सेनाके साथ सुमन्त्र और शत्रुघ्न प्रस्थान करें ॥ ४ ॥ रामचन्द्रजी की इन बातोंको सुनकर वसिष्ठजीने ज्योतिषियोंके साथ अच्छे लग्न तथा अच्छे नक्षत्रसे संयुक्त एक बढ़िया मुहूर्त देखा और सभामें ही रामचन्द्रजीके सामने लक्ष्मणजीसे बोले—हे लक्ष्मण ! रामचन्द्रके यज्ञकी दीक्षा लेनेका शुभ मुहूर्त आजसे ठीक सातवें दिन है ॥ ५ ॥ ६ ॥ सबसे पहला काम यह है कि इस अश्वमेध यज्ञके लिए रामतीर्थकी भूमि सुवर्णके बने हुए हलों द्वारा ब्राह्मणोंके साथ जोतकर शुद्ध की जाय । अयोध्याके चारों ओर दस कोस तककी जमीन पटवाकर बराबर कर दी जाय और ऐसी साफ की जाय कि उसमे कहीं कुछ भी कङ्कड़-पत्थर न रहने