भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 220

२०४ आनन्दरामायणे [ सर्गः ९

पश्यन् स्थलानि संप्राप्त स्ततो श्रीमत्कर्णिकाम् । करतोयानदीतोये स्नात्वाऽग्रे न ययौ विभुः ॥ २ ॥ तत्तणे दोषमाकर्ण्य पर्यवर्त्तत राघवः । कर्मनाशानदीस्पर्शात्करतोयाविलङ्घनात् ॥ ३ ॥ गण्डकीबाहुतरणाद्धर्मः स्खलति कीर्त्तनात् । गत्वा देवप्रयागं चालकनन्दातटेन वै ॥ ४ ॥ नरनारायणौ गत्वा दर्शनान्मुक्तिदौ नृणाम् । बदरिकाश्रमे रामः केदारेशं विलोक्य सः ॥ ५ ॥ हिमाद्रौ देवगन्धर्वसंविते धातुमण्डले । महापथं ततो गत्वा ययौ तन्मानसं सरः ॥ ६ ॥ यस्माद्विनिर्गता गंगा सरयूः पापनाशिनी । कञ्जने यत्र हेमाभि यत्र हंसाः सहस्रशः ॥ ७ , रक्तनेत्रांघ्रिवदना मुक्ताभक्षणतत्पराः । यत्प्रदेशेषु चित्रभूम्यौ देवगंधर्वकिन्नराः ॥ ८ ॥ अप्सरोभिस्स्वकीयाभिः क्रीडां कुर्वन्त्यहर्निशम् । तत्र स्नात्वा मानसेऽथ गत्वा बिन्दुसरोवरम् ॥ ९ ॥ स्नात्वा दानादिकं कृत्वा हिमालयगिरिस्थिताम् । दृष्ट्वा ब्रह्मसभां दिव्यां मेरुपृष्ठसदृशीं पराम् ॥ १०॥ राघवः सीतया भ्रातृभिरुह्य स पुष्षकात् प्रणमंतं सुरेंद्रार्यरालिग्य चतुगननम् ॥ ११ ॥ ब्रह्मणा सहितान्देवान्पूजयामास विस्तरैः विधिरतं पूजयामाम कामधेनुं न्यवेदयत् । १२। विमानाग्रे कामधेनु मस्थाप्य रघुनंदनः सुरेंद्रादिभिः साक केलासमगमत्तदा । १३ ॥ राममागमनमाज्ञाय कैलासे गिरिजापतिः । प्रत्युज्जगाम पार्वत्या रामचंद्रं वृषस्थितः ॥ १४ ॥ अभ्यागतमाज्ञाय राघवः पुष्षकाज्जवात् । अवरुह्य नमस्कृत्य शिवेनालिंगितः स्थितः । १५॥ उमाऽपि सीतामालिग्य दिव्यालंकारचंदनैः । पूजयामास वस्त्राद्यैः सूर्यकोटिसमप्रभैः । नाटके नूपुरे दिव्ये केयूरे चूडकद्वयम् । १६। किंकिणीणवमयुक्तरशनां चन्द्राश्ककंगौ । सीमंतभूषणौ डारन्मणिमुक्ताविचित्रितान् । १७।।

जटाशायुत्री गये १। वहाँ अनेक दुर्तेरे स्थानोंको देखते हुए श्रीमत्कर्णिका तीर्थपर जा पहुंचे । वहाँ करतोया नदीमे स्नान किया, परन्तु उसको पार करक आगे नहीं गये ॥ २ ॥ श्रीराम करतोयाका पार करनेमें प्राय- श्चित्त सुनकर वहींसे लौट पड़े। क्योंकि शास्त्रोक्त दिशा है- कर्मनाशा नदीके स्पर्शमात्रसे करतोयाके लांघनेसे, गंडकी में हाथोंद्वारा तैरनेसे तथा धर्मका अपने मुखसे बखान करनाम प्राणीका किया हुआ धर्म नष्ट हो जाता है। वहाँ से देवप्रयाग गये । पश्चात् अलकनन्दाके किनारे किनारे चलकर मनुष्यांका दर्शनमात्रसे मुक्ति देनेवाले नर-नारायणका दर्शन किया। श्रीरामाने बदरिकाश्रमके बाद केदारेश्वरका दर्शन किया ॥ ३-५ । इसके अनन्तर राम अनेक धातुओंम मंडित हिमाद्रिपर गये, जहाँ कि अनेक देवता तथा गन्धर्व निवास करते हैं। बादमें महापथ गये और वहाँसे उस मर्यादित मानसरोवरपर पधारे ॥ ६ । जहाँसे कि पापोंको नष्ट करनेवाली गंगा तथा सरयू निकली है। उस मानसरोवरमे अनेक सुवर्णकमल खिले हुए थे वहाँ मोती चुगनमें तत्पर, लाल नेत्र, लाल पग तथा लाल मुखवाले हजारों राजहंस निवास करते थे। उस प्रदेशकी चित्र विचित्र भूमिपर अप्सराओं तथा स्त्रियांक सहित अनेक देव गन्धर्व और किन्नरांक समूह क्रीड़ा कर रहे थे। उस मानसरोवरमें स्नान करके श्रीराम बिन्दुसरोवर गये ॥ ७-९ । वहाँपर स्नान करक तथा अनेक दान देकर हिमालयपर गये। वहाँ मेरुपर्वतपर स्थित ब्रह्मसभाके समान एक दूसरी मनोहर ब्रह्मसभा देखी ॥ १० ॥ वहाँ राम सीता तथा अन्य सब लोगोंके साथ विमानपरसे उतर पड़े और इन्द्रादिकांको साथ लेकर प्रणाम करते हुए चतुर्मुख ब्रह्माका आलिंगन किया। ब्रह्मा सहित अन्य सब देवताओंकी रामने विस्तारसे पूजा की। पश्चात् ब्रह्माने भी श्रीरामका विधिवूवर्क पूजन किया और उन्हें सादर कामधेनु समर्पित की ॥ ११ ॥ १२ ॥ बादमें रघुनन्दन सब देवताओं सहित ब्रह्माको तथा उस कामधेनुको विमानपर रखकर कैलास पर्वतपर पधारे ॥ १३ ॥ कैलासपर श्रीरामको आते जानकर गिरिजाके पति शिवजी पार्वतीके साथ नन्दीश्वरपर सवार होकर रामचन्द्रको लेने आये । १४ ॥ राम शिवजीको आते देखकर पुष्पकपरसे नीचे उतर गये और शिवजीको प्रणाम किया। शिवजीने रामका आलिङ्गन किया। पार्वती ने भी सीताका आलिङ्गन करके दिव्य चन्दन आदिसे पूजा की । तदनन्तर प्रसन्न होकर उमादेवीने सीता महारानीको सूर्यके समान दीप्तिवाले अनेक आभूषण और वस्त्र दिये।