भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 219

सर्गः ९ ] यात्राकाण्डम् २०३


एवं नानाविधं श्रुत्वा पुष्करस्था जना ध्वनिम् । निशीथे पश्चिमामाशां किमेतद्विवि विह्वलाः ॥ ३९ ॥
केचिदूचुर्नन्दिघंटास्वनोऽयं श्रूयते महान् । केचिदूचुर्विमानेन गच्छतीन्द्रो दिवं प्रति ॥ ४० ॥
केचिदूचुः समायांति रंभाद्यप्सरसश्च खे । केचिन्मेघध्वनिं प्रोचुः केचिदैरावतं स्थिति ॥ ४१ ॥
केचिञ्चोचुः समायाति सागरः किं लयं विना । केचित्प्रोचुस्त्विदं ज्ञेयं वायुपुत्रस्य शब्दितम् ॥ ४२ ॥
केचिन्मन्त्रिराजस्व शब्दितं प्रोचुरूत्तमम् । केचित्प्रोचुश्च गंधर्वा विमानस्था भटंति खे ॥ ४३ ॥
केचिञ्चोचुर्नागकन्याः कुर्वन्तीदं सुगायनम् । कुर्वन्तश्चेति तर्कांश्च ददृशुः पुष्पकं महत् ॥ ४४ ॥
राममागतमाज्ञाय तोषपूर्णा बभूविरे उपायनानि संगृह्य प्रेमनिर्भरमानसाः ॥ ४५ ॥
प्रत्युज्जग्मुस्तदा रामं दृष्ट्वा नत्वा रघूत्तमम् । मेनिरे जन्मसाफल्यं राघवेणाभिमानितः ॥ ४६ ॥
राघवोऽपि विमानाग्र्यादवरुह्य द्विजोत्तमान् प्रणिपत्य समाभाष्य प्रतिपूज्य सविस्तरम् ॥ ४७ ॥
तैस्तीर्थवासिभिर्युक्तो ययौ पुष्करमुत्तमम् स्नात्वा सचैलं विधिना तीर्थश्राद्धं विधाय च ॥ ४८ ॥
दत्त्वा दानान्यनेकानि काश्याःकोट्यधिकानि तु । द्रव्यालंकारवस्त्राद्यैस्तोषयामास भूसुरान् ॥ ४९ ॥
ततस्तैरभ्यनुज्ञातो विमानेन ययौ पुनः । एवं पश्चिमयात्रा ते वर्णिता राघवस्य हि ॥ ५० ॥
इति श्रीमदानन्दरामायणे यात्राकाण्डे पश्चिमयात्रावर्णनं नामाष्टमः सर्गः ॥ ८ ॥


नवमः सर्गः

( रामकी उत्तरभारतीय तीर्थयात्रा और वहाँसे लौटकर अयोध्या आगमन )

रामदास उवाच

उत्तराभिमुखो रामस्ततः पश्यन् स्थलानि सः । ययौ पर्वततीर्थं च ततो ज्वालामुखों ययौ ॥ १ ॥


हृष्ट तथा पायजेबका मनोहारी निनाद हो रहा था ॥ ३७ ॥ ३८ ॥ इस प्रकार अनेक प्रकारके शब्दसे मिश्रित तथा वशीभूत ध्वनिको रात्रिके शांत समयमें पश्चिमकी ओर सुनकर पुष्करनिवासी लोग चकित हो गये ॥ ३९ ॥ कोई कहने लगा कि नन्दीश्वरके घंटका यह शब्द सुनाई देता है। कोई कहन लगा कि इन्द्र विमानपर बैठकर स्वर्ग जा रहे हैं ॥ ४० ॥ कोई कहने लगा कि रम्भादि अप्सराएं आकाशमें जा रही हैं। कोई मेघकी गर्जना बतलाने लगे। कोई ऐरावतकी चिघाड़ कहने लगा ॥ ४१ । कोई कहने लगा कि विना प्रलयकालके ही समुद्र उमड़ा आ रहा है। कोई कहने लगा कि वायुपुत्र हनुमान्का गर्जन हो रहा है ॥ ४२ ॥ कोई कहने लगा कि पक्षिराज गरुडका शब्द हो रहा है। कोई बोला कि ये सो गन्धर्व लोग विमानपर बैठकर आकाशमें घूम-फिर रहे हैं । ४३ ॥ कोई कहने लगा कि नागकन्याएं गान कर रही हैं। इस प्रकारके अनेक तर्क-वितर्क करते हुए वे लोग पुष्पकको देखने लगे ॥ ४४ ॥ बादम जब रामचन्द्रजाको आते देखा तो सब लोग बड़े ही प्रसन्न हुए । रामको देखकर सब लोग हाथमें अनेक तरहकी भेंट ले-लेकर प्रेमपूर्वक उनके सामने गये । श्रीरामको प्रणाम करके उन्होंने अपना जन्म सफल माना श्रीरामने भी उन सबका सत्कार किया ॥ ४५ ॥ ४६ ॥ पश्चात् श्रीरामने विमानसे नीचे उतरकर द्विज लोगोंमें श्रेष्ठ ब्राह्मणोंका नमस्कारपूर्वक पूजन किया ओर बादमें उन तीर्थवासियोंके साथ विस्तारसे वार्तालाप करते हुए उत्तम पुष्कर नगरमें प्रवेश किया । वहाँ सचस्त्र स्नान करके विधिवत् तीर्थश्राद्ध किया ॥ ४७ ॥ ४८ ॥ वहाँपर रामने काशीसे कोटिगुणा अधिक दान-पुण्य किया द्रव्य अलंकार, वस्त्र तथा अन्नादिसे ब्राह्मणोंको संतुष्ट किया बादमें उनसे आज्ञा लेकर वे विमान द्वारा आगे बढ़े। इस प्रकार हे पार्वती ! मैंने रामकी पश्चिम भारतकी तीर्थयात्रा कह सुनायी ॥ ४९ ॥ ५० ॥ इति श्रीमदानन्दरामायणे यात्राकाण्डे 'ज्योत्स्ना' भाषाटीकायां पश्चिमयात्रावर्णनं नामाष्टमः सर्गः ॥ ८ ॥

श्रीरामदासने कहा—बादमे श्रीराम अनेक स्थलों एवं उत्तरके पर्वतों तथा तीर्थोंको देखते हुए वहाँसे

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