भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 218

२०२ आनन्दरामायणे [ सर्गः ८

पूजिता मानिता आसन् सादरं ते यथासुखम् । न कश्चिद्भिन्नपाकं हि चकार पुष्पके नरः ॥२४॥ चिन्ता काष्ठतृणादीनां जलस्यापि न कस्यचित् । एका चिन्ता तु तत्रास्ति क्षुद्बोधो मे कथं भवेत् ॥२५॥ वांञ्छन्ति सर्वे तत्रैके भिषक् चूर्णं प्रदास्यति । निद्रायास्तत्र शङ्केयं वाद्यघोषैर्निरन्तरम् ॥२६॥ श्राम्यन्नत्र महान्त्वादिमान वास्यापिताशु । गीतेर्नैत्रकटाक्षैश्च क्रीडाभिश्चैवनादिभिः ॥२७॥ मणिदीपैर्दिनं रात्रिं न जानाति स्म तत्र वै । गच्छद्दिने कदा यानं याति रात्रावपि क्वचित् ॥२८॥ एतस्मिन्नन्तरे शिष्य पुष्करस्थैर्जनैस्तदा । महानादः श्रुतो रम्यो मंजुलः श्रुतितोषकृत् ॥२९॥ वारांगनापुराङ्गनः क्वणत्कंकणजीरवै च । कराताडनगीतादिसुदंगगणतोद्भवः ॥३०॥ नववाद्यसमुद्भूतो घंटीयंत्रसमुद्भवः । यानघंटाकिंकिणीनां पताकारवसम्भवः ॥३१॥ वारांगनाकटितटीकिंकिणीसंभवोऽपि च , वारणाश्वायुधोत्प्रादिसमुत्कपिसम्भवः ॥३२॥ वीरभ्यो वेदघोषभ्यः शिष्येभ्यश्च समुत्थितः । नटनाट्यवंदिभ्यो मागधेभ्यः समुत्थितः ॥३३॥ गोदोहमभवश्चापि बजासहिपिदोहन । दधिमंथनमद्भूतः शिशूनां रोदनोद्भवः ॥३४॥ निक्षुमत्रकमञ्जुमृखलास्थः समुत्थितः नानात्तूरोद्भवाश्चापि पिष्टचक्रसमुद्भवः ॥३५॥ घृतपाचितपक्वान्नप्रकारकरणोत्थपः । नारदादिमुनिश्रेष्ठतृतीणादिसंभवः ॥३६॥ पुराणकथनोद्भूतो हरिकीर्तनसंभवः । रामनाममहिमाद्विस्तोत्रपाठसमुद्भवः ॥३७॥ नारीपूरुषपेषणकार्ये कणणभवः । पादप्रक्षालनायादिनानाकार्यसमुद्भवः ॥३८॥

राजा श्रीमन् पुष्पदशक राजा लोग तथा पश्चिम देशके राजालोग थे । इन सबका भी सेनाओं और वाहनों सहित राघव विधिवत् अस्त्र-शस्त्र-आभूषण आदिसे सब सत्कार किया । उन्हें पूर्ण आदर और सुख दिया । पुष्पक विमानपर कोई भी मनुष्य पृथक् भोजन नहीं बनाता था । सब समूहरूप भोजनालयमें भोजन करते थे । इसलिए न तो किसीको काष्ठ तथा तृणकी चिन्ता थी और न जलका । यदि वहां किसीको कोई चिन्ता थी तो केवल यही कि अच्छी भूख कैसे लगे । जिससे कि खूब अच्छा अच्छा भोजन करें ॥ २४-२५ ॥ तहाँ सब लोग वैद्यसे चूर्ण मांगते फिरते रहते थे । यह संदिग्ध था ना केवल निद्राकी । क्योंकि हर समय नाना प्रकारके बाजोंकी ध्वनि हुआ करती थी ॥ २६ ॥ वहां यदि कोई भय था तो केवल वारांगनाओंका विमानस्थ लोगों का बाणोंऔर गीत, नेत्रकटाक्ष, अनेक क्रीड़ाओं, मधुर वचनों तथा मणिमय दीपोंके कारण रात-दिन एक-सा प्रभात होता था । यान कभी दिनमें यात्रा करता था और कभी रातमें ॥ २७ ॥ २८ ॥ इतनेमें हे शिष्य पुष्पकनोदक समय में एक बड़ा कोमल, मनोहर और श्रवणसुखकारी शब्द सुनायी पड़ा ॥ २९ ॥ जिसमें वरवाउक नूपुर बजने से कंकण बजने से तालियां बजती थी गान हो रहा था, मृदङ्ग तथा नगाड़े आदि वाद्यसमूह बज रहे थे, घटिया बज रही थीं, यानके घट बज रहे थे और झंडे फड़फड़ा रहे थे ॥ ३० ॥ ३१ ॥ वारांगनाओंकी कण्ठमें कमनीय बँधी हुई क्षुद्रघंटिकाएं बज रही थी और हाथी चिंघाड़ रहे थे। घोड़े हिनहिना रहे थे, आयुध खनखना रहे थे। ऊंट गलगला रहे थे। भाट केवल वाणी बोल रहे थे ॥ ३२ ॥ योद्धा लोग हुँकार लगा रहे थे। वेदपाठ हो रहा था। छात्रगण अध्ययन कर रहे थे। नटोंका नाटक हो रहा था। चारण तथा भाट विरुदावली बखान रहे थे ॥ ३३ ॥ गौका शङ्खका घघर शब्द हो रहा था। बकरियों तथा भैंस के दोहनका शब्द भी सुनायी दे रहा था। छाछ विलोनेका घरर-घरर निनाद हो रहा था। बालक रो रहे थे। बाल्संग्रह झूलोंकी सिकड़ियों का शब्द हो रहा था। अनेक बाजे बज रहे थे। आटा पीसनेकी चक्कियोंकी घरघरघूहट हो रही थी ॥ ३४ ॥ ३५ ॥ घीमें पक्वये जात तथा तले जात पक्वानोंका छुं छुं शब्द हो रहा था। नारदादि मुनियोंका वीणादिका मधुर शब्द हो रहा था ॥ ३६ ॥ पुराण बांचे जा रहे थे हरिकीर्तनकी ध्वनि हो रही थी । विष्णुसहस्रनाम तथा शिवमहिम्नस्तोत्रादिके पाठका घोष हो रहा था। नारियोंके कोई वस्तु कूटने तथा मेहन्दी आदि पीसनेके समय कङ्कणका शब्द हो रहा था। उनके पाद-प्रक्षालनके समय झांझरका झंकार, कड़ोंकी कणकणाहट, छड़ोंका छनछनाहट, बिछुओंकी छमछमा-