भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 217

सर्गः ८ ] यात्राकाण्डम् २०१


मधिष्ठितं पृथ्व्यं तु यो वेदेत्यभिप्रेरितम् । इदानीं रामचंद्रस्य शृणु तां प्राक्तनीं कथाम् ॥ ७ ॥ त्र्यंबकाद्रामचंद्रस्तु पुरा यत्र तु निद्रितम् । सीतया पर्वते तत्र गत्वा स्थित्वा दिनत्रयम् ॥ ८ ॥ सप्तशृंगगिरिं गत्वा गत्वाऽगस्त्येस्तु चाश्रमम् । सुतीक्ष्णस्याश्रमं गत्वा ययौ चैलपुरं ततः ॥ ९ ॥ धुण्डेश्वरं नमस्कृत्य शिवतीर्थे विगाह्य च । दृष्ट्वा रम्यं देवगिरिं विरजाक्षेत्रमाययौ ॥१०॥ मत्तापुरस्थां देवीं तां नत्वा पश्यन्स्थलानि सः । देवघाटं नारसिंहं नत्वा रामश्च सीतया ॥११॥ चकार विधिवत्स्नानं पयोष्ण्यां बन्धुभिर्जनैः । स्नात्वा ताप्त्युदके रामः स्नात्वाऽन्तःपर्वतोजलम् ॥१२॥ गत्वा स्नात्वाऽथ रेवायांमोंकारं परिपूज्य च । पश्चिमाभिमुखः पश्यन्स्थानान्पुण्यस्थलानि हि ॥१३॥ ताप्याश्च संगमे स्नात्वा नर्मदायाश्च संगमे । महानदीजले स्नात्वा प्रभासं च ततो ययौ ॥१४॥ पद्मसरस्वतीनां च संगमेषु विगाह्य च । सौराष्ट्रञ्च सोमनाथं दृष्ट्वाऽथ भवतीं नदीम् ॥१५॥ पश्यन्स्थानान्यनल्पानि द्वारावत्यां ययौ ततः । गोमत्यां विधिवत्स्नात्वा द्वारावत्यां विवेश सः ॥१६॥ अनादिसिद्धां समतुं पुरीषु प्रसिद्धां शुभाम् । दृष्ट्वा कृत्वा तीर्थविधिं दत्त्वा दानान्यनेकशः ॥१७॥ पश्यंस्तीर्थानि सर्वाणि पुण्यानि रघुनंदनः । पश्चिमात्यैर्नृपैश्चापि मानितः पूजितोऽपि च ॥१८॥ गृहीत्वाऽऽज्ञां स्व तेभ्यस्तैः सहितो ययौ । सरस्वत्यास्तटेनैव पश्यन्पुण्यस्थलानि सः ॥१९॥ पुष्करस्थः शनैः सीतां दर्शयन् कौतुकानि च । ययौ पुष्करतीर्थं वै नृपैः सर्वैश्च संवृतः ॥२०॥ विमाने प्रत्यहं रामः कोटिशो ब्राह्मनान् सदा । भोजयामास दिव्यान्नैः पायसैः शर्करादिभिः ॥२१॥ विमाने ये स्थिताः पूर्वमयोध्यापुरवासिनः । तथा ये पूर्वदेशीया दाक्षिणात्या नृपाश्च ये ॥२२॥ पश्चिमात्या नृपा एवं ते सर्वैर्वाहनैः सह । रामेणातिथिसत्कार्यं वसन्त्याख्यानादिभिः ॥२३॥


करना चाहिए। उन्हीं रामचन्द्रके आज्ञाके अनुसार और लोग भी विश्वेश्वर सवार हुए ॥ ६ ॥ ईश्वरकी चेष्टा को कौन समझ सकता है? अब तुम श्रीरामकी प्राचीन कथा सुनो ॥ ७॥ त्र्यम्बक धामसे चलकर श्रीराम उस पर्वतपर गये, जहाँ सीताके साथ उन्होंने प्रथम निद्रा ली थी। वहाँपर उन्होंने तीन रात्रि निवास किया ॥ ८ ॥ सप्तशृङ्ग पर्वतपर जाकर अनेक मनोहर स्थानोंमें भ्रमण किया। वहाँसे अगस्त्य मुनिके आश्रमको गये बादमें सुतीक्ष्ण मुनिके आश्रममें पधारे। पश्चात् चैलपूर गये ॥ ९ ॥ वहाँ धुण्डेश्वरका नमस्कार किया, शिवतीर्थमें स्नान किया, रमणीक देवगिरि देखा और वहाँसे विरजाक्षेत्रम गये । १०॥ वहाँ मत्तापुरनिवासिनी देवीको नमस्कारकर अनेक स्थानोंको देखते हुए देवताराव आकर नरसिंहको प्रणाम किया। सीता सहित रामने आकर पयोष्णी नदीमें विधिवत् स्नान करके बन्धुसहित तापीके उदकप्रवाहमें स्नान किया। पश्चात् अन्तःपर्वतपर आकर रेवामें स्नान करके ओंकारेश्वरकी पूजा की और पश्चिमकी ओरके अनेक स्थान देखे, जो कि बड़े पवित्र थे ॥ १३-१४ ॥ तदनन्तर तापी तथा नर्मदाके संगममें स्नान करके महानदके जलमें स्नान किया और वहाँसे प्रभासक्षेत्र गये ॥ १४ ॥ वहाँ पद्मसरस्वतीके संगममें स्नान करके सौराष्ट्र (गुजरात) में सोमनाथजीका दर्शन किया। बहुसि भवती नदी गये। रास्तेमें अनेक स्थानोंको देखते हुए द्वारकादार द्वीप गये। वहाँ गोमतीमें विधिपूर्वक स्नान करके द्वारावती (द्वारिका) में प्रवेश किया ॥ १५ ॥ १६ ॥ जो कि सब पुरियोंमें अनादिसिद्ध, प्रसिद्ध और बड़ी ही सुन्दर पुरी है। वहाँ तीर्थविधि सम्पन्न करके अनेक दान दिये ॥ १७ ॥ इस प्रकार अनेक तीर्थोंको देखते तथा पश्चिमके राजा-महाराजाओंसे सम्मानित और पूजित होकर तथा उनसे आज्ञा कर लेते और उनके साथ पुण्य स्थानोंको देखते हुए राम सरस्वतीके किनारे-किनारे चले गये। पुष्करपर स्थित राम महारानी सीताको रास्तेमें अनेक कौतुक दिखाते तथा राजाओंके साथ वे पुष्करराज जा पहुँचे । १८-२० ॥ रामचन्द्रजी विमानपर भी प्रतिदिन करोड़ों ब्राह्मणोंको सुन्दर दिव्य अन्न मालपूआ आदि तथा विधिपूर्वक खीर भोजन कराते थे ॥ २१ ॥ इतना ही नहीं, बल्कि जो भी अयोध्यापुरवासी लोग विमानपर पहलेसे ही गये हुए थे तथा अन्य भी जो दक्षिण देशके