भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 216

२०७ आनन्दरामायणे [ सर्गः ८


आत्मतीर्थे ततः स्नात्वा नत्वा विज्ञानमीश्वरम् । महालक्ष्मीं विलोक्याथ वडवासंगमं ययौ ॥८०॥ प्रतिष्ठानं विलोक्याथ स्नात्वा वृद्धैल्मसंगमे । शिवनंदासंगमेऽथ नृसिंहं परिपूज्य सः ॥८१॥ स्वकीयनाम्ना ख्याततीर्थे प्रवरासंगमं ययौ । सिद्धेश्वरं नमस्कृत्य निवासाख्यं पुरं ययौ ॥८२॥ नृसिंहाख्यं पुरं गत्वा दृश्यस्थानान्यमलानि सः । ययौ गोदातटेनैव पुण्यस्तंभं रघूद्वहः ॥८३॥ गत्वा कङ्कसंगमे तु विनतासंगमं ययौ । जनस्थानं ततो गत्वा ययौ त्र्यंबकमीश्वरम् ॥८४॥ दाक्षिणात्यैर्नृपैर्मित्रैर्मानितः पूजितोऽपि च । गृहीत्वा करभारं स्वं तैस्सैन्यैः सहितो ययौ ॥८५॥ इयं दक्षिणयात्रेयं या कृता राघवेण वै । सा मया विस्तरेणैव कथिता त्र्यम्बकऋषे ॥८६॥ इति श्रीमदानन्दरामायणे यात्राकाण्डे दक्षिणतीर्थयात्रावर्णनं नाम सप्तमः सर्गः ॥ ७ ॥


अष्टमः सर्गः

( राम द्वारा भारतवर्षके पश्चिमी प्रदेशकी तीर्थयात्रा )

विष्णुदास उवाच

गुरो जातोऽस्ति संदेहो मम चित्ते वदाम्यहम् । स त्वया छिद्यतां स्वामिन् साधवो हि कृपालवः॥ १ ॥ यानारूढा न कर्तव्या यात्रा चेति श्रुतं मया । कथं यानेन रामेण कृता यात्रा स्वप्रेरिता ॥ २ ॥ इति जातोऽस्ति संदेहो मम तं त्वं निवारय । इति शिष्यवचः श्रुत्वा गुरुः प्राहार्थ तं पुनः ॥ ३ ॥

श्रीरामदास उवाच

पदा यात्रा न कर्तव्या छत्रचामरधारिभिः । गता द्वीपाधिपत्येन कार्या मांडलिकेन तु ॥ ४ ॥ पृथिवीशस्य देवस्य लग्नोद्वाहकवरस्य च । तथा मठाधिपस्यापि गमनं न पदा स्मृतम् ॥ ५ ॥ तस्मान्नात्र त्वया कार्यः संदेहो राघवं प्रति । आतृषा रामचंद्रस्य कृपयाऽपि च तैर्जनैः ॥ ६ ॥


अपने नामकी पुरी बसायी । फिर मन्त्रिका तथा चण्डिकाकी पूजा की ॥ ७९ ॥ पश्चात् आत्मतीर्थमें जाकर स्नान किया । बादमें विज्ञानेश्वरका दर्शन करके वडवासंगमपर स्नान किया ॥ ८० ॥ फिर प्रतिष्ठानपुरको देखकर वृद्धैसङ्गममें स्नान किया । शिवनन्दाके संगमर्म स्नान करके उन्होंने नृसिंहकी पूजा की ॥ ८१ ॥ तदनन्तर अपने नामके रामतीर्थको देखकर प्रवराके संगमपर गये । वहाँ सिद्धेश्वरको नमस्कार करके निवाससंज्ञकपुर गये । ८२ ॥ वहाँसे नूपुरनगर गये तथा और भी बहुतस स्थान देखे । गोदावरीके तटपर होते हुए रघूद्वह राम पुण्यस्तम्भ गये । ८३ । वहाँसे कङ्कके संगमपर गये । वहाँसे आगे विनताके संगमपर गये । वहाँसे जनस्थान और वहाँसे त्र्यंबकेश्वर गये ॥ ८४ ॥ रास्तेमे दाक्षिणात्य राजाओके द्वारा सम्मानित और पूजित होते हुए राम उनसे अपना कर उगाहल और उनका साथ संत हुए आग बड़े ॥ ८५ ॥ इस प्रकार त्र्यम्बकऋषि को हुई रामकी दक्षिण भारतकी तीर्थयात्रा मैने तुमको कह सुनायी ॥ ८६ ॥ इति श्रीमदानन्दरामायणे यात्राकाण्डे 'गोदा'मम्घाटीशार्या दक्षिणतीर्थयात्रावर्णनं नाम सप्तमः सर्ग ॥ ७ ।

विष्णुदासने कहा--हे गुरो मेरे हृदयमे एक संशय है । वह मैं आपके सम्मुख कहता हूँ। आप उसको दूर करें । क्योंकि साधु-महात्मा स्वभावसे कृपालु होते हैं ॥ १ ॥ मैंने सुना है कि सवारोपर बैठकर यात्रा नहीं करनी चाहिये । फिर आपने जो कहा कि श्रीरामने विमानपर सवार होकर यात्रा की सो क्यों ? ॥ २॥ यही मुझे संदेह है, इसे आप निवृत्त करे । शिष्यके वचनको सुनकर गुरुने कहा । ३ ॥ श्रीरामदास बोले-शास्त्रम यह भी लिखा है कि ऐसे छत्रचमरधारी पुरुषको पैदल यात्रा नहीं करनी चाहिए, जो किसी द्वीपका अधिपति राजा हो। हाँ, मांडलिक अर्थात् किसी एक मंडलके राजाको तो पैदल ही यात्रा करना उचित है ॥ ४ ॥ बड़े पृथ्वीपतिको, देवताको, जिसका विवाह होना हो ऐसे वरको तथा मठाधीशको पैदल चलकर यात्रा नहीं करनी चाहिए ॥ ५ ॥ अतः तुमको श्रीरामकी विमान द्वारा यात्रामें किसी प्रकारका संदेह नहीं