श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 221, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्ग ९] यात्राकाण्डम् २०५
ददौ जनकनन्दिन्यै पार्वती तोषपूरिता। ततः शम्भुस्तदा प्राह राघव पूज्य वैभवैः ॥१८॥ राम त्वन्नाभिकमले ब्रह्माऽभूच्चतुराननः। ततो जातो विषंश्चाहं रुदनाद्रुद्रसंज्ञकः ॥१९॥ पौत्रस्तव रघूश्रेष्ठ तवाज्ञापरिपालकः। संहारः क्रियते राम आज्ञया तव चादरात् ॥२०॥ यदा मया तु प्रलये तदा शापं क्व ते मनम्। यत्प्रशस्यवधाच्चापि स्तीर्णश्चाश्वारथां करोषि हि। २१। क्रीडेयं तव राजेन्द्र सुखं कांडस्व सीतया। क्रियत लोकाङ्गुष्ठार्थे जानामि तव चेष्टितम् ॥२२॥ एवं नानाविधैस्तस्य चारित्रैर्गह्वरस्य राघवम्। ददौ सिंहासनं छत्रं चामरे चंपकप्रभम् ॥२३॥ पानपात्रं भोजनस्य पात्रं ह्येवं मनोरमम्। कण्ठे कुण्डले बाहुभूषणे मुकुटोत्तमम् ॥२४॥ राम प्रस्थापयामास बद्धात्वा चिन्तामणिं हृदि। हृदि चिन्तामणिं दृष्ट्वा राघवस्य विदेहजा ॥२५॥ प्राहातिलज्जिता रामं गौर्ये चिन्तामणिस्तव। तथेति राघवोऽप्युक्त्वा विमानेन जनैः सह ।२६। ययौ नत्वा शङ्करं हि कृत्वा यज्ञाधेश्चचनात्। आकाशे विम्वारुह्य विधिं मार्गेकेनाभवत् हि ।२७। भागीरथ्यास्तटेनैव हरिद्वारं ययौ जवात्। कुरुक्षेत्रं विगाद्याथ इन्द्रप्रस्थं ततो ययौ ॥२८॥ दृष्ट्वा मधुवनं रम्यं ययौ वृन्दावनं ततः। गोकुलं वीक्ष्य रामस्तु गोवर्धनमगाच्छनैः ॥२९॥ गत्वाऽथावन्तिकां पुण्यां क्षिप्रातीरेविराजिताम्। महाकाल पुरस्कृत्य पश्यंस्तीर्थान्यनेकशः ॥३०॥ दृष्ट्वा गजद्वयं क्षेत्रं सागरं कूपमेव च। ययौ स नैमिषारण्ये गोमत्यां स विगाह्य च ॥३१॥ सूतं पौराणिकं दृष्ट्वा शौनकादीन् प्रपूज्य च। स्नात्वा तद्रत्नतीर्थेऽसौ रघूत्तमः ॥३२॥ तमसां तां विगाद्याथ ददर्श नगरीं निजाम्। रम्यामागतमाज्ञाय सुमंत्रो वेगवत्तरः ॥३३॥
दो कर्णफूल, दो सुन्दर चूड़िएं, छाट-छाट घुंघरुवाले शब्दसे युक्त करधनी, चन्द्रमाके समान कान्ति- मान दो सीमन्तभूषण और मणि तथा मोतियोंके हार भी दिये । पश्चात् शिवजीने भी अनेक विधियोंसे रामका पूजन करके उनसे प्रश्न किया ॥ १८-१९॥ हे राम ! आपके नाभिकमलसे चतुरानन ब्रह्मा हुए। उन ब्रह्मासे मैं पैदा हुआ और रोदन करनेके कारण मेरा नाम रुद्र पड़ा ॥ १९ ॥ हे रघुनाथ ! इस प्रकार मैं आप- का पौत्र हुआ। हे राम ! आपकी आज्ञाका पालन करते हुए आपके सांकेतिक अनुमार मैं प्रलयकालमें तीनों लोकोंका संहार करता हूँ । तब क्या यह पाप आपका नहीं लगता, जो आज आप साक्षात्परब्रह्म होकर भी रावणवधरूप ब्रह्महत्यारूपी लोकापवादके भयसे प्रायश्चित्तरूपी अश्वमेध यज्ञ करते हैं ? ॥ २० । २१ ॥ अथवा ठीक ही है, मैं समझ गया। हे प्रभो ! आप यह सब लोकशिक्षाके लिये क्रीड़ा मात्र कर रहे हैं। यदि ऐसा है तो आप धन्य हैं! सीताके सहित क्रीड़ा करें। लोकमर्यादाको स्थापित करनेके अतिरिक्त और कुछ भी आपकी क्रीड़ाका प्रयो- जन नहीं है ॥ २२ ॥ इस प्रकार अनेक रामचरित्रोंका थोराभका स्तुति करनेके बाद शिवजीने उन्हें सिंहासन, एक छत्र, दो चमर, एक उत्तम शय्या, पानका डिब्बा, भोजन करनेके लिये सुन्दर सोनेका थाल, कंकण, कुण्डल, बाहे और मुकुट दिये ॥ २३।२४ ॥ तदनन्तर रामने गलय चिन्तामणि बाँधकर उन्हें विदा किया। सीताने रामके हृदयपर चिन्तामणि देखकर उनसे कुछ लज्जापूर्वक कहा- अच्य, यह चिन्तामणि आपका रही और यह कामधेनु मेरी । श्रीराम भी 'बहुत अच्छा' कहकर वहांसे सब लोगोंके साथ विमानपर सवार हो शंकर भगवान्को नमस्कार करके चल दिये । चलते समय वे शंकर भगवान्को भावी यज्ञकी सूचना देत गये। ब्रह्माका भी एक मासके बाद होनेवाले यज्ञमें अयोध्या आनेके लिए कहा ॥ २४-२७॥ वहाँसे भागीरथीके किनारे- किनारे हरिद्वार गये । वहाँसे शीघ्र ही कुरुक्षेत्रमें स्नान करके इन्द्रप्रस्थ (दिल्ली) गये ॥ २८ ॥ यहाँसे मनोहर मधुपुरीपुरी देखकर वृन्दावन पधारे । गोकुल देखकर वे गोवर्धन पर्वतपर गये ॥ २९ ॥ बादमें क्षिप्रा नदीके परम पवित्र अवन्तिका (उज्जैन) नगरीको गये, जो कि क्षिप्रा नदीके किनारेपर विद्यमान है। वहाँ महा- कालेश्वरका दर्शन-पूजन करके अनेक शुभ तीर्थ देखते हुए गजद्वय (हस्तिनापुर) क्षेत्र तथा सागर कूपको देखे। पश्चात् नैमिषारण्य गये। वहाँ गोमतीमें स्नान किया ॥ ३० ॥ ३१ । फिर पौराणिक सूतका दर्शन करके