भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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२०६ आनन्दरामायणे [ सर्गः ९


अयोध्यां धूपयामास प्रोच्छ्रितानांविधध्वजैः। तोरणैश्च पताकाभिः पुष्पहारैर्मनोरमैः ॥३४॥ शोधयित्वा राजमार्गांन् सेचयित्वा तु चन्दनैः । विकीर्णकुसुमं दैव्यैर्बलिदीपैर्विराजितान् ॥३५॥ वप्रणेंद्रं पुरस्कृत्य सेनया परिवेष्टितः । प्रत्युज्जगाम राजेंद्रं पुष्पकस्थं त्वरान्वितः । ३६ । दण्डवत्प्रणिपत्याथ दत्त्वा चोपायनानि तन् । आलिङ्गितो राघवेण मेने स कृतकृत्यताम् ।३७। ततो वाद्यनिनादैश्च नर्तनैर्वारयोषिताम् । वेदघोषैर्द्विजानां च रामतीर्थं ययौ शनैः ॥३८॥ स्नात्वा तन्मग्ग्नयोये यत्न तीर्थे सुपपुण्यदम् । स्वयमेव कृतं पूर्वं नित्यकर्मार्थमादरात् ॥३९॥ वसिष्ठोक्तविधानेन कृत्वा चैकमुपोषणम् । दधिश्राद्धं विधायाथ दत्त्वा दानान्यनेकशः ॥४० । तृतीये दिवसे रामो विमानेन विहायसा । पुर्यां विलोक्य प्राकारम् हेमरत्नविनिर्मितान् ॥४१ । अयोध्यां शोभितां रम्यां गोपुराट्टालमंडिताम् । वीथीहट्टप्रभायुक्तां चतुष्पथविराजिताम् ॥४२॥ पश्यन् स्वकीयं राजसभाद्वारं प्राप रघूत्तमः । यानं भूमंडल प्राप्य सुखमासीत्स्थिरं तदा ॥४३॥ ततः सुमंत्रपत्नीभिर्दध्योदनविनिर्मिताः । बलयः कांस्यपात्रस्था जलनैर्घटास्तथा ॥४४॥ सीताराघवयोर्देहादुत्तार्य घृतकम्बदा । नीत्वा व्यक्त्वा विदूरे तु स्नात्वा रामगृहं ययुः ॥४५॥ ततो रामो विमानाऽथादवरुह्य स बन्धुभिः । नागरैर्नरभूपैर्नृपतिभिः सभायां सविवेश ह ॥४६॥ तस्थौ सिंहासने रम्येचिन्तामणिविराजितः । तस्यूर्नृपाः सभायां श्रीराघवेणातिमानिताः ॥४७॥ सीताऽपि निजगेह सा विचित्ररत्ननिर्मितम् । कामधेनुं पुरस्कृत्य प्रविष्टज्ञातिहर्षिता ॥४८॥ ततो रामः कामधेनुप्रभूनैस्तपस्तितैः । परमान्नैः षड्रसेश्च भोजयामास भूसुरान् ॥४९॥


शौनकादि ऋषियोंका पूजन और वह्नितीर्थ नामके सरोवरमें स्नान किया ॥ ३२ । तमसा नदीमें अवगाहन करके राम अपनी नगरीको चल पड़े। उधर श्रीरामको आते सुनकर सुमंत्रने झटपट अनेक प्रकारकी बड़ी बड़ी पताकाओं तथा ध्वजाओंसे अयोध्या नगरीको सजवा दिया। अनेक तोरण बँधवा दिये । ३३ ॥ ३४ ॥ राजमार्गोंको साफ कराकर चन्दनके जलसे छिड़काव करा दिया। उनपर दिव्य और नाना रंगके फल बिछवा दिये । जगह-जगह चौराहोंपर दीपक तथा पूजाकी सामग्री रखवा दी । ३५ । पश्चात् सुमन्त्रजी बाणेन्द्र (हाथी) को आगे करके सेनासहित स्वयं पुष्पकस्थित राजा रामकी अगवानी करने गये ॥ ३६ । उन्होंने उन्हें दण्डवत् प्रणाम करके अनेक उपहार दिये। बादमे मंत्री सुमंत्र रामसे आलिङ्गित होकर अपने आपको कृतकृत्य समझने लगे ॥ ३७। तदनन्तर बाजे-गाजे करांगनाओंके नृत्य तथा ब्राह्मणोंके वेदघोषके साथ राम धीरे-धीरे रामतीर्थपर गये ॥३८ वहाँ जाकर उन्होंने सरयूके जलमें स्नान किया। वह बड़ा पवित्र तथा उत्तम तीर्थ स्वयं रामके ही नित्यकर्मके लिये निर्मित हुआ था ॥ ३९ ॥ वहाँ उन्होंने वसिष्ठजीके कथनानुसार विधिवत् एक उपवास किया, दधिश्राद्ध किया तथा अनेक दान दिये ॥ ४० ॥ तीसरे दिन श्रीराम विमानके द्वारा आकाशमार्गसे नगरके सुवर्णनिर्मित प्राकारोंको देखकर पुरद्वार तथा सुन्दर अटारियोंसे सुशोभित मनोहारिणी अयोध्यामें पधारे। जो गलियों, सड़कों, बाजारों तथा चौराहोंसे बढ़ी ही भली लग रही थी ॥ ४१ ॥ ४२ ॥ बहुत दिनों बाद आज उन्हें अपनी राजसभाके द्वारका दर्शन प्राप्त हुआ। वहाँ आकर वे यानपरसे उतर पड़े। विमान भी भूतलपर उतरकर सुखपूर्वक खड़ा हो गया ॥ ४३ ॥ तब सुमंत्रकी स्त्रियें दधि-ओदन-से युक्त काँसेके पात्रमें रक्खी हुई बलिर्ग तथा जल-तेलसे पूर्ण सैकड़ों घट सीता तथा रामके देहपरसे उतार तथा दूर ले जाकर छोड़ आयीं और स्नान करके रामके महलमें गयीं ॥ ४४ ॥ ४५ ॥ श्रीराम भी विमानपरसे उतरनेके बाद नागरिकों तथा अन्य राजाओंके साथ सभाभवनमें पधारे ॥ ४६ ॥ चिन्तामणिसे सुशोभित होनेवाले राम सिंहासनपर जा विराजे तथा उनसे सम्मानित होकर अन्य राजे भी यथास्थान बैठ गये ॥ ४७ ॥ महारानी सीता भी कामधेनुको लेकर प्रसन्नतापूर्वक चित्र-विचित्र रत्नोंसे निर्मित अपने महलमें गयीं ॥ ४८ ॥ पश्चात् श्रीरामने कामधेनुसे प्राप्त घृतसे निर्मित षड्समय उत्तम पक्वानों द्वारा