श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें११२ आनन्दरामायणे [ सर्गः ६
रेखात्रयं तदद्यापि दृश्यते तत्र वै स्फुटम् । आस्तीर्य स कुशांस्तत्र पिण्डान् मक्तुमयाञ्छुभान् ॥८७॥ तिलाज्यमधुसंयुक्तान् दातुं रामः समुद्यतः । सव्येन पाणिना पिण्डं गृहीत्वा रघुनन्दनः ॥८८॥ यावत्पश्यति भूम्यौ तु न ददर्श पितुः करम् । तदाश्चर्येण विप्रास्ते राममूचुस्त्वरान्विताः ॥८९॥ निष्क्रामन्त्यत्र सर्वेषां पितॄणां दक्षिणाः कराः । न दृश्यते तव पितुः कारणं नात्र विद्महे ॥९०॥ रामोऽपि विस्मयाविष्टश्चकितः प्राह लक्ष्मणम् । जानीषे कारणं किंचिदत्र त्वं बुद्धिमानसि ॥९१॥ स प्राह राघवास्माभिर्यदा गोदावरीं गतम् । इङ्गुदीफलपिण्याकपिण्डदाने तदा करः ॥९२॥ अस्माभिः स्वपितुर्दृष्टः सोऽत्र नैव प्रदृश्यते । ममापि ज्ञानमाश्चर्यं सीतां त्वं प्रष्टुमर्हसि ॥९३॥ तच्छ्रुत्वा जानकी शीघ्रं प्राह किंचिद्भयातुरा । मयाऽपराधिकं किंचिन्नखमस्व रघूत्तम ॥९४॥ वत्तस्या वचनं श्रुत्वा राघवः प्राह तां पुनः । वद तथ्यं न भेतव्यं कारणं किं ममातिकम् ॥९५॥ यथा श्रुतं तया सर्वं राघवाय निवेदितम् । तच्छ्रुत्वा राघवः प्राह कः साक्षी तव कर्मणि ॥९६॥ सा प्राह चूतवृक्षोऽस्ति दृष्टः स नेत्युवाच ह । तदा शप्तः सीतया स फलहीनः स कीटतः ॥९७॥ भव मे वचनाज्झट भतो मिथ्या त्वयेरितम् । पुनः सा राघव प्राह फल्गुः साक्ष्यं प्रदास्यति ॥९८॥ साऽपि रामेण पृष्टाऽथ नेत्युवाच भयातुरा । साऽपि शप्ता रामपत्न्याऽधोमुखी भव वाक्यतः ॥९९॥ बह यस्मान्मृषा चोक्तं त्वया मन्येपि कर्मणि । ततः सीता पुनः प्राह साक्ष्यं मेऽत्र निवासिनः ॥१००॥ दास्यंति मे द्विजाः सर्वे तदा मन्निकटस्थिताः । तेऽपि पृष्टा राघवेण नेत्युचुर्भयविह्वलाः ॥१०१॥ दृष्टः साक्ष्यं नहिं रामः शापं नप्तु प्रदास्यति । निवारिता कथमियं तदा सीतेति चिन्त्यते ॥१०२॥ ताँस्तदा जानकी शापं ददौ तीर्थनिवासिनः । युष्माकं नात्र मद्धत्तिः कदा दूर्यर्थमविष्यति ॥१०३॥
दिखायी देती हैं। पश्चात् उन्होंने कुशा बिछाकर उसपर तिल घृत मधुचादिसं युक्त सत्तूका पिंड रखना प्रारम्भ किया। रामने जब दाहिने हाथमें पिण्ड लेकर अथात्रकी ओर देखा तो उन्हें अपने पिताका हाथ नहीं दीखा। महकि ब्राह्मण भी आश्चर्यान्वित होकर रामसे कहने लगे—॥८७-८८॥ यहाँ सब लोगोंके पितरोंके दाहिने हाथ पिंड लेनेके लिये निकलते हैं, पर आपके पिताका हाथ क्यों नहीं निकला। इसका कारण समझमें नहीं आता ॥९०॥ तब रामने विस्मित होकर लक्ष्मणसे पूछा—हे लक्ष्मण! तुम बुद्धिमान् हो, क्या कुछ इसका कारण जानते हो? ॥९१॥ लक्ष्मणने कहा—हाँ भाई ! जब हम लोग गोदावरा गय थे, तब तो इङ्गुदीफलके पिसानका पिण्डदान देते समय अपने पिताका हाथ दिखाई दिया था, वह यहाँ नहीं दिखाई देता। इस बातका हमको भी आश्चर्य है, आप इसका कारण जानकीसे तो पूछें॥९२। ६३॥ यह सुनकर जानकानी घबड़ा उठीं और बोलीं-हे रघुराज! आप क्षमा करें। मुझसे कुछ अपराध हो गया है। ९४॥ यह सुनकर रामने कहा कि घबराने तथा डरनेकी कोई बात नहीं है जो हो, सो साफ-साफ कहो ॥९५॥ तब जानकीने जो घटना घटी थी, सो स्पष्ट कह सुनायी । यह सुनकर रामने पूछा--इस बातका साक्षी कौन है कि हमारे पिताने तुम्हारे हाथसे पिण्डदान ग्रहण किया है ? ॥९६॥ सीताने अपना गवाह पासके आम्रवृक्षको बताया, परन्तु उससे पूछनेपर वह इन्कार कर गया। तब सीताने उसका शाप दिया कि अरे दुष्ट! तू झूठ बोला है इसलिए मध्यदेशम तू फलशून्य होकर रहेगा। तब सीताने फल्गुनदीको अपना साक्षी बताया ॥९७॥९८॥ परन्तु रामके पूछनेपर वह भी भयसे इंकार कर गयी। इसपर सीताने उसको भी शाप दिया कि तू सत्य बातमें भी झूठ बोली है, इसलिए तू मधापुखी (अन्तःमुखी) होकर बहेगी। तब सीताने कहा कि मेरी साक्षी यहाँके रहनेवाले उस समय मेरे पास खड़े ब्राह्मण देंगे। उन्होंने भी विह्वल होकर रामके पूछनेपर ना कर दिया ॥९९ १०१॥ वे लोग विचारने लगे कि "यदि ऐसा था तो तुम लोगोने सीताकी उस समय पिण्ड देनेसे रोका क्यों नहीं। ऐसा कहकर कही हरय कहनेपर राम हमको शाप न दे दें" सोताने उनको भी शाप दिया कि आओ, तुमलोग द्रव्यसे कभी तृप्त न होकर मारे-मारे फिरोगे। इस बातकीने