श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 207, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः ६] यात्राकाण्डम् १९१
सप्तरात्रं क्वचिच्चापि पक्षमेकमथ क्वचित्। अष्टादशैकविंशद्वा त्रिमासं च क्वचित्प्रभुः ॥७०॥
चकार वासं तीर्थेषु धर्मान् कुर्वन् यथामखम्। गंडकीसंगमे स्नात्वा नेपाले जगदीश्वरम् ॥७१॥
दृष्ट्वा हरिहरक्षेत्रं ययौ रघुकुलोद्वहः। एवं कुर्वन् स तीर्थानि सर्वाणि रघुनन्दनः ॥७२॥
पुनः पुनः सगाम च ययौ जाह्नविदक्षिणे। वैकुण्ठनगरं गत्वा जरासन्धपुरं ययौ ॥७३॥
वैकुण्ठाख्ये जले स्नात्वा ततो रामो ययौ गयाम्। फल्गुनद्यास्तटे पूर्व मुक्त्वा तद्यानमुत्तमम् ॥७४॥
नत्वा विष्णुपदं दिव्यं पुनर्यानान्तिकं ययौ। तां निशां गमयित्वाथ प्रभाते रघुनन्दनः ॥७५॥
स्नातुं फल्गुनदीतीर्थे ययौ तीर्थं द्विजैः सह। एतस्मिन्नन्तरे सीता सखीभिः परिवेष्टिता ॥७६॥
ययौ स्नातुं फल्गुन्यां स्नात्वा पूज्य सुवामिनीः। सैकते सा क्षणं तस्थौ पूजनार्थं महेश्वरीम् ॥७७॥
वालुकापञ्चपिंडैश्च दुर्गां कर्तुं समुद्यता। गृहीत्वा वामहस्तेन माद्रीं सा सिकतां तदा ॥७८॥
सव्येन कृत्वा पिंडं तु यावत्सा पाणिना भुवि। स्थापयामास तावत्तु ददर्श अगतीतलात् ॥७९॥
विनिर्गतं हस्तमथ श्वशुरस्य करं शुभम्। दक्षिणं निजहस्तात्तु गृहीत्वा विष्णुरूपधृक् ॥८०॥
गच्छन्तं भूतलं रम्यं तद्दृष्ट्वा कौतुकं पुनः। द्वितीयं स्थापयामास भुवि पिंडं तु सैकतम् ॥८१॥
सोऽपि नीतः पूर्ववच्च ह्यवमष्टात्तरं शतम्। ददौ पिडान कौतुकेन ततः श्रान्ता विदेहजा ॥८२॥
मनसा पूज्य दुर्गां सा ययौ यानं स्वरान्विता। तद्वृत्तं न सखीभिस्तु ज्ञातं रामेण वाऽपि न ॥८३॥
तथापि कथितं नैव किं रामो मां वदिष्यति। इति भीत्या ततो रामः पञ्चतीर्थं विगाह्य च ॥८४॥
प्रेतपर्वतमासाद्य पिंडदानमथाऽकरोत्। कनिष्ठिकाया निष्कास्य निजनामांकितां शुभाम् ॥८५॥
कांचनीं मुद्रिकां गव्यां दक्षिणाभिमुखस्तदा अपहतेति मंत्रेण चकार भुवि राघवः ॥८६॥
गंडकीके सङ्गमकी ओर सिधारे। श्रीराम प्रथम जिस स्थानपर तीन रात, कहीं पाँच रात कहीं सात रात, कहीं एक पक्ष, कहीं अठारह दिन, कहीं इक्कीस दिन और कहीं तीन मास पर्यन्त सुखसे निवास किया। गंडकीके सङ्गममें स्नान करके श्रीहरि नेपालम पशुपतिनाथका दर्शन के गये। ६७-७०॥ बादन रघुकुलभूषण राम हरिहरक्षेत्र गये। इस प्रकार रघुनन्दन राम तं र्थाटन समय बीच बीचम बार-बार गङ्गाके दक्षिण सङ्गमपद पधारत थे। बाइस वैकुण्ठ नगर होते हुए जरासन्धक राजगृह नगर गये ॥ ७१ ७३ ॥ पश्चात् वैकुण्ठके जलमे स्नान करके गयाजी गये, फल्गुनदीक पूर्वतटपर विमानको छोड़कर दिव्य विष्णुपदके दर्शनार्थ गये। दर्शन करनक बाद पुनः यानके पास लौट आय और रात्रिको वही व्यतीत करके सवेरे ब्राह्मणोके साथ फल्गुनदीके पवित्र तीर्थमे स्नान करन गये। इसाम सखियोंग घिरा हुई साताजी फल्गुतीरपर स्नानार्थं पधारौं। वहाँ उन्होने स्नान करके सोहागिन स्त्रियोंकी पूजा की। पश्चात् देवी महेश्वरीकी पूजा करनेके लिए सैकत-प्रदेशमें जाकर बालूके पाँच पिण्डोंमें दुर्गाजीकी प्रतिमा बनानेको उद्यत हुई। बायें हाथमें गीली बालुका लेकर उन्होंने दाहिने हाथसे पिण्ड बनाकर ज्यों ही पृथ्वीपर रखना चाह, त्या ही उन्हें पृथ्वीतलसे निकलता हुआ अपने श्वशुर महाराज दशरथका सुन्दर हाथ दिखायी दिया। उनका दाहिना हाथ सीताके हाथसे उस उत्तम पिण्डको लेकर पुनः धरतीमे प्रविष्ट हो गया। यह देखकर सीताके मनमें बड़ा कौतूहल हुआ। बादमें फिर सीताने पिण्ड बनाकर जमीनपर रक्खा, उसको भी पूर्ववत् वह हाथ ले गया। इस प्रकार सीताने एक-एक करके एक सौ आठ पिण्ड दुर्गाकी पूजाके लिये रक्खे और उन सबको श्वशुरका हाथ ले गया। यह देखकर सीता हार गयीं ॥ ७४-८२ ॥ अन्तमें उन्होंने दुर्गाका मन ही मन पूजा की और विमानके पास लौट आयीं। उस वृत्तान्तको न तो सखियें जान सकीं और न राम ही जान पाये ॥ ८३ ॥ सीतानें भा राम हमको क्या कहेंगे, इस डरके मारे उस वृत्तान्तको छिपा रखा बादमे रामने जब पञ्चतीर्थ करके बाद प्रेतशिलापर जाकर पिण्डदान दिया और उन्होंने अपने हाथकी अनामिका अँगुलसि रामनाम खुदी हुई सुन्दर सुवर्णकी अँगूढी निकालकर दक्षिण-की ओर मुख करके 'अपहता' इत्यादि मंत्रसे जमीनपर खींच रेखाएं खींची, जो कि यहाँ अभी भी स्पष्ट