श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 209, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें| [सर्गः ६ ] | यात्राकाण्डम् | १९३ |
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द्रव्यार्थं सकलान् देवान् भ्रमध्वं दीनरूपिणः। ततः सा जानकी प्राह ओतुःसाक्ष्यं प्रदास्यति ॥१०४॥ सोऽपि पृष्टो नेत्युवाच रामं सीता शशाप तम्। पुच्छाद्य स्वपुरः कृत्वा परा मन्मर्कटोऽपि सन् ॥१०५॥ भूयोऽति यत्तत्त्वन्मात्पुच्छे सम्पूर्य्यतां भव। ततः सा जानकी प्राह गौर्मे साक्ष्यं प्रदास्यति ॥१०६॥ साऽपि पृष्टा नेत्युवाच रामं सीता शशाप ताम्। अपवित्रा भवाऽद्ये त्वं मम वाक्येन धेनुके ॥१०७॥ ततः सीताऽश्वत्थवृक्षं साक्ष्यार्थं प्राह राघवम्। स पृष्टो नेत्युवाचाथ तं सीताऽशापक्रुधा ॥१०८॥ भवाचलदलस्त्वं हि मदिराऽभ्यन्यपादप। पुनः सीता पतिं प्राह मम साक्षी प्रभाकरः ॥१०९॥ स पृष्टः प्राह तथ्यं हि सुप्तिर्जाता पितुस्तव । एतस्मिन्नन्तरे तत्र विमानेनार्कवर्चसा ॥११०॥ राजा दशरथो राममागम्यालिङ्ग्य वै दृढम् ॥
प्राह त्वया तारितोऽहं नरकादतिदुस्तरात् । मैथिल्याः पिण्डदानेन जाता मे तृप्तिरुत्तमा ॥१११॥ तथापि लोकशिक्षार्थं गयाश्राद्धं त्वमाचर । पितरं प्राह रामोऽपि किमर्थं हि त्वयाऽत्र वै । ११२॥ त्वरया सिक्तापिण्ड संगृहीतो वदस्व माम्। स प्राहारत्र गयायां तु बहुविघ्नानि राघव ॥११३॥ मर्त्तवि श्राद्धसमये कृता तस्मात्त्वरा मया । इति रामं समाभाष्य गृहीत्वा राघवादपि ॥११४॥ किञ्चित्कव्यं विमानेन ययौ दशरथस्तदा । ततो रामः प्रेतगिरौ पिण्डदानं विधाय च ॥११५॥ गत्वा प्रेतशिलायां च दत्त्वा काकबलिं ततः धर्मारण्यं ततो गत्वा कुर्व्वकोनपदेषु हि ॥११६॥ सक्तूना च तिलानाञ्च पायसैश्च सशर्करैः । पृथग्वे पिण्डदानानि वटश्राद्धं विधाय च ॥११७॥ अष्टतीर्थी ततः कृत्वा ततः संध्यां स्थलत्रये कृत्वा यथाविधानेन दत्त्वा दानान्यनेकशः ॥११८॥ गदाधरं ततः पूज्य महाविभवपूर्वकम् । सेचनायाम तोयैश्च नृत्त्येभं सर्कर्कटम् ॥११९॥ एको मुनिः कुमकुशाम्रदलश्रुतस्य मूले मलिन्नं दधार। आश्रम भिक्तः पितरश्च तृप्ता एका क्रिया द्वयर्थकरे प्रसिद्धा ॥१२०॥
बिलावको साक्षी देनेके लिए कहा । उसने भी पूछनेपर ना कह दिया। सीताने उसे भी शाप देते हुए कहा कि उस समय मेरे समक्ष पूंछ किये खड़े रहनपर भी आ मून ना कर दिया है। इसलिए आज तेरी पूंछ भञ्जन हो जायगी। तब जानकीजीने गौका साक्षी देनेके लिए कहा । १०२-१०६ ॥ रामके पूछनेपर उसने भी ना कह दिया । सीताने कहा हे धेनु ! मर शापसे तेरा मुख अपवित्र हो जायगा । १०७ ॥ पश्चात् सीताने पीपलके वृक्षको साक्षी देनेके लिए रामके सम्मुख उपस्थित किया । जिसका नाम अश्वत्थ था, परन्तु जब वह भी इन्कार कर गया तो सीताने श्राप करके शाप दिया कि तू आजसे चञ्चलदल हो जायगा । तब अन्तमें सीताने कहा कि सूर्य मेरी साक्षी देंगे । रामके पूछनेपर सूर्यने कहा कि यह बात सत्य है । इस कार्यसे आपके पिता अवश्य सन्तुष्ट हुए हैं। इतनेमें सूर्यके समान कान्तिमान् विमानपर सवार होकर स्वयं महाराज दशरथ वहीं आ पहुंचे। रामका दृढ़ आलिङ्गन करके वे बोले हे राम ! तुमने यथार्थमें हमको तार दिया है। मैथिलीके पिण्डदानसे हमें बड़ी ही तृप्ति मिली है ॥ १०८-१११ । तो भी लोकशिक्षाके लिए तुम गयाश्राद्ध अवश्य करो । रामने पितासे पूछा कि आपने यहाँ इतनी जल्दी बालूकापिंड क्यों ग्रहण किया ? इसका क्या कारण है ? दशरथने कहा हे राम ! गयामें पिंडदानके समय बड़े बड़े विघ्न उपस्थित होते हैं । इसीलिए मैंने त्वरा की थी । इतना कहकर राजा दशरथ रामके हाथसे भी कुछ कव्य (पितृ-अन्न ग्रहण करके विमान द्वारा वहाँसे चले गये । पश्चात् रामने प्रेतपर्वतपर पिण्डदान दिया ॥ ११२-११५ ॥ वहाँसे वे प्रेतशिला गये। वहाँ काकबलि देनेके बाद धर्मवन गये । वहाँ एकोनपद् स्थानोंमें तिल-पायस तथा शर्करासे युक्त सत्तूके पृथक्-पृथक् करके अनेक पिंड दिये और वटश्राद्धाव भी सम्पादन किया ॥ ११६ ॥ ११७ ॥ तदनन्तर अष्टतीर्थी की । तीनों नियतस्थानोंमें सन्ध्यावन्दन करनेके बाद विधिवत् बहुतसे दान दिये ॥ ११८ ॥ अनेक विभवोंसे गदाधरकी पूजा की और मतंगेश्वरस्य आम्रवृक्षका जलसे सेचन किया ॥ ११९ ॥ कहा भी है किसी