श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 210, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें| १९५ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः ६ |
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कृत्वा विष्णुपदे पूजां विमानारोहणादिभिः । मासत्रयमतिक्रम्य गयायां रघुनन्दनः ॥१२१॥ विमानेन ययौ प्राचीं दिवि सन्तोषयन् जनान् । फल्गुतीरात्तटे पूर्वं विमानं यत्र संस्थितम् ॥१२२॥ तत्र रामगयानाम्नी भूमिविप्रेरुदाहृता । रामेश्वरो रामतीर्थं वर्तते तत्र पावनम् ॥१२३॥ रामोऽपि फल्गुनाद्याश्च गङ्गायाः संगमं ययौ । गयाबहिः फल्गुरेव ज्ञेया सा तु महानदी ॥१२४॥ ततो ययौ मुद्गलस्य नूतनाश्रममुत्तमम् । यस्मिन्नुदग्वहा गङ्गा जाह्नवी पापनाशिनी ॥१२५॥ ततोऽग्रे जानकीं ज्ञात्वा भूमौ दिव्यं प्रदास्यति । तस्या दिव्यस्थले रामस्तीर्थपादौ चकार सः ॥१२६॥ भ्रातॄणां च पृथक् तत्र मत्रि तीर्थानि सर्वतः । सीतया च कृतं तत्र स्वनाम्ना तीर्थमुत्तमम् ॥१२७॥ ज्ञात्वा भविष्यदग्रे मत्तीर्थं चेति सविस्तरम् । यदा भूमौ प्रहास्यामि दिव्यं तीर्थं तदाऽस्तु मे ॥१२८॥ रामस्ततो विमानेन गतश्चोत्तरवाहिनीम् । नाम्ना पुरीं तथा गङ्गां यत्रास्ति परमांगदा ॥१२९॥ पर्वतो यत्र गङ्गायामस्ति विन्ध्येश्वरोऽपि च । ततः श्रीवैद्यनाथेशं नत्वा रावणनिर्मितम् ॥१३०॥ ततः पुनर्विमानेन पश्यन्नानास्थलानि सः । ययौ भागीरथीमप्यात्र भिन्ना भिन्ना पुनः ॥१३१॥ प्रयागाद्योजनशतान् देशे रघूद्वहः । ततो गङ्गाब्धिसमीपं संगमञ्च पुष्षकेन सः ॥१३२॥ गत्वा स्नात्वा ततो यत्र कालिंदी संगताऽर्णवे । तत्र गत्वा रघुश्रेष्ठस्ततः पश्यन् स्थलानि सः ॥१३३॥ नानापुण्यानि तीर्थानि दृष्ट्वा श्रीपुरुषोत्तमम् । पूर्वसागरतीरस्थं दत्त्वा दानान्यनेकशः ॥१३४॥ ततः शनैः पुष्षकेण दृष्ट्वा नानाविधान् सुरान् । दृष्ट्वा नाना नदीः सर्वा नानादेशान्विलङ्घ्य च ॥१३५॥ गोदातीरे स्वनाम्ना तु कृत्वा गिरिममुत्तमम् । सप्तगोदावरीभेदसंगमेषु महोदधौ ॥१३६॥
एक मुनिने कुशयुक्त हाथमें जलका घड़ा लेकर आम्रवृक्षके मूलमें जल दिया। उसमे आम्रवृक्ष सिंच गया और पितर भी तृप्त हो गये। इसीके आधारपर 'एक क्रिया द्वयर्थकरी' यह कहावत प्रचलित हुई ॥ १२० ॥ इसी प्रकार प्रतिदिन विष्णुपदकी पूजा करते और विमानपर चढ़कर घूमत फिरत हुए रामने गयामे एक वर्ष व्यतीत किया ॥ १२१ ॥ पश्चात् सब लोगोको आश्वासन दे तथा विमानपर सवार होकर रघुनन्दन पूर्वकी ओर चल दिये। फल्गुनदीके किनार जहाँ रामका विमान खड़ा हुआ था ॥ १२२ ॥ उस जगहको वहाँके विप्र रामगया कहन लगे। पवित्र रामेश्वर नामका रामतीर्थ अभी भी वहाँ विद्यमान है ॥ १२३ ॥ राम वहाँसे चल-कर फल्गु तथा गंगाके सङ्गमपर आये। गयाके बाह्री भागमे फल्गुनदी है उसका विस्तार बहुत बड़ा है ॥ १२४ ॥ बादमे मुद्गल ऋषिके नवीन आश्रमकी ओर गये। जहाँपर पाप हरण करनेवाली गंगा उत्तरवाहिनी होकर बहती है ॥ १२५ ॥ आगे चलकर एक जगह जहाँ कि उन्हें विश्वास था कि यहाँ जानकी भूमिमे प्रवेश करके दिव्य रूप धारण करेगी, अपने नामका एक उत्तम तीर्थ स्थापित किया ॥ १२६ ॥ उसके बाद लक्ष्मण आदि भाइयोके नामसे भी उनके तीर्थ स्थापित किये। सीताने भी वहीं, यह विचारकर कि भविष्यमे मेरे नामका यहाँ बड़ा भारी तीर्थ होगा एक अपने नामका तीर्थ स्थापित किया। उन्होने यह विचार कि जब मै दिव्य रूप धारण करूंगी, तब यहाँ दिव्य तीर्थ होगा ॥ १२७ ॥ १२८ ॥ पश्चात् राम विमानमे बैठकर उस जगह गये, जहाँ कि कल्याणकारिणी उत्तरवाहिनी नामकी गंगा तथा एक नगरी विद्यमान थी ॥ १२९ ॥ और जहाँपर बीच गंगामे विन्ध्येश्वर नामका पर्वत खड़ा है। वहाँसे आगे चलकर श्रीरामने रावण द्वारा स्थापित वैद्यनाथजीका दर्शन किया ॥ १३० ॥ तदनन्तर विमानमें बैठकर अनेक वनोंकी शोभा देखत हुए वहाँ गये, जहाँपे कि श्वेतजल युक्त गंगा बीचोबीचसे दो भागोमे बँट गयी है ॥ १३१ ॥ वह स्थान प्रयागसे सौ योजनकी दूरीपर था। पश्चात् राम विमानके द्वारा वहाँ जा पहुँचे, जहाँ कि गंगा सहस्रमुखी हो-कर समुद्रमे मिली है ॥ १३२ ॥ उस जगह गंगा-समुद्रसङ्गममें स्नान करनेके बाद कालिन्दी-समुद्रके सङ्गममे स्नान किया। वहींपर रामने अनेक मनोहर पुष्पित वनोपवन देखे, अनेक तीर्थोके दर्शन किये और साथ ही पूर्वी सागरके तटपर स्थित भगवान् परम पुरुषोत्तमके भी दर्शन किये तथा अनेक दान दिये ॥ १३३ ॥ १३४ ॥ बहुरि चलकर अनेक देवताओके दर्शन करते हुए अनेक नदियोको लाँघकर गोदावरीके