भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

पृष्ठ 214, कुल 811 में से

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पृष्ठ 214

१९८ आनन्दरामायणे [ सर्गः ७

४५.प इत्यन्ते पश्य तरङ्गान्निर्गतं बहिः। अद्य त्वया तारिताऽहं मां दासीं कर्तुमर्हसि ॥४६। ज्ञात्वा मत्या ह्यभिप्रायं तामाह रघुनन्दनः । एकपत्नीव्रतं मेऽस्मिञ्जन्मन्वस्ति कुमारिके । ४७। मम कृष्णावतारे त्वं भज मां नात्र संशयः । तद्रामवचनादेव यमैश्च नियमैरपि ।४८।। यावद्रामः स्थितो भूम्यां तावद्बन्धा कलेवरम् । ततोऽनेन देहान्ते जाम्बवती भविष्यसि ॥४९। जांबवतीति नाम्ना सा कृष्णपत्नी भविष्यति । रामो ययौ सुरेंद्र च पयोष्णीं सरितं ह्य सः ॥५०। आद्यन्तं ततो गत्वा ताम्रपर्णीतटे स्थितम् । विनिद्रितं शेषपृष्ठे लक्ष्मीरूढसेवितम् ॥५१। ज्ञानदद्या ताम्रपर्णी मा त्यक्त्या पश्चिमवाहिनी । अनन्तशयनं गत्वा पयोष्णीं विगाह्य च ॥५२। पयोष्णीं मत्स्यनद्यां विगाह्य मीनया प्रभुः । ततो गत्वा विमानेन धर्माधर्मसरोवरे ॥५३॥ स्नात्वा जनार्दनं गत्वा पश्चिमे सन्धिगोपधि। दर्शोश्च पौर्णिमायां च गंगासागरसङ्गमम । ५४॥ स्नात्वा जनार्दनं पूज्य नारीराज्यं विलोक्य च । अद्य श्रीरामचन्द्रः स न ययौ लोकशिक्षया ।५५॥ निवृत्य ततो रामो घृतमालां विगाह्य च। कृतमालां ततः स्नात्वा सिन्धुन्दां विगाह्य च ॥५६॥ गत्वा गजेन्द्रमोक्षं च ताम्रपर्णीतटस्थितम् । ताम्रपर्ण्युद्गमे स्नात्वा गत्वा शैवालतीर्थकम् ॥५७। गत्वा चन्द्रकुमाराख्यं गिरि श्रीरघुनन्दनः । ततो ययौ विमानेन दृष्ट्वा दक्षिणकाशिकाम् ॥५८॥ नत्वा काश्याविश्वनाथं चंपकारण्यमाययौ । चित्रगंगाजले स्नात्वा नत्वा हरिहरं शुभम् ॥५९॥ ततो रामो विमानेन मधुपूरीं विवेश सः । वेगवन्त्या जले स्नात्वा नत्वा तं सौन्दरेश्वरम् ॥६०॥ मीनाक्षीमंबिकां नत्वा व्यंकटं द्राविडे गिरौ । कावेरीमध्यनिलयं श्रीरङ्गशयनं ययौ ॥६१॥ मातृभूतेश्वरं नत्वा नत्वा तं जंबुकेश्वरम् । रङ्गनाथं नमस्कृत्य दक्षिणाशां ततो ययौ । ६२॥

चित्तार्न कह शंकर मधुपद्म करूणा री ४५ । वह साप आजाभी तरंगोंके द्वारा उछल-उछल कर बाहर आ रहा है। हे प्रभो ! आज यहां आकर आपने मुझको तार दिया है। अब कृपा कृपा करके मुझे अपनी दासी बनाओ ॥ ४६ ॥ उसके अभिप्रायको जानकर रघुनन्दन कहने लगे - हे कुमारिके ! इस जन्ममें तो मैंने अविरुद्ध एकपत्नी-व्रत धारण कर रक्खा है ॥ ४७ । मम युष्माक कृष्णावतारामें में तुम अवश्य प्राप्त होऊँगा। इसमें संदेह नहीं है। रामचन्द्र के कथनानुसार जबतक राम पृथ्वीपर रहे, तबतक वह यम-नियमपालनपूर्वक जीती रही। तदनन्तर आगे तपोबल से शरीर छूट जानेपर उस देहसे उत्पन्न होकर जाम्बवती नामकी कृष्ण-पत्नी बनी । वहांसे राम सुरेन्द्र गये तथा पयोष्णीमें स्नानकर ताम्रपर्णीके तटपर स्थित अनाद्यन्त ध्येय पधारे, जहाँ भगवान् विनिद्रावस्था तथा सहित होकर शेषनागपर शयन कर रहे थे ॥ ४८-५१ ॥ उनके दर्शन करके पश्चिमावाहिनी ताम्रपर्णीतटपर गये। वहाँ स्नान करके पयोष्णी-तटपर अनन्तशयनके दर्शनार्थ गये ॥ ५२ ॥ मत्स्य सहित भगवान्ने प्रफुल्ल होकर मत्स्यनदी में स्नान किया और बाद में वहीं से विमान-पर सवार होकर धर्माधर्मनामक सरोवरपर गये। वहाँ स्नान करके पश्चिम समुद्रतटपर विराजमान जनार्दन-के दर्शन किये। अमावश्या तथा पूर्णिमाको गंगा तथा समुद्रके सङ्गमपर स्नान करके उन्होंने जनार्दन भगवान्-की पूजा की। उसके आगे स्त्री राज्य देखकर श्रीराम लोकको शिक्षा देनक निमित्त आगे नहीं बढ़े । ५३-५५ ॥ वहाँ से लौटकर रामने घृतमाला, कृतमाला तथा सिन्धुनदमें स्नान किया ॥ ५६ ॥ तत्पश्चात् ताम्रपर्णीके तटपर स्थित गजेन्द्रमोक्ष गये । जहाँ से ताम्रपर्णी निकली है, उस जगह स्नान किया। वहाँ से शैवाल तीर्थ गये ॥ ५७॥ वहाँ से चन्द्रकुमार पर्वतपर गये । पश्चात् विमानके द्वारा दक्षिणकाशी गये ॥ ५८ । वहाँ विश्वनाथका वन्दन करके चम्पकारण्य पधारे । वहाँ चित्रगङ्गा में स्नान करके दर्शनमात्रसे कल्याण करनेवाले हरिहरका दर्शन किया ॥ ५९ ॥ बाद में रामने विमानपर बैठकर मधुपूरीमें प्रवेश किया । तदनन्तर वेगवतीके पवित्र जल में सर्वगाहन करके जगद्विख्यात सौन्दरेश्वरके दर्शन किये ॥ ६० ॥ तदनन्तर मीनाक्षी देवीके दर्शन किये। द्रविड़गिरिपर वेंकटेश्वरके दर्शन किये और कावेरीके मध्यमें निवास करनेवाले श्रीरंगशयनका दर्शन किया ॥ ६१ ॥ पश्चात् मातृभूतेश्वरका दर्शन करके जंबुकेश्वरके दर्शनार्थ पधारे। वहाँ से रङ्गनाथ जाकर

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