श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 213, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः ७ ] यात्राकाण्डम् १९७
स स्नात्वा भैरवे तीर्थे प्रार्थेकांश्च स्थितो निजम् । अवरुह्य विमानाञ्च पदाभ्यां सर्वजनैः सह ॥ ३० ॥
गत्वा लक्ष्मणकुण्डेऽथ स्वकुण्डेऽपि विगाह्य च । अग्नितीर्थे ततः स्नात्वा धनुष्कोट्यां विगाह्य च ॥ ३१ ॥
स्नात्वा जटापुनीर्थे हि गत्वा तं गन्धमादनम् । आदौ नत्वा विश्वनाथं पुङ्गानीतं हनूमता ॥ ३२ ॥
रामेश्वरं ततो नत्वा कृत्वा गंगाभिषेचनम् । काश्यादिकं त्यक्त्वा धनुष्कोट्यां रघूत्तमः ॥ ३३ ॥
कोटितीर्थं धनुष्कोट्यां चकार कूपमुत्तमम् । क्षेत्रपापप्रशांत्यर्थं दृष्ट्वा श्रीसेतुमाधवम् ॥ ३४ ॥
नानादानादिकं कृत्वा स ममेकं विलंघ्य च । बह्वाह्लाददेवानां महोत्साहान्विधाय च ॥ ३५ ॥
क्षेत्रपापप्रशांत्यर्थं कोटितीर्थं विगाह्य च । नत्वा द्वाग्गन्धमगम तीर्त्वाऽथ जलधेः पुनः ॥ ३६ ॥
विहारस्य विमानेन स दर्भशयनं ययौ । स्नात्वा निक्षेपिकायां च ताम्रपर्णीब्धिसंगमे ॥ ३७ ॥
गत्वा स्नात्वा रामचन्द्रो ददौ दानान्यनेकशः । ततोऽब्धितटमभ्येत्य तं स्कन्द मपूजय राघवः ॥ ३८ ॥
ताम्रपर्णीतटेनैव पश्यन्पुण्यस्थलानि सः । नववेंकटनाथांश्चाभ्यर्च्य तोताद्रिमपयौ ॥ ३९ ॥
कन्याकुमारिकां दृष्ट्वा सिन्धुतीरनिवासिनीम् । प्रतीक्षतीं स्वीयमार्गं बिभ्रतीं मालिकां करे ॥ ४० ॥
तामाह रघुपतिश्च वरं वरय सुव्रते । सा प्राह राघवं नत्वा चिरमस्मि प्रनस्थिता ॥ ४१ ॥
अहं मुनिसुता पित्रा सुरेन्द्राय विनिर्मिता । विवाहार्थं समानातः सुरेन्द्रो योजन स्थितः ॥ ४२ ॥
तव श्रोत्रोपमं श्रुत्वा मया चित्ते विनिश्चितम् । आगमिष्यति रामोऽत्र वरयिष्याम्यहं तदा ॥ ४३ ॥
पित्रा मन्निश्चयं ज्ञात्वा सुरेन्द्रो विनिवर्तितः । सोऽपि मन्त्खेदित्स्वास्तु योजनेऽद्यापि वर्तते । ४४ ॥
विवाहोपकरणादि मन्मात्रा यत्कृतं पुरा । पित्रा तन्सागरे क्षिप्तं क्रोधाविष्टेन राघव ॥ ४५ ॥
अग्रयतेश्वरका दर्शन किया । पश्चात् रामचन्द्रने पूर्वसमयमे अपने द्वारा स्थापित विश्वेश्वरका दर्शन किया ॥ २८ ॥ वहाँके नवपाषाणसरमे स्नान करके टंक नगर गये । फिर वैतान्तीर्थमें स्नान करके सागरके अगाध जल-प्रवाहको पार करके । २६ ॥ एकान्तमें स्थित भैरवतीर्थ गये । वहाँसे पैदल चलते हुए सबके साथ आगे बढ़े । आगे जाकर लक्ष्मणकुंद, रामकुड, अग्नितीर्थ, धनुष्कोटितीर्थ और जटापुनीर्थमे स्नान किया । वहाँसे गन्धमादन पर्वतपर गये । वहाँ पूर्वसमयम हनुमान्के द्वारा लाये हुए विश्वनाथका दर्शन किया ॥ ३०-३२ ॥ पश्चात् रामेश्वरको नमस्कार करके उन्ह गंगा जलसे स्नान कराया । बादम राजन् काशो काँवरके घड़ेको धनुष्कोटि तीर्थमे फेंक दिया ॥ ३३ ॥ उस धनुष्कोटि तीर्थमे रामने कोटितीर्थ नामका एक कूप खुदवाया । बादमें क्षेत्रपापकी शान्तिके लिए श्रीसेतुबंध माधवका दर्शन किया ॥ ३४ ॥ वहींपर अनेक दानपुण्य करते हुए रामने एक मास निवास किया । अनेक बह्वाह्लाद देवताओका महोत्सव भी वही कराया ॥ ३५ ॥ पश्चात् पुनः क्षेत्रपापकी शान्तिके लिए कोटितीर्थमे स्नान किया । द्वारपाल वगन्धामको नमस्कार कर तथा विमानके द्वारा समुद्र पार करके दर्भशयन नामके तीर्थको गये वहीं निक्षेपिकाके जलमे और ताम्रपर्णी तथा सागरके संगममे स्नान किया ॥ ३६ ॥ ३७ ॥ वहीं भी अनेक दान दिये । पश्चात् रामने समुद्रके तटपर विराजमान कार्तिकेय स्वामीकी पूजा की ॥ ३८ । बादमे ताम्रपर्णीके किनारे किनारे राम अनेक पवित्र स्थानोको देखते तथा नववेंकटेशोंकी पूजा करते हुए तोताद्रि गये ॥ ३९ ॥ पश्चात् सिन्धुतीर-निवासिनी कन्याकुमारीके दर्शन किये, जो कि हाथम माला लिये उन्हीं (राम) की राह देख रही थीं ॥ ४० ॥ रामजीने उससे कहा हे सुव्रते ! वर माँगो तब उसने रामको नमस्कार करके कहा हे राघव ! मै बहुत दिनांसे व्रत धारण करके आपकी प्रतीक्षा मे यहीं खड़ी हूँ । ४१ ॥ मैं एक मुनिकन्या हूँ । मेरे पिताने मुझे सुरेन्द्रको देना निश्चित किया ओर उनको विवाहके लिए बुलाया भी था । जो कि अब भी यहाँसे एक योजनकी दूरीपर विद्यमान है ॥ ४२ । परन्तु मैने जब आपकी तीर्थयात्राका समाचार सुना तो मनमें यह निश्चय कर लिया कि राम जब यहाँ यात्राके निमित्त आयेंगे, तब मै उन्हीसे विवाह करूँगी ॥ ४३ ॥ पिताने जब मेरा यह दृढ़ निश्चय देखा तो सुरेन्द्रको लोटा दिया । वह मेरे लिए दुखित होकर एक योजनपर अब भी खड़ा है ॥ ४४ ॥ हे राघव ! मेरी माताने विवाहके लिए जो सामग्री एकत्रित की थी, वह सब मेरे