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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

२१० आनन्दरामायणे [ सर्गः १

जम्बाम्रादिद्रुमाणां च शाखाभिः कुसुमैरपि । पल्लवैश्च विचित्रैश्च कदलीस्तम्भमण्डितः ॥१०॥ समन्तस्तोरणानि बन्धनीयानि यत्नतः । पुष्पहाराः फलादीनां मालाश्च विविधाः शुभाः ॥११॥ वेद्यः सहस्रशः कार्याः सुधया चेटकादिभिः । करणीयं महत्कुण्डं सप्ताब्धिध्येन मृन्मयम् ॥१२॥ इंटोपरि महत् कार्यं गोमुखं च मनोरमम् । खदिरस्य विचित्रं हि वसोर्धारार्थमुत्तमम् ॥१३॥ सितरक्तासिनेश्चैत्र नीलपीतादिभिः शुभैः । नानावर्षदचूर्णैश्च रूपधातुविनिर्मितैः ॥१४। नानावर्णैर्विलेख्यानि स्वस्तिकानि समन्ततः । कमलानि विचित्राणि तथा चाष्टदलानि च ।१५। शङ्खचक्रगदापद्मवल्ल्यश्च सहस्रशः । कुसुमानि विचित्राणि यज्ञभूम्यां समन्ततः ॥१६॥ चतुर्विंशत्युच्छ्राः कार्या यत्नस्तम्भा महोच्छ्रिताः । विनिर्मिताः सुवर्णेन मुक्ताहारविगुम्फिताः ॥१७॥ त्रितयं सर्वतोभद्रं कुण्डमध्येऽष्टदैवतम् । लेखनीयं तथा कुडं नानावर्णैर्विचित्रितम् ॥१८। दूत कार्याणि पात्राणि यज्ञार्थं मम पश्यतः । हैमाः किलोपकरणा वरुणस्य यथाऽध्वरे ॥१९। आसनानि शूर्याणां च निद्रार्थं च सहस्रशः । वासोगेहानि कार्याणि तृणैः पर्णैश्च खर्परैः ॥२०॥ पाकशाला विधातव्या कार्या शालाऽन्ननस्य च । ऋषिशाला विधातव्याः स्त्रीशालाश्च शुभावहाः ॥२१। यज्ञोपकरणानां च शाला परमसुन्दरी । सभाः कार्या नृपाणां च वस्त्ररत्नैर्विचित्रिताः ॥२२। आसनार्थं महार्हाणि वस्त्राणि च समन्ततः । आस्तीर्याणि तथा राज्ञामुपशाखाश्रयाणि च ॥२३॥ पक्षिपिछैः सुकार्पासभेदैः सम्पूरितानि हि । कश्चिदुपबर्हणानि विचित्राणि महान्ति च ॥२४। स्थापनीयानि सदसि महार्हाणि तु लक्ष्मण । स्थापनीयानि पानार्थं पात्राणि विविधानि च ॥२५। नानारसैः पूरितानि तथा पक्वफलादिभिः । नानासुगन्धद्रव्यैश्च रागैर्नानाविधैरपि ।२६।

पायें । फिर केशर-चन्दन से लीपकर वह भूमि पवित्र करनी होगी । उस भूमिपर ऐसे मण्डप बनाये जायें, जो सुन्दर हों और कहींसे कटे-फटे न हों ॥ ७-९ ॥ जामुन-आम आदि वृक्षोंकी शाखाओं तथा फूलों-पत्तोंसे खूब अच्छी तरह सजाकर केलके खम्भोंके फाटक बनाये जायें और मण्डपके चारों ओर फूलों और फलोंकी मालाएं लटकाई जायें ॥ १० ॥ ११ ॥ मण्डपके भीतर ईंट और चूनेकी पक्की जोड़ाई करके एक हजार वेदियां बनवायी जायें । वहीं ही मिट्टीका एक बड़ा भारी कुण्ड बनाया जाय । लेकिन वह मे अपने सामने बनवाऊंगा । कुण्डके ऊपर खैरकी लकड़ीका एक सुन्दर गोमुख बनाया जाय, जो वसोर्धाराके कामम आयेगा । सफेद लाल, काले, नीले और पीले पत्थरोंका चूर्ण तथा उपधातु (गेरू-मंचक आदि) के चूर्णसे जगह-जगह रङ्ग-बिरङ्गे स्वस्तिक लिखे जायें और अष्टदल कमल बनाये जायें ॥ १२-१५ ॥ जहां तहां शंख चक्र, गदा पद्म तथा फूल-पत्तियोंकी चित्रकारी की जाय ॥ १६ ॥ सोनेके चौबीस यज्ञस्तम्भ बनाये जायें, जो खूब ऊँचे हों और उनपर मोती-माणिक आदिका काम किया गया हो । कुण्डके पास अष्टदेवताके निर्मित सर्वतोभद्र बनाया जाय और वेदीके चारों ओर अच्छे-अच्छे चित्र बनाये जायें । यज्ञके लिए जितने पात्रोंकी आवश्यकता होगी, वे सब मेरे सामने बनाये जायेंगे । प्रायः वे सब पात्र सोनेके होंगे, जैसे वरुणदेवके यज्ञम थे ॥ १७-१९ । ब्राह्मणोंको बैठने और सोनेके लिए उनके, कपडोंके अथवा छप्परोंके हजार घर तैयार करने होंगे ॥ २० ॥ मण्डपकी एक ओर पाकशाला ( रसोईघर ) रहेगी, दूसरी ओर अशनशाला ( भोजनभवन ), तीसरी ओर ऋषि-शाला ( मुनियोंके ठहरनेकी जगह ) और एक ओर सुन्दर स्त्रीशाला ( स्त्रियोंके रहनेकी जगह ) बनेगी ॥ २१ । एक बड़ा सा और सुन्दर मकान यज्ञकी सब सामग्रियें रखनेके लिए बनेगा । अच्छे-अच्छे कपड़ोंसे सजाकर राजाओंके लिए कई महफ़िलें बनायी जायेंगी । बैठनेके लिए बढ़िया बढ़िया कालीन-गलीचे आदि मँगाकर बिछाये जायेंगे । पक्षियोंके पखों या रूईसे भरी कितनी ही सुन्दर तकियें राजाओंको लगानेके लिए रक्खी जायेंगी । सबको जल पीनेके लिए विविध प्रकारके पात्र रक्खे जायेंगे ॥ २२-२४ ॥ सभामवनमें जल पीनेके लिए सुन्दर तथा बहुमूल्य बर्तन रक्खे जायेंगे । कितने ही पके हुए फलोंके शरबतसे भरे

सर्गः १ ] उत्तरकाण्डम् २११


मदैर्विचित्रैर्मधुरैस्तथा मादकवस्तुभिः । नानासुगंधतैलेश्च काचकुम्भाः सहस्रशः ॥२७॥
स्थापनीयाश्चन्दनैश्च सुगंधैर्गन्धवादिभिः नानोपकरणैर्युक्तानां ताम्बूलानां सहस्रशः ॥२८॥
स्थापनीयानि पात्राणि चामराणि सहस्रशः । व्यंजनानि विचित्राणि तथाऽऽदर्शा विचित्रिताः ॥२९॥
स्थापनीयाश्च क्रीडार्थं क्रीडोपकल्पणानि च । स्थापनीयानि महत्सु नृपाणां चित्राणि च ॥३०॥
मृत्पात्रसम्भराः कार्याः शतशः पुष्पवाटिकाः । जलप्रणालि कार्याणि सर्वत्र विविधानि च ॥३१॥
नानाविवित्रवर्णानां वयसां पंजराः शुभाः । हेमचूर्णमणिक्लैश्च प्रवालैर्नामरत्नैश्च ॥३२॥
कमनीयाश्च भूषास्तैस्तोषणाद्यैः प्रपूरिताः । वधनीया मंडपेषु नर्तितव्योऽप्सरोगणैः ॥३३॥
धूपयंतु सुधूपैश्च सुगायतु हि गायकाः । वादनीयानि वाद्यानि बहूनि विविधानि च ॥३४॥
पूजोपकरणाद्यैश्च शस्त्राणि संस्थितानि हि । पृथक् पृथक् मञ्चांश्चैव स्थापनीयानि लक्ष्मणः ३५॥
तथा ऋषिसभार्या तु दभांश्च समिधस्तथा । दण्डाः कमण्डलुयुताः स्थापनीयाः सहस्रशः ॥३६॥
परिधायांथ कौपीनान् वल्कलाश्चाजिनानि च । पूजाद्रव्याणि हव्यानि जलकुम्भाः सहस्रशः ॥३७॥
शौचार्थे मृत्तिकाः शुद्धा दंतकाष्ठानि पादुकाः । रोविष्ट मुखशुद्ध्यर्थे नानावस्तूनि कल्पप ॥३८॥
तथा नरासभार्या तु पूजकत्राण्यनेकशः । सौभाग्याद्रव्यरत्नानि सुगंधैः पूजितान्यपि ॥३९॥
वायनान् विचित्राणि स्थापजाय नि लक्ष्मण । कतर्यः कज्जाना च पात्राणि कुंकुमानि च ॥४०॥
करउस्थानि रम्याणि भूषणान्युज्ज्वलानि च । हरिद्रादीनि वस्तूनि कञ्चुक्यो वसनानि च ॥४१॥
धारनीयानि व्यञ्जनचमरादीनि सादयम् । सहृदा लेखनीणानि पत्राणि च सभामतः ॥४२॥


के सह कडाव वहाँ उपस्थित रहें। अनेक प्रकारके इत्र, गुलाबजल, केवड़ाजल, कस्तूरी और केसरका चन्दन सबको लगानेके लिए तैयार रहना चाहिए ॥२५, २६। विविध प्रकारके स्वादिष्ट मद्य तथा अनेक मदकर वस्तुएं जुटाई जायें। बहुत किस्मके सुगन्धित तेलोंसे भरे हुए काँचके हजारों घड़े सदा तैयार रहें। बहुतसे बर्तनोंमें सुगन्धित चन्दन और अत्तर रक्खे रहें। विविध सामग्रियोंके साथ हजारों ताम्बूलोंके थालके बीड़े लगा-लगाकर रक्खे जायें ॥२७॥२८॥ हजारों चँवर हाँकनेके लिए मँगा लेने चाहिये। स्नानके लिए तरह तरहके पक्वान्न सर्वथा तैयार रहें। मुँह देखनेके लिए अच्छे अच्छे दर्पण मँगवा लिये जायें खेलनेके लिए जितनी भी सामग्रियां हो सकें मँगवाकर रख ली जावें। देश विदेशके राजाओंके चित्र मँगवाकर सभाभवनमें आगे और टाँग दिये जावें ॥२९॥३०॥ बहुतसे फूलोंके गमले मँगवाकर वहाँ-पर रक्खे जावें। छोटी-छोटी दूरपर हजारों फौहारे बनाये जायें, जिनसे सदा जलकी धारा बहता रहे तोता, पोले, हरे तथा मैनादि आदि सुहावने पक्षियोंके पिंजड़े लाकर मण्डपमें चारों ओर लटका दिये जावें और हीरा, मोती पन्ना और मूंगा आदिके जड़ाऊ वस्त्रों द्वारा वे सजाये जावें। ३१॥३२॥ जिससव इन पक्षियोंक भोजन करनकी सब सामग्री भरी रहे। वहाँपर नाचनेके लिए सुन्दर सुन्दर वेश्याव बुलायी जायें। धूप देनेवाले लोग सुगन्धित धूप देनके लिए नियुक्त किये जावें। गानवाले लोग गाय और बजानेवाले विविध प्रकारके बाज बजावें ॥३३॥३४। सब राजमण्डलाने अलग-अलग पूजन करनकी सामग्रियोंसे पूर्ण बर्तन रक्खे रहें। ऋषिसभाओंके लिए कुशा, दण्ड, कमण्डलु तथा समिधाका विशेष प्रबन्ध रहे। ऊपर पहननेके लिये वस्त्र और नीचे पहननेके लिये कौपीन, वल्कल वस्त्र, मृगचर्म, पूजनकी सब सामग्रियां, हवन करनकी सब वस्तुएं, जलसे भरे हुए हजारो घड़े बादि वहाँपर ला-लाकर रक्खे जायें। हाथ पवित्र करनेके लिए शुद्ध मृत्तिका, दातौन, खड़ाऊं तथा मुखशुद्धिके लिये बहुतसे मंजन आदि वहींपर रक्खे रहें ॥३५-३८॥ इसी तरह नारीसभाके या पूजाके बहुतसे पात्र रहने चाहिये। सोहागके लिये शुभसूचक रोली-सेंदुर आदि सुगन्धित वस्तुयें भी रक्खी रहें। सुन्दर दर्पण लाकर रख्य जायें। काजलके कुमकुमभरे बर्तन आदि भी वहाँ उपस्थित रहें ॥३९॥४०॥ बहुत-सी बाँसकी बनी हुई सन्दूकोंमें सुन्दर और चमकवाते हुए आभूषण रक्खे रहें। हल्दी-रोली आदि चीजें और कंचुकी आदि वस्त्र लाकर रक्खे जायें। पंखे और चमरादिक

७१२आनन्दरामायणे[ सर्गः १

...समुद्रान्तानथ तथा दूता महाजवाः। जनकाय प्रेषणीयाः केकटाद्यनृपेष्वथौ ॥४३॥
...सख्यायाः सुमंत्राद्याः प्रिनंगं प्रति लक्ष्मण। श्यामांध्रिः श्यामकर्णश्च श्यामपुच्छः सितः शुभः ॥४४॥
महादामार्घ्यवस्त्रैर्दव्यैरागमनेन च शोभनीयाचापवर्गमुक्तादार्ममनागमः । ॥४५॥
हर्म्यभिः शुक्लवस्त्रैश्च वर्णगन्धविभूषणैः । तस्य भाले हेमपत्रे लेखनाय स्फुटाक्षरैः ॥४६॥
कोमलेन्द्रस्य रामस्य यज्ञांगतुरंगमो ह्ययम् । ज्ञेयः सर्वैर्नृपैर्मुक्तः कृतै भुम्पाः प्रदक्षिणाम् ॥४७॥
यस्यास्ति बलं तेनासौ बंधनीयोऽद्यसुत्तमः । नोचेत् क्रोधाच्च मित्राप्त पुरस्कृत्य बलैः सह ॥४८॥
स्वकुटुम्बैर्नागरैश्च तथा जानपदैः सह। आगन्तव्यं नृपतिभिर्यज्ञांगाश्वानुवर्तिभिः ॥४९॥
यज्ञभूमिमवोध्यायां युद्धेर्जित्वा महोद्धतान्। एवं पत्रं बंधयित्वा मुक्तामणिर्विचित्रितैः ॥५०॥
अनन्तरंः साभयित्वा सिद्धः कार्यश्च मण्डपे सिद्धः कार्यः स शत्रुघ्नः सैन्येन परिवेष्टितः ॥५१॥
रथाऽश्वोष्ट्रगजाक्षार्थ सुमन्त्रेण समन्वितः नानापुष्पनदीनां च जलकुभान् सहस्त्रशः । ५२॥
नानादृष्टामृत्तश्चापि शत्रुघ्नेनानयस्व हि। शोभनीया पुरी रम्या पताकाध्वजतोरणैः ॥२३॥
दत्त्वा सुधा देया तथा प्रासादमस्तके । देवालयाभ्यन्तरेऽथ चित्रशाला मनोरमाः ॥५४।
लेखनाया विधातव्या रत्नदीपाः सदैव हि। पूजोपकरणादीनि प्रतिदेवालयेष्वपि ॥५५॥
स्यापयस्व समस्तानि वायन्त्याज्ञापयस्व भोः । राजमार्गः शोधनीयाः सेचनीयाश्च चन्दनैः ॥५६॥
वीथीगोषु मयंत्र चित्राणि विविधानि च। लेखनीयानि रम्याणि मुक्ताहाराः समन्ततः ॥५७॥
प्रवालमणिवैदूर्यकाश्मीरस्फटिकादिभिः नानाविधाश्च कुसुमंहाराः पक्वफलादिभिः ॥५८॥
बधनीयाश्च सर्वत्र जालश्चैविंशेषतः। एवं यच्चन्मया प्रोक्तं तत्कुरुष्वाधिघावरतः ॥५९॥


जाकर रख आयें और अपने मित्रोंके आगे हुई विटिंवां अपना यहाँ खर्चा रह ॥ ४१ ॥ ४२ ॥ आज ही रामचन्द्रजीका मुहर लगा हुआ पत्र लेकर दूत मिथिलेश जनक, काश्मौर तथा केकय आदि राजाओंके पास जायें । तदनन्तर श्याम पुच्छ तथा श्याम रेंगवाला घोडेका । ४३ । ४४ ॥ बहुमूल्य वस्त्रों और आभूषणोंसे सजाये जाय, उसे म नवां अङ्गार और वस्त्राभूषण आदि पहन पहने जाय । एक सुवर्णपत्रपर ये व से साफ़ अक्षरामे लिखकर उसके माथेपर बाँध दिया जाय-॥ ४५ । ४६ । "कौसल्यादे पह राज गगारन्दन। यह यज्ञीय घाउ भूमिपे प्रदक्षिणा करनेके लिए छोड़ा गया है। सब देश-देशान्तरके राजाओको ज्ञात हो कि जिसमें बल हो, वह इस सुन्दर घोड़ेको बाँध ले, नहीं तो अपने देशवासियां, अपनी सेना तथा कुटुम्बिदाके साथ इस प्र हक पीछे-पीछे चलता हुआ हमारी यज्ञभूमि अयोध्या अगोध्यम आकर मुझसे मिल" ॥ ४७-४९ ॥ इस आशयका पत्र लटकाया जाय । रास्तेमें जो जो उद्दण्ड राज मिले उनसे युद्ध कर-करके उन्हें परास्त कि । जाय अनेक प्रकारके झाड़-फानूस आदिस सजा करके कि सिद्धमंडप बनाया जाय । इसके अनन्तर अपनी पूरी सेनाके साथ शत्रुघ्नजी सुमन्त्रको साथ लिये हुए घोड़ेपर सवार होकर उस यज्ञीय घोड़ेकी रक्षा करनेके लिए प्रस्थान कर । उसके पश्चात् बहुत-सी पवित्र नदियोंकी मृत्तिका और हजारो घड़ोमे जल भर-भरकर शत्रुघ्नजीके द्वारा मँगाया जाय ॥ ५०-५२ ॥ अयोध्यामें जितने भी देवालय हो, उन सबको चुनेसे पुतवाया जाय । सब मकानोंकी भी सफाई की जाय । देवालयोंके भीतर नाना प्रकारके चित्रकारियों की जायँ । हर एक देवालयम हर रोज पूजन करनेकी सामग्रियाँ भेजी जायँ ॥ ५३-५५ ॥ हे लक्ष्मणजी ! आज ही आप सब प्रकारके बाज मँगाकर रखनेकी आज्ञा दे दीजिए अयोध्याके सब राजमार्ग खूब अच्छी तरह साफ किये जायें और उनपर चन्दनका छिड़काव किया जाय । राजमार्गके सब बड़े-बड़े महलोंकी दीवारोंपर विविध प्रकारके चित्र बनानेकी आज्ञा दे दी जाय । जगह जगहपर मोतियोंका मालायें लटकार्या जायं ॥ ५६ । ५७ ॥ प्रवालमणि, वैदूर्यमणि, काश्मीर और स्फटिकादि मणियांकी मालायें, फूलोंकी मालायें तथा पके फलोंकी मालाय हर एक मकानोपर लटकाई जायें । इस प्रकार मैंने जो कुछ बतलाया है, उसे कर

सर्गः १] | सारकाण्डम् | २१३


तद्गुरोर्वचनं श्रुत्वा मूर्ध्नाऽऽकृत्वा स लक्ष्मणः। काम्यं यस्य तन्मर्त्यं गुरोर्वाक्याच्छताधिकम् ॥ ६०।
इति श्रीमत्काटारामचरितान्तर्गत श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये यागकाण्डे
यागोपकरणनिवेदनं नाम प्रथमः सर्गः ॥ १ ॥


द्वितीयः सर्गः

(यज्ञमें सावधानी रखनेके लिए रामका लक्ष्मणको आदेश)

श्रीरामदास उवाच
अथ रामः समीतस्तु मुहूर्ते सप्तमेऽहनि । मज्जनोद्वर्तनाद्यैः स्नान्त्वा कुर्व्वांजनादिकम् ॥ १ ॥
तूर्यनादैर्द्विजानां च वेदघोषैर्विशेषतः। पौरस्त्रीणां गायनश्च पौराणां च जयस्वनैः ॥ २ ॥
आगत्य मण्डपे रम्ये तस्यां चित्रासनोपरि। ददौ कौशेयवस्त्राणि गुरुं रामस्स्वयम्भवीम् ॥ ३ ॥
पौराँश्च पौरपत्नीश्च मातृश्चाथ स्नुषांस्तथा । शश्रूश्चापि द्विजान् सर्वान् जनकं सुहृदस्तथा ॥ ४ ॥
बंधूंश्च बंधुपत्नीश्च स्वस्थांश्च जनः परम् । मंत्रिणांश्चाथ वीरांश्च दामदास्रींर्जनांस्तथा ॥ ५ ॥
नटनर्तकवद्यादीन् वारस्त्रींश्च ततः परम्। अचंडालादिकान् दत्त्वा ततः सीतां ददौ वरम् ॥ ६ ॥
हेमतन्तुसमुद्धृतं मुक्तामाणिक्यगुंफितम् । रत्नकान्त्याऽऽनीलार्थमध्ये मध्ये विचित्रितम् ॥ ७।
मुक्ताप्रवालपोपार्थमणिभिः सरंतो वृतम्। आदर्शबिम्बसदृशं विद्युत्तेजौपमं महत् ॥ ८ ॥
वतः स्वयं रामचन्द्रः पतकौशेयमुत्तमम्। हेमतत्त्वाऽऽवृतं नानावल्लीपुष्पादिचित्रितम् ॥ ९॥
दधारण्यत्तुत्तरीयं वामोंऽसलकारमंडितः । व्यजिनाक्षेपमात्रार्थमणिङ्कपविराजितः ॥१०॥
केयूरकुण्डलैर्मुक्ताहारैश्च कटकैर्युतः। ततो वसिष्ठर्द्धर्मस्तं मुक्तानां स्वस्तिकोपरि ॥११॥
निवेश्य राघवः सीतामाहूय बटुकैर्निजैः। निवेश्य रामवामांगे मुनिभिः परिवेष्टितः ॥१२।
रमेश कारयामास विघ्नशादिषूजनम् । पुण्याहादित्रयं चापि ददौ दीक्षा ततस्तयोः ॥१३॥


आओ। तुम उनके विषयमे कुछ मत सोचो विचारो। मैंने स्वयं सब सोच लिया है। इस प्रकार गुरुवरकी आज्ञा पाकर लक्ष्मणने सिर झुकाकर स्वीकार किया और सब काम उससे भी सौगुना बढ़-चढ़कर किया, जैसा कि गुरु वसिष्ठजीने कहा था ॥ ५८-६० ॥ इति श्रीमत्काटारामचरितान्तर्गतश्रीमदानन्दरामायणे यागकाण्डे भाषा-टीकायां यागोपकरणनिवेदनं नाम प्रथमः सर्गः ॥ १ ॥

श्रीरामदासने कहा — इसके बाद सातवें दिन सीताजीके साथ-साथ रामचन्द्रने मज्जन आदिका उबटन लगाकर स्नान किया, अंजन लगाया और तुरही आदि बाजो, वेदमंत्रों, नगरकी स्त्रियोंके गीतों और पुरवासियोका जयध्वनिके साथ ॥ १।२॥ आकर उस सुन्दर मंडपमें एक चित्रासनपर बैठे। तब गुरु वसिष्ठतथा अरुन्धतीको उन्होने सुन्दर-सुन्दर रेशमी वस्त्र दिये। इसके अनन्तर पुरवासियोंको, पुरवासिनी नारियोंको, माताओंकोको, बहुओंको, साधुओंको, नगरनिवासी सब विप्रोंको, मित्रोंका, बान्धवोंको, परिवारके लोगोंको, बान्धवोंकी भारियाको, समवयस्क मित्रोंको, मत्रियोंको, सेन पतियोंको, सैनिकोको, दास-दासियाको, ॥ ३-५ ॥ नटो, नतकोंको, बन्दीजनोंको, वेश्याओंको और चाण्डालसे लेकर ऊँच जाति तकके प्रत्येक मनुष्यको अच्छे-अच्छे कपड़े देकर जिसमे सुनहले तारका काम बना हुआ था, मोतियों-माणिक आदिके झुम्बे चारो ओर लटक रहे थे, ऐसे नीलम तथा पुखराज आदि मणियोंसे सुसज्जित एक सुन्दर वस्त्र सीताजीको दिया ॥ ६ ॥ ७ ॥ ८ ॥ तब दर्पणकी तरह चमकती हुई एवं बिजलीकी तरह जिसमें तेज था और सुवर्णके तारका जगह-जगह बेल-बूटा बना हुआ था, ऐसे एक वस्त्रको लेकर रामचन्द्रजीने स्वयं पहिना ॥ ८ ॥ ९॥ ऊपरसे एक उपरना धारण किया। तरह-तरहके आभूषण पहने। जब रामचन्द्रन के कानोंम कुण्डल झूकने लगे, मोतियोंकी मालाएं गलेमें पड़ गयीं और हाथोंके सब गहने हाथोंमें पहन लिये गये। तब वसिष्ठजीने मोतियोंके चौरुके ऊपर रामचन्द्रजी तथा

२१४ आनन्दरामायणे [ सर्गः २

ध्वजारोपणविधानेन स्थापयित्वा ध्वजोत्तमम् । रामेण कारयामास गुरुः षोडश ऋत्विजः ॥१४॥ याज्ञवल्क्यं सराजऽध्वयुः सकलकर्मवित् । ब्रह्माऽभूच्च स्वयं ब्रह्मा होता गाधिसुतो बभूव ॥१५॥ उद्गाताऽभूच्छतानन्दो गुरुर्यो जनकस्य च । शमो बभूव शमिता कश्यपाद्या मुनीश्वराः ॥१६॥ दृष्टा राज्ञोऽश्वमेधं हि राघवेण महात्मना । ऋत्विजः षोडशैश्चक्रुरन्ये च नवकर्मसु । १७॥ पृथक् पृथक् संवृणानाः संवृणस्ते मुनीश्वरः कुण्डेऽग्निमथ संकृत्या पात्राण्यासाद्यविस्तरात्॥१८॥ दशमकर्णे जपित्वा मोक्षयामास भूतले । सव्यं प्रदक्षिणो कर्तुं तस्य संरक्षणाय हि ॥१९॥ न्यस्तं सुमंत्रेण सैन्यैनावृतमंशुपया शत्रुघ्नं प्रेषयित्वाऽथ तूष्णीं तस्थौ द्विजेर्गुरुः ॥२०॥ यज्ञवाटे मुनिगणैःपूर्णे नरपूतटै । समाऽपि सीतया तूष्णीं तस्थौ शृण्वन् कथाः शुभाः ॥ २१ ॥ कृष्णा जिनधरो दान्तः कुशपाणिः कृतान्वितः कोटिसूर्यप्रभाऽशश्वत्तथ्यो य गुरुसन्निधौ ॥२२॥ तदाज्ञायां प्रवृत्तायां भ्रातरः पुक्कन्ध्रजः । स्नाताः सुवासमः सर्वे रेजियरे सुष्टुवलकृताः ॥२३॥ कण्ठहिक्यश्च मुदिता निष्कवन्त्यः सुवाससः दीक्षाशालामुपाजग्मुर्हस्ताग्रा वस्तुपाणयः ॥२४॥ तदा विनेदुर्वादामि ननृतूश्चाप्सरोऽपिचः एवमस्मिन्नन्तर तत्र समाजग्मु मुनीश्वराः ॥२५॥ दिने दिनेऽश्वमेधस्य वार्ता श्रुत्वा, महर्षयः कश्यपोऽत्रिरथद्वाजौ विश्वामित्रोऽथ गौतमः ॥२६॥ मार्कण्डेयो मुकुण्डश्च च्यवनो मुङ्गलोऽसितः । जमदग्म्यो देवलश्च व्यासो नागपणः क्रतुः । २७ । विभाण्डको नारदश्च तुम्बुरुगालवो मुनिः । शिवदासो भानुदासो हरिदासो महानराः । २८ । शिवशर्मा रुद्रवर्मा शिवशर्मा मुनावधः । एकशृङ्गश्चतुः शृङ्गः मप्तशृङ्गस्त्रिशृङ्गकः । २९॥ तिलभांडो भृगुश्चैव भार्गवो राक्षपास्तस्तथा। धौम्यः दण्डश्चकपादश्चिपादश्चोर्ध्वबाहुकः । ३० ।


माताजीको बिठाया और अपने शिष्यों तथा ऋत्विजके साथ-साथ मन्त्रम पढके रामचन्द्रजीके द्वारा गणेश-गौरी आदिका पूजन तथा पुण्याहवाचन कराया और सीता तथा रामचन्द्रजीका यज्ञक दीक्षा दी। ध्वजारोपणको जो विधि होता है, उसके अनुसार ध्वजारोपण और रामचन्द्रजक द्वारा सोलह ऋत्विजोका वरण कराया ॥ १०-१४ ॥ सम्पूर्ण कर्मोंके ज्ञाता वसिष्ठ स्वयं अध्वर्यु बने । स्वयं ब्रह्माजी ब्रह्मा बने और होता का विश्वामित्रजी । सतानन्द उद्गाता बने, जो जनकके गुरु थे। इसके अनन्तर कश्यपादि मुनियोंका रामचन्द्रजीने ऋत्विक् बनाकर वरण किया ॥ १५-१७ ॥ इसके अतिरिक्त जो सैकडो ऋत्विजका रामचन्द्रजीने अन्यान्य कार्योंको करनेके लिए वरण किया। उन सबने यथासमय कुण्डमें अग्नि स्थापन करके यज्ञके पात्रोंको अपने-अपने स्थानपर रक्खा, विधियुवक श्यामकर्ण घोडका पूजन कराया और पृथ्वीकी दक्षिणावर्त परिक्रमा करनेके लिए उसे छोड़ दिया ॥ १८, १९ ॥ उसकी रक्षाके लिए समन्तके साथ शत्रुघ्नको भेजकर भगवान् रामचन्द्रजी अपने गुरुजीके पास चुपचाप जा बैठे। उस यज्ञभूमिमें जहाँ हजारो ऋषि आकर बैठे हुए थे रामचन्द्रजी भी सीताजीके साथ एक किनारे बैठकर शुभ कथायें सुनने लगे उस समय रामचन्द्रजी केवल काले मृगका चर्म धारण किये और हाथमें कुशा लिये हुए एक साधारण वस्त्रमें थे फिर भी उनमें करोडो सूर्योका तेज था और वे गुरु वसिष्ठके पास बैठे थे ॥ २०-२२ । यज्ञकी दीक्षा हो जानेपर सब भ्राता फूलका मालायें तथा अच्छे-अच्छे कपडे पहिने बहुत ही सुन्दर दीख पडते थे । उनकी स्त्रियाँ भी गलेमें सोनेके कण्ठे और शरीरमें सुन्दर वस्त्र पहिन हंसती-खेलती अनेक वस्तुओंका उपहार लिये हुए उसी यज्ञशालामें आ पहुँची ॥ २३ । २४ । इसके अनन्तर बाजे बजे और अप्सराएँ नाचने लगीं । उसी समय बहुतसे ऋषिलोग आ पहुंचे अश्वमेध यज्ञका खबर पाकर हजारो महर्षिलोग आकर एकत्रित होते जा रहे थे। जैसे कश्यप, अत्रि, भरद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, मार्कण्डेय, मुकण्ड, च्यवन, मुद्गल, असित, जामदग्नि, देवल, व्यास, नारायण, क्रतु, विभाण्डक, नारद, तुम्बुरु, गालव, शिवदास, भानुदास, महातपस्वी हरिदास, शिवशर्मा, रववर्मा, मुनावराः शिवशर्मा, एकशृंग, द्विशृङ्ग, चतुःशृङ्ग, सप्तशृङ्ख ॥ २५-२६ ॥ विरूभाण्ड,

सर्गः २ ] यागकाण्डम् २१५

सर्गः २ ] यागकाण्डम् २१५

ऊर्ध्वपादश्चोर्ध्वनेत्र और्ध्वस्यस्त्रिशिखास्तथा । वृद्धगौतममान्धाव्य पर्णादश्चन्द्रसंज्ञकः ॥३०॥ ऋष्यशृङ्गो मतङ्गश्च जाबालिः कुम्भसंभवः । दधीचिः शौनकः सूतः सुमन्तुश्च लोमशस्तथा ॥ ३१ ॥ वाल्मीकिश्चापि दुर्वासा मुनिर्वेदनिधिर्महान् । एते चान्ये च मुनयः स्वाशिष्यतनयादिभिः ॥३२॥ केचित्पर्णाशनाः केचिद्वायुभक्षास्तथाऽपरे । कुशाग्रजलपानाश्च केचित्त्यक्ताशनास्तथा ॥ ३४ ॥ भिक्षाशनास्तथा केचित् पादसाधनाः परे । अयाञ्चाव्रतिनः केचिन्नोक्तसंभाषणाः परे ॥३५॥ केचिद्वल्कलसंवीताः केचित्काषायवासिणः मृगचर्मधराः केचित् केचिदाकाशावासिणः ॥३६॥ वृक्षपत्रवस्त्राश्च केचित्पञ्चाग्निसाधकाः । धूमपानव्रताः केचित् केचित्त्यक्तेषणाः परे ॥३७॥ एवं नानावनागमंगिग्दिग्देशान्तरादिषु । रामिनस्ते समायाताः सदारश्च सबालकाः ॥३८॥ सशिष्या रामचन्द्रस्य द्रष्टु यज्ञोत्सवं वरम् दशदिग्भ्यो मुनिश्रेष्ठाः कोटिशश्च दिने दिने । ३९. तान्सर्वान् रामचन्द्रोपि प्रत्युत्थानासनादिभिः । मधुपर्कादिपूजाभिरतोषयाम्यम् सादरम् ॥४०॥ यज्ञवाटे महारम्ये कामधेनुं शुचन्तः पूजयामास विधिवत्सर्वसम्पन्नपि ॥४१॥ सुवर्णशृंगभूषाभिः किंकिणीनूपुरादिभिः । एव ता शोभयित्वाऽथ प्रार्थयामास राघवः ॥४२॥ धेनो सागरसम्भुते त्वमन्नानि द्विजादिकान् दानमहैंस्त्वमध्वरे मे प्रसीद जगदम्बिके ॥४३॥ एवं संप्राथ्यं तां कामधेनु रामः प्रणम्य च बबन्ध पाकशालायां पट्टकूलामनोपरि ।४४॥ अथ सा सुरभिस्तुष्टा षड्रसाश्नानि सादरम् ददौ जनकनन्दिन्यै सा देवान्पद्मकर्मणि ॥४५॥ नाग्निकार्यं च तत्रासीत् पाकशालासु चैकता । इच्छाशनेः सदा पुष्टा बभूवुर्मुनिपुंगवाः ॥४६॥


भृगु भार्गव बृहस्पति, पौष्य, कण्व एकाद, त्रिपाद, ऊर्ध्वपाद ऊर्ध्वनेत्र ऊर्ध्वस्य, त्रिशिखा वृद्धगौतम, पर्णाद, चन्द्रसंज्ञक, । ३० । ३१ ॥ ऋष्यशृंग, मतङ्ग, जाबालि, अगस्त्य, दधीचि, शौनक, सूत सुमन्तु, लोमश, वाल्मीकि दुर्वासा ये एकसे एक विद्वान मुनिगण तथा और भी कितने ही ऋषि अपनी स्त्री-पुत्रों तथा शिष्योंके साथ आज आ रहे थे ॥ ३२ । ३३ ॥ उनमें बहुतसे ऐसे थे, जो केवल पत्ते खाकर रहते थे। कोई वायु पीकर रहते थे। कोई कुशक अग्रभागमें जल लेकर पीते और उसस काल यापन कर रहे थे । कुछ ऐसे थे जो जिन्होंने भोजनको त्याग ही दिया था ॥ ३४ ॥ कुछ ऋषि भिक्षान्न खाते थे, कोई दूसरेके हाथसे भोजनको करते थे (अपने हाथसे आग नहीं छूते थे) और कितने ही ऐसे थे जो किसीसे माँगना पसन्द नहीं करते थे। कोई कोई तो किसीसे सम्भाषण ही नहीं करते थे ॥ ३५ ॥ कुछ मुनि वल्कल वस्त्र पहनते हुए थे कोई गेरुआ कपड़ा धारण किये थे, कोई मृगचर्म पहने थे और कोई दिगम्बर (नंगे) थे ॥ ३६ ॥ कुछ महर्षि वृक्षके पत्तोंसे शरीर ढके हुए थे, कोई पंचाग्नि तापनेवाले थे, कोई धूम्रपान (गाँजेऔर चरस) का यत्न किये थे और कोई-काई ऐसे थे, जिनकी सब प्रकारकी इच्छाएं समाप्त हो गयी थीं ॥ ३७॥ इसी प्रकार कितने ही अङ्गों वनोंको पर्वतों, किन्हीं और आश्रमोंके निवासी ऋषि अपनी स्त्री तथा बच्चोंके साथ वहाँ आ पहुंचे थे । ३८ ॥ रामचन्द्रके उस अश्वमेध यज्ञको देखनेके लिए दशों दिशाओंसे करोड़ों ऋषि इसी तरह अपने शिष्यादिकोंके साथ वहाँ प्रतिदिन आ रहे थे। रामचन्द्र भी उनका प्रत्युत्थान आसन, मधुपर्कादिसे पूजन तथा आदर करते थे ॥ ३९ ॥ ४० ॥ उसी यज्ञभूमिमें रामचन्द्रजी विधिवूवर्क अनेक वस्त्रों और आभूषणोंसे कामधेनुका पूजन किया। उसकी सींगे सोनेसे मढ़ाईं तथा किंकिणी और नूपुर आदि पहनाये। इसी तरह उसको अलंकृत करके रामचन्द्रजीने प्रार्थना की—॥४१ ॥ ४२ । हे क्षीरसागरसे उत्पन्न होनेवाली कामधेने तुम हमारे अतिथिरूपमें आये हुए ब्राह्मणों को अन्नादिक दानसे तृप्त रखना। हे जगदम्बिके ! तुम मेरेपर प्रसन्न होओ ॥ ४३। इस प्रकार विनती करके एक गलीचा बिछाकर भोजनशाला (रसोईघर) में ले आकर कामधेनुको बाँध दिया । ४४ । इसके पश्चात् उस सुरभीने प्रसन्न होकर आदरपूर्वक छहों रसके अन्न सीताको दिये । उससे पाकशालामें न तो कोई भट्ठी जलती थी और न कोई पदार्थ बनाया जाता था। लेकिन

२१६ आनन्दरामायणे [ सर्ग २

यन्त्यान्कामान् रामचन्द्रश्चिन्तयामास चेतसि । तांस्तानुभौ मणी शीघ्रं कल्पयामासतुर्द्रुतम् ॥४७॥ यथार्थान्ताऽपि यान् कामांश्चिन्तयामास चेतसि। कामधेनुर्ददौ तांस्ताञ्छीघ्रं त्रैलोक्यदुर्लभान् ॥४८॥ सर्वत्र यज्ञवाटे हि द्विजार्यैश्च समन्ततः। पङ्क्तिषु भूमिजादीनां परिवेषणकर्मणि ॥४९॥ स्त्रीणां कङ्कणनादश्च शुश्रुवे नूपुरध्वनिः। अथ रामश्च सौमित्रिं समाहूयेदमब्रवीत् ॥५०॥ सीमाचारान्समाहूय मम वाक्यञ्च सादरम् । आज्ञापयस्व शीघ्रं त्वं शासनं यन्मरोच्यते ॥५१॥ ब्रह्मचारी गृहस्थो वा वानप्रस्थोऽश्रमी यतिः। यःकश्चिद्याममायाति पथिकः स समाज्ञया। ५२॥ निवारणीयो युष्माभिर्न कदाप्यध्वरे मम। ममाज्ञां न प्रतीक्षध्वं कोपः कार्यो न कस्यचित्। ५३॥ इति रामवचः श्रुत्वा तथेत्युक्त्वा स लक्ष्मणः। सीमाचारान समाहूय राघवोक्तं न्यवेदयत् ।५४॥ ततो रामः पुनः प्राहः समाहूयाथ लक्ष्मणम्। ब्रह्मचारी गृहस्थो वा वानप्रस्थाश्रमी यतिः। ५५॥ मुनीनां दायिनां दाराः शिष्याः सम्बन्धिनास्तथा। पौरा जानपदाश्चास्तु तेषां संबधिनः स्त्रियः ॥५६॥ दासीदासजनाः सर्वे यद्यद्वाञ्छन्ति लक्ष्मण। मामपृष्ट्वा तु सर्वेषां दातव्यं ह्यविचारितम् । ५७॥ अन्त्यजावधि सर्वान्हि तोषयस्व निरन्तरम् । न केषामभिलाषा च विफला हि विधीयताम् ॥५८॥ अयोध्यां कामधेनुं च जानकीं कौस्तुभं मणिम् । चिन्तामणिं पुष्पकं च राज्यं कोशादिकं च मे ॥५९॥ एतेष्वपि च यो यद्वै याचयिष्यति तन्नया। न दत्तं चेति वै श्रुत्वा ममानोषो भविष्यति ॥६०॥ अतो ज्ञात्वा भयं मत्तो दत्तस्व ह्यविचारत। याञ्चाभङ्गः कृतश्चेद्धि मन्छिरोद्रोहो भविष्यति ॥६१॥ सदा स्मर शिरं मे त्वमिमां लक्ष्मण सादरम्। इति रामकृतां शिक्षाङ्गीकृत्य स लक्ष्मणः ॥६२॥ तथा चकार तत्सर्वं यथा रामेण शिक्षितम् ॥६३॥ इति श्रीमन्महीपतिरामचरितान्तर्गतश्रीमदानन्दरामायणे यागकाण्डे लक्ष्मणाज्ञाकरणं नाम द्वितीयः सर्गः ॥ २ ॥

वहाँपर आये हुए सब ऋषि इच्छ भोजन कर करके प्रसन्न हो रहे थे । ४५ । ४६ ॥ जिन जिन वस्तुओंको राम- चन्द्रजीने अपने मनमें चाहा उन सबको उनके दो मणियों (कौस्तुभमणि तथा चिन्तामणि) ने बातकी बातमें पूर्ण कर दिया ॥ ४७॥ इसी तरह सीताजीने जो कुछ चाहा, सो कामधेनुने त्रैलोक्यकी दुर्लभ वस्तुओंको भी देकर उनकी इच्छा पूरी की । यज्ञभूमिके चारों ओर जब ब्राह्मणोंक मण्डली भोजन करनेके लिए बैठती थी और स्त्रियाँ उनका भोजन परोसनेके लिए आती थीं तब उनके भूषणोंकी मधुर ध्वनि सुनायी देती थी। इसके तदनन्तर रामचन्द्रजीने लक्ष्मणको बुलाकर इस प्रकार समझाया - । ४८। ४९॥ ५०॥ हमारे यज्ञभूमिके आस- पास रहनेवाले निवासियोंको सादर बुलाकर हमारी तरफसे यह समझा दो कि आश्रम लेकर जो कोई ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ सन्यासी मुनियोंके पण्डितों, उनके वस्त्र, शिष्य सम्बन्धी, पुरवासी, देशनिवासी और उनके सम्बन्धी, जो कोई यहाँ आ जाय, उसे कोई न रोके । उसका सत्कार करनेके लिए मेरी आज्ञाकी प्रतीक्षा करनेकी कोई आवश्यकता नहीं है ॥ ५१-५३ ॥ रामचन्द्रजीके आज्ञानुसार लक्ष्मणजीने सब आस-पासके निवासियोंको जाकर समझा दिया। कुछ देर बाद रामचन्द्रजीने फिर लक्ष्मणको बुलाकर कहा कि मुनियोंकी स्त्रियों तथा बच्चों आदिको अथवा दास दासियोंको जिस किसी वस्तुकी आवश्यकता हो, वह बिना मुझसे पूछे उनके इच्छानुसार देते जाओ ॥ ५४-५७॥ चाण्डालसे लेकर विप्रतक प्रत्येक प्राणीको सन्तुष्ट करो। किसी को किसी प्रकारका कष्ट न होने पाये। किसीकी कोई अभिलाषा विफल न हो। अयोध्या, कामधेनु, सीता, कौस्तुभमणि पुष्पक विमान, राज्य तथा कोशादिक इन सब वस्तुओंको भी देनेसे यदि तुमने इनकार किया तो मैं तुम्हारे ऊपर बहुत नाराज होऊँगा। इसलिए मेरे क्रोधसे डरते हुए बिना किसी प्रकारका विचार किये सब अभ्यागतोंको उनकी अभिलषित वस्तुएँ देते जाओ। तुम किसीकी माँग खाली करोगे तो तुम्हें मेरा सिर काटनेका पातक लगेगा ॥५८-६१॥ हे लक्ष्मण ! सदा मेरी इन बातोंका ख्याल

सर्गः ३ ] यागकाण्डम् २१७

सर्गः ३ ] यागकाण्डम् २१७


तृतीयः सर्गः

(रामके यज्ञीय अश्वका सब ओर घूमकर अयोध्या लौटना)

श्रीरामदास उवाच

अथ मुक्तस्तदा वाजी राघवेण महात्मना । यज्ञांगः श्यामकर्णः स पूर्वदेशं ययौ जवात् ॥१॥
शत्रुघ्नेन च सैन्येन प्राप्तो भागीरथीपटम् । एतस्मिन्नन्तरे रामः स्वप्रतापं प्रदर्शयन् ॥२॥
चकार कौतुकं तत्र शत्रुघ्नस्य पुरो महत् । ब्रह्मावर्ते महादेशं त्यक्त्वा गङ्गातटं प्रति ॥३॥
यावत्प्राप्ताः श्यामकर्णश्चावदामूर्द्धनेर्निधा । गङ्गायां च महापूरो यत्र नौकाऽपि कुण्ठिता ॥४॥
शत्रुघ्नेनापि तद्दृष्ट्वा कुण्ठितां गतिमीक्ष्य च । कालानिक्रमभीत्या स निश्चिन्तं व्यचिन्तयन् ॥५॥
आदावेवापि मे विघ्नमुत्पन्नं गमने महत् । ग्रामे प्राथमिके यद्वन्मक्षिकापतनं तथा ॥६॥
तदीदानीं रामचन्द्रप्रतापेनास्तु मे गतिः । निश्चित्येत्थं स शत्रुघ्नो रथस्थो जाह्नवीतटे ॥७॥
स्थित्वा प्रोवाच गङ्गां प्रतिपूज्य मवित्वरम् । शृण्वन्तु सर्वलोकेषु मुनिदेवगणेषु च ॥८॥
देवि गङ्गे महापुण्ये यदि सत्यं शृणुष्वमे । दीयतां तर्हि पंथा मे शीघ्रं सैन्ययुतस्य च ॥९॥
इति शत्रुघ्नवचनं श्रुत्वा सा जाह्नवी तदा । स्ववेगं मंदयामास इरोदरं चाप्रदर्शयत् ॥१०॥
पद्भित्रोंऽजो तदा शीघ्रं परं तीरं ययौ क्षणात् । तथा सैन्येन शत्रुघ्नः ससुमन्त्रः ममाययौ ॥११॥
मागधाख्यं महादेशं स एव कीकटः स्मृतः । पूर्वरूपं महापूरो जाह्नव्यां मयभूव ह ॥१२॥
प्रतापं रामचन्द्रस्य सर्ववुद्ध्या महाद्भुतम् । चक्रुन्ते जयशब्दांश्च सीतारामस्यच मुहुः ॥१३॥
श्यामकर्णस्ततः शीघ्रं ययौ पूर्वांदिशं प्रति । मगधेशो नृपश्चाथ श्रुत्वा तुरंगमागतम् ॥१४॥
प्रत्युज्जगाम सैन्येन पुरुरुन्द्याथ वारणम् । निनायाश्वं पठित्वा मङ्गलपत्रं पुरं निजम् ॥१५॥


रखना भूलना नही। रामचन्द्रजीका शिक्षाका अनुकरण करके लक्ष्मणजीने वैसा ही किया, जैसा रामने कहा था ॥ ६२।६३ ॥ इति श्रीशतकोटिपरिमितहरिकथामृतान्तर्गतानन्दरामायणे राज्यकाण्डेयश्वमेधविधौत 'ज्येत्स्ना' भाषाटीकासमन्विते यागकाण्डं लक्ष्मणाज्ञाकरणं नाम द्वितीयः सर्गः ॥ २ ॥

श्रीरामदासजी फिर कहने लगे—रामचन्द्रजीके द्वारा छोड़ा हुआ वह यज्ञका अङ्गरूप श्यामकर्ण घोड़ा अयोध्यासे बड़े वेगके साथ पूर्व दिशाकी ओर चला ॥ १ ॥ पतन चलते शत्रुघ्न, सुमन्त तथा विशाल सेनाके साथ वह अश्व जाकर भागीरथी गङ्गा तटपर पहुंचा। इधर रामचन्द्रजीने अपना महिमा दिखाकर इच्छासे शत्रुघ्नजीके सामने एक विचित्र कौतुक उपस्थित किया वह यह कि ब्रह्मावर्त देशको छोड़कर गङ्गातट पहुंचत-पहुंचते उनके कान जा जुड़ा औ बन था वह सब समाप्त हो गया। गङ्गाका बाढ़से एक स्थानपर उनकी नौका भी रुक गयी ॥ २-४ ॥ शत्रुघ्न उस दारुण समयको देखा तो देर हो जानेके भयसे मन ही मन सोचने लगे और 'पहिले ही आवाम इतना बड़ा विघ्न आ पहुंचा। यह वही कहावत चरितार्थ हुई कि 'पहल ही ग्रासमे मक्खी आ गिरी' ॥ ५ । ६ ॥ अब मुझे इस समय केवल रामचन्द्रजीके प्रतापका भरोसा है। उसीसे मेरा निस्तार होगा । इस प्रकार निश्चय करके शत्रुघ्नजी रथपर बैठे ही बैठे जाह्नवीके तटपर आकर कहने लगे—॥ ७ ॥ हे महापुण्यशालिनी गंगे ! यदि आप यदि भगवान् रामचन्द्रजी सच्चरित्र हो तो आप सेनासहित मुझे रास्ता दे दीजिए । ८ । ९ ॥ इस प्रकार शत्रुघ्नके वचनको सुनकर गङ्गाजीने वेगको मन्द करके अपने मध्य भागसे शत्रुघ्नको रास्ता दे दिया । १० ॥ तब क्षणभरमें घोड़े और पैदल सैनिक चलकर गङ्गाके उस पार पहुंच गये । इस तरह समन्य शत्रुघ्न सुमन्त्रके साथ मगधदेश मध्यम जा पहुंचे, जिस देशको कीकट भी कहते है उन के घोड़े पार उतर जानेके बाद गङ्गाका प्रवाह पूर्वरूप वेगवान् हो गया॥११ ।१२॥ मगधनिवासी लोग रामचन्द्रके अद्भुत प्रतापको समझकर सीतारामके नामके जयजयकार करने लगे ॥ १३ ॥ वहाँसे अश्वमेध यज्ञके लिए छोड़ हुआ श्यामकर्ण घोड़ा पूर्व दिशाकी ओर चला। राजा मगधेश घोड़ेको आया हुआ सुनकर हाथीकी सवारीपर चढ़ तथा सेनाको लेकर अगवानीके लिए गये । घोड़ेके मस्तकपर बँधे हुए पत्रको पढ़कर उसकी नगरमें ले गये

२१८ आनन्दरामायणे [ सर्गः ३

पूज्यादरात्स्वमर्त्यै तं शत्रुघ्नं विभवैर्निजैः । समस्तं निजकोशादि समर्प्य मघवाधिपः ॥१६॥ पौराञ् जानपदान्स्वस्त्रीः सुहृद्बान्धवमन्त्रिणः । पौरपत्नीर्जानपदपत्नीर्विप्रान् पुरोधसम् ॥१७॥ प्रेषयामास यानेने वाहनेश्च प्रति । स्वयं सैन्येन तुरगचरणान्नुलक्ष्य च ॥१८॥ शत्रुघ्नस्यागुवर्ती बद्धहस्तपुटो ययौ । एवं सर्वेऽपि राजानो ज्ञातव्याः सर्वदिक्स्थिताः ॥१९॥ न केनापि श्यामकर्णो बद्धो नृपतिना भुवि । इन्द्राद्यैर्निर्जरैर्नापि नासुरैः कदाचन ॥२०॥ ततो बाजी पूर्वदेशान्वङ्गवङ्गकलिङ्गकान् । तथा नानाविधान्देशान् विलंध्य जलधेस्तटम् ॥२१॥ दृष्ट्वा नृपकुलैर्युक्तो दक्षिणाभिमुखो ययौ । गोदावरीं नदीं तीर्त्वा देशांश्च च द्राविडम् ॥२२॥ अतिक्रम्यारवारारुणं देशं समतिक्रम्य च । काञ्चीप्रदेशान्सकलान्वंशन्नानाविधान्त्सुभान् ॥२३॥ कावेरीं समतिक्रम्य चोलदेशं विलङ्घ्य च सेतुबन्धं ततो दृष्ट्वा पश्चिमाभिमुखो ययौ ॥२४॥ ताम्रपर्णीं विलङ्घ्याथ समतिक्रम्य केरलान् । त्रिषट्प्रकारान् देशांश्च गोकर्णं च ततो ययौ ॥२५॥ कृष्णातौरप्रदेशांश्च समतिक्रम्य घोटकः । कर्णाटकं महादेशं समतिक्रम्य सत्तरम् ॥२६॥ कोंकणं समतिक्रम्य तत्तद्देशनृपैः सह । भीमान्देशान्म सकलाञ्छ्यामकर्णः शुभावहः ॥२७॥ पश्यन् ययौ महाराष्ट्रं गौतमीं तां विलङ्घ्य च । विदर्भ समतिक्रम्य ययावाभीरमंडलम् ॥२८॥ मालवं समतिक्रम्य तीर्त्वा पुण्यां महानदीम् । वीर्त्वा स श्रमनीं पुण्यां समतिक्रम्य गुर्ज्जरम् ॥२९॥ प्रभासं च ततो गत्वा ययावानर्त्तमुत्तमम् । सौवीरान् समतिक्रम्य ययौ बाजी स माधुरान् । सौराष्ट्रान्व्यतिक्रम्य मरुदेशं ययौ हयः ॥३०॥ धन्वदेशमतिक्रम्य ययौ सारस्वतातटम् । मत्स्यान् देशानतिक्रम्य ययौ बाजी म माठरान् ॥३१॥ शूरसेनानतिक्रम्य पांचालांस्तुङ्गरो ययौ । कुरुक्षेत्रं ततो गत्वाऽतिक्रम्य कुरुजांगलान् ॥३२॥ देशं कैकेयमुल्लंध्य ययौ काश्मीरमुत्तमम् भिल्लदेशं गौडदेशं यवनदेश ययौ हयः ॥३३॥ यवनांम्नाग्रदेशांश्च समतिक्रम्य वेगतः । पश्यन्नानाविधान् देशान् करतोयातटेन वै ॥३४॥

और बडे आदरके साथ अपनी संपत्तिसे शत्रुघ्नकी पूजा की । समस्त निज कोषादि शत्रुघ्नको अर्पण करके पुरवासियोंको, अपने कुटुम्बको, जनपदवासियोंको एवं अपन मित्र-बान्धवोंको वाहनांक साथ अश्वमेध यज्ञमें अगाड्या भेज दिया । किन्तु स्वयं सेनाके साथ जनुघ्नके दनुवर्ती होकर गणीय अश्वके चरणोंके लक्ष्य करके साथ-साथ चले । इसी तरह सब देशोंके राजा लोग शत्रुघ्नके वशवर्ती होकर अश्वके पीछे-पीछे चले ॥ १४-१९॥ पृथ्वीपर किसी भी राजाने श्यामकर्ण घोडंको नहीं बाँधा, न स्वयमें इन्द्रादि देवताओने और न पाताललोकके असुरोने उसे बाँधा । २० ॥ उसके बाद घोडा वङ्ग वङ्ग-कलिङ्गादि अनेक देशोंमें होता हुआ समुद्रतटपर पहुंचा । २१ ॥ बहसि नृपसमूहके साथ यह दक्षिण दिशामे गया । फिर गोदावरी नदीको पार करके आध्र, द्रविड, कारवार नामक देशोका अतिक्रमण करक नाना प्रकारके मनोहर प्रदेशोंमें घूमता हुआ कावेरी नदीको पार करके चोलदेशमें जा पहुंचा । वहांसे समुद्रतटपर सेतुबन्ध रामेश्वर होकर पश्चिम दिशामे गया ॥ २२-२४ ॥ बहसि वह घोड़ा ताम्रपर्णी नदीको लांघ तथा केरल देशका अतिक्रमण करके गोकर्ण तीर्थम जा पहुंचा ॥ २५ ॥ वहांसे कृष्णा नदी उतरकर वह घोड़ा कर्णाटकमें पहुंचा ॥ २६ ॥ वहाँसे कोंकण देशको पार करके सत्तरेशीय राजाओके साथ भीमा नदीको लांघता हुआ महाराष्ट्रमे जा पहुंचा ॥२७॥ वहाँपर गौतमी नदीको लांघकर विदर्भ देशमे होता हुआ आभीरमण्डलमे पहुँचा ॥ २८ ॥ वहाँस मालवा होता हुआ महानदी पुण्याका अतिक्रमण करके गूज्र्जरम पहुँचरा ॥ २९ ॥ वहाँसे प्रभास तीथम अ.कर आनत्त देशको गया । फिर सोवार आदि देशोंको पार करके घोड़ा मथुरा प्रदेशम गया । वहाँस सौराष्ट्र देशको लांघकर मरु-देश ( मारवाड ) में पहुंचा ॥ ३० ॥ उसके बाद धन्व नामक देशका अतिक्रमण करके सरस्वतीके तौरपर गया । वहाँसे मत्स्य देशमे घूमता हुआ माठर देशमें गया । ३१ ॥ उसके बाद वह श्यामकर्ण घोड़ा शूरसेन, पञ्चाल, कुरुक्षेत्र, जांगल एवं कैकय देशमें भ्रमण करता हुआ कश्मीर गया । वहाँसे भिल्लदेश,

सर्ग ११ ] यागकाण्डम् २१९

सर्ग ११ ] यागकाण्डम् २१९

ययौ वाजी वायुगत्या शीघ्रं ज्वालामुखों प्रति । दोषभास्यां फल्गोयां वीक्षा नैवाद्रतो गतः ॥३५॥ कर्मनाशाजलस्पर्शात् फल्गोराचमनात्। गंडक्यां बहुनागाधर्मः स्खलति कीर्तनात् ॥३६॥ हरिद्वारं ययौ बाजी ततो गङ्गातटेन हि। हिमाद्रेः सन्निधौ देशान् समतिक्रम्य वेगवान् ॥३७॥ बद्रिकाश्रममालोक्य कलापग्रामवासिभिः। संमानितस्तदा बाजी गत्वा तन्मानसं सरः ॥३८॥ दृष्ट्वा हरिसरक्षेत्रं मिथिलां प्राप सेनया। नानादेशानतिक्रम्य ह्यर्यावर्तं ययौ हयः ॥३९॥ दृष्ट्वा काशीं त्रिवेणीं च शतंर्वादीं ययौ जवात्। शृङ्गवेरपुरं गत्वा तमसां तां विलंघ्य च ॥४०॥ सरत्वा च नैमिषारण्यं समुल्लंघ्याथ गोमतीम्। ब्रह्मावर्ते सरो गत्वा पश्यन् देशान् मनोरमान् ॥४१॥ कोसलाख्यं महादेशं दृष्ट्वा बाजी मनोहरम्। ततः साकेतविषये यय्वभौ प्राप वाश्वरम् ॥४२॥ नानादेशनृपैः सार्धं शत्रुघ्नेनाभिरक्षितः। अगात श्यामकर्णं तं श्रुत्वा सीतापतिस्तदा ॥४३॥ आज्ञापयच्च सौमित्रिं सोऽपि प्रत्युज्जगाम तम्। पञ्चेन्द्रं पुरस्कृत्य मेरीदुन्दुभिनिःस्वनः ॥४४॥ ऋत्विग्भिर्वेदवेदांगपारगैर्जगैः। संपूज्याथ श्यामकर्णं नृपतींश्च सविस्तरम् ॥४५॥ मानयामास सौमित्रिः शनैरध्वरमण्डपम्। महात्मरो महान् सन्मदा तुरङ्गदर्शने ॥४६॥ दशयोजनपर्यन्तं सर्वत जनसंकुलम्। व्याप्तं सर्वं ततोऽप्योषपात्रहिंतृवर्णसंसदा ॥४७॥ हय सर्वत्र रक्षन्तः पूर्वसंदर्शिताञ्जनान्। पौरान् जानपदान्त्रांश्च बहुसंधा अमरापमाः ॥४८॥ मैन्चन् वभ्रमुः सर्वे स्वीयदर्श नकामुकाः। न प्रापुःशन तेषां उनीपेऽध्वरमण्डपे ॥४९॥ केचिचे दर्शनं स्वानां प्रपुष्यत्र परेऽहनि। केचित्तृतीये दिवसे पंचमे सप्तमेऽथ वा ॥५०॥ केचिद्दूरद्वियोगेन प्रापुः स्वानां दर्शनम्। केचित् पक्षानन्तरं हि मासेनानन्तर जनाः ॥५१॥ केषां वियोग एवापाद्दिग्भ्रमात् तदानुचर। तज्ज्ञात्वा रामचन्द्रोऽपि लक्ष्मणं प्राह सादरम् ५२।


चौहद्दर, कुरुक्षेत्र, ज्वालामुखी देश एवं मानसरोवर निमन्त्रण करता हुआ तथा उक्त तटवर्ती नानाविध मनोहर दृश्योंको देखता हुआ बड़े वेगसे ज्वालामुखक पावर्ती प्रदेशमें गया ॥ ३५-३८ ॥ वहाँसे कुरुक्षेत्रादि प्रदेशोंको पार करके अवध प्रदेश में आ गया। क्योंकि कर्मनाशा नदीका स्पर्श करनेसे, फल्गु नदीका आचमन करनेसे, गंडकी नदीकी बहुधा द्वारा तरंग और धार्मिक कर्म करके उसका आचमन करनेमें धर्मका क्षय होता है ॥ ३५ ॥ ३६ ॥ यहाँसे वह गङ्गाके तट ही तट होकर हरिद्वार गया। पश्चात् हिमालयके प्रान्तमें जाकर बद्रिकाश्रम पहुँचा। वहाँसे कलापग्रामनिवासियोँका आतिथ्य सत्कार वह पाण्डि आर्यावर्त देशमें गया ॥ ३७-३९ ॥ वहाँसे काशी और गङ्गाके तटपर घूमता हुआ वेगपूर्वक अवधदेशमें गया। फिर शृङ्गवेरपुरमें जाकर तमसाको पार करके नैमिषारण्यमें गया। वहाँसे गोमती और ब्रह्मावर्त सरोवरको जाकर मनोहर दृश्योंको देखता हुआ कोसल देशमें पहुँचा। इस प्रकार सब ब्रह्माण्डको घूमता हुआ वह अश्व फिर अयोध्याके निकटवर्ती अश्वमेधके यज्ञमण्डप में पहुँचा ॥ ४०-४२ ॥ अनेक देशके राजाओंके साथ शत्रुघ्नसे अभिरक्षित दशार्योहित हुआ श्यामकर्ण अश्वको आया हुआ सुनकर सीतापति रामचन्द्रजीने उसको लानेके लिए लक्ष्मणको आज्ञा दी। लक्ष्मणजी हाथीपर बैठकर बड़े उत्साहके साथ उसकी अगवानी करनेके लिए गये, ऋषियोंयुक्त सब मण्डलपालों और राजाओंकी पूजा करके उस अश्वसहित यज्ञमण्डपमें ले आये। उस समय घोड़ेका देखनेके लिए प्रजावर्गमें बड़ा उत्साह था ॥ ४३-४५ ॥ यज्ञारम्भके समय अयोध्याके बाहर दस योजनतक सम्पूर्ण पृथ्वामण्डलके संग्रामी, राजाओं तथा अमीर-उम-रावोंसे भरा था ॥ ४७ ॥ यजन होता ही था कि श्यामकर्ण अश्वके साथ भ्रमण करके लौट हुए राजा लोग पहिलेसे बहुमूल्य अपने-अपने शुभ आश्रयको त्यागकर तुरन्त उसको देखनेकी इच्छामें इधर उधर घूमने लगे पर उस प्रकारनिक जनसमुदायमें उन लोगोंका प्राप्त नहीं कर सके ॥ ४८ ॥ ४९ ॥ कोई परिजन सज्जन दूसरे दिन मित्र-बान्धवोंसे मिल सका। कोई तीसरे दिन कोई पांचवें रोज और कोई सातवें रोज मिला ॥ ५० ॥ किसीकोके मण्डपका द्विविध स्वतंत्रतोंका पता चला। किसीको एक पखवाड़ेके बाद और किसीको एक माहके बाद पता लगा ॥ ५१ ॥ किसीको वियोगका फल पता ही नहीं लगा। यह सुनकर भगवान रामचन्द्रजीने लक्ष्मणसे

२२०आनन्दरामायणे[ सर्गः ४

परस्परं वियोगोऽत्र संमर्देन तु लक्ष्मण जायते तत्र युक्तिं त्वं मत्तः श्रुत्वा कुरुष्व ताम् ॥५३॥
तमसायास्तटे शालां कृत्वाऽथ महतीं शुभाम् घोषणां च सर्वत्र महादुन्दुभिनिःस्वनैः ॥५४॥
येषां वियोगस्तैर्गत्वा तमसातटशोभिनाम् । शालां प्रवेश्यध्वं द्वि स्वानां योगोऽस्तु तत्र हि ॥५५॥
चतुष्पदादिवस्तूनि ज्ञात्वा यस्य लघून्यपि । तत्रैव स्थापनीयानि स्वं स्वं गृह्णन्तु ते जनाः ५६॥
इति रामवचः श्रुत्वा तथेत्युक्त्वा स लक्ष्मणः तथा चकार तन्मर्त्यं येन योगः परस्परम् ॥५७॥
सर्वे तत्र जनाः प्रापुः स्वानां स्त्रीबालमित्रिणाम् । चतुष्पदादिवस्तूनां तत्र लाभो बभूव ह ॥५८॥
यत्किंचिद्विस्मृतं येन दृष्ट्वाऽन्येन च कदा । शालायां स्थापितं दृष्ट्वा स्वयं जग्राह तत्र सः ॥५९॥
एवं श्रीरामयज्ञे हि संमर्दः संबभूव ह । न तत्र शुश्रुवे शब्दः कर्णेऽप्युक्तो जनैस्तदा ॥६०॥
तत्तन्ते पार्थिवाः सर्वे तस्थुर्वेश्मनरास्रसु ॥६१॥
इति शतकोटिरामचरितान्तर्गतश्रीमदानंदरमायणे वाल्मीकीये यागकाण्डे अश्वगमनं नाम तृतीयः सर्ग ॥ ३ ॥


चतुर्थः सर्गः

( रामका कुम्भोदर मुनिसे साक्षात्कार )
श्रीरामदास उवाच

अथ ते ऋत्विजः सर्वे मंगलैर्विधिभिः शुभैः । सम्यक् प्रवर्त्तयामासुर्वाजिमेधं यथाविधि ॥ १ ॥
तत्रर्त्विजो वाजिमेधे रत्नक्रीडेशयाम्बराः । मसदृश्या विरेजुस्ते यथा वृत्रहणोऽध्वरे ॥ २ ॥
एतस्मिन्नन्तरे तत्र सुरैयसहितैः सुरैः । स्वामिना विघ्नराजेन पार्वत्या वृषमस्थितः । - ।
महेश्वरो यज्ञवाटं रामाहूतो ययौ गणैः । शिवमागतमाज्ञाय प्रत्युद्गम्याथ लक्ष्मणः । ४ ।
वारणेंद्र पुरस्कृत्य पताकाध्वजसंरणैः । नानाव्याद्यसुघोषश्च वारस्त्रीणां प्रनर्त्तनैः , ५ ॥


कहा—॥ ५२ ॥ यहाँ भीडके कारण परस्पर लागोंका वियोग हो जाता है। अतएव मैं एक युक्ति बतलाता हू। उसको करो । ५३ ॥ तमसा नदीके तटपर एक बड़ी आगे शाला बनवाओ और दुन्दुभी पिटवा दो कि भूले-भटकोंको खोजना हो तो तमसा नदीके तटपर जहाँ नयी शाला बनी हुई है, वहाँ जाओ । वहींपर भूले-भटकों-को लोग पाओगे ॥ ५४ । ५५ । लागोंको अशीम लकर छांटा छांटी का खोयी हुई वस्तुएँ स्वाजखाजकर वहाँ रखी हैं। वहाँ जिस-जिसकी जो-जो वस्तु हो, वह अपनी-अपनी वस्तु ले ले। इस प्रकार रामजीके वचन सुनकर लक्ष्मणने कहा—अच्छा महाराज ! ऐसा ही करूँगा । इसके बाद लक्ष्मणजीने ऐसी व्यवस्था की, जिससे सबका अपने वियुक्त बान्धवोंसे मिलाप होने लगा । ५६ । ५७ । वियुक्त बन्धु वहाँ गये और सबको अपने अपने स्त्री-पुत्र-मित्रादि और नतुष्पदादि पशु सभी खोई हुई चीजें मिल गयी। जहाँ-कहींपर जिससे जो वस्तु भूलसे छूट गई, उस वस्तुको राजानुचरोंने तथा जिसने देखी एंव जिसको मिली, उसने वहीं शालामे रखवा दी और जिसकी वह वस्तु थी, उसने वहाँ जाकर ल ली । ५८ ॥ ५९ ॥ इस प्रकार श्रीरामजीके यज्ञम एसी भीड़ हुई वि जिसके कारण कानमे कहा हुआ भी शब्द मनुष्योंको नहीं सुनाई पड़ता था । ६० ॥ सब भगवान्‌के दर्शन करके सब राजा लोग अपने-अपने स्त्री-पुत्र मित्रादिकोका लेकर अलग अलग तम्बूओं (खेमों) में रहने लगे । ६१ । इति श्रीमशतकोटिरामचरितान्तर्गतश्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीय यागकाण्डे अश्वगमनं नाम तृतीयः सर्गः ॥ ३ ॥

श्रीरामदास कहने लगे इसके अनन्तर सब ऋत्विक् मंगलमय कृत्योंके साथ-साथ शास्त्रानुसार अश्वमेध यज्ञ करवाने लगे ॥ १ ॥ उस समय यज्ञमें रत्नमय आभरणों और वस्त्रोंको पहिने हुए ऋत्विक् ऐसे सुशोभित हो रहे थे, जैसे इन्द्रके यज्ञम सुशोभित होते थे ॥ २ ॥ उसी समय वहाँ रामज क बुलावेसे बैलपर चढ़कर महादेव और पार्वतीजी आयीं । उनके संग इन्द्रादि देवता, स्वामिकार्तिकेय, गणेशजी एवं प्रमथादि सब गण भी आये ॥ ३ ॥ महादेवजीका आगमन सुनकर सम्पूर्ण नगर ध्वजा-पताका आदिसे सजाया गया ।

पादप्रक्षालनं शम्भोश्चकार मैथिली प्रभुः । स्वनाभिप्रजया गङ्गा गङ्गादिनिलया ॥ ८॥

सर्गः ४ ] यात्राकाण्डम् २२१


संपूज्य शंकरं भक्त्या चानयामास मण्डपम् । एवं सह पदान्यग्रे गत्वा समोद्य शंकरम् ॥ ६ ॥
नमस्कृत्य समानीय निवेश्य गिरिजाधवम् । हेमपात्रे भवेद्भक्त्य हेमपात्रे स्वहस्ततः ॥ ७॥
पादप्रक्षालनं शम्भोश्चकार मैथिली प्रभुः । स्वनाभिप्रजया गङ्गा गङ्गादिनिलया ॥ ८॥
जलधारां यथायोग्यां प्रोक्षयामास जननः। रामेने गता सीता दृष्ट्वा दद्युगणस्तदा ॥ ९॥
अनिमेषाः कंजनेत्रकटाक्षाः मन्दिगतय हि। तन्मयेऽनेधमः सम्मन्न न विदुः के वयं स्थित ॥ १०॥
तुष्टुवुस्तत्र कपिने सुराः श्रीरामयं मुदा। गन्धर्वा तुष्टुवुः केचित् प्रबद्धकरसम्पुटाः ॥११॥
एवं निर्जङ्गमानां मनोपस्त्वं ई शभूत्। अतोवस्य नयेद्दृष्ट्वा रूपं कोटिरविप्रभम् १२॥
अथ रामः सीतया हि शंकरं गिरिजापतिम् । स्वयं मपूज्य सकलान् देवान् सौमित्रिणा ऋषीन् ॥१३॥
पूजयित्वाद्वयंवोढाख्यं शङ्करं लोकशङ्करम् अद्य धन्योऽस्म्यहं दद दर्शनात्तत्र सीतया ॥१४॥
अद्य मे सूर्यवंशेऽस्मिन् जन्म सफलयतः शतम् इति रामस्य वचनं श्रुत्वा स शशिभूषणः ॥१५॥
विहस्य राघवं प्राह वेद्मि मायां हरे तव त्वन्तः सिक्तपले ब्रह्मा ज्ञानस्तस्मात्पुनाभवः ॥१६॥
मरीच्याद्याः मरुद्भृतुः पौत्राः सप्राहतांगजः। मरीचेः कश्यपः पुत्रः सूर्यस्तनिशंशवापकः ॥१७॥
कश्यपात्सविता जज्ञे पौत्रपौत्रम्वरं प्रभा। रवेरत्रानः सूर्यवंशस्तद्वंशे तव जन्म वै ॥१८॥
मद्दंशसम्भवः सूर्यः किं मां मोहयसि प्रभो देवानां कार्यसिद्धयर्थमवतीर्णोऽसि मायया ॥१९॥
कुरु क्रीडां यथेच्छं त्वं यात्रापञ्चारिकीर्मुखैः शिक्षां करोषि लोकानां बहुभ्यहं रोहिते तव ॥२०॥
इति श्रुत्वा शंभुवाक्यं माहागर्वी विहस्य च यज्ञकुण्डसमीपे तु तस्थतुर्गुह्यसन्निधौ ॥२१॥
एतस्मिन्नन्तरे तत्र समाजग्मुः सहस्रशः गन्धर्वाः किन्नराः सिद्धास्तथा चाप्सरसां गणाः॥२२॥
लोकपालाश्च दिक्पालाः रमानलतिरोहिताः। नवग्रहाः षटृतवः पश्चिनस्थमगस्तथा ॥२३॥


वेश्याओक नाना प्रकारके नाच और अनेक तरह बाजे-गाजके साथ हाथीपर रहकर लक्ष्मणजी उनकी अगवानीके लिए गये ॥ ४॥ ५। व भक्तिपूर्वक शङ्करभगवान्‌का यज्ञमण्डपम ल आए। राजाज भा उनको आते देखा तो पाँव सात पग आगे बढकर शङ्करजीको प्रणाम किया शिव-पार्वतीका सत्कार करक सुवर्णमय सिंहासनपर बैठाया। सत्कार मद्य सदा रामने अपने हाथ स्वर्णखचित एक बडे मणक पात्रम दोनोंका पादप्रक्षालन किया। सवन न० के मस्तकपर गिरिजेश जलदान करते। सम्मुख देवतागण निमेष रहन नेत्रों से उन दोनोंकी अनुपम शोभा देखकर चित्तिलखित-से होगए उनका यह तक ज्ञान नही रहा कि वे कौन हैं। ६-१०। उस समय दवगण मुदित होकर श्रीरामचन्द्र और माता जानकीकी स्तुति करने लगे ॥ ११॥ इस प्रकार मन्त्रिगण भी जानकी कविके समान प्रभावाली अनुपम सौन्दर्य देखकर देवताओंका अभाव प्रसन्नता हुई ॥ १२॥ इसके बाद सीता और लक्ष्मणजी सहित रामजीने शिव-पार्वती तथा सब देवताओंकी पूजा का ॥ १३॥ सर्व सुख कल्याण कत्तव्य से शङ्करकी पूजा करके रामजी कहने लगे-हे भगवन् ! आज में धन्य हुआ॥ १४। आज भयंकर सूर्यवंश में जन्म लेने से मेरा जन्म धारण करना सफल हुआ। इस प्रकार रामजीक बचन सुनकर शशिशेखर श्री शङ्करजी ने कहा-हे राघव ! आपकी मायाको मैं जानता हूँ। आपके नाभिकमलसे ब्रह्मा उत्पन्न हुए और उस ब्रह्मासे सम्पूर्ण मुनिगण उत्पन्न हुए हैं ॥ १६॥ उन निष्पाप मरीचि प्रभृति म० मुनि उत्पन्न भये और उन मुनिगणों से सपूर्ण सृष्टि की विस्तृत किया ॥ १७॥ उन कश्यपके पुत्र सूर्य हुए। इस प्रकार आपके पौत्रक परम्परासे सूर्यवंश बना। उस सूर्यवंशम आपका जन्म हुआ यह सब आपकी माया ही है। किस प्रकार मुझे अपनी मायाजालमें फँसाते हैं? आप अपनी मायासे देवताओं के कार्यसिद्धि के लिए पूर्णरूप अवतीर्ण हुए हैं ॥ १८ ॥ १९ ॥ यात्रा-यज्ञादि कौतुकसे आप यथेच्छ क्रीड़ा करिये। में आपकी सब चष्टाओंको समझता हूँ। आप संसारको शिक्षित करनेके लिए ही ऐसा करते हैं। २०। इस प्रकार शिवजीके कथनको सुनकर सीता और रामजी हंसे। तदनन्तर वे यज्ञकुण्डके समीप स्थित गुह वसिष्ठक पास गये ॥ २१॥ इसी समय हजारों यक्ष, गन्धर्व, किन्नर,

२९२आनन्दरामायणे[ सर्गः ४

ऋक्षाणि तिथयो योगा करणानि च राशयः । पर्वताम्भरसः सर्वे सागराश्च नदा अपि ॥२४॥ सरोवराणि नद्यश्च वाप्यः कूपह्रदास्तरे । धृत्वा जगद्रूपाणि ययुस्ते यज्ञमण्डपम् ॥२५॥ समागतश्च संपातिर्गुहो मकरध्वजः । प्रहायौ च लङ्काया राक्षसेश विभीषणः ॥२६॥ आतिना राघवेणापि सर्वं तस्थुः प्रपूजिताः । स्वनिर्दिके स्थापिताः पूर्व सर्वेश्वाभूर प्लवंगमाः ॥२७॥ एतस्मिन्नन्तरे तत्र समायातो मुनीश्वरः । कुम्भोदरो महातेजाः सीमाचार्यावलोकितः ॥२८॥ तं दृष्ट्वा भयभीतास्ते सर्वे प्रोचुः परस्परम् । हा कष्टं पुनरायातः सोऽय कुम्भोदरो मुनिः ॥२९॥ यात्राम्रमो राघवस्य यन्निमित्तो बभूव ह । यद्वाक्यादश्वमेधोऽपि सर्वेषां संबभूव ह ॥३०॥ महान् भ्रमांशपपुष्टे तु श्रमणो जगतीतले । अधुनाऽपि समायातः किमग्रे वै पुनर्भवेत् ॥३१॥ कुप्येत न तदृष्टो राघवस्यापि निंदकः । एवं नानाविधा वाचः सीमाचारगणोरिताः ॥३२॥ शृण्वन् कुम्भोदरस्तूष्णीं ययौ यज्ञभुवं प्रति । सदागमनपूर्वे स सीमाचारैर्निवेदितः ॥३३॥ धावद्भिर्वेपमानैश्च स्थलाद्गामिश्चरान्वितैः । राम राम महाबाहो हे लक्ष्मण शृणु प्रभो ॥३४॥ यात्रायज्ञश्च यद्वाक्यात् समायातः स वै पुनः । कुम्भोदरो मुनिश्रेष्ठो राम त्वय्यपि निष्ठुरः ॥३५॥ तद्द्तवचनं श्रुत्वा सर्वे तद्दर्शनात्सुकाः । त्यक्त्वा स्वीयानिकर्माणि चोत्सुरुस्तद्दिक्षया॥३६॥ ऋत्विजो राघवः सीता न भयं सेजिरे मुनेः । कुम्भोदरो यज्ञवाटं ययौ सर्वविलोकितः ॥३७॥ अतिखर्वः स्थूलशिराः श्याम्यरूपः महोदकः । स्थूलोदरः पिंगनेत्रः सर्पपाना जटाधरः ॥३८॥ चीरवासाः खर्वपादः खर्वहस्तो महामुनिः । पुरा किंचित् श्मश्रुयुक्तो धृतदण्डकमण्डलुः ॥३९॥ तं दृष्ट्वा सकला लोका भयं प्रापुः स्वचेतसि । पूर्वकर्म च संस्मृत्य श्रुत्य च परस्परम् ॥४०॥ एतस्मिन्नन्तरे रामः शीघ्रं प्रत्युद्जगाम तम् । मार्तण्डं प्रणम्येवाथ करं धृत्वा तु मंडपम् ॥४१॥

सिद्ध चारण एवं अप्सराओंका गण आया ॥ २२ ॥ सम्पूर्ण दिक्पाल, दिक्पाल तथा मन्दलनिवासी भी आये । नवो ग्रह, छट्टा ऋतुवें, साठो सम्वत्सर एवं तिथि नक्षत्र योग करण राश पर्वत वृक्ष समुद्र नद नदी कूप तालाब तथा अन्य सूक्ष्म प्राणी सभा अपने जङ्गम रूप धारण करके मण्डप में पधारे ॥२३-२५॥ गृध्रराज संपाति, निषादराज एवं मकरध्वज आये तदनन्तर सभा राक्षसोंके साथ लंकाके विभीषण जी आये ॥ २६ ॥ भगवान् रामने सबकी पूजा का और अपने समीप बैठाया वानर पहिलसे ही वहां टिके थे ॥ २७ ॥ इसी समय महातेजा कुम्भोदर मुनि आये। यज्ञ भूमिकी सीमा पर निवास करनेवालोंने उन्हें आते हुए देखा ॥ २८ । वे देखकर बड़े भयभीत हुए और बोले अहो ! बड़े कष्टकी बात है। यह तो फिर वह कुम्भोदर मुनि आ गये ॥ २९ ॥ जिनके कारण भगवान् रामको यात्राका कष्ट हुआ था, जिनके कारण हम सबका अश्वमेध हो गया ॥ ३० ॥ छःङ्ग के पीछे यज्ञ समाप्त हुआ से उधर उधरसे इधर घूमते हुए अत्यन्त कष्ट भये । अब यह फिर आये हैं। अब आगे क्या होगा, सा हमलोग नही जानते। यह रामचन्द्रका बड़ा निन्दक है ॥ ३१ ॥ इस प्रकार सीमाचारी लोगों की वाणियोको सुनते हुए कुम्भोदर चुपचाप यज्ञभूमिमे आये ॥ ३२ ॥ उनके आनके पूर्व ही बड़े वेगसे भागत-कांपते हुए दूतोंने आकर रामसे निवेदन किया-॥ ३३ ॥ हे राम ! हे महाबाहो लक्ष्मण हे प्रभो ! आप लोग सुने, जिसके वाक्यसे बारात गया और यज्ञ हुआ है वही कुम्भोदर मुनि फिर आये हैं। हे राम आपके ऊपर उनका बड़ा कठोर भाव है ॥ ३४ ॥ ३५ ॥ इस तरह दूतके वाक्य सुनकर सब अपने अपने कार्योंको छोड़कर उन्हें देखनेको उठे ॥ ३६ ॥ ऋत्विक् लोग, सीता तथा रामजी मुनिस भयभीत नहीं हुए। उनके देखते-देखते वे कुम्भोदर मुनि यज्ञभूमिमे आ पहुंचे ॥ ३७॥ जो बड़े नाटे थे जिनका मस्तक बड़ा था जिनका तरुईसा उभार था, जिनके श्यामल रूप था। जो खटाई पहने हुए तथा स्थूल उदरवाले थे पीले-पीले जिनके नेत्र थे। वे कौपीन पहिने तथा जटा धारण किये थे ॥ ३८ ॥ चीर पहिने हुए व छोटे-छोटे हाथोंवाले थे। मुचा होनेसे जिनके मूंछ आ रही थी और जो दण्ड-कमण्डलु धारण किये हुए थे ॥ ३९ ॥ उनका देखकर सम्पूर्ण जनसमुदाय और पहिले के कृत्योंको सुन सुन और स्मरण कर-करके मन ही मन भयभीत हुआ ॥ ४० ॥ उसी समय राम

सर्गः ४ ] बालकाण्डम् २२३


आनयामास श्रीरामो ददौ हेमासनं वरम् । कुम्भोदरो मुनिः शीघ्रं भूमौ डण्डकमण्डलू ॥४२॥
स्थापयामास वीराणि ननाम रघुनायकम् । रामः शीघ्रं कराभ्यां तं प्रत्युत्थाप्य मुनीश्वरम् । ४३ ।
गाढमालिङ्गय बाहुभ्यां ततो मुनिमभाषत । नाहं योग्यो वदनार्थं त्वया राजवघातकः ॥४४॥
इति रामवचोध्वैर्बाणैः संताडितो हृदि । कुम्भोदरस्तदोवाच यतवाटे रघूत्तमम् । ४५॥
राम राम महाबाहो न कोपः क्रियतां मयि । अपराधक्षम्यहं ते हि क्षमस्व रघुनायक । ४६॥
न मया स्वार्थमिष्टार्थं दोषारोपः कृतस्त्वयि । कृतः परोपकारार्थं तथा कीर्त्यै तवापि च ॥४७ ।
शिक्षार्थं सर्वलोकानां लल्लोभं च त्वयापि हि । यथैते मुनयः सर्वे तव मन्त्रोन्ननिर्मिते ॥४८॥
शतशो भोजनं चक्रुस्तथा भुक्तं मयाऽपि च । तदा कुतो महस्कीर्तिर्भवन्न मे रघुनन्दन ॥४९॥
इति निश्चित्य हृदये मया पूर्वं हिताय हि । लोकानां च कृतो यत्त्वन्मय्यपि दोषानुकीर्तनैः ॥५०॥
नोचेद्यात्रामप्रयुक्तः कथं राम भवेत्तव । यत्र यत्र च देशेषु तीर्थेषूपवनेषु च । ५१
आश्रमागमग्रामेषु नदीवनगिरिष्वपि । ये ये मनुजाः सर्वत्र नाना रूपेषु सत्पथाः ॥५२ ।
तव दर्शनलाभस्तु तेषां जातः सुखप्रदः । तत्राहं कारणं मन्ये चात्मानं रघुनन्दन ॥५३॥
ममान्तमुपकारंस्तु जनैः सर्वत्र कीर्त्यते । कुम्भोदरप्रसादेन नः सीतारामदर्शनम् । ५४॥
जातं विषयलुब्धानामिति मे कृतकृत्यता । जाता समन्ततः कीर्तिन्त्वयि दोषानुकीर्तनात् ॥५५॥
तवापि कीर्तिः सर्वत्र जाताऽत्र रघुनन्दन । रामेश्वरश्च सर्वत्र रामतीर्थान्यनेकशः ॥५६॥
यावद्भूभ्यां प्रमीयेत तावत्कीर्तिंस्तथापि च । अन्यच्च लोकशिक्षाऽपि जाता मद्वाक्यकारणात् ।५७।
कुम्भोदरेण मुनिना राघवस्य महात्मनः । दोषारोपः कृतः पूर्वं कथं नो न भविष्यति । ५८।
स्वदोषपरिहारार्थं राघवेण महात्मना । तीर्थयात्रा कृता पूर्वमस्माकं का कथा पुनः । ५९॥
इति स्मृत्वा भयं चित्ते सर्वत्र जगतीतले । करिष्यन्ति जना यात्रां स्वदोषक्षालनाय हि । ६०॥


बड़ा सम्मानसे लाये और कुम्भोदरका गलास प्रणाम करके हाथम हाथ मिलाते हुए यज्ञमण्डपम न लाये और उन्हें सुवर्णनिर्मित आसन बैठनेक लिए दिया ॥ ४२॥ कुम्भोदरने भी शीघ्र ही भूमपर दण्ड कमण्डलु रख कर रघुनायक रामको प्रणाम किया । ४२॥ रामने शीघ्र मुनिको हाथाम उठा लिया और बाहुओंस दृढालिङ्गन करके बोले हे भगवन् ! रावणपालक मै आपकी वन्दना करन योग्य नहीं हूँ ।॥४३॥ ४४ । इस तरह रामके वाक्यवाणसे हृदयमे विद्ध कुम्भोदर रामसे कहने लगे ॥४५॥ हे राम ! हे महाबाहो ! आपको इस तरह मेरे ऊपर क्रोध नहीं करना चाहिए । मै आपका अपराधी हूँ। मुझ क्षमा करें ॥ ४६ ॥ मैने स्वार्थसिद्धिके लिए आपके उपर दोषारोपण नहीं किया था। किन्तु संसारका उपकार करनेके लिये, आपकी कीर्तिवृद्धिके लिए और संसारको शिक्षित करनेके लिए ही मैने ऐसा किया था सो आपन जान ही लिया होगा । ४७ ॥ ॥ ४८ ॥ जैसे इन मुनियोंने आपके अन्नसत्रम सैकडो बार भोजन किया है वैसे ही मैने भी भोजन किया है। आपकी और मेरी कीर्ति कैसे हो, पहलेसे ही यह निश्चय करके संसारके हितके लिए मैने आपकी निन्दा की थी ॥ ४९ ॥ ५० ॥ अन्यथा हे राम ! विभिन्न तीर्थों तथा देशोंके लिए आपकी यात्रा नहीं होती । विविध तीर्थ, नदी, बन बगीचा तथा आश्रमोंम जो मनुष्य नाना कर्मान लिप्त हो रहे है, उनका जो आपका सुखप्रद दर्शनलाभ हुआ । उसमे मैं अपनेको ही कारण मानता हूँ ॥ ५१-५३ ॥ सब मनुष्य सभी जगह मेरे इस उपकारका कीर्तन करते हैं । वे कहते हैं कि कुम्भोदरको कृपासे ही हम लोगांको सीतारामके दर्शन मिल गये ॥ ५४ ॥ आपके ऊपर दोषारोपण कर दम्प विषयो जनांका भी आपका दर्शन प्राप्त हुआ । इससे मैं कृतकृत्य हो गया और चारो तरफ आपकी कीर्ति फैल गयी ॥ ५५ ॥ जबतक भूमण्डलपर विविध रामेश्वर महादेव और रामतीर्थ रहेंगे, तबतक आपकी कीर्ति संसारमे स्थिर रहेगा ॥ ५६ ॥ और फिर मेरे दुर्व्वाक्यके कारण ही यह लोकशिक्षा भी हो गयी कि कुम्भोदर मुनिन जब रामजीको दोष लगाया तब हमलोगोको कैसे न लगेगा ॥ ५७ । ।५८॥ प्राचीन समयमें महात्मा रामचन्द्रने दोषोंको नष्ट करनेके लिए तीर्थ किया था तो फिर हमलोगोंका तो कहना

२२४आनन्दरामायणे[ सर्गः ४

मयि ब्रह्मणि पूर्णे च दोषारोपः कथं भवेत् । पद्मपत्रे जलस्पर्शो न घटेत यथा तथा ॥६१॥
यस्य भ्रूभंगमात्रेण ब्रह्मांडप्रलयो भवेत् । ब्रह्मांडांतर्गतान् जीवान् हरसि त्वं यदा मुहुः ॥६२॥
तदा दावानलोत्पन्ने किं घटेत जनार्दन । सर्पाणां च कथं मृत्युर्विदधाति तवाज्ञया ॥६३॥
तत्र संख्याऽत्र का कार्या त्वया दोषाः कृतास्त्विति । यथा चित्राणि कुड्ये हि लिखितानि सहस्रशः ॥६४॥
संमार्जितानि तेनैव तत्र दोषो भवेत्कथम् । तथा त्वमपि श्रीराम त्रिधा भूत्वा त्रिभिर्गुणैः ॥६५॥
सृष्टिं करोषि रजसा सत्त्वरूपेण पालनम् । तमोरूपेण संहारं विधिर्विष्णुशिवात्मकः ॥६६॥
अस्माभिस्तव तोषार्थं तीर्थयात्रा विधीयते । तव तीर्थैस्तु किं राम तीर्थीभूतगुणस्य च ॥६७॥
सर्वतीर्थेषु मुख्या या कीर्त्यते स्वर्गधुनी भुवि । तव दक्षिणपादस्यांगुष्ठाग्रजनिता तु सा ॥६८॥
सर्वाघिरजसः स्पर्शात्पवित्रा कीर्तिता भुवि । तव पादरजोमिश्रा दृश्यतेऽद्यापि सा सिता ॥६९॥
रजांस्यद्यापि दृश्यन्ते तव भागीरथीजले । इति नानाविधैर्वाक्यैस्तोपयामास राघवम् ॥७०॥
अष्टोत्तरशतं नाम्नां श्रीरामस्यान्ववेक्ष्य च । स्तुत्वा रामं राघवेण पूजितः स्थितवान्मुनिः ॥७१॥
रामोऽपि गुरुसान्निध्ये तस्थौ सीतासमन्वितः । निजासनेषु सर्वत्र तस्थुस्ते सकला जनाः ॥७२॥
इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गत श्रीमदानन्दरामायणे यानकाण्डे कुम्भोदरदर्शनं नाम चतुर्थः सर्गः ॥ ४ ॥


पञ्चमः सर्गः

( रामाष्टोत्तरशतनामस्तोत्र )
विष्णुदास उवाच

गुरो ते प्रष्टुमिच्छामि तत्त्वं वद सविस्तरम् । कुम्भोदरेण मुनिना यत्स्तोत्रं समुदीरितम् ॥ १ ॥
अष्टोत्तरशतं नाम्नां राघवस्य शुभप्रदम् । श्रवणे तस्य मे प्रीतिर्जाताऽस्ति कथयस्व तत् ॥ २ ॥


हो गया है ॥ ५९ ॥ इस तरह पृथ्वीतलपर मनुष्यमात्र अपने चित्तम भयका अनुभव करके स्वदाहपरिहारार्थ तीर्थयात्रा करेंगे ॥ ६० ॥ जैसे कमलके पत्तेपर जलका स्पर्श नहीं हो सकता, वैसे ही आप पूर्ण ब्रह्ममें दोषारोप नहीं हो सकता ॥ ६१ ॥ जिसके भ्रूभङ्गमात्रसे ब्रह्माण्डका प्रलय हो जाता है वहा आप ब्रह्माण्डान्तर्गत सब जीवों- को आनन्द विलीन करते हैं ॥ ६२ ॥ तब हे जनार्दन आपपर दावानल कैसे हो सकता है ? अब आप ही की आज्ञासे मृत्यु सबका क्षय करती है ॥ ६३ ॥ तब आपने कितने दोष किये हैं ? इसकी गणना कौन कर सकता है। ६४ ॥ जैसे किसीने भित्तिपर चित्र लिखा और फिर उमान अपने हाथसे मिटा दिया। तब उसमें क्या दोष हो सकता है। उसी तरह आप भी तीनों गुणोंसे तीन तरहके अर्थात् ब्रह्मा-विष्णु-शिवरूपमें परिणत होकर रजोगुणसे सृष्टि, सत्त्वसे पालन और तमोगुणसे संहार करते हैं ॥ ६५ ॥ ६६ ॥ हम लोग आपकी प्रसन्नताके लिए ही तीर्थयात्रा करते हैं। स्वतः तीर्थस्वरूप आपका तीर्थोसे क्या प्रयोजन है ॥ ६७ ॥ जिस गङ्गाकी लोग सब तीर्थोंमें श्रेष्ठ मानते हैं, वह गङ्गा आपके दक्षिण पैरके अंगूठेस उत्पन्न हुई है ॥ ६८ ॥ वह आपके चरण रजस्पर्शसे ही पवित्र माना गया है इसी हाथन यह आज तक श्वेत दिखाई पड़ती है ॥ ६९ ॥ आज भी गङ्गाजीमे आपकी चरण-रज देख रहीं है। इस प्रकारके वाक्योंसे कुम्भोदरमुनि भगवान् रामको प्रसन्न किया ॥ ७० ॥ इसके बाद रामाष्टोत्तरशतनामसे रामकी स्तुति करके और रामके द्वारा पूजित होकर वे यथास्थान बैठ गये ॥ ७१ ॥ रामजी भी गुरुके समीप सीताके साथ जा बैठे। अन्यान्य लोग भी अपने-अपने आसनोंपर विराजमान हो गये ॥ ७२ ॥ इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गतश्रीमदानन्दरामायणे कुम्भोदरदर्शनं नाम चतुर्थः सर्गः ॥ ४ ॥

श्रीविष्णुदास बोले - हे गुरु ! मैं आपसे कुछ पूछना चाहता हूँ। जो प्रश्न मैं पूछना चाहता हूँ, उसका आप विस्तृत उत्तर दीजिए ॥ १ ॥ कुम्भोदर मुनिने रामके जो अष्टोत्तरशत नामोंका शुभप्रद स्तोत्र कहा

सर्गः ५ ] यज्ञकाण्डम् २२५

सर्गः ५ ] यज्ञकाण्डम् २२५


श्रीरामदास उवाच

शृणु शिष्य महाबुद्धे सम्यक् पृष्टं त्वया मम । अष्टोत्तरशतं नाम्नां राघवस्य वदाम्यहम् ॥ ३ ॥
सर्वेश्वरः सर्वमयः सर्वभूतोपकारकः । सर्वेषामुपकारार्थं यः साकारो निराकृतिः ॥ ४ ॥
स एवैत्य लोकेऽस्मिन् समग्रभयनाशनः । यदा यदा हि लोकानां भयमुत्पद्यते तदा ॥ ५ ॥
अवतीर्यावनीं श्रीमान् दुष्टदैत्यशिरोरत्नन् । मत्स्यकूर्मवराहादिरूपेण परमार्थदृक् ॥ ६ ॥
तत्कालेषु च सर्वेषु सर्वसद्रूपधारकम् । साधूनां मयचित्तानां भक्तानां बत्सरुत्सलः ॥ ७ ॥
उपकर्तुं निराकारः सकारेण जायते । अत्रास्य जायतेऽनन्तो विभूतो भूःभारतः । ८ ॥
तदा तदाऽवतरति भक्तानामनुकम्पया । क्षीराब्धौ देवदेवेशो लक्ष्मीनारायणो विभुः । ९ ॥
अशेषैः शङ्खचक्राभ्यां दैवतैरंशादिभिः सह । शेषोऽभूल्लक्ष्मणो लक्ष्मीर्जानकी सुखचक्रके ॥१०॥
आदी भरतशत्रुघ्नौ देवाः सर्वेऽपि वानराः । प्रापन् पुरैव सर्वेऽपि देवानां भयशांतये ॥११॥
तत्र नारायणो देवः श्रीराम इति विश्रुतः । सर्वलोकापकाराय भूमौ स्वयमवातरत् ॥१२।
ध्यानमात्रेण देवेशो महापातकनाशनम् । कीर्तनश्रवणाभ्यां च हत्याकोटिनिवारणः ॥१३।
कलौ स कीर्तनेनैव सर्वं पापं व्यपोहति । राम रामेति रामेति ये वदन्त्यतिपापिनः ॥१४।
पापकोटिसहस्रेभ्यस्तानुद्धरति नान्यथा । अष्टोत्तरशतं नाम्नां तस्य स्तोत्रं वदाम्यहम् ।१५।

ॐ अस्य श्रीरामचन्द्रनामाष्टोत्तरशतमन्त्रस्य ब्रह्मा ऋषिः । अनुष्टुप् छन्दः । जानकीवल्लभः श्रीरामचन्द्रो देवता । ॐ बीजम् । नमः शक्तिः । श्रीरामचन्द्रः कीलकम् । श्रीरामचन्द्रप्रीत्यर्थे जपे विनियोगः । ॐ नमो भगवते राजाधिराजाय परमात्मने हृदयाय नमः । ॐ नमो भगवते विद्याधिराजाय हयग्रीवाय शिरसे स्वाहा । ॐ नमो भगवते जानकीवल्लभाय नमः शिखायै वषट् ।


हैं, उसे सुननेकी मेरी प्रबल इच्छा है। वह कहिए ॥ २॥ श्रीरामदास बोले-हे महाबुद्ध शिष्य ! सुनो ! तुमने अच्छा प्रश्न पूछा है। मैं तुम्हें रामाष्टोत्तरशतनामस्तोत्र सुना रहा हूँ ॥ ३ । राम सर्वेश्वर हैं, सर्वमय हैं और सब प्राणियोंका उपकार करनेवाले हैं वे निराकार होते हुए भी संसारके कल्याणार्थ साकार मनुष्यदेह धारण करते हैं । ४ । जब जब प्रजाको भय होता है, तब-तब उस भयको नष्ट करनेके लिये वे इस लोकमें अवतार होते हैं ॥ ५ । अवतीर्ण होकर वे मत्स्य-कूर्म-वराहादि रूपसे दानववृन्दका विनाश करते हैं । भगवान् जो कुछ करते हैं, वह सब परमार्थकी दृष्टिसे ही करते हैं ॥ ६ ॥ वे भक्तवत्सल प्रभु समदर्शी हैं। साधुओं और भक्तोंके उपकारार्थ निराकार होते हुए भी अल्पकालमें ही साकार हो जाते हैं। वे मूलपावन प्रभु अनन्त एवं अज हैं और इन्हीं नामोंसे प्रसिद्ध हैं । वे समय समयपर भक्तोंपर अनुकम्पा करके अवतार्य होते हैं। वे देवदेव इन्द्रके भी शासक हैं। वे क्षीरसागरमें शयन करते हैं और सर्वत्र व्यापक हैं ॥ ७-९॥ वे ही लक्ष्मीनारायण वखिल देवोंके साथ त्रैलोक्यके भयप्रशम्यथं रामरूपसे संसारमें अवतीर्ण हुए । शेष लक्ष्मण बने । लक्ष्मी जानकी बनी और भगवान्‌के पार्षद शङ्ख-चक्र भरत-शत्रुघ्नके रूपमें उत्पन्न हुए और सब देवता वानर बने ॥ १० ॥ ११ ॥ जो श्रीराम इसी नामसे प्रसिद्ध हैं, वे साक्षात् नारायण हैं और लोकोपकारार्थ समहन्त स्वयं अवतरे हैं ॥ १२ ॥ उन भगवान् रामके ध्यानमात्रसे महापातक भी नष्ट हो जाते हैं। वे कीर्तन श्रवण करनेसे कोटि हत्याओंके पापको भी निवारण कर देते हैं ॥ १३ ॥ वे भगवान् कलियुगमें नाम कीर्तन करनेसे ही सब पापोंको नष्ट कर देते हैं। जो घोर पापी भी रामरूप उच्चारण करते हैं तो राम उनका सहस्रकोटि पापोंसे उद्धार कर देते हैं। उन भगवान्‌के अष्टोत्तरशतनाममन्त्रको कहता हूँ ॥१४। १५॥ रामचन्द्रके इस महान्तर रामनाम मन्त्रके ब्रह्मा ऋषि हैं । अनुष्टुप् छन्द है । जानकीवल्लभ श्रीरामचन्द्रना-मक देवता हैं। ॐ बीज है। नमः शक्ति है। श्रीरामचन्द्र कीलक है । श्रीरामप्रीत्यर्थ इसका विनियोग होता है । ॐ हृदयमें बैठे हुए राजाधिराज परमात्मस्वरूप भगवान्‌को बारम्बार नमस्कार है। मस्तकमें विराजमान विद्याधिराज हयग्रीव भगवान्‌को नमस्कार है। शिखामें विराजमान जानकीवल्लभ भगवान्‌को नमस्कार और

२२६ आनन्दरामायणे [सर्गः ६


ॐ नमो भगवते रघुनन्दनायामिततेजसे कवचाय हुम् । ॐ नमो भगवते क्षीराब्धिमध्यस्थाय शरायणाय नेत्रत्रयाय वौषट् । ॐ नमो भगवते सर्वप्रकाशाय रामाय अस्त्राय फट् । इति षडंगन्यासः । एवं अंगुलिन्यासः कार्यः ।

अथ ध्यानम्

मन्दारकुंतिपुण्यधामविलसद्वक्षःस्थलं कोमल शांतं शांतमहेंद्रनीलरुचिशोभं सहस्राननम् ।
वंदेऽहं रघुनंदन सुरपतिं कोदण्डदीक्षागुरुं रामं सर्वजगत्सुसेवितपदं सीतामनोवल्लभम् ॥१६॥

सहस्रशीर्षे वै तुभ्यं सहस्राक्षाय ते नमः । नमः सहस्रहस्ताय सहस्रचरणाय च ॥१७॥
नमो जीमूतवर्णाय नमस्ते विश्वतोमुख । अच्युताय नमस्तुभ्यं नमस्ते शेषशायिने ॥१८॥
नमो हिरण्यगर्भाय पंचभूतात्मने नमः । नमः मूलप्रकृतये देवानां हितकारिणे ॥१९॥
नमस्ते सर्वलोकेश सर्वदुःखनिषूदन । शंखचक्रगदापद्मजटामुकुटधारिणे ॥२०॥
नमो धर्माय तत्त्वाय ज्योतिषां ज्योतिषे नमः । ॐ नमो वासुदेवाय नमो दशरथात्मज ॥२१॥
नमो नमस्ते राजेन्द्र सर्वसम्पत्प्रदाय च । नमः कारुण्यरूपाय कैकेयीप्रियकारिणे ॥२२॥
नमो दांताय शांताय विश्वामित्रप्रियाय ते । यज्ञेश च नमस्तुभ्यं नमस्ते क्रतुपालक ॥२३॥
नमो नमः केशवाय नमो माधाय शार्ङ्गिणे । नमस्ते रामचन्द्राय नमो नारायणाय च ॥२४॥
नमस्ते रामचन्द्राय माधवाय नमो नमः । गोविन्दाय नमस्तुभ्यं नमस्ते परमात्मने ॥२५॥
नमस्ते विष्णुरूपाय रघुनाथाय ते नमः । नमस्तेऽनाथनाथाय नमस्ते मधुसूदन ॥२६॥
त्रिविक्रम नमस्तेऽस्तु सीतायाः पतये नमः । वामनाय नमस्तुभ्यं नमस्ते राघवाय च ॥२७॥
नमो नमः श्रीधराय जानकीवल्लभाय च । नमस्तेऽस्तु हृषीकेश कदर्पाय नमो नमः ॥२८॥


वषट्कार है। बाहुओमें कवचरूपेण विद्यमान अमिततेज उन रघुनन्दनको नमस्कार है, जिनके हुङ्कारमात्रसे सब शत्रु नष्ट हो जाते हैं। नेत्रोंमें वौषट् अर्थात् ज्योतिस्सम्पन्न विद्यमान तथा क्षीरसागरमें शयन करनेवाले भगवान्को नमस्कार है। अस्त्रस्वरूप फट्स्वरूप और सर्वप्रकाश स्वरूप रामको नमस्कार है। इस प्रकार भगवान्‌को छहों अङ्गोंमें न्यास अर्थात् विराजमान करे। इसी तरह अंगुलियोंमें न्यास करे। अब महर्षि एक श्लोकमें रामका ध्यान करके स्तोत्र आरम्भ होता है। जिनकी मनोहर आकृति है जो पुण्यधाम है। मालाओंसे जिनका वक्षःस्थल सुशोभित हो रहा है, जो कोमल एवं शान्त हैं। जो सुन्दर महेन्द्रनीलमणिकी कान्तिके समान सुशोभित हैं। जो धनुर्वेदकी शिक्षा में संसारके गुरु हैं, संसार जिनके चरणोंको पूजता है, उन सुरपति रूप सीताके प्राणवल्लभ रामको मैं प्रणाम करता हूँ॥१६॥ हे राम ! सहस्र मस्तकवाले आपको नमस्कार है। मेघके समान कान्तिवाले आपको नमस्कार है। हे विश्वतोमुख ! आपको नमस्कार है। अच्युतको नमस्कार है ! शेषशायीको प्रणाम है ॥१७॥१८॥ हिरण्यगर्भको प्रणाम है। पञ्चभूतात्माको प्रणाम है । मूलप्रकृतिको नमस्कार है ॥१९॥ हे सर्वलोकनाथ ! सब दुःखोंको दूर करनेवाले ! आपको प्रणाम है। हे शंख चक्र गदा पद्म तथा जटा-मुकुट धारण करनेवाले राम आपको नमस्कार है ॥२०॥ धर्मस्वरूप आपको प्रणाम है। तत्त्वस्वरूपको प्रणाम है। ज्योतियोंकी भी ज्योतिको नमस्कार है। वसुदेवके पुत्रको प्रणाम है। दशरथपुत्र रामको प्रणाम है। २१॥ हे राजेन्द्र ! सब संपत्ति देनेवाले आपको प्रणाम है। हे दयाके मूर्त्तस्वरूप तथा कैकेयीके प्रिय करनेवाले ! आपको नमस्कार है ॥२२॥ दान्त, शान्त एवं विश्वामित्रके प्रियकर्ता आपको प्रणाम है। हे यज्ञेश ! हे ऋतुपालक ! आपको प्रणाम है ॥२३॥ केशवको नमस्कार है। शार्ङ्गिको नमस्कार है। रामचन्द्रके लिए नमस्कार है। नारायणके लिए नमस्कार है । २४ । हे रामचन्द्र ! आपको प्रणाम है। हे माधव ! आपको प्रणाम है। हे गोविन्द ! हे परमात्मन् ! आपका नमस्कार है । २५ ॥ हे विष्णुरूप रघुनाथ ! मैं आपको नमस्कार करता हूँ। हे दीनोंके नाथ मधुसूदन ! आपको प्रणाम है ॥ २६ ॥ हे त्रिविक्रम ! हे सीतायते ! हे वामन ! हे रामचन्द्र ! मैं

सर्गः २ ] युद्धकाण्डम् ७२३

सर्गः २ ] युद्धकाण्डम् ७२३


नमस्ते भरताग्रज ईश्वरत्वाद्यकारिणे । नमो गजानन च नमस्ते लक्ष्मणप्रिय । २९ ।
नमो नमस्ते काकुत्स्थ नमो दाशरथाय च । विभीषणपरित्रातः संकटनाश च ॥ ३० ॥
वासुदेव नमस्तेऽस्तु नमस्ते शंकराय च । प्रद्युम्नाय नमस्तुभ्यमनिरुद्धाय ते नमः ॥ ३१ ॥
सदमङ्गलिरूपाय नमस्ते पुरुषोत्तम । यज्ञांगाय नमस्तेऽस्तु मखसाधनरूप च ॥ ३२ ॥
खरदूषणहर्त्रे श्रीनृसिंहाय ते नमः । अच्युताय नमस्तुभ्यं नमस्ते सेतुबन्धक ॥ ३३ ॥
जनार्दन नमस्तेऽस्तु नमो हनूमदाश्रय । उपेन्द्रचन्द्रबंधाय मारीचवधनाय च ॥ ३४ ॥
नमो बालिवहरण नमः सुग्रीवराज्यद । जामदग्न्यमदच्छेद्रे हरये नमः ॥ ३५ ॥
नमो नमस्ते कृष्णाय नमस्ते भरताग्रज । नमस्ते पितृभक्ताय नमः शत्रुघ्नपूर्वज ॥ ३६ ॥
अयोध्याधिपते तुभ्यं नमः शत्रुघ्नसेवित । नमो नित्याय सत्याय बुद्ध्यादिक्लेशहारिणे ॥ ३७ ॥
अद्वैतमलरूपाय ज्ञानगम्याय ते नमः । नमः पूर्णाय रम्याय माधवाय चिदात्मने ॥ ३८ ॥
अयोध्मेशाय श्रेष्ठाय चिन्मात्राय परमात्मने । नमोऽरण्योद्धारगाय नमस्ते चापभञ्जिने ॥ ३९ ॥
सीतागपाय सेव्याय स्तुत्याय परमेष्ठिने । नमस्ते बाणहस्ताय नमः कोदण्डधारिणे ॥ ४० ॥
नमः कबन्धहन्त्रे च बालिहन्त्रे नमोऽस्तु ते । नमस्तेऽस्तु दशग्रीवप्रजसंहारकारिणे १०८ ॥ ४१ ॥
अष्टोत्तरशतं नाम्नां रामचन्द्रस्य पावनम् । रहस्योक्तं मया श्रेष्ठं सर्वपातकनाशनम् ॥ ४२ ॥
भ्रमन्ति ये ह्यलोके प्राण्यरूपवशानुगाः । तस्य कीर्त्तनमात्रेण जना यास्यन्ति सद्गतिम् ॥ ४३ ॥
तावद्विजृम्भन्ते पाप ब्रह्महत्यापुरःसरम् । यावन्नामाष्टकशतं पुरुषो न विकीर्त्तयेत् ॥ ४४ ॥
तावत्कलेर्महोत्साहो निःशंकं संप्रवर्त्तते । यावच्छ्रीरामचन्द्रस्य शतनाम्नां न कीर्त्तनम् ॥ ४५ ॥
तावद्यमभटाः क्रूराः संचरिष्यन्ति निर्भयाः । यावच्छ्रीरामचन्द्रस्य शतनाम्नां न कीर्त्तनम् ॥ ४६ ॥
तावत्स्वरूपं रामस्य दुर्बोधं प्राणिनां स्फुटम् । यावन्न निष्ठा रामनाममाहात्म्यमृतमत् ॥ ४७ ॥


आपका बारम्बार प्रणाम करता हूँ ॥ २७ ॥ हे माधव ! हे जानकवल्लभ ! हृषीकेश ! कन्दर्प ! मैं आपको बारम्बार प्रणाम करता हूँ ॥ २८ ॥ हे रघुनाथ ! हे कीर्त्तय-हूर्त्तकारिन् ! कमलनयन ! लक्ष्मणप्रिय ! मैं आपको पुनः पुनः प्रणाम करता हूँ ॥ २९ ॥ हे काकुत्स्थ ! दशरथनन्दन ! संकटनाशन ! विभीषणसंरक्षक ! आपका मैं पुनः पुनः प्रणाम करता हूँ ॥ ३० ॥ हे वासुदेव ! शंकरप्रिय प्रद्युम्न ! अनिरुद्ध ! मैं आपका पुनः पुनः प्रणाम करता हूँ ॥ ३१ ॥ हे सदसद्मूर्त्तिस्वरूप ! पुरुषोत्तम ! यज्ञांगस्वरूप ! मखसाधनरूप ! आपको कोटिशः प्रणाम है ॥ ३२ ॥ हे खरदूषणहन्ता ! श्रीनृसिंह ! अच्युत ! सेतुबन्धनकारिन् राम ! आपका कोटिशः प्रणाम है ॥ ३३ ॥ हे जनार्दन ! हनुमदाश्रय ! उपेन्द्रचन्द्रबंधी ! मारीचवधभंजनकारिन् ! आपको कोटिशः प्रणाम है ॥ ३४ ॥ हे बालिवधहरण ! सुग्रीवराज्यद ! जामदग्नि ! महादुःखहर हरे ! आपको कोटिशः प्रणाम है ॥ ३५ ॥ हे कृष्ण ! भरताग्रज ! पितृभक्त ! शत्रुघ्नपूर्वज ! मैं आपका सहस्रों बार प्रणाम करता हूँ ॥ ३६ ॥ हे अयोध्याधिपते ! शत्रुघ्नसेवित ! नित्यसत्य ! बुद्ध्यादिक्लेशनाशक ! आपको प्रणाम है ॥ ३७ ॥ हे अद्वैत मङ्गलस्वरूप ! ज्ञानगम्य ! माधव ! पूर्ण ! रम्य ! चिदात्मन् ! मैं आपको प्रणाम करता हूँ ॥ ३८ ॥ हे अयोध्याेश श्रेष्ठ ! चिन्मात्र ! परमात्मन् ! बहुदण्डाधारक ! सुचापभञ्जन् आपका प्रणाम है ॥ ३९ ॥ हे सीतासेव्य ! स्तुत्य ! परमेष्ठिन् ! बाणहस्त ! धनुर्धारिन् ! आपको अनेकशः प्रणाम है ॥ ४० ॥ हे कबन्धहन्त ! पालिहन्त ! दशग्रीवप्रायसंहार-कारिन् ! मैं आपको पुनः पुनः नमस्कार करता हूँ ॥ ४१ ॥ सम्पूर्ण पापोंको नष्ट करनेवाला श्रेष्ठ एवं पावन रामचन्द्रका यह अष्टोत्तरशतनामरत्न मैंने तुमसे कहा ॥ ४२ ॥ हे द्विज ! जो प्राणी अपने दुर्भागयवश इस लोकमें भ्रमण करते हैं। इस स्तोत्रके पठनमात्रसे वे सद्गतिको प्राप्त होंगे ॥ ४३ ॥ ब्रह्महत्यादि पाप तभीतक उपद्रव करते हैं, जब तक पुरुष इस स्तोत्रका पाठ नहीं करता ॥ ४४ ॥ प्रणाश तभी तक कलिकृत प्रबल रहता है जब तक यह रामचन्द्रके इस स्तोत्रका स्मरण पठन नहीं करता ॥ ४५ ॥ तभी तक भयंकर यमराजके दूतगण निर्भय विचरण करते हैं, जबतक प्राणी इस स्तोत्रका पाठ नहीं करता ॥ ४६ ॥ तब तक रामका स्वरूपशक्तियानको

२२८ आनन्दरामायणे [ सर्गः ६


कीर्त्तितं पठितं चित्ते धृतं संस्मारितं मुदा । अन्यतः शृण्वदन्मर्त्यैः सोऽपि मुच्येत पातकात् ॥ ४८ ॥ ब्रह्महत्यादिपापानां निष्कृतिं यदि वाञ्छति । रामस्तोत्रं मासमेकं पठित्वा मुच्यते नरः ॥ ४९ ॥ दुष्प्रतिग्रहदुर्भोक्तृदुरालापादिजम्भवम् । पापं सकृत्कीर्तनेन रामस्तोत्रं विनाशयेत् ॥ ५० ॥ श्रुतिस्मृतिपुराणेतिहासोपामशतानि च । अर्हन्ति नाल्पां श्रीरामनामकीर्तिकलामपि ॥ ५१ ॥ अष्टोत्तरशतं नाम्नां सीतारामस्य पावनम् । अस्य संकीर्तनादेव सर्वान् कामाँल्लभेनरः ॥ ५२ ॥ पुत्रार्थी लभते पुत्रान् धनार्थी धनमाप्नुयात् । स्त्रियं प्राप्नोति पत्न्यर्थी स्तोत्रपाठश्रवादिनः ॥ ५३ ॥ कुम्भोदरेण मुनिना येन स्तोत्रेण राघवः । स्तुतः पूर्वं यज्ञवाटे तदेतत्ते मयोदितम् ॥ ५४ ॥

इति श्रीमत्कोटिरमचचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये यागकाण्डे श्रीरामनामाष्टोत्तरशतनामस्तोत्रं नाम पञ्चमः सर्गः ॥ ५ ॥


षष्ठः सर्गः

( रामकी दिनचर्या )

श्रीरामदास उवाच

अथ कुम्भोदरे दिव्ये चासनोपरि संस्थिते । यज्ञस्तम्भे श्यामकर्णं बबन्धुस्ते हि ऋत्विजः ॥ १ ॥ तस्याङ्गानि समस्तानि पृथङ् मन्त्रैर्यथाविधि । मन्त्रयित्वापि शमित्रा तं निजघ्नुर्द्विजपुङ्गवाः ॥ २ ॥ तन्मांसखण्डैराज्याक्तैर्होमं चक्रुः सविस्तरम् । तथा नानाविधैर्द्रव्यैः सक्तुपायसगोधूमैः ॥ ३ ॥ मध्वाक्ततिलदूर्वाद्यैः समिधाभिश्च सादरम् । गोघृतेन वसोर्धारां वह्नौ स्थूलामखण्डिताम् ॥ ४ ॥ गोशृङ्गेनोर्ध्वबद्धेन ददुर्मन्त्रैः सविस्तरम् । चिरकालं होमकुण्डे यावद्यज्ञसमापनम् ॥ ५ ॥ तदा धूमचयैर्व्याप्तमाकाशं च समन्ततः । नाद्यापि दृश्यते शुभ्रं नीलाभं प्रहृश्यते ॥ ६ ॥ चैत्रमासे महापुण्ये वसन्ततौ सुखावहे । एवं प्रवर्त्तयामासुर्वाजिमेधं मुनीश्वराः ॥ ७ ॥


दुर्बोध रहता है, जबतक इस उत्तम स्तोत्रमें निष्ठा नहीं होती ॥ ४७ ॥ जो इसको पढ़ता और कीर्तन करता है, जो डम चित्तमें धारण करता है, प्रेमसे स्मरण करता है और औरोंसे सुनता है, वह भी पातकोंसे छूट जाता है ॥ ४८ ॥ जो ब्रह्महत्यादि पापोंकी निष्कृति चाहता हो, वह पुरुष एक महीने इसका पाठ करे ॥ ४९ ॥ इसके एक बार कीर्तन करनेसे मनुष्य दुष्प्रतिग्रह, दुर्भोज्य तथा दुरालापादिजन्य पापोंसे छूट जाता है ॥ ५० ॥ श्रुति-स्मृति-पुराण-इतिहास-आगम (वेद) और स्मृति इसकी सोलहवीं कलाको भी नहीं पहुंचते ॥ ५१ ॥ श्रीसीतारामके इस पावन अष्टोत्तरशतनामका जो मनुष्य पाठ करता है, वह सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। इसका पाठ एवं श्रवण करनेसे पुत्रार्थीको पुत्र, धनार्थीको धन और स्त्री चाहनेवालेको स्त्री मिलती है ॥ ५२ ॥ ५३ ॥ बागस्त्य मुनिने जिस स्तोत्रके द्वारा अश्वमेध यज्ञमें रामचन्द्रकी स्तुति की थी, वही स्तोत्र मैंने तुमसे कहा है ॥ ५४ ॥

इति श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये यागकाण्डे श्रीरामनामाष्टोत्तरशतनामस्तोत्रं नाम पञ्चमः सर्गः ॥ ५ ॥

श्रीरामदास बोले—इसके अनन्तर कुम्भोदर मुनि दिव्य आसनपर बैठ गये । उधर ऋत्विक् लोगोंने यज्ञस्तम्भमें श्यामकर्ण अश्वको बांध दिया ॥ १ ॥ हे द्विजश्रेष्ठ ! उसके अंगोंको शास्त्रानुसार मन्त्रोंसे अभिमन्त्रित करके ब्राह्मणोंने उसका वध किया ॥ २ ॥ तब घृतमें सने हुए घोड़ेके मांसखण्डों एवं सक्तु पायस गोधूम आदि नाना द्रव्योंसे ऋत्विक् लोग हवन करने लगे ॥ ३ ॥ हे हूं! मधुमें सने हुए तिल, दूर्वा, समिधा तथा गोघृतकी अखंड एवं स्थूल वसोर्धाराको अग्निमे छोड़ने लगे ॥ ४ ॥ चिरकाल पर्यन्त जब तक यज्ञ समाप्त नहीं हुआ, तबतक वे ऊपर बँधे हुए गोशृङ्गके द्वारा होमकुण्डमें समन्त्र आहुति देने रहे ॥ ५ ॥ इसके सम्पूर्ण आकाश-मंडल धूमसमूहसे व्याप्त हो गया । उसीके कारण आज भी आकाश श्वेत नहीं, नीला ही दीखता है । सुखावह वसन्त ऋतु एवं पुनीत चैत्रमासमें इस तरह वे मुनीश्वर लोग वह अश्वमेध यज्ञ कर रहे थे ॥ ६ ॥ ७ ॥

सर्गः ६ ] यागकाण्डम् २२९

सर्गः ६ ] यागकाण्डम् २२९

ईजुस्ते यज्ञविधिना हविर्होत्रादिलालपैः । शङ्खतूर्यस्वनैर्नादैर्ब्रह्मघोषैर्महेश्वरम् ॥ ८ ॥ प्रत्यहं प्रातरुत्थाय रामचन्द्रः सर्मयया । नत्वा शम्भुं च देवेशानमुनींश्चापि पृथक्पृथक् ॥ ९ ॥ कौसल्याद्याश्च मातॄश्च कामधेनुं हृदि स्थितम् । चिन्तामणिं कोशाध्यक्षं कल्पवृक्षं द्विजोत्तमम् ॥ १० ॥ पृष्ठतः यज्ञवाटस्य देवतां यज्ञपूरुषम् । ततो गङ्गागमनार्थे समाज्ञाप्य यथाविधि ॥ ११ ॥ कृत्वा नित्यविधिं सर्वं पूजयामास शङ्करम् । उपहारान् समर्प्याथ कामधेनुसमुद्गतान् ॥ १२ ॥ समानितान् रत्नपात्रैः सीताया शृण्वदन्तः । ततः संप्रूजयामास धेनुं विधिपूर्वकं स विस्तरम् ॥ १३ ॥ ऋत्विजश्च तु मण्डपस्थांश्चैव सुहृद्विदां । प्रदाने ऋत्विजः सर्व यदाज्ञा मुमुचून् ॥ १४ ॥ स्नात्वा नित्यविधिं कृत्वा सम्पूज्यस्य महेश्वरैः । गमाज्ञयाऽथ सौमित्रिनृपादीनां प्रपूजनम् ॥ १५ ॥ दिव्यैर्नानोपहारार्थैः कामधेनुसमुद्भवैः । ततश्चकार सौमित्रिनृपादीनां प्रपूजनम् ॥ १६ ॥ तथा सीताऽथ साऽप्याज्ञाप्योर्मिला लक्ष्मणप्रिया ॥ १७ ॥ मांडवी श्रुतकीर्तिश्च सर्वस्त्रीकः प्रपूजयत् । अथ ते ऋत्विजश्वक्रुः स्वाहाकारैर्यथाविधि ॥ १८ ॥ होमं नानाविधैर्द्रव्यैः सुगन्धैर्यज्ञमण्डपे । पुरोडाशान् वरान् दिव्यान्भक्षयन्तोऽप्यमानवाः ॥ १९ ॥ वाजिमेधे राघवस्य साक्षाद्देवाः स्वयं मुदा । हवींषि भक्षयामासुःप्रत्यक्षाणि पावके ॥ २० ॥ अस्तु वौषडिति प्रोचुराद्ययातः स मेघवत् । श्रूयते यज्ञशालासु मन्त्रान्वितवशाननः ॥ २१ ॥ मध्ये कुण्डं महारम्यं व्याप्तमृत्विजनैः शुभम् । ततो मुनीश्वराः सर्वे ततो देवाः समन्ततः ॥ २२ ॥ ततः सर्वाः स्त्रियः श्रेष्ठास्ततो विद्याधराः स्थिताः । ततो यक्षाश्च गन्धर्वाः किन्नराः प्लवगास्तथाः ॥ २३ ॥ ततस्ते क्षत्रियाः सर्वे तत्तत्तेषां तु सेवकाः । ततः स्थिता वश्याश्चैवान्येनो माघवशंवदाः ॥ २४ ॥ ददृशुः संस्थिता यज्ञमण्डपे यज्ञकौतुकम् । मध्याह्नावधि हुत्वा ते ऋत्विजश्च प्रतिष्ठरन् ॥ २५ ॥

इत्याख्यान एवं क्रियाश्राव नियम वैदिक अग्निहोत्र दीक्षा प्राकृत एवं वैदिक विधियोंसे संपादन कर रहे थे ॥ ८ ॥ रामचन्द्रजी नित्य प्रातःकाल उठ तथा शौचादि क्रियाओंसे निवृत्त होकर शंभु, ब्रह्मा एवं अन्य देवताओंका, मुनियोंका, कामधेनुका, हृदयस्थ चिन्तामणिका, कल्पवृक्षके समान कान्तान् को, सुवर्ण का, पृष्ठपर विराजमान, यक्षक देवता तथा यज्ञ भगवान्‌को प्रणाम करते थे ॥ ९ ॥ १० ॥ इसके बाद यथाविधि गंगातटपर जाकर स्नान करते थे ॥ ११ ॥ इसके अनन्तर सम्पूर्ण दैनिक कृत्य करते और कामधेनुसे प्राप्त उपहारोंकी भेंट देते थे ॥ १२ ॥ सीताके द्वारा रत्नपात्रमें लाये गये सब रसोंसे कामधेनुकी पूजा करके बाद विस्तारपूर्वक ब्रह्माकी पूजा करते थे ॥ १३ ॥ तदनन्तर ऋत्विजोंकी पूजा करके याज्ञिकोंके पास बैठ जाते थे। ऋत्विक्, होता एवं सब मुनीश्वर भी नित्यकर्मोंको समाप्त करक यज्ञमण्डपमें बैठ जाते थे। रामकी आज्ञासे लक्ष्मणजी उनकी पूजा करते थे ॥ १४ ॥ १५ ॥ बादमें कामधेनुसे उत्पन्न नाना प्रकारके स्वर्गीय उपहारोंसे राजाओंकी पूजा करते थे ॥ १६ ॥ दिव्य वस्त्राभरणों तथा विविध पक्वान्नोंसे लक्ष्मणप्रिया उर्मिला एवं माण्डवी-श्रुतकीर्ति प्रभृति स्त्रियां भी सीताके आज्ञानुसार सब स्त्रियोंका पूजन करती थीं ॥ १७ ॥ इस तरह प्रत्येक मनुष्योंकी यथायोग्य पूजा हो चुकनेके बाद ऋत्विक् लोग स्वाहाकारो द्वारा विविध सुगन्धित द्रव्योंसे यज्ञमण्डपमें हवन करते थे ॥ १८ ॥ सीता और राम दृष्टियोंकी तृप्तिपर भेंट एवं दिव्य पुरोडाशों को खाती थे ॥ १९ ॥ रामचन्द्रजीके अश्वमेध यज्ञमें देवता प्रत्यक्ष प्रकट होकर बड़े आनन्दसे अग्निमें प्राक्षित हवियोंको खाते थे ॥ २० ॥ ऋत्विक् लोग 'अस्तु वौषट्' इस प्रकार बोलते थे और बाजे बजाते थे। जिनका मेघध्वनिके सदृश गम्भीर बांथ समस्त यज्ञशालामें सुनायी पड़ता था ॥ २१ ॥ मध्यमें रमणीय एवं ऋत्विकजनोंसे व्याप्त हवनकुण्ड था। उनके पास मुनीश्वर बैठे थे। चारों तरफ देवता बैठे थे ॥ २२ ॥ इसके बाद सम्पूर्ण स्त्रियाँ थीं। उनके बाद विद्याधर बैठे थे। उनके बाद यक्ष, यक्षोंके बाद गन्धर्व, गन्धर्वोंके बाद किन्नर, किन्नरोंके बाद बन्दर, उनके बाद क्षत्रिय, क्षत्रियोंके बाद सेवकवर्ग, उनके बाद वैश्यादि, उनके बाद मगध और बंदीजन बैठे थे ॥ २३ ॥ २४ ॥ इस तरह अपने-अपने स्थानपर बैठे हुए सब लोग यज्ञका कौतुक देख रहे थे ॥ २५ ॥