भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 241

सर्गः ५ ] यज्ञकाण्डम् २२५


श्रीरामदास उवाच

शृणु शिष्य महाबुद्धे सम्यक् पृष्टं त्वया मम । अष्टोत्तरशतं नाम्नां राघवस्य वदाम्यहम् ॥ ३ ॥
सर्वेश्वरः सर्वमयः सर्वभूतोपकारकः । सर्वेषामुपकारार्थं यः साकारो निराकृतिः ॥ ४ ॥
स एवैत्य लोकेऽस्मिन् समग्रभयनाशनः । यदा यदा हि लोकानां भयमुत्पद्यते तदा ॥ ५ ॥
अवतीर्यावनीं श्रीमान् दुष्टदैत्यशिरोरत्नन् । मत्स्यकूर्मवराहादिरूपेण परमार्थदृक् ॥ ६ ॥
तत्कालेषु च सर्वेषु सर्वसद्रूपधारकम् । साधूनां मयचित्तानां भक्तानां बत्सरुत्सलः ॥ ७ ॥
उपकर्तुं निराकारः सकारेण जायते । अत्रास्य जायतेऽनन्तो विभूतो भूःभारतः । ८ ॥
तदा तदाऽवतरति भक्तानामनुकम्पया । क्षीराब्धौ देवदेवेशो लक्ष्मीनारायणो विभुः । ९ ॥
अशेषैः शङ्खचक्राभ्यां दैवतैरंशादिभिः सह । शेषोऽभूल्लक्ष्मणो लक्ष्मीर्जानकी सुखचक्रके ॥१०॥
आदी भरतशत्रुघ्नौ देवाः सर्वेऽपि वानराः । प्रापन् पुरैव सर्वेऽपि देवानां भयशांतये ॥११॥
तत्र नारायणो देवः श्रीराम इति विश्रुतः । सर्वलोकापकाराय भूमौ स्वयमवातरत् ॥१२।
ध्यानमात्रेण देवेशो महापातकनाशनम् । कीर्तनश्रवणाभ्यां च हत्याकोटिनिवारणः ॥१३।
कलौ स कीर्तनेनैव सर्वं पापं व्यपोहति । राम रामेति रामेति ये वदन्त्यतिपापिनः ॥१४।
पापकोटिसहस्रेभ्यस्तानुद्धरति नान्यथा । अष्टोत्तरशतं नाम्नां तस्य स्तोत्रं वदाम्यहम् ।१५।

ॐ अस्य श्रीरामचन्द्रनामाष्टोत्तरशतमन्त्रस्य ब्रह्मा ऋषिः । अनुष्टुप् छन्दः । जानकीवल्लभः श्रीरामचन्द्रो देवता । ॐ बीजम् । नमः शक्तिः । श्रीरामचन्द्रः कीलकम् । श्रीरामचन्द्रप्रीत्यर्थे जपे विनियोगः । ॐ नमो भगवते राजाधिराजाय परमात्मने हृदयाय नमः । ॐ नमो भगवते विद्याधिराजाय हयग्रीवाय शिरसे स्वाहा । ॐ नमो भगवते जानकीवल्लभाय नमः शिखायै वषट् ।


हैं, उसे सुननेकी मेरी प्रबल इच्छा है। वह कहिए ॥ २॥ श्रीरामदास बोले-हे महाबुद्ध शिष्य ! सुनो ! तुमने अच्छा प्रश्न पूछा है। मैं तुम्हें रामाष्टोत्तरशतनामस्तोत्र सुना रहा हूँ ॥ ३ । राम सर्वेश्वर हैं, सर्वमय हैं और सब प्राणियोंका उपकार करनेवाले हैं वे निराकार होते हुए भी संसारके कल्याणार्थ साकार मनुष्यदेह धारण करते हैं । ४ । जब जब प्रजाको भय होता है, तब-तब उस भयको नष्ट करनेके लिये वे इस लोकमें अवतार होते हैं ॥ ५ । अवतीर्ण होकर वे मत्स्य-कूर्म-वराहादि रूपसे दानववृन्दका विनाश करते हैं । भगवान् जो कुछ करते हैं, वह सब परमार्थकी दृष्टिसे ही करते हैं ॥ ६ ॥ वे भक्तवत्सल प्रभु समदर्शी हैं। साधुओं और भक्तोंके उपकारार्थ निराकार होते हुए भी अल्पकालमें ही साकार हो जाते हैं। वे मूलपावन प्रभु अनन्त एवं अज हैं और इन्हीं नामोंसे प्रसिद्ध हैं । वे समय समयपर भक्तोंपर अनुकम्पा करके अवतार्य होते हैं। वे देवदेव इन्द्रके भी शासक हैं। वे क्षीरसागरमें शयन करते हैं और सर्वत्र व्यापक हैं ॥ ७-९॥ वे ही लक्ष्मीनारायण वखिल देवोंके साथ त्रैलोक्यके भयप्रशम्यथं रामरूपसे संसारमें अवतीर्ण हुए । शेष लक्ष्मण बने । लक्ष्मी जानकी बनी और भगवान्‌के पार्षद शङ्ख-चक्र भरत-शत्रुघ्नके रूपमें उत्पन्न हुए और सब देवता वानर बने ॥ १० ॥ ११ ॥ जो श्रीराम इसी नामसे प्रसिद्ध हैं, वे साक्षात् नारायण हैं और लोकोपकारार्थ समहन्त स्वयं अवतरे हैं ॥ १२ ॥ उन भगवान् रामके ध्यानमात्रसे महापातक भी नष्ट हो जाते हैं। वे कीर्तन श्रवण करनेसे कोटि हत्याओंके पापको भी निवारण कर देते हैं ॥ १३ ॥ वे भगवान् कलियुगमें नाम कीर्तन करनेसे ही सब पापोंको नष्ट कर देते हैं। जो घोर पापी भी रामरूप उच्चारण करते हैं तो राम उनका सहस्रकोटि पापोंसे उद्धार कर देते हैं। उन भगवान्‌के अष्टोत्तरशतनाममन्त्रको कहता हूँ ॥१४। १५॥ रामचन्द्रके इस महान्तर रामनाम मन्त्रके ब्रह्मा ऋषि हैं । अनुष्टुप् छन्द है । जानकीवल्लभ श्रीरामचन्द्रना-मक देवता हैं। ॐ बीज है। नमः शक्ति है। श्रीरामचन्द्र कीलक है । श्रीरामप्रीत्यर्थ इसका विनियोग होता है । ॐ हृदयमें बैठे हुए राजाधिराज परमात्मस्वरूप भगवान्‌को बारम्बार नमस्कार है। मस्तकमें विराजमान विद्याधिराज हयग्रीव भगवान्‌को नमस्कार है। शिखामें विराजमान जानकीवल्लभ भगवान्‌को नमस्कार और