श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 240, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें| २२४ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः ४ |
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मयि ब्रह्मणि पूर्णे च दोषारोपः कथं भवेत् । पद्मपत्रे जलस्पर्शो न घटेत यथा तथा ॥६१॥
यस्य भ्रूभंगमात्रेण ब्रह्मांडप्रलयो भवेत् । ब्रह्मांडांतर्गतान् जीवान् हरसि त्वं यदा मुहुः ॥६२॥
तदा दावानलोत्पन्ने किं घटेत जनार्दन । सर्पाणां च कथं मृत्युर्विदधाति तवाज्ञया ॥६३॥
तत्र संख्याऽत्र का कार्या त्वया दोषाः कृतास्त्विति । यथा चित्राणि कुड्ये हि लिखितानि सहस्रशः ॥६४॥
संमार्जितानि तेनैव तत्र दोषो भवेत्कथम् । तथा त्वमपि श्रीराम त्रिधा भूत्वा त्रिभिर्गुणैः ॥६५॥
सृष्टिं करोषि रजसा सत्त्वरूपेण पालनम् । तमोरूपेण संहारं विधिर्विष्णुशिवात्मकः ॥६६॥
अस्माभिस्तव तोषार्थं तीर्थयात्रा विधीयते । तव तीर्थैस्तु किं राम तीर्थीभूतगुणस्य च ॥६७॥
सर्वतीर्थेषु मुख्या या कीर्त्यते स्वर्गधुनी भुवि । तव दक्षिणपादस्यांगुष्ठाग्रजनिता तु सा ॥६८॥
सर्वाघिरजसः स्पर्शात्पवित्रा कीर्तिता भुवि । तव पादरजोमिश्रा दृश्यतेऽद्यापि सा सिता ॥६९॥
रजांस्यद्यापि दृश्यन्ते तव भागीरथीजले । इति नानाविधैर्वाक्यैस्तोपयामास राघवम् ॥७०॥
अष्टोत्तरशतं नाम्नां श्रीरामस्यान्ववेक्ष्य च । स्तुत्वा रामं राघवेण पूजितः स्थितवान्मुनिः ॥७१॥
रामोऽपि गुरुसान्निध्ये तस्थौ सीतासमन्वितः । निजासनेषु सर्वत्र तस्थुस्ते सकला जनाः ॥७२॥
इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गत श्रीमदानन्दरामायणे यानकाण्डे कुम्भोदरदर्शनं नाम चतुर्थः सर्गः ॥ ४ ॥
पञ्चमः सर्गः
( रामाष्टोत्तरशतनामस्तोत्र )
विष्णुदास उवाच
गुरो ते प्रष्टुमिच्छामि तत्त्वं वद सविस्तरम् । कुम्भोदरेण मुनिना यत्स्तोत्रं समुदीरितम् ॥ १ ॥
अष्टोत्तरशतं नाम्नां राघवस्य शुभप्रदम् । श्रवणे तस्य मे प्रीतिर्जाताऽस्ति कथयस्व तत् ॥ २ ॥
हो गया है ॥ ५९ ॥ इस तरह पृथ्वीतलपर मनुष्यमात्र अपने चित्तम भयका अनुभव करके स्वदाहपरिहारार्थ तीर्थयात्रा करेंगे ॥ ६० ॥ जैसे कमलके पत्तेपर जलका स्पर्श नहीं हो सकता, वैसे ही आप पूर्ण ब्रह्ममें दोषारोप नहीं हो सकता ॥ ६१ ॥ जिसके भ्रूभङ्गमात्रसे ब्रह्माण्डका प्रलय हो जाता है वहा आप ब्रह्माण्डान्तर्गत सब जीवों- को आनन्द विलीन करते हैं ॥ ६२ ॥ तब हे जनार्दन आपपर दावानल कैसे हो सकता है ? अब आप ही की आज्ञासे मृत्यु सबका क्षय करती है ॥ ६३ ॥ तब आपने कितने दोष किये हैं ? इसकी गणना कौन कर सकता है। ६४ ॥ जैसे किसीने भित्तिपर चित्र लिखा और फिर उमान अपने हाथसे मिटा दिया। तब उसमें क्या दोष हो सकता है। उसी तरह आप भी तीनों गुणोंसे तीन तरहके अर्थात् ब्रह्मा-विष्णु-शिवरूपमें परिणत होकर रजोगुणसे सृष्टि, सत्त्वसे पालन और तमोगुणसे संहार करते हैं ॥ ६५ ॥ ६६ ॥ हम लोग आपकी प्रसन्नताके लिए ही तीर्थयात्रा करते हैं। स्वतः तीर्थस्वरूप आपका तीर्थोसे क्या प्रयोजन है ॥ ६७ ॥ जिस गङ्गाकी लोग सब तीर्थोंमें श्रेष्ठ मानते हैं, वह गङ्गा आपके दक्षिण पैरके अंगूठेस उत्पन्न हुई है ॥ ६८ ॥ वह आपके चरण रजस्पर्शसे ही पवित्र माना गया है इसी हाथन यह आज तक श्वेत दिखाई पड़ती है ॥ ६९ ॥ आज भी गङ्गाजीमे आपकी चरण-रज देख रहीं है। इस प्रकारके वाक्योंसे कुम्भोदरमुनि भगवान् रामको प्रसन्न किया ॥ ७० ॥ इसके बाद रामाष्टोत्तरशतनामसे रामकी स्तुति करके और रामके द्वारा पूजित होकर वे यथास्थान बैठ गये ॥ ७१ ॥ रामजी भी गुरुके समीप सीताके साथ जा बैठे। अन्यान्य लोग भी अपने-अपने आसनोंपर विराजमान हो गये ॥ ७२ ॥ इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गतश्रीमदानन्दरामायणे कुम्भोदरदर्शनं नाम चतुर्थः सर्गः ॥ ४ ॥
श्रीविष्णुदास बोले - हे गुरु ! मैं आपसे कुछ पूछना चाहता हूँ। जो प्रश्न मैं पूछना चाहता हूँ, उसका आप विस्तृत उत्तर दीजिए ॥ १ ॥ कुम्भोदर मुनिने रामके जो अष्टोत्तरशत नामोंका शुभप्रद स्तोत्र कहा