भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 239

सर्गः ४ ] बालकाण्डम् २२३


आनयामास श्रीरामो ददौ हेमासनं वरम् । कुम्भोदरो मुनिः शीघ्रं भूमौ डण्डकमण्डलू ॥४२॥
स्थापयामास वीराणि ननाम रघुनायकम् । रामः शीघ्रं कराभ्यां तं प्रत्युत्थाप्य मुनीश्वरम् । ४३ ।
गाढमालिङ्गय बाहुभ्यां ततो मुनिमभाषत । नाहं योग्यो वदनार्थं त्वया राजवघातकः ॥४४॥
इति रामवचोध्वैर्बाणैः संताडितो हृदि । कुम्भोदरस्तदोवाच यतवाटे रघूत्तमम् । ४५॥
राम राम महाबाहो न कोपः क्रियतां मयि । अपराधक्षम्यहं ते हि क्षमस्व रघुनायक । ४६॥
न मया स्वार्थमिष्टार्थं दोषारोपः कृतस्त्वयि । कृतः परोपकारार्थं तथा कीर्त्यै तवापि च ॥४७ ।
शिक्षार्थं सर्वलोकानां लल्लोभं च त्वयापि हि । यथैते मुनयः सर्वे तव मन्त्रोन्ननिर्मिते ॥४८॥
शतशो भोजनं चक्रुस्तथा भुक्तं मयाऽपि च । तदा कुतो महस्कीर्तिर्भवन्न मे रघुनन्दन ॥४९॥
इति निश्चित्य हृदये मया पूर्वं हिताय हि । लोकानां च कृतो यत्त्वन्मय्यपि दोषानुकीर्तनैः ॥५०॥
नोचेद्यात्रामप्रयुक्तः कथं राम भवेत्तव । यत्र यत्र च देशेषु तीर्थेषूपवनेषु च । ५१
आश्रमागमग्रामेषु नदीवनगिरिष्वपि । ये ये मनुजाः सर्वत्र नाना रूपेषु सत्पथाः ॥५२ ।
तव दर्शनलाभस्तु तेषां जातः सुखप्रदः । तत्राहं कारणं मन्ये चात्मानं रघुनन्दन ॥५३॥
ममान्तमुपकारंस्तु जनैः सर्वत्र कीर्त्यते । कुम्भोदरप्रसादेन नः सीतारामदर्शनम् । ५४॥
जातं विषयलुब्धानामिति मे कृतकृत्यता । जाता समन्ततः कीर्तिन्त्वयि दोषानुकीर्तनात् ॥५५॥
तवापि कीर्तिः सर्वत्र जाताऽत्र रघुनन्दन । रामेश्वरश्च सर्वत्र रामतीर्थान्यनेकशः ॥५६॥
यावद्भूभ्यां प्रमीयेत तावत्कीर्तिंस्तथापि च । अन्यच्च लोकशिक्षाऽपि जाता मद्वाक्यकारणात् ।५७।
कुम्भोदरेण मुनिना राघवस्य महात्मनः । दोषारोपः कृतः पूर्वं कथं नो न भविष्यति । ५८।
स्वदोषपरिहारार्थं राघवेण महात्मना । तीर्थयात्रा कृता पूर्वमस्माकं का कथा पुनः । ५९॥
इति स्मृत्वा भयं चित्ते सर्वत्र जगतीतले । करिष्यन्ति जना यात्रां स्वदोषक्षालनाय हि । ६०॥


बड़ा सम्मानसे लाये और कुम्भोदरका गलास प्रणाम करके हाथम हाथ मिलाते हुए यज्ञमण्डपम न लाये और उन्हें सुवर्णनिर्मित आसन बैठनेक लिए दिया ॥ ४२॥ कुम्भोदरने भी शीघ्र ही भूमपर दण्ड कमण्डलु रख कर रघुनायक रामको प्रणाम किया । ४२॥ रामने शीघ्र मुनिको हाथाम उठा लिया और बाहुओंस दृढालिङ्गन करके बोले हे भगवन् ! रावणपालक मै आपकी वन्दना करन योग्य नहीं हूँ ।॥४३॥ ४४ । इस तरह रामके वाक्यवाणसे हृदयमे विद्ध कुम्भोदर रामसे कहने लगे ॥४५॥ हे राम ! हे महाबाहो ! आपको इस तरह मेरे ऊपर क्रोध नहीं करना चाहिए । मै आपका अपराधी हूँ। मुझ क्षमा करें ॥ ४६ ॥ मैने स्वार्थसिद्धिके लिए आपके उपर दोषारोपण नहीं किया था। किन्तु संसारका उपकार करनेके लिये, आपकी कीर्तिवृद्धिके लिए और संसारको शिक्षित करनेके लिए ही मैने ऐसा किया था सो आपन जान ही लिया होगा । ४७ ॥ ॥ ४८ ॥ जैसे इन मुनियोंने आपके अन्नसत्रम सैकडो बार भोजन किया है वैसे ही मैने भी भोजन किया है। आपकी और मेरी कीर्ति कैसे हो, पहलेसे ही यह निश्चय करके संसारके हितके लिए मैने आपकी निन्दा की थी ॥ ४९ ॥ ५० ॥ अन्यथा हे राम ! विभिन्न तीर्थों तथा देशोंके लिए आपकी यात्रा नहीं होती । विविध तीर्थ, नदी, बन बगीचा तथा आश्रमोंम जो मनुष्य नाना कर्मान लिप्त हो रहे है, उनका जो आपका सुखप्रद दर्शनलाभ हुआ । उसमे मैं अपनेको ही कारण मानता हूँ ॥ ५१-५३ ॥ सब मनुष्य सभी जगह मेरे इस उपकारका कीर्तन करते हैं । वे कहते हैं कि कुम्भोदरको कृपासे ही हम लोगांको सीतारामके दर्शन मिल गये ॥ ५४ ॥ आपके ऊपर दोषारोपण कर दम्प विषयो जनांका भी आपका दर्शन प्राप्त हुआ । इससे मैं कृतकृत्य हो गया और चारो तरफ आपकी कीर्ति फैल गयी ॥ ५५ ॥ जबतक भूमण्डलपर विविध रामेश्वर महादेव और रामतीर्थ रहेंगे, तबतक आपकी कीर्ति संसारमे स्थिर रहेगा ॥ ५६ ॥ और फिर मेरे दुर्व्वाक्यके कारण ही यह लोकशिक्षा भी हो गयी कि कुम्भोदर मुनिन जब रामजीको दोष लगाया तब हमलोगोको कैसे न लगेगा ॥ ५७ । ।५८॥ प्राचीन समयमें महात्मा रामचन्द्रने दोषोंको नष्ट करनेके लिए तीर्थ किया था तो फिर हमलोगोंका तो कहना