भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 238
२९२आनन्दरामायणे[ सर्गः ४

ऋक्षाणि तिथयो योगा करणानि च राशयः । पर्वताम्भरसः सर्वे सागराश्च नदा अपि ॥२४॥ सरोवराणि नद्यश्च वाप्यः कूपह्रदास्तरे । धृत्वा जगद्रूपाणि ययुस्ते यज्ञमण्डपम् ॥२५॥ समागतश्च संपातिर्गुहो मकरध्वजः । प्रहायौ च लङ्काया राक्षसेश विभीषणः ॥२६॥ आतिना राघवेणापि सर्वं तस्थुः प्रपूजिताः । स्वनिर्दिके स्थापिताः पूर्व सर्वेश्वाभूर प्लवंगमाः ॥२७॥ एतस्मिन्नन्तरे तत्र समायातो मुनीश्वरः । कुम्भोदरो महातेजाः सीमाचार्यावलोकितः ॥२८॥ तं दृष्ट्वा भयभीतास्ते सर्वे प्रोचुः परस्परम् । हा कष्टं पुनरायातः सोऽय कुम्भोदरो मुनिः ॥२९॥ यात्राम्रमो राघवस्य यन्निमित्तो बभूव ह । यद्वाक्यादश्वमेधोऽपि सर्वेषां संबभूव ह ॥३०॥ महान् भ्रमांशपपुष्टे तु श्रमणो जगतीतले । अधुनाऽपि समायातः किमग्रे वै पुनर्भवेत् ॥३१॥ कुप्येत न तदृष्टो राघवस्यापि निंदकः । एवं नानाविधा वाचः सीमाचारगणोरिताः ॥३२॥ शृण्वन् कुम्भोदरस्तूष्णीं ययौ यज्ञभुवं प्रति । सदागमनपूर्वे स सीमाचारैर्निवेदितः ॥३३॥ धावद्भिर्वेपमानैश्च स्थलाद्गामिश्चरान्वितैः । राम राम महाबाहो हे लक्ष्मण शृणु प्रभो ॥३४॥ यात्रायज्ञश्च यद्वाक्यात् समायातः स वै पुनः । कुम्भोदरो मुनिश्रेष्ठो राम त्वय्यपि निष्ठुरः ॥३५॥ तद्द्तवचनं श्रुत्वा सर्वे तद्दर्शनात्सुकाः । त्यक्त्वा स्वीयानिकर्माणि चोत्सुरुस्तद्दिक्षया॥३६॥ ऋत्विजो राघवः सीता न भयं सेजिरे मुनेः । कुम्भोदरो यज्ञवाटं ययौ सर्वविलोकितः ॥३७॥ अतिखर्वः स्थूलशिराः श्याम्यरूपः महोदकः । स्थूलोदरः पिंगनेत्रः सर्पपाना जटाधरः ॥३८॥ चीरवासाः खर्वपादः खर्वहस्तो महामुनिः । पुरा किंचित् श्मश्रुयुक्तो धृतदण्डकमण्डलुः ॥३९॥ तं दृष्ट्वा सकला लोका भयं प्रापुः स्वचेतसि । पूर्वकर्म च संस्मृत्य श्रुत्य च परस्परम् ॥४०॥ एतस्मिन्नन्तरे रामः शीघ्रं प्रत्युद्जगाम तम् । मार्तण्डं प्रणम्येवाथ करं धृत्वा तु मंडपम् ॥४१॥

सिद्ध चारण एवं अप्सराओंका गण आया ॥ २२ ॥ सम्पूर्ण दिक्पाल, दिक्पाल तथा मन्दलनिवासी भी आये । नवो ग्रह, छट्टा ऋतुवें, साठो सम्वत्सर एवं तिथि नक्षत्र योग करण राश पर्वत वृक्ष समुद्र नद नदी कूप तालाब तथा अन्य सूक्ष्म प्राणी सभा अपने जङ्गम रूप धारण करके मण्डप में पधारे ॥२३-२५॥ गृध्रराज संपाति, निषादराज एवं मकरध्वज आये तदनन्तर सभा राक्षसोंके साथ लंकाके विभीषण जी आये ॥ २६ ॥ भगवान् रामने सबकी पूजा का और अपने समीप बैठाया वानर पहिलसे ही वहां टिके थे ॥ २७ ॥ इसी समय महातेजा कुम्भोदर मुनि आये। यज्ञ भूमिकी सीमा पर निवास करनेवालोंने उन्हें आते हुए देखा ॥ २८ । वे देखकर बड़े भयभीत हुए और बोले अहो ! बड़े कष्टकी बात है। यह तो फिर वह कुम्भोदर मुनि आ गये ॥ २९ ॥ जिनके कारण भगवान् रामको यात्राका कष्ट हुआ था, जिनके कारण हम सबका अश्वमेध हो गया ॥ ३० ॥ छःङ्ग के पीछे यज्ञ समाप्त हुआ से उधर उधरसे इधर घूमते हुए अत्यन्त कष्ट भये । अब यह फिर आये हैं। अब आगे क्या होगा, सा हमलोग नही जानते। यह रामचन्द्रका बड़ा निन्दक है ॥ ३१ ॥ इस प्रकार सीमाचारी लोगों की वाणियोको सुनते हुए कुम्भोदर चुपचाप यज्ञभूमिमे आये ॥ ३२ ॥ उनके आनके पूर्व ही बड़े वेगसे भागत-कांपते हुए दूतोंने आकर रामसे निवेदन किया-॥ ३३ ॥ हे राम ! हे महाबाहो लक्ष्मण हे प्रभो ! आप लोग सुने, जिसके वाक्यसे बारात गया और यज्ञ हुआ है वही कुम्भोदर मुनि फिर आये हैं। हे राम आपके ऊपर उनका बड़ा कठोर भाव है ॥ ३४ ॥ ३५ ॥ इस तरह दूतके वाक्य सुनकर सब अपने अपने कार्योंको छोड़कर उन्हें देखनेको उठे ॥ ३६ ॥ ऋत्विक् लोग, सीता तथा रामजी मुनिस भयभीत नहीं हुए। उनके देखते-देखते वे कुम्भोदर मुनि यज्ञभूमिमे आ पहुंचे ॥ ३७॥ जो बड़े नाटे थे जिनका मस्तक बड़ा था जिनका तरुईसा उभार था, जिनके श्यामल रूप था। जो खटाई पहने हुए तथा स्थूल उदरवाले थे पीले-पीले जिनके नेत्र थे। वे कौपीन पहिने तथा जटा धारण किये थे ॥ ३८ ॥ चीर पहिने हुए व छोटे-छोटे हाथोंवाले थे। मुचा होनेसे जिनके मूंछ आ रही थी और जो दण्ड-कमण्डलु धारण किये हुए थे ॥ ३९ ॥ उनका देखकर सम्पूर्ण जनसमुदाय और पहिले के कृत्योंको सुन सुन और स्मरण कर-करके मन ही मन भयभीत हुआ ॥ ४० ॥ उसी समय राम