श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 237, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः ४ ] यात्राकाण्डम् २२१
संपूज्य शंकरं भक्त्या चानयामास मण्डपम् । एवं सह पदान्यग्रे गत्वा समोद्य शंकरम् ॥ ६ ॥
नमस्कृत्य समानीय निवेश्य गिरिजाधवम् । हेमपात्रे भवेद्भक्त्य हेमपात्रे स्वहस्ततः ॥ ७॥
पादप्रक्षालनं शम्भोश्चकार मैथिली प्रभुः । स्वनाभिप्रजया गङ्गा गङ्गादिनिलया ॥ ८॥
जलधारां यथायोग्यां प्रोक्षयामास जननः। रामेने गता सीता दृष्ट्वा दद्युगणस्तदा ॥ ९॥
अनिमेषाः कंजनेत्रकटाक्षाः मन्दिगतय हि। तन्मयेऽनेधमः सम्मन्न न विदुः के वयं स्थित ॥ १०॥
तुष्टुवुस्तत्र कपिने सुराः श्रीरामयं मुदा। गन्धर्वा तुष्टुवुः केचित् प्रबद्धकरसम्पुटाः ॥११॥
एवं निर्जङ्गमानां मनोपस्त्वं ई शभूत्। अतोवस्य नयेद्दृष्ट्वा रूपं कोटिरविप्रभम् १२॥
अथ रामः सीतया हि शंकरं गिरिजापतिम् । स्वयं मपूज्य सकलान् देवान् सौमित्रिणा ऋषीन् ॥१३॥
पूजयित्वाद्वयंवोढाख्यं शङ्करं लोकशङ्करम् अद्य धन्योऽस्म्यहं दद दर्शनात्तत्र सीतया ॥१४॥
अद्य मे सूर्यवंशेऽस्मिन् जन्म सफलयतः शतम् इति रामस्य वचनं श्रुत्वा स शशिभूषणः ॥१५॥
विहस्य राघवं प्राह वेद्मि मायां हरे तव त्वन्तः सिक्तपले ब्रह्मा ज्ञानस्तस्मात्पुनाभवः ॥१६॥
मरीच्याद्याः मरुद्भृतुः पौत्राः सप्राहतांगजः। मरीचेः कश्यपः पुत्रः सूर्यस्तनिशंशवापकः ॥१७॥
कश्यपात्सविता जज्ञे पौत्रपौत्रम्वरं प्रभा। रवेरत्रानः सूर्यवंशस्तद्वंशे तव जन्म वै ॥१८॥
मद्दंशसम्भवः सूर्यः किं मां मोहयसि प्रभो देवानां कार्यसिद्धयर्थमवतीर्णोऽसि मायया ॥१९॥
कुरु क्रीडां यथेच्छं त्वं यात्रापञ्चारिकीर्मुखैः शिक्षां करोषि लोकानां बहुभ्यहं रोहिते तव ॥२०॥
इति श्रुत्वा शंभुवाक्यं माहागर्वी विहस्य च यज्ञकुण्डसमीपे तु तस्थतुर्गुह्यसन्निधौ ॥२१॥
एतस्मिन्नन्तरे तत्र समाजग्मुः सहस्रशः गन्धर्वाः किन्नराः सिद्धास्तथा चाप्सरसां गणाः॥२२॥
लोकपालाश्च दिक्पालाः रमानलतिरोहिताः। नवग्रहाः षटृतवः पश्चिनस्थमगस्तथा ॥२३॥
वेश्याओक नाना प्रकारके नाच और अनेक तरह बाजे-गाजके साथ हाथीपर रहकर लक्ष्मणजी उनकी अगवानीके लिए गये ॥ ४॥ ५। व भक्तिपूर्वक शङ्करभगवान्का यज्ञमण्डपम ल आए। राजाज भा उनको आते देखा तो पाँव सात पग आगे बढकर शङ्करजीको प्रणाम किया शिव-पार्वतीका सत्कार करक सुवर्णमय सिंहासनपर बैठाया। सत्कार मद्य सदा रामने अपने हाथ स्वर्णखचित एक बडे मणक पात्रम दोनोंका पादप्रक्षालन किया। सवन न० के मस्तकपर गिरिजेश जलदान करते। सम्मुख देवतागण निमेष रहन नेत्रों से उन दोनोंकी अनुपम शोभा देखकर चित्तिलखित-से होगए उनका यह तक ज्ञान नही रहा कि वे कौन हैं। ६-१०। उस समय दवगण मुदित होकर श्रीरामचन्द्र और माता जानकीकी स्तुति करने लगे ॥ ११॥ इस प्रकार मन्त्रिगण भी जानकी कविके समान प्रभावाली अनुपम सौन्दर्य देखकर देवताओंका अभाव प्रसन्नता हुई ॥ १२॥ इसके बाद सीता और लक्ष्मणजी सहित रामजीने शिव-पार्वती तथा सब देवताओंकी पूजा का ॥ १३॥ सर्व सुख कल्याण कत्तव्य से शङ्करकी पूजा करके रामजी कहने लगे-हे भगवन् ! आज में धन्य हुआ॥ १४। आज भयंकर सूर्यवंश में जन्म लेने से मेरा जन्म धारण करना सफल हुआ। इस प्रकार रामजीक बचन सुनकर शशिशेखर श्री शङ्करजी ने कहा-हे राघव ! आपकी मायाको मैं जानता हूँ। आपके नाभिकमलसे ब्रह्मा उत्पन्न हुए और उस ब्रह्मासे सम्पूर्ण मुनिगण उत्पन्न हुए हैं ॥ १६॥ उन निष्पाप मरीचि प्रभृति म० मुनि उत्पन्न भये और उन मुनिगणों से सपूर्ण सृष्टि की विस्तृत किया ॥ १७॥ उन कश्यपके पुत्र सूर्य हुए। इस प्रकार आपके पौत्रक परम्परासे सूर्यवंश बना। उस सूर्यवंशम आपका जन्म हुआ यह सब आपकी माया ही है। किस प्रकार मुझे अपनी मायाजालमें फँसाते हैं? आप अपनी मायासे देवताओं के कार्यसिद्धि के लिए पूर्णरूप अवतीर्ण हुए हैं ॥ १८ ॥ १९ ॥ यात्रा-यज्ञादि कौतुकसे आप यथेच्छ क्रीड़ा करिये। में आपकी सब चष्टाओंको समझता हूँ। आप संसारको शिक्षित करनेके लिए ही ऐसा करते हैं। २०। इस प्रकार शिवजीके कथनको सुनकर सीता और रामजी हंसे। तदनन्तर वे यज्ञकुण्डके समीप स्थित गुह वसिष्ठक पास गये ॥ २१॥ इसी समय हजारों यक्ष, गन्धर्व, किन्नर,