भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 236
२२०आनन्दरामायणे[ सर्गः ४

परस्परं वियोगोऽत्र संमर्देन तु लक्ष्मण जायते तत्र युक्तिं त्वं मत्तः श्रुत्वा कुरुष्व ताम् ॥५३॥
तमसायास्तटे शालां कृत्वाऽथ महतीं शुभाम् घोषणां च सर्वत्र महादुन्दुभिनिःस्वनैः ॥५४॥
येषां वियोगस्तैर्गत्वा तमसातटशोभिनाम् । शालां प्रवेश्यध्वं द्वि स्वानां योगोऽस्तु तत्र हि ॥५५॥
चतुष्पदादिवस्तूनि ज्ञात्वा यस्य लघून्यपि । तत्रैव स्थापनीयानि स्वं स्वं गृह्णन्तु ते जनाः ५६॥
इति रामवचः श्रुत्वा तथेत्युक्त्वा स लक्ष्मणः तथा चकार तन्मर्त्यं येन योगः परस्परम् ॥५७॥
सर्वे तत्र जनाः प्रापुः स्वानां स्त्रीबालमित्रिणाम् । चतुष्पदादिवस्तूनां तत्र लाभो बभूव ह ॥५८॥
यत्किंचिद्विस्मृतं येन दृष्ट्वाऽन्येन च कदा । शालायां स्थापितं दृष्ट्वा स्वयं जग्राह तत्र सः ॥५९॥
एवं श्रीरामयज्ञे हि संमर्दः संबभूव ह । न तत्र शुश्रुवे शब्दः कर्णेऽप्युक्तो जनैस्तदा ॥६०॥
तत्तन्ते पार्थिवाः सर्वे तस्थुर्वेश्मनरास्रसु ॥६१॥
इति शतकोटिरामचरितान्तर्गतश्रीमदानंदरमायणे वाल्मीकीये यागकाण्डे अश्वगमनं नाम तृतीयः सर्ग ॥ ३ ॥


चतुर्थः सर्गः

( रामका कुम्भोदर मुनिसे साक्षात्कार )
श्रीरामदास उवाच

अथ ते ऋत्विजः सर्वे मंगलैर्विधिभिः शुभैः । सम्यक् प्रवर्त्तयामासुर्वाजिमेधं यथाविधि ॥ १ ॥
तत्रर्त्विजो वाजिमेधे रत्नक्रीडेशयाम्बराः । मसदृश्या विरेजुस्ते यथा वृत्रहणोऽध्वरे ॥ २ ॥
एतस्मिन्नन्तरे तत्र सुरैयसहितैः सुरैः । स्वामिना विघ्नराजेन पार्वत्या वृषमस्थितः । - ।
महेश्वरो यज्ञवाटं रामाहूतो ययौ गणैः । शिवमागतमाज्ञाय प्रत्युद्गम्याथ लक्ष्मणः । ४ ।
वारणेंद्र पुरस्कृत्य पताकाध्वजसंरणैः । नानाव्याद्यसुघोषश्च वारस्त्रीणां प्रनर्त्तनैः , ५ ॥


कहा—॥ ५२ ॥ यहाँ भीडके कारण परस्पर लागोंका वियोग हो जाता है। अतएव मैं एक युक्ति बतलाता हू। उसको करो । ५३ ॥ तमसा नदीके तटपर एक बड़ी आगे शाला बनवाओ और दुन्दुभी पिटवा दो कि भूले-भटकोंको खोजना हो तो तमसा नदीके तटपर जहाँ नयी शाला बनी हुई है, वहाँ जाओ । वहींपर भूले-भटकों-को लोग पाओगे ॥ ५४ । ५५ । लागोंको अशीम लकर छांटा छांटी का खोयी हुई वस्तुएँ स्वाजखाजकर वहाँ रखी हैं। वहाँ जिस-जिसकी जो-जो वस्तु हो, वह अपनी-अपनी वस्तु ले ले। इस प्रकार रामजीके वचन सुनकर लक्ष्मणने कहा—अच्छा महाराज ! ऐसा ही करूँगा । इसके बाद लक्ष्मणजीने ऐसी व्यवस्था की, जिससे सबका अपने वियुक्त बान्धवोंसे मिलाप होने लगा । ५६ । ५७ । वियुक्त बन्धु वहाँ गये और सबको अपने अपने स्त्री-पुत्र-मित्रादि और नतुष्पदादि पशु सभी खोई हुई चीजें मिल गयी। जहाँ-कहींपर जिससे जो वस्तु भूलसे छूट गई, उस वस्तुको राजानुचरोंने तथा जिसने देखी एंव जिसको मिली, उसने वहीं शालामे रखवा दी और जिसकी वह वस्तु थी, उसने वहाँ जाकर ल ली । ५८ ॥ ५९ ॥ इस प्रकार श्रीरामजीके यज्ञम एसी भीड़ हुई वि जिसके कारण कानमे कहा हुआ भी शब्द मनुष्योंको नहीं सुनाई पड़ता था । ६० ॥ सब भगवान्‌के दर्शन करके सब राजा लोग अपने-अपने स्त्री-पुत्र मित्रादिकोका लेकर अलग अलग तम्बूओं (खेमों) में रहने लगे । ६१ । इति श्रीमशतकोटिरामचरितान्तर्गतश्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीय यागकाण्डे अश्वगमनं नाम तृतीयः सर्गः ॥ ३ ॥

श्रीरामदास कहने लगे इसके अनन्तर सब ऋत्विक् मंगलमय कृत्योंके साथ-साथ शास्त्रानुसार अश्वमेध यज्ञ करवाने लगे ॥ १ ॥ उस समय यज्ञमें रत्नमय आभरणों और वस्त्रोंको पहिने हुए ऋत्विक् ऐसे सुशोभित हो रहे थे, जैसे इन्द्रके यज्ञम सुशोभित होते थे ॥ २ ॥ उसी समय वहाँ रामज क बुलावेसे बैलपर चढ़कर महादेव और पार्वतीजी आयीं । उनके संग इन्द्रादि देवता, स्वामिकार्तिकेय, गणेशजी एवं प्रमथादि सब गण भी आये ॥ ३ ॥ महादेवजीका आगमन सुनकर सम्पूर्ण नगर ध्वजा-पताका आदिसे सजाया गया ।