श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 235, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्ग ११ ] यागकाण्डम् २१९
ययौ वाजी वायुगत्या शीघ्रं ज्वालामुखों प्रति । दोषभास्यां फल्गोयां वीक्षा नैवाद्रतो गतः ॥३५॥ कर्मनाशाजलस्पर्शात् फल्गोराचमनात्। गंडक्यां बहुनागाधर्मः स्खलति कीर्तनात् ॥३६॥ हरिद्वारं ययौ बाजी ततो गङ्गातटेन हि। हिमाद्रेः सन्निधौ देशान् समतिक्रम्य वेगवान् ॥३७॥ बद्रिकाश्रममालोक्य कलापग्रामवासिभिः। संमानितस्तदा बाजी गत्वा तन्मानसं सरः ॥३८॥ दृष्ट्वा हरिसरक्षेत्रं मिथिलां प्राप सेनया। नानादेशानतिक्रम्य ह्यर्यावर्तं ययौ हयः ॥३९॥ दृष्ट्वा काशीं त्रिवेणीं च शतंर्वादीं ययौ जवात्। शृङ्गवेरपुरं गत्वा तमसां तां विलंघ्य च ॥४०॥ सरत्वा च नैमिषारण्यं समुल्लंघ्याथ गोमतीम्। ब्रह्मावर्ते सरो गत्वा पश्यन् देशान् मनोरमान् ॥४१॥ कोसलाख्यं महादेशं दृष्ट्वा बाजी मनोहरम्। ततः साकेतविषये यय्वभौ प्राप वाश्वरम् ॥४२॥ नानादेशनृपैः सार्धं शत्रुघ्नेनाभिरक्षितः। अगात श्यामकर्णं तं श्रुत्वा सीतापतिस्तदा ॥४३॥ आज्ञापयच्च सौमित्रिं सोऽपि प्रत्युज्जगाम तम्। पञ्चेन्द्रं पुरस्कृत्य मेरीदुन्दुभिनिःस्वनः ॥४४॥ ऋत्विग्भिर्वेदवेदांगपारगैर्जगैः। संपूज्याथ श्यामकर्णं नृपतींश्च सविस्तरम् ॥४५॥ मानयामास सौमित्रिः शनैरध्वरमण्डपम्। महात्मरो महान् सन्मदा तुरङ्गदर्शने ॥४६॥ दशयोजनपर्यन्तं सर्वत जनसंकुलम्। व्याप्तं सर्वं ततोऽप्योषपात्रहिंतृवर्णसंसदा ॥४७॥ हय सर्वत्र रक्षन्तः पूर्वसंदर्शिताञ्जनान्। पौरान् जानपदान्त्रांश्च बहुसंधा अमरापमाः ॥४८॥ मैन्चन् वभ्रमुः सर्वे स्वीयदर्श नकामुकाः। न प्रापुःशन तेषां उनीपेऽध्वरमण्डपे ॥४९॥ केचिचे दर्शनं स्वानां प्रपुष्यत्र परेऽहनि। केचित्तृतीये दिवसे पंचमे सप्तमेऽथ वा ॥५०॥ केचिद्दूरद्वियोगेन प्रापुः स्वानां दर्शनम्। केचित् पक्षानन्तरं हि मासेनानन्तर जनाः ॥५१॥ केषां वियोग एवापाद्दिग्भ्रमात् तदानुचर। तज्ज्ञात्वा रामचन्द्रोऽपि लक्ष्मणं प्राह सादरम् ५२।
चौहद्दर, कुरुक्षेत्र, ज्वालामुखी देश एवं मानसरोवर निमन्त्रण करता हुआ तथा उक्त तटवर्ती नानाविध मनोहर दृश्योंको देखता हुआ बड़े वेगसे ज्वालामुखक पावर्ती प्रदेशमें गया ॥ ३५-३८ ॥ वहाँसे कुरुक्षेत्रादि प्रदेशोंको पार करके अवध प्रदेश में आ गया। क्योंकि कर्मनाशा नदीका स्पर्श करनेसे, फल्गु नदीका आचमन करनेसे, गंडकी नदीकी बहुधा द्वारा तरंग और धार्मिक कर्म करके उसका आचमन करनेमें धर्मका क्षय होता है ॥ ३५ ॥ ३६ ॥ यहाँसे वह गङ्गाके तट ही तट होकर हरिद्वार गया। पश्चात् हिमालयके प्रान्तमें जाकर बद्रिकाश्रम पहुँचा। वहाँसे कलापग्रामनिवासियोँका आतिथ्य सत्कार वह पाण्डि आर्यावर्त देशमें गया ॥ ३७-३९ ॥ वहाँसे काशी और गङ्गाके तटपर घूमता हुआ वेगपूर्वक अवधदेशमें गया। फिर शृङ्गवेरपुरमें जाकर तमसाको पार करके नैमिषारण्यमें गया। वहाँसे गोमती और ब्रह्मावर्त सरोवरको जाकर मनोहर दृश्योंको देखता हुआ कोसल देशमें पहुँचा। इस प्रकार सब ब्रह्माण्डको घूमता हुआ वह अश्व फिर अयोध्याके निकटवर्ती अश्वमेधके यज्ञमण्डप में पहुँचा ॥ ४०-४२ ॥ अनेक देशके राजाओंके साथ शत्रुघ्नसे अभिरक्षित दशार्योहित हुआ श्यामकर्ण अश्वको आया हुआ सुनकर सीतापति रामचन्द्रजीने उसको लानेके लिए लक्ष्मणको आज्ञा दी। लक्ष्मणजी हाथीपर बैठकर बड़े उत्साहके साथ उसकी अगवानी करनेके लिए गये, ऋषियोंयुक्त सब मण्डलपालों और राजाओंकी पूजा करके उस अश्वसहित यज्ञमण्डपमें ले आये। उस समय घोड़ेका देखनेके लिए प्रजावर्गमें बड़ा उत्साह था ॥ ४३-४५ ॥ यज्ञारम्भके समय अयोध्याके बाहर दस योजनतक सम्पूर्ण पृथ्वामण्डलके संग्रामी, राजाओं तथा अमीर-उम-रावोंसे भरा था ॥ ४७ ॥ यजन होता ही था कि श्यामकर्ण अश्वके साथ भ्रमण करके लौट हुए राजा लोग पहिलेसे बहुमूल्य अपने-अपने शुभ आश्रयको त्यागकर तुरन्त उसको देखनेकी इच्छामें इधर उधर घूमने लगे पर उस प्रकारनिक जनसमुदायमें उन लोगोंका प्राप्त नहीं कर सके ॥ ४८ ॥ ४९ ॥ कोई परिजन सज्जन दूसरे दिन मित्र-बान्धवोंसे मिल सका। कोई तीसरे दिन कोई पांचवें रोज और कोई सातवें रोज मिला ॥ ५० ॥ किसीकोके मण्डपका द्विविध स्वतंत्रतोंका पता चला। किसीको एक पखवाड़ेके बाद और किसीको एक माहके बाद पता लगा ॥ ५१ ॥ किसीको वियोगका फल पता ही नहीं लगा। यह सुनकर भगवान रामचन्द्रजीने लक्ष्मणसे