श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 234, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें२१८ आनन्दरामायणे [ सर्गः ३
पूज्यादरात्स्वमर्त्यै तं शत्रुघ्नं विभवैर्निजैः । समस्तं निजकोशादि समर्प्य मघवाधिपः ॥१६॥ पौराञ् जानपदान्स्वस्त्रीः सुहृद्बान्धवमन्त्रिणः । पौरपत्नीर्जानपदपत्नीर्विप्रान् पुरोधसम् ॥१७॥ प्रेषयामास यानेने वाहनेश्च प्रति । स्वयं सैन्येन तुरगचरणान्नुलक्ष्य च ॥१८॥ शत्रुघ्नस्यागुवर्ती बद्धहस्तपुटो ययौ । एवं सर्वेऽपि राजानो ज्ञातव्याः सर्वदिक्स्थिताः ॥१९॥ न केनापि श्यामकर्णो बद्धो नृपतिना भुवि । इन्द्राद्यैर्निर्जरैर्नापि नासुरैः कदाचन ॥२०॥ ततो बाजी पूर्वदेशान्वङ्गवङ्गकलिङ्गकान् । तथा नानाविधान्देशान् विलंध्य जलधेस्तटम् ॥२१॥ दृष्ट्वा नृपकुलैर्युक्तो दक्षिणाभिमुखो ययौ । गोदावरीं नदीं तीर्त्वा देशांश्च च द्राविडम् ॥२२॥ अतिक्रम्यारवारारुणं देशं समतिक्रम्य च । काञ्चीप्रदेशान्सकलान्वंशन्नानाविधान्त्सुभान् ॥२३॥ कावेरीं समतिक्रम्य चोलदेशं विलङ्घ्य च सेतुबन्धं ततो दृष्ट्वा पश्चिमाभिमुखो ययौ ॥२४॥ ताम्रपर्णीं विलङ्घ्याथ समतिक्रम्य केरलान् । त्रिषट्प्रकारान् देशांश्च गोकर्णं च ततो ययौ ॥२५॥ कृष्णातौरप्रदेशांश्च समतिक्रम्य घोटकः । कर्णाटकं महादेशं समतिक्रम्य सत्तरम् ॥२६॥ कोंकणं समतिक्रम्य तत्तद्देशनृपैः सह । भीमान्देशान्म सकलाञ्छ्यामकर्णः शुभावहः ॥२७॥ पश्यन् ययौ महाराष्ट्रं गौतमीं तां विलङ्घ्य च । विदर्भ समतिक्रम्य ययावाभीरमंडलम् ॥२८॥ मालवं समतिक्रम्य तीर्त्वा पुण्यां महानदीम् । वीर्त्वा स श्रमनीं पुण्यां समतिक्रम्य गुर्ज्जरम् ॥२९॥ प्रभासं च ततो गत्वा ययावानर्त्तमुत्तमम् । सौवीरान् समतिक्रम्य ययौ बाजी स माधुरान् । सौराष्ट्रान्व्यतिक्रम्य मरुदेशं ययौ हयः ॥३०॥ धन्वदेशमतिक्रम्य ययौ सारस्वतातटम् । मत्स्यान् देशानतिक्रम्य ययौ बाजी म माठरान् ॥३१॥ शूरसेनानतिक्रम्य पांचालांस्तुङ्गरो ययौ । कुरुक्षेत्रं ततो गत्वाऽतिक्रम्य कुरुजांगलान् ॥३२॥ देशं कैकेयमुल्लंध्य ययौ काश्मीरमुत्तमम् भिल्लदेशं गौडदेशं यवनदेश ययौ हयः ॥३३॥ यवनांम्नाग्रदेशांश्च समतिक्रम्य वेगतः । पश्यन्नानाविधान् देशान् करतोयातटेन वै ॥३४॥
और बडे आदरके साथ अपनी संपत्तिसे शत्रुघ्नकी पूजा की । समस्त निज कोषादि शत्रुघ्नको अर्पण करके पुरवासियोंको, अपने कुटुम्बको, जनपदवासियोंको एवं अपन मित्र-बान्धवोंको वाहनांक साथ अश्वमेध यज्ञमें अगाड्या भेज दिया । किन्तु स्वयं सेनाके साथ जनुघ्नके दनुवर्ती होकर गणीय अश्वके चरणोंके लक्ष्य करके साथ-साथ चले । इसी तरह सब देशोंके राजा लोग शत्रुघ्नके वशवर्ती होकर अश्वके पीछे-पीछे चले ॥ १४-१९॥ पृथ्वीपर किसी भी राजाने श्यामकर्ण घोडंको नहीं बाँधा, न स्वयमें इन्द्रादि देवताओने और न पाताललोकके असुरोने उसे बाँधा । २० ॥ उसके बाद घोडा वङ्ग वङ्ग-कलिङ्गादि अनेक देशोंमें होता हुआ समुद्रतटपर पहुंचा । २१ ॥ बहसि नृपसमूहके साथ यह दक्षिण दिशामे गया । फिर गोदावरी नदीको पार करके आध्र, द्रविड, कारवार नामक देशोका अतिक्रमण करक नाना प्रकारके मनोहर प्रदेशोंमें घूमता हुआ कावेरी नदीको पार करके चोलदेशमें जा पहुंचा । वहांसे समुद्रतटपर सेतुबन्ध रामेश्वर होकर पश्चिम दिशामे गया ॥ २२-२४ ॥ बहसि वह घोड़ा ताम्रपर्णी नदीको लांघ तथा केरल देशका अतिक्रमण करके गोकर्ण तीर्थम जा पहुंचा ॥ २५ ॥ वहांसे कृष्णा नदी उतरकर वह घोड़ा कर्णाटकमें पहुंचा ॥ २६ ॥ वहाँसे कोंकण देशको पार करके सत्तरेशीय राजाओके साथ भीमा नदीको लांघता हुआ महाराष्ट्रमे जा पहुंचा ॥२७॥ वहाँपर गौतमी नदीको लांघकर विदर्भ देशमे होता हुआ आभीरमण्डलमे पहुँचा ॥ २८ ॥ वहाँस मालवा होता हुआ महानदी पुण्याका अतिक्रमण करके गूज्र्जरम पहुँचरा ॥ २९ ॥ वहाँसे प्रभास तीथम अ.कर आनत्त देशको गया । फिर सोवार आदि देशोंको पार करके घोड़ा मथुरा प्रदेशम गया । वहाँस सौराष्ट्र देशको लांघकर मरु-देश ( मारवाड ) में पहुंचा ॥ ३० ॥ उसके बाद धन्व नामक देशका अतिक्रमण करके सरस्वतीके तौरपर गया । वहाँसे मत्स्य देशमे घूमता हुआ माठर देशमें गया । ३१ ॥ उसके बाद वह श्यामकर्ण घोड़ा शूरसेन, पञ्चाल, कुरुक्षेत्र, जांगल एवं कैकय देशमें भ्रमण करता हुआ कश्मीर गया । वहाँसे भिल्लदेश,