श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२२६ आनन्दरामायणे [सर्गः ६
ॐ नमो भगवते रघुनन्दनायामिततेजसे कवचाय हुम् । ॐ नमो भगवते क्षीराब्धिमध्यस्थाय शरायणाय नेत्रत्रयाय वौषट् । ॐ नमो भगवते सर्वप्रकाशाय रामाय अस्त्राय फट् । इति षडंगन्यासः । एवं अंगुलिन्यासः कार्यः ।
अथ ध्यानम्
मन्दारकुंतिपुण्यधामविलसद्वक्षःस्थलं कोमल शांतं शांतमहेंद्रनीलरुचिशोभं सहस्राननम् ।
वंदेऽहं रघुनंदन सुरपतिं कोदण्डदीक्षागुरुं रामं सर्वजगत्सुसेवितपदं सीतामनोवल्लभम् ॥१६॥
सहस्रशीर्षे वै तुभ्यं सहस्राक्षाय ते नमः । नमः सहस्रहस्ताय सहस्रचरणाय च ॥१७॥
नमो जीमूतवर्णाय नमस्ते विश्वतोमुख । अच्युताय नमस्तुभ्यं नमस्ते शेषशायिने ॥१८॥
नमो हिरण्यगर्भाय पंचभूतात्मने नमः । नमः मूलप्रकृतये देवानां हितकारिणे ॥१९॥
नमस्ते सर्वलोकेश सर्वदुःखनिषूदन । शंखचक्रगदापद्मजटामुकुटधारिणे ॥२०॥
नमो धर्माय तत्त्वाय ज्योतिषां ज्योतिषे नमः । ॐ नमो वासुदेवाय नमो दशरथात्मज ॥२१॥
नमो नमस्ते राजेन्द्र सर्वसम्पत्प्रदाय च । नमः कारुण्यरूपाय कैकेयीप्रियकारिणे ॥२२॥
नमो दांताय शांताय विश्वामित्रप्रियाय ते । यज्ञेश च नमस्तुभ्यं नमस्ते क्रतुपालक ॥२३॥
नमो नमः केशवाय नमो माधाय शार्ङ्गिणे । नमस्ते रामचन्द्राय नमो नारायणाय च ॥२४॥
नमस्ते रामचन्द्राय माधवाय नमो नमः । गोविन्दाय नमस्तुभ्यं नमस्ते परमात्मने ॥२५॥
नमस्ते विष्णुरूपाय रघुनाथाय ते नमः । नमस्तेऽनाथनाथाय नमस्ते मधुसूदन ॥२६॥
त्रिविक्रम नमस्तेऽस्तु सीतायाः पतये नमः । वामनाय नमस्तुभ्यं नमस्ते राघवाय च ॥२७॥
नमो नमः श्रीधराय जानकीवल्लभाय च । नमस्तेऽस्तु हृषीकेश कदर्पाय नमो नमः ॥२८॥
वषट्कार है। बाहुओमें कवचरूपेण विद्यमान अमिततेज उन रघुनन्दनको नमस्कार है, जिनके हुङ्कारमात्रसे सब शत्रु नष्ट हो जाते हैं। नेत्रोंमें वौषट् अर्थात् ज्योतिस्सम्पन्न विद्यमान तथा क्षीरसागरमें शयन करनेवाले भगवान्को नमस्कार है। अस्त्रस्वरूप फट्स्वरूप और सर्वप्रकाश स्वरूप रामको नमस्कार है। इस प्रकार भगवान्को छहों अङ्गोंमें न्यास अर्थात् विराजमान करे। इसी तरह अंगुलियोंमें न्यास करे। अब महर्षि एक श्लोकमें रामका ध्यान करके स्तोत्र आरम्भ होता है। जिनकी मनोहर आकृति है जो पुण्यधाम है। मालाओंसे जिनका वक्षःस्थल सुशोभित हो रहा है, जो कोमल एवं शान्त हैं। जो सुन्दर महेन्द्रनीलमणिकी कान्तिके समान सुशोभित हैं। जो धनुर्वेदकी शिक्षा में संसारके गुरु हैं, संसार जिनके चरणोंको पूजता है, उन सुरपति रूप सीताके प्राणवल्लभ रामको मैं प्रणाम करता हूँ॥१६॥ हे राम ! सहस्र मस्तकवाले आपको नमस्कार है। मेघके समान कान्तिवाले आपको नमस्कार है। हे विश्वतोमुख ! आपको नमस्कार है। अच्युतको नमस्कार है ! शेषशायीको प्रणाम है ॥१७॥१८॥ हिरण्यगर्भको प्रणाम है। पञ्चभूतात्माको प्रणाम है । मूलप्रकृतिको नमस्कार है ॥१९॥ हे सर्वलोकनाथ ! सब दुःखोंको दूर करनेवाले ! आपको प्रणाम है। हे शंख चक्र गदा पद्म तथा जटा-मुकुट धारण करनेवाले राम आपको नमस्कार है ॥२०॥ धर्मस्वरूप आपको प्रणाम है। तत्त्वस्वरूपको प्रणाम है। ज्योतियोंकी भी ज्योतिको नमस्कार है। वसुदेवके पुत्रको प्रणाम है। दशरथपुत्र रामको प्रणाम है। २१॥ हे राजेन्द्र ! सब संपत्ति देनेवाले आपको प्रणाम है। हे दयाके मूर्त्तस्वरूप तथा कैकेयीके प्रिय करनेवाले ! आपको नमस्कार है ॥२२॥ दान्त, शान्त एवं विश्वामित्रके प्रियकर्ता आपको प्रणाम है। हे यज्ञेश ! हे ऋतुपालक ! आपको प्रणाम है ॥२३॥ केशवको नमस्कार है। शार्ङ्गिको नमस्कार है। रामचन्द्रके लिए नमस्कार है। नारायणके लिए नमस्कार है । २४ । हे रामचन्द्र ! आपको प्रणाम है। हे माधव ! आपको प्रणाम है। हे गोविन्द ! हे परमात्मन् ! आपका नमस्कार है । २५ ॥ हे विष्णुरूप रघुनाथ ! मैं आपको नमस्कार करता हूँ। हे दीनोंके नाथ मधुसूदन ! आपको प्रणाम है ॥ २६ ॥ हे त्रिविक्रम ! हे सीतायते ! हे वामन ! हे रामचन्द्र ! मैं