भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

पृष्ठ 245, कुल 811 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 245

सर्गः ६ ] यागकाण्डम् २२९

ईजुस्ते यज्ञविधिना हविर्होत्रादिलालपैः । शङ्खतूर्यस्वनैर्नादैर्ब्रह्मघोषैर्महेश्वरम् ॥ ८ ॥ प्रत्यहं प्रातरुत्थाय रामचन्द्रः सर्मयया । नत्वा शम्भुं च देवेशानमुनींश्चापि पृथक्पृथक् ॥ ९ ॥ कौसल्याद्याश्च मातॄश्च कामधेनुं हृदि स्थितम् । चिन्तामणिं कोशाध्यक्षं कल्पवृक्षं द्विजोत्तमम् ॥ १० ॥ पृष्ठतः यज्ञवाटस्य देवतां यज्ञपूरुषम् । ततो गङ्गागमनार्थे समाज्ञाप्य यथाविधि ॥ ११ ॥ कृत्वा नित्यविधिं सर्वं पूजयामास शङ्करम् । उपहारान् समर्प्याथ कामधेनुसमुद्गतान् ॥ १२ ॥ समानितान् रत्नपात्रैः सीताया शृण्वदन्तः । ततः संप्रूजयामास धेनुं विधिपूर्वकं स विस्तरम् ॥ १३ ॥ ऋत्विजश्च तु मण्डपस्थांश्चैव सुहृद्विदां । प्रदाने ऋत्विजः सर्व यदाज्ञा मुमुचून् ॥ १४ ॥ स्नात्वा नित्यविधिं कृत्वा सम्पूज्यस्य महेश्वरैः । गमाज्ञयाऽथ सौमित्रिनृपादीनां प्रपूजनम् ॥ १५ ॥ दिव्यैर्नानोपहारार्थैः कामधेनुसमुद्भवैः । ततश्चकार सौमित्रिनृपादीनां प्रपूजनम् ॥ १६ ॥ तथा सीताऽथ साऽप्याज्ञाप्योर्मिला लक्ष्मणप्रिया ॥ १७ ॥ मांडवी श्रुतकीर्तिश्च सर्वस्त्रीकः प्रपूजयत् । अथ ते ऋत्विजश्वक्रुः स्वाहाकारैर्यथाविधि ॥ १८ ॥ होमं नानाविधैर्द्रव्यैः सुगन्धैर्यज्ञमण्डपे । पुरोडाशान् वरान् दिव्यान्भक्षयन्तोऽप्यमानवाः ॥ १९ ॥ वाजिमेधे राघवस्य साक्षाद्देवाः स्वयं मुदा । हवींषि भक्षयामासुःप्रत्यक्षाणि पावके ॥ २० ॥ अस्तु वौषडिति प्रोचुराद्ययातः स मेघवत् । श्रूयते यज्ञशालासु मन्त्रान्वितवशाननः ॥ २१ ॥ मध्ये कुण्डं महारम्यं व्याप्तमृत्विजनैः शुभम् । ततो मुनीश्वराः सर्वे ततो देवाः समन्ततः ॥ २२ ॥ ततः सर्वाः स्त्रियः श्रेष्ठास्ततो विद्याधराः स्थिताः । ततो यक्षाश्च गन्धर्वाः किन्नराः प्लवगास्तथाः ॥ २३ ॥ ततस्ते क्षत्रियाः सर्वे तत्तत्तेषां तु सेवकाः । ततः स्थिता वश्याश्चैवान्येनो माघवशंवदाः ॥ २४ ॥ ददृशुः संस्थिता यज्ञमण्डपे यज्ञकौतुकम् । मध्याह्नावधि हुत्वा ते ऋत्विजश्च प्रतिष्ठरन् ॥ २५ ॥

इत्याख्यान एवं क्रियाश्राव नियम वैदिक अग्निहोत्र दीक्षा प्राकृत एवं वैदिक विधियोंसे संपादन कर रहे थे ॥ ८ ॥ रामचन्द्रजी नित्य प्रातःकाल उठ तथा शौचादि क्रियाओंसे निवृत्त होकर शंभु, ब्रह्मा एवं अन्य देवताओंका, मुनियोंका, कामधेनुका, हृदयस्थ चिन्तामणिका, कल्पवृक्षके समान कान्तान् को, सुवर्ण का, पृष्ठपर विराजमान, यक्षक देवता तथा यज्ञ भगवान्‌को प्रणाम करते थे ॥ ९ ॥ १० ॥ इसके बाद यथाविधि गंगातटपर जाकर स्नान करते थे ॥ ११ ॥ इसके अनन्तर सम्पूर्ण दैनिक कृत्य करते और कामधेनुसे प्राप्त उपहारोंकी भेंट देते थे ॥ १२ ॥ सीताके द्वारा रत्नपात्रमें लाये गये सब रसोंसे कामधेनुकी पूजा करके बाद विस्तारपूर्वक ब्रह्माकी पूजा करते थे ॥ १३ ॥ तदनन्तर ऋत्विजोंकी पूजा करके याज्ञिकोंके पास बैठ जाते थे। ऋत्विक्, होता एवं सब मुनीश्वर भी नित्यकर्मोंको समाप्त करक यज्ञमण्डपमें बैठ जाते थे। रामकी आज्ञासे लक्ष्मणजी उनकी पूजा करते थे ॥ १४ ॥ १५ ॥ बादमें कामधेनुसे उत्पन्न नाना प्रकारके स्वर्गीय उपहारोंसे राजाओंकी पूजा करते थे ॥ १६ ॥ दिव्य वस्त्राभरणों तथा विविध पक्वान्नोंसे लक्ष्मणप्रिया उर्मिला एवं माण्डवी-श्रुतकीर्ति प्रभृति स्त्रियां भी सीताके आज्ञानुसार सब स्त्रियोंका पूजन करती थीं ॥ १७ ॥ इस तरह प्रत्येक मनुष्योंकी यथायोग्य पूजा हो चुकनेके बाद ऋत्विक् लोग स्वाहाकारो द्वारा विविध सुगन्धित द्रव्योंसे यज्ञमण्डपमें हवन करते थे ॥ १८ ॥ सीता और राम दृष्टियोंकी तृप्तिपर भेंट एवं दिव्य पुरोडाशों को खाती थे ॥ १९ ॥ रामचन्द्रजीके अश्वमेध यज्ञमें देवता प्रत्यक्ष प्रकट होकर बड़े आनन्दसे अग्निमें प्राक्षित हवियोंको खाते थे ॥ २० ॥ ऋत्विक् लोग 'अस्तु वौषट्' इस प्रकार बोलते थे और बाजे बजाते थे। जिनका मेघध्वनिके सदृश गम्भीर बांथ समस्त यज्ञशालामें सुनायी पड़ता था ॥ २१ ॥ मध्यमें रमणीय एवं ऋत्विकजनोंसे व्याप्त हवनकुण्ड था। उनके पास मुनीश्वर बैठे थे। चारों तरफ देवता बैठे थे ॥ २२ ॥ इसके बाद सम्पूर्ण स्त्रियाँ थीं। उनके बाद विद्याधर बैठे थे। उनके बाद यक्ष, यक्षोंके बाद गन्धर्व, गन्धर्वोंके बाद किन्नर, किन्नरोंके बाद बन्दर, उनके बाद क्षत्रिय, क्षत्रियोंके बाद सेवकवर्ग, उनके बाद वैश्यादि, उनके बाद मगध और बंदीजन बैठे थे ॥ २३ ॥ २४ ॥ इस तरह अपने-अपने स्थानपर बैठे हुए सब लोग यज्ञका कौतुक देख रहे थे ॥ २५ ॥