श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 246, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें२३० आनन्दरामायणे [ सर्गः ६
ततो माध्याह्निकं कर्तुं ययूस्तेऽ वग्यु नदीषु, कृत्वा माध्याह्निकं कर्म गत्वा तु यज्ञमण्डपे । २६॥ द्रव्यासनं तु सम्प्रेष्य नामरेखपदं स्थितः । दद्याद्याश्चाग्रगश्चाञ्च तन्मूर्द्धन्यासनोपरि । २७॥ लक्ष्मणस्वान् प्रपूज्याथ भरतेन स शत्रुहा । मध्येऽप्य हेमपात्राणि मर्यषां गुरुवस्तदा ॥२८॥ जानकीं त्वत्वरामास परिवेषणकर्मण । अथ सांतानिना रम्या नया सा मांडवी शुभा । २९॥ श्रुवकीर्तिमिशिवन्यः सुहत्पत्न्यः सहस्रशः । परिवेषणकर्माण चक्रुस्ता यज्ञमण्डपं ॥३०॥ नानाविघरसवंश्च कामधेनुःसुसुर्ब्वे । मुनायणादकाः सर्वे तोषमापुस्तदाऽध्वरं ॥३१॥ मीनादीनां ह न रीगां तदा यज्ञस्य मंडपे । नूपुरणा किंकिणीनां शुश्रूवे मवतो ध्वनिः ॥३२॥ यथेच्छ भुजतां सर्वं याच्यता यद्धृदि स्थितम् । मा शङ्का भोजने कार्या त्यक्तव्यं यन्न रोचते ॥३३॥ अयाचितानि देयानि पक्वान्नानि यथारुचि । अखण्डिताज्यधाराञ्च कार्या राघवशासनात् ॥३४॥ गृह्णीतां किञ्चिदुत्सृज्ये नेति नेति द्विजाः पुनः । इति भोजनकाले वै शुश्रुवे सर्वतो ध्वनिः ॥३५॥ किंचिदपेक्षित स्वामिनिति रामेण प्रार्थिताः । चक्रुस्ते भोजनं सर्वे दीजता व्यञ्जनादिभिः ॥३६॥ उर्लेकणोदकैरूच्छ्वैः रूङ्गशुद्धिं मुनीश्वरी । ततो गृहीत्वाऽत्यूत्वा मुनयस्ते तु निर्जराः ॥३७॥ गृहीत्वा दमुद्रां हि राघवेण पृथक् पृथक् । समर्पितां दक्षिणार्थं जग्मुर्वामस्थलानि हि ॥३८॥ ततः पूर्वोपचारार्थैः कथितैरथ पार्थिवाः । चक्रुस्ते भोजनं सर्वं चकुरेषामस्ततः परम् ॥३९॥ स्त्रीणां भोजनशालासु पूर्व भुक्त्वाऽवरस्त्रियः । सहिता मुनिपत्नीभिस्ततस्ताः क्षत्रियस्त्रियः ॥४०॥ चक्रुर् भोजनं सर्वाः सीतया प्रार्थिता मुहुः । ततो वैश्यास्तथच्छ्रूः पौग्न र्यस्ततः परम् ॥४१॥ तत शूद्रास्त्वथार्येषु मुदा चक्रुश्च भोजनम् । शालासु पुरनार्या च ततो वानरराक्षसाः ॥४२॥ ऋक्षाः पौरा जानपदायर्जुर्माजनमुत्तमम् । ततः शूद्रादयः सर्व ततः पार्थिवसत्रकाः ॥४३।
ऋत्विक् लोग मध्याह्नस्त स्नानाद्यवश्यक हवन कृत्य माध्याह्निक कृत्य करनेके लिए सरयूपर जात भये ॥ २६ ॥ माध्याह्निक कृत्य करके वे यज्ञमण्डपमें जिसका स्थान पूर्वनिर्मित आसान पर बैठ जन थे उसी तरह अपना अपना कृत्य समाप्त करके देवता भी दिव्य आसनपर विराज गये ॥ २७ ॥ तदनन्तर भरत, लक्ष्मण एवं शत्रुघ्न उनकी पूजा करके सुवर्णके भोजनपात्र उनके सामने रख दिये ॥ २८ ॥ तब भगवान् रामचन्द्र ने अन्न परोसनेके लिए सीताको आज्ञा दई थी । तब सीता, ऊर्मिला, मण्डवी, श्रुतकीर्ति एव हजारस मित्रपत्नियां परोसती थीं । २९ ॥ ३० ॥ नाना प्रकारका उन उत्कृष्ट भोजनसामग्रियोंसे व मुनश्वरादिक अत्यंत प्रसन्न होते थे । ३१ ॥ जिस समय सीता प्रभृति स्त्रियां यज्ञमण्डपमें भोजन परोसती थीं, उस समय नूपुरों एवं किकिणियोंका मधुर ध्वान सबन सुनाई पड़ता था ॥३२॥ सब लोग यथेष्ट भोजन करें, जो पसंद हो सो मांगें, भोजनके विषयमें कोई किसी तरहकी शंका न करे और जिसका जो पदार्थ न रुचे, उस छोड़ दें । बिना मांग ही यथेष्ट पक्वान्न दो और उनका आज्योद्य अखण्ड घृतधारा डालो । इस प्रकार रामचन्द्र परोसनेवालाको आज्ञा देते थे ॥ ३३ ॥ ३४ ॥ परोसनेवाले कहते थे और लीजिये, ब्राह्मण कहते थे 'नही'। इस प्रकार भोजनकालम सर्वत्र यही ध्वनि सुनाई पड़ती थी । ३५॥ भगवान् रामचन्द्रजी कहते थे-भगवन् ! क्या चाहिये ? इसके उत्तरमें ब्राह्मण सब पागूर्ण हैं ऐसा कहते थे। इस प्रकार आनन्दके साथ पक्वान्नां द्वारा स्रात हुए विप्रगण भोजन करते थे ॥ ३६ ॥ भोजनान्तर ठण्डे एवं उष्णोदकसे हस्त-दन्त शुद्धि करके व ताम्बूल खाते थे ॥ ३७ ॥ इसके बाद राम द्वारा दक्षिणार्थ समर्पित स्वर्णमुद्राको लेकर वे मुन वर एवं देवता डरपर चले जाते थे ॥ ३८ ॥ इसके बाद पूर्वोक्त उपचारास राजालाग भोजन करते थे । तदुपरा्न्त वैश्यप भोजन करतेथ ॥ ३६ ॥ स्त्रियाक भाजनाशालान पहल दवाङ्गनार्थे, फिर मुनिपलियां और उनके बाद क्षत्रियपत्नियां भाजन करती थी । तदनन्तर सभा न्वियों सीताकी प्रार्थना-पर भोजन करतो थी । इसके बाद वणिक् स्त्रियां तदुपरात्न पुरनारियां एव शूहवणिप भाजन करते थे । पुरवासी भोजनालयम बानर, राक्षस, ऋक्ष, पुरवासा, शूद्रा द एवं राजनयक पे सब क्रमशः भोजन करते थे