भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

पृष्ठ 226, कुल 811 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 226

२१० आनन्दरामायणे [ सर्गः १

जम्बाम्रादिद्रुमाणां च शाखाभिः कुसुमैरपि । पल्लवैश्च विचित्रैश्च कदलीस्तम्भमण्डितः ॥१०॥ समन्तस्तोरणानि बन्धनीयानि यत्नतः । पुष्पहाराः फलादीनां मालाश्च विविधाः शुभाः ॥११॥ वेद्यः सहस्रशः कार्याः सुधया चेटकादिभिः । करणीयं महत्कुण्डं सप्ताब्धिध्येन मृन्मयम् ॥१२॥ इंटोपरि महत् कार्यं गोमुखं च मनोरमम् । खदिरस्य विचित्रं हि वसोर्धारार्थमुत्तमम् ॥१३॥ सितरक्तासिनेश्चैत्र नीलपीतादिभिः शुभैः । नानावर्षदचूर्णैश्च रूपधातुविनिर्मितैः ॥१४। नानावर्णैर्विलेख्यानि स्वस्तिकानि समन्ततः । कमलानि विचित्राणि तथा चाष्टदलानि च ।१५। शङ्खचक्रगदापद्मवल्ल्यश्च सहस्रशः । कुसुमानि विचित्राणि यज्ञभूम्यां समन्ततः ॥१६॥ चतुर्विंशत्युच्छ्राः कार्या यत्नस्तम्भा महोच्छ्रिताः । विनिर्मिताः सुवर्णेन मुक्ताहारविगुम्फिताः ॥१७॥ त्रितयं सर्वतोभद्रं कुण्डमध्येऽष्टदैवतम् । लेखनीयं तथा कुडं नानावर्णैर्विचित्रितम् ॥१८। दूत कार्याणि पात्राणि यज्ञार्थं मम पश्यतः । हैमाः किलोपकरणा वरुणस्य यथाऽध्वरे ॥१९। आसनानि शूर्याणां च निद्रार्थं च सहस्रशः । वासोगेहानि कार्याणि तृणैः पर्णैश्च खर्परैः ॥२०॥ पाकशाला विधातव्या कार्या शालाऽन्ननस्य च । ऋषिशाला विधातव्याः स्त्रीशालाश्च शुभावहाः ॥२१। यज्ञोपकरणानां च शाला परमसुन्दरी । सभाः कार्या नृपाणां च वस्त्ररत्नैर्विचित्रिताः ॥२२। आसनार्थं महार्हाणि वस्त्राणि च समन्ततः । आस्तीर्याणि तथा राज्ञामुपशाखाश्रयाणि च ॥२३॥ पक्षिपिछैः सुकार्पासभेदैः सम्पूरितानि हि । कश्चिदुपबर्हणानि विचित्राणि महान्ति च ॥२४। स्थापनीयानि सदसि महार्हाणि तु लक्ष्मण । स्थापनीयानि पानार्थं पात्राणि विविधानि च ॥२५। नानारसैः पूरितानि तथा पक्वफलादिभिः । नानासुगन्धद्रव्यैश्च रागैर्नानाविधैरपि ।२६।

पायें । फिर केशर-चन्दन से लीपकर वह भूमि पवित्र करनी होगी । उस भूमिपर ऐसे मण्डप बनाये जायें, जो सुन्दर हों और कहींसे कटे-फटे न हों ॥ ७-९ ॥ जामुन-आम आदि वृक्षोंकी शाखाओं तथा फूलों-पत्तोंसे खूब अच्छी तरह सजाकर केलके खम्भोंके फाटक बनाये जायें और मण्डपके चारों ओर फूलों और फलोंकी मालाएं लटकाई जायें ॥ १० ॥ ११ ॥ मण्डपके भीतर ईंट और चूनेकी पक्की जोड़ाई करके एक हजार वेदियां बनवायी जायें । वहीं ही मिट्टीका एक बड़ा भारी कुण्ड बनाया जाय । लेकिन वह मे अपने सामने बनवाऊंगा । कुण्डके ऊपर खैरकी लकड़ीका एक सुन्दर गोमुख बनाया जाय, जो वसोर्धाराके कामम आयेगा । सफेद लाल, काले, नीले और पीले पत्थरोंका चूर्ण तथा उपधातु (गेरू-मंचक आदि) के चूर्णसे जगह-जगह रङ्ग-बिरङ्गे स्वस्तिक लिखे जायें और अष्टदल कमल बनाये जायें ॥ १२-१५ ॥ जहां तहां शंख चक्र, गदा पद्म तथा फूल-पत्तियोंकी चित्रकारी की जाय ॥ १६ ॥ सोनेके चौबीस यज्ञस्तम्भ बनाये जायें, जो खूब ऊँचे हों और उनपर मोती-माणिक आदिका काम किया गया हो । कुण्डके पास अष्टदेवताके निर्मित सर्वतोभद्र बनाया जाय और वेदीके चारों ओर अच्छे-अच्छे चित्र बनाये जायें । यज्ञके लिए जितने पात्रोंकी आवश्यकता होगी, वे सब मेरे सामने बनाये जायेंगे । प्रायः वे सब पात्र सोनेके होंगे, जैसे वरुणदेवके यज्ञम थे ॥ १७-१९ । ब्राह्मणोंको बैठने और सोनेके लिए उनके, कपडोंके अथवा छप्परोंके हजार घर तैयार करने होंगे ॥ २० ॥ मण्डपकी एक ओर पाकशाला ( रसोईघर ) रहेगी, दूसरी ओर अशनशाला ( भोजनभवन ), तीसरी ओर ऋषि-शाला ( मुनियोंके ठहरनेकी जगह ) और एक ओर सुन्दर स्त्रीशाला ( स्त्रियोंके रहनेकी जगह ) बनेगी ॥ २१ । एक बड़ा सा और सुन्दर मकान यज्ञकी सब सामग्रियें रखनेके लिए बनेगा । अच्छे-अच्छे कपड़ोंसे सजाकर राजाओंके लिए कई महफ़िलें बनायी जायेंगी । बैठनेके लिए बढ़िया बढ़िया कालीन-गलीचे आदि मँगाकर बिछाये जायेंगे । पक्षियोंके पखों या रूईसे भरी कितनी ही सुन्दर तकियें राजाओंको लगानेके लिए रक्खी जायेंगी । सबको जल पीनेके लिए विविध प्रकारके पात्र रक्खे जायेंगे ॥ २२-२४ ॥ सभामवनमें जल पीनेके लिए सुन्दर तथा बहुमूल्य बर्तन रक्खे जायेंगे । कितने ही पके हुए फलोंके शरबतसे भरे