श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 229, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः १] | सारकाण्डम् | २१३
तद्गुरोर्वचनं श्रुत्वा मूर्ध्नाऽऽकृत्वा स लक्ष्मणः। काम्यं यस्य तन्मर्त्यं गुरोर्वाक्याच्छताधिकम् ॥ ६०।
इति श्रीमत्काटारामचरितान्तर्गत श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये यागकाण्डे
यागोपकरणनिवेदनं नाम प्रथमः सर्गः ॥ १ ॥
द्वितीयः सर्गः
(यज्ञमें सावधानी रखनेके लिए रामका लक्ष्मणको आदेश)
श्रीरामदास उवाच
अथ रामः समीतस्तु मुहूर्ते सप्तमेऽहनि । मज्जनोद्वर्तनाद्यैः स्नान्त्वा कुर्व्वांजनादिकम् ॥ १ ॥
तूर्यनादैर्द्विजानां च वेदघोषैर्विशेषतः। पौरस्त्रीणां गायनश्च पौराणां च जयस्वनैः ॥ २ ॥
आगत्य मण्डपे रम्ये तस्यां चित्रासनोपरि। ददौ कौशेयवस्त्राणि गुरुं रामस्स्वयम्भवीम् ॥ ३ ॥
पौराँश्च पौरपत्नीश्च मातृश्चाथ स्नुषांस्तथा । शश्रूश्चापि द्विजान् सर्वान् जनकं सुहृदस्तथा ॥ ४ ॥
बंधूंश्च बंधुपत्नीश्च स्वस्थांश्च जनः परम् । मंत्रिणांश्चाथ वीरांश्च दामदास्रींर्जनांस्तथा ॥ ५ ॥
नटनर्तकवद्यादीन् वारस्त्रींश्च ततः परम्। अचंडालादिकान् दत्त्वा ततः सीतां ददौ वरम् ॥ ६ ॥
हेमतन्तुसमुद्धृतं मुक्तामाणिक्यगुंफितम् । रत्नकान्त्याऽऽनीलार्थमध्ये मध्ये विचित्रितम् ॥ ७।
मुक्ताप्रवालपोपार्थमणिभिः सरंतो वृतम्। आदर्शबिम्बसदृशं विद्युत्तेजौपमं महत् ॥ ८ ॥
वतः स्वयं रामचन्द्रः पतकौशेयमुत्तमम्। हेमतत्त्वाऽऽवृतं नानावल्लीपुष्पादिचित्रितम् ॥ ९॥
दधारण्यत्तुत्तरीयं वामोंऽसलकारमंडितः । व्यजिनाक्षेपमात्रार्थमणिङ्कपविराजितः ॥१०॥
केयूरकुण्डलैर्मुक्ताहारैश्च कटकैर्युतः। ततो वसिष्ठर्द्धर्मस्तं मुक्तानां स्वस्तिकोपरि ॥११॥
निवेश्य राघवः सीतामाहूय बटुकैर्निजैः। निवेश्य रामवामांगे मुनिभिः परिवेष्टितः ॥१२।
रमेश कारयामास विघ्नशादिषूजनम् । पुण्याहादित्रयं चापि ददौ दीक्षा ततस्तयोः ॥१३॥
आओ। तुम उनके विषयमे कुछ मत सोचो विचारो। मैंने स्वयं सब सोच लिया है। इस प्रकार गुरुवरकी आज्ञा पाकर लक्ष्मणने सिर झुकाकर स्वीकार किया और सब काम उससे भी सौगुना बढ़-चढ़कर किया, जैसा कि गुरु वसिष्ठजीने कहा था ॥ ५८-६० ॥ इति श्रीमत्काटारामचरितान्तर्गतश्रीमदानन्दरामायणे यागकाण्डे भाषा-टीकायां यागोपकरणनिवेदनं नाम प्रथमः सर्गः ॥ १ ॥
श्रीरामदासने कहा — इसके बाद सातवें दिन सीताजीके साथ-साथ रामचन्द्रने मज्जन आदिका उबटन लगाकर स्नान किया, अंजन लगाया और तुरही आदि बाजो, वेदमंत्रों, नगरकी स्त्रियोंके गीतों और पुरवासियोका जयध्वनिके साथ ॥ १।२॥ आकर उस सुन्दर मंडपमें एक चित्रासनपर बैठे। तब गुरु वसिष्ठतथा अरुन्धतीको उन्होने सुन्दर-सुन्दर रेशमी वस्त्र दिये। इसके अनन्तर पुरवासियोंको, पुरवासिनी नारियोंको, माताओंकोको, बहुओंको, साधुओंको, नगरनिवासी सब विप्रोंको, मित्रोंका, बान्धवोंको, परिवारके लोगोंको, बान्धवोंकी भारियाको, समवयस्क मित्रोंको, मत्रियोंको, सेन पतियोंको, सैनिकोको, दास-दासियाको, ॥ ३-५ ॥ नटो, नतकोंको, बन्दीजनोंको, वेश्याओंको और चाण्डालसे लेकर ऊँच जाति तकके प्रत्येक मनुष्यको अच्छे-अच्छे कपड़े देकर जिसमे सुनहले तारका काम बना हुआ था, मोतियों-माणिक आदिके झुम्बे चारो ओर लटक रहे थे, ऐसे नीलम तथा पुखराज आदि मणियोंसे सुसज्जित एक सुन्दर वस्त्र सीताजीको दिया ॥ ६ ॥ ७ ॥ ८ ॥ तब दर्पणकी तरह चमकती हुई एवं बिजलीकी तरह जिसमें तेज था और सुवर्णके तारका जगह-जगह बेल-बूटा बना हुआ था, ऐसे एक वस्त्रको लेकर रामचन्द्रजीने स्वयं पहिना ॥ ८ ॥ ९॥ ऊपरसे एक उपरना धारण किया। तरह-तरहके आभूषण पहने। जब रामचन्द्रन के कानोंम कुण्डल झूकने लगे, मोतियोंकी मालाएं गलेमें पड़ गयीं और हाथोंके सब गहने हाथोंमें पहन लिये गये। तब वसिष्ठजीने मोतियोंके चौरुके ऊपर रामचन्द्रजी तथा