श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 230, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें२१४ आनन्दरामायणे [ सर्गः २
ध्वजारोपणविधानेन स्थापयित्वा ध्वजोत्तमम् । रामेण कारयामास गुरुः षोडश ऋत्विजः ॥१४॥ याज्ञवल्क्यं सराजऽध्वयुः सकलकर्मवित् । ब्रह्माऽभूच्च स्वयं ब्रह्मा होता गाधिसुतो बभूव ॥१५॥ उद्गाताऽभूच्छतानन्दो गुरुर्यो जनकस्य च । शमो बभूव शमिता कश्यपाद्या मुनीश्वराः ॥१६॥ दृष्टा राज्ञोऽश्वमेधं हि राघवेण महात्मना । ऋत्विजः षोडशैश्चक्रुरन्ये च नवकर्मसु । १७॥ पृथक् पृथक् संवृणानाः संवृणस्ते मुनीश्वरः कुण्डेऽग्निमथ संकृत्या पात्राण्यासाद्यविस्तरात्॥१८॥ दशमकर्णे जपित्वा मोक्षयामास भूतले । सव्यं प्रदक्षिणो कर्तुं तस्य संरक्षणाय हि ॥१९॥ न्यस्तं सुमंत्रेण सैन्यैनावृतमंशुपया शत्रुघ्नं प्रेषयित्वाऽथ तूष्णीं तस्थौ द्विजेर्गुरुः ॥२०॥ यज्ञवाटे मुनिगणैःपूर्णे नरपूतटै । समाऽपि सीतया तूष्णीं तस्थौ शृण्वन् कथाः शुभाः ॥ २१ ॥ कृष्णा जिनधरो दान्तः कुशपाणिः कृतान्वितः कोटिसूर्यप्रभाऽशश्वत्तथ्यो य गुरुसन्निधौ ॥२२॥ तदाज्ञायां प्रवृत्तायां भ्रातरः पुक्कन्ध्रजः । स्नाताः सुवासमः सर्वे रेजियरे सुष्टुवलकृताः ॥२३॥ कण्ठहिक्यश्च मुदिता निष्कवन्त्यः सुवाससः दीक्षाशालामुपाजग्मुर्हस्ताग्रा वस्तुपाणयः ॥२४॥ तदा विनेदुर्वादामि ननृतूश्चाप्सरोऽपिचः एवमस्मिन्नन्तर तत्र समाजग्मु मुनीश्वराः ॥२५॥ दिने दिनेऽश्वमेधस्य वार्ता श्रुत्वा, महर्षयः कश्यपोऽत्रिरथद्वाजौ विश्वामित्रोऽथ गौतमः ॥२६॥ मार्कण्डेयो मुकुण्डश्च च्यवनो मुङ्गलोऽसितः । जमदग्म्यो देवलश्च व्यासो नागपणः क्रतुः । २७ । विभाण्डको नारदश्च तुम्बुरुगालवो मुनिः । शिवदासो भानुदासो हरिदासो महानराः । २८ । शिवशर्मा रुद्रवर्मा शिवशर्मा मुनावधः । एकशृङ्गश्चतुः शृङ्गः मप्तशृङ्गस्त्रिशृङ्गकः । २९॥ तिलभांडो भृगुश्चैव भार्गवो राक्षपास्तस्तथा। धौम्यः दण्डश्चकपादश्चिपादश्चोर्ध्वबाहुकः । ३० ।
माताजीको बिठाया और अपने शिष्यों तथा ऋत्विजके साथ-साथ मन्त्रम पढके रामचन्द्रजीके द्वारा गणेश-गौरी आदिका पूजन तथा पुण्याहवाचन कराया और सीता तथा रामचन्द्रजीका यज्ञक दीक्षा दी। ध्वजारोपणको जो विधि होता है, उसके अनुसार ध्वजारोपण और रामचन्द्रजक द्वारा सोलह ऋत्विजोका वरण कराया ॥ १०-१४ ॥ सम्पूर्ण कर्मोंके ज्ञाता वसिष्ठ स्वयं अध्वर्यु बने । स्वयं ब्रह्माजी ब्रह्मा बने और होता का विश्वामित्रजी । सतानन्द उद्गाता बने, जो जनकके गुरु थे। इसके अनन्तर कश्यपादि मुनियोंका रामचन्द्रजीने ऋत्विक् बनाकर वरण किया ॥ १५-१७ ॥ इसके अतिरिक्त जो सैकडो ऋत्विजका रामचन्द्रजीने अन्यान्य कार्योंको करनेके लिए वरण किया। उन सबने यथासमय कुण्डमें अग्नि स्थापन करके यज्ञके पात्रोंको अपने-अपने स्थानपर रक्खा, विधियुवक श्यामकर्ण घोडका पूजन कराया और पृथ्वीकी दक्षिणावर्त परिक्रमा करनेके लिए उसे छोड़ दिया ॥ १८, १९ ॥ उसकी रक्षाके लिए समन्तके साथ शत्रुघ्नको भेजकर भगवान् रामचन्द्रजी अपने गुरुजीके पास चुपचाप जा बैठे। उस यज्ञभूमिमें जहाँ हजारो ऋषि आकर बैठे हुए थे रामचन्द्रजी भी सीताजीके साथ एक किनारे बैठकर शुभ कथायें सुनने लगे उस समय रामचन्द्रजी केवल काले मृगका चर्म धारण किये और हाथमें कुशा लिये हुए एक साधारण वस्त्रमें थे फिर भी उनमें करोडो सूर्योका तेज था और वे गुरु वसिष्ठके पास बैठे थे ॥ २०-२२ । यज्ञकी दीक्षा हो जानेपर सब भ्राता फूलका मालायें तथा अच्छे-अच्छे कपडे पहिने बहुत ही सुन्दर दीख पडते थे । उनकी स्त्रियाँ भी गलेमें सोनेके कण्ठे और शरीरमें सुन्दर वस्त्र पहिन हंसती-खेलती अनेक वस्तुओंका उपहार लिये हुए उसी यज्ञशालामें आ पहुँची ॥ २३ । २४ । इसके अनन्तर बाजे बजे और अप्सराएँ नाचने लगीं । उसी समय बहुतसे ऋषिलोग आ पहुंचे अश्वमेध यज्ञका खबर पाकर हजारो महर्षिलोग आकर एकत्रित होते जा रहे थे। जैसे कश्यप, अत्रि, भरद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, मार्कण्डेय, मुकण्ड, च्यवन, मुद्गल, असित, जामदग्नि, देवल, व्यास, नारायण, क्रतु, विभाण्डक, नारद, तुम्बुरु, गालव, शिवदास, भानुदास, महातपस्वी हरिदास, शिवशर्मा, रववर्मा, मुनावराः शिवशर्मा, एकशृंग, द्विशृङ्ग, चतुःशृङ्ग, सप्तशृङ्ख ॥ २५-२६ ॥ विरूभाण्ड,