श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 23, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः १ ] बालकाण्डम् ७
तातौचापि तपुत्रवचं श्रुत्वा रुरुदतुः । कारयित्वा नृपतिना चितिं पुत्रसमन्वितौ ॥ ९४ ॥
दशस्थाय तौ शापं ददतुः सुमहद्दुःखिनौ । पुत्रशोकादावयोर्हि यथा मृत्युस्तवास्त्विति ॥ ९५ ॥
ययौ नृपोऽपि नगरीं गुरुं वृत्तं न्यवेदयत् । वसिष्ठो नृपतेर्दोषशान्त्यर्थं तृष्णायाध्वरम् ॥ ९६ ॥
नृपेण कारयामास साङ्केते सम्यगुत्कृष्टे । रोमपाद इति ख्यातस्तस्मै दशरथः सखा ॥ ९७ ॥
शान्तां स्वकन्यां प्रायच्छत्सराष्ट्रेऽभूत्प्रवर्षकम् । विभाण्डकाश्रमं वाराङ्गनाः संप्रैष्य तत्सुतम् ॥ ९८ ॥
रोमपादो मोहयित्वा ऋष्यशृङ्गं समानयत् । वारास्त्रयो वने गत्वा यमानिन्युःऋषेः सुतम् ॥ ९९ ॥
नाट्यसंगीतवादित्रैर्विभ्रमालिङ्गनाद्यर्हणैः । तत्प्रतापात्प्रभूवृष्टिः पुत्रोऽपि नृपतेरभूत् ॥ १०० ॥
तन्तुष्टो रोमपादस्तस्मै शान्तां ददौ सुताम् । दशरथोऽपि स्वपुरीमानयामास तं मुनिम् ॥ १०१ ॥
स तु शृङ्गोऽपत्यस्य निरूप्येष्टिं मखन्वतः । प्रत्यक्षं हि चकाराग्निं यज्ञकुण्डान्यपायसम् ॥ १०२ ॥
आविर्भून्त्वा स्वयं वह्निर्ददौ राज्ञे सुपायसम् । राज्ञा विभक्तं कौसल्यैस्तत्कैकेय्या दृष्टमात्रतः ॥ १०३ ॥
अहरत्पायसं हृष्टाद्गृध्री शापविमोचकम् । सुप्रतीलाऽप्सरोगोलदा नृत्यसंगाच्छप्यभुवा । १०४ ॥
शप्ता जाता तु सा गृध्री तया वेधाः सुनोषितः । तस्मै तुष्टो विधिः प्राह कैकेयीपायसं यदा ॥ १०५ ॥
प्रक्षिपस्यर्जनगिरौ तदा ते भविता मतिः । अप्सरा त्वं पूर्ववच्च भविष्यसि न संशयः ॥ १०६ ॥
तस्मात्सा पायसं नीत्वाऽक्षिपदर्जनपर्वते निज स्वरूपं सा लब्ध्वा जगाम सुरमदिरम् ॥ १०७ ॥
ततस्ताभ्यां तु कैकेय्यै दत्तं किंचित्तु पायसम् । अथ ता भक्षयामासुरगर्भसंस्तदाऽभवन् ॥ १०८ ॥
से बाहर निकालकर उसके मुंहसे सब वृत्तान्त सुना तब अत्यन्त कपित हुए राजाने उस बाणवालकके शरीरसे बाण निकाला ॥ ९२ । ९३ ॥ राजाके मुखसे पुत्रप्राणकी बात सुनकर वे दोनों अन्ध अतिशय विलाप करने लगे और राजासे चिता बनवाकर पुत्रके साथ जलकर परलोक सिधार गये । मरते समय पुत्रवियोगसे दुःखित वे दोनों अन्धी-अन्ध राजा दशरथको यह शाप दे गये कि जैसे हम दोनों पुत्रशोकसे मर रहे हैं, वैसे ही तुम भी पुत्रशोकसे ही मरोगे । ९४ ॥ ९५ ॥ राजान नगरमें आकर यह सब हाल गुरु-वसिष्ठजीको सुनाया । कुछ दिनों बाद वसिष्ठजीने राजाकी दोषनिवृत्ति तथा पुत्रप्राप्तिके लिए उनसे साङ्केत दिलाकर ऋष्य श्रृङ्गको बुलवाकर अश्वमेध यज्ञ करवाया । राजा दशरथके मित्र अङ्गदेशक राजा रोमपादने अपनी शान्ता नामकी कन्या ऋष्यशृङ्गको दे दी थी । क्योंकि एक बार राजा रोमपादके देशमें वर्षा न होने तथा उन्हें कोई पुत्र न होनेके कारण मन्त्रियोंके कथनानुसार ऋष्यशृङ्गरूप पिता विभाण्डकके आश्रमसे वेश्याओंके द्वारा मोहित करवाकर उन्हें अपने देशमें बुलवाया । वेश्याये बनमें गयीं और नाचकर, गाना गाकर, बाजे बजाकर हावभाव, आलिङ्गन तथा पूजा आदिके द्वारा मोहित करके ऋष्यशृङ्गको ले आयीं । उनके यज्ञ करानेसे राज्यमे वृष्टि हुई और राजाको पुत्र भी प्राप्त हुआ ॥ ९६-१०० ॥ तब प्रसन्न होकर राजा रोमपादने ऋष्यशृङ्गको अपनी शान्ता नामकी कन्या दान करके दे दी । अतएव दशरथ भी उन ऋष्यशृङ्गको अपने नगरमें ले आये ॥ १०१ ॥ उन मुनिने सन्तानरहित राजा दशरथसे इष्टि (यज्ञ) करवाकर खीर लिये हुए अग्निदेवको यज्ञकुण्डसे प्रत्यक्ष प्रकट किया । १०२ ॥ इस प्रकार अग्निने स्वयं प्रकट होकर राजाको सुन्दर पुत्र देनेवाला पायस (खीर) दिया । राज ने वह खीर लेकर तीनों स्त्रियोंमें बाँट दी । तभी कैकेयीके भागको एक गृध्री यह सोचकर कि यदि इसका मै ले जाऊँगी तो मेरा शाप छूट जायगा । इस स्वार्थमे खीर छीन ले गयी । कथान्तर । एक समय सुपर्वा नामको अप्सराओमे उत्तम अप्सराको ऋष्यशृङ्गके अपराधसे ब्रह्माजीने गृध्री होनेका शाप दे दिया । अब फिर उसने स्तुतिके द्वारा ब्रह्माको प्रसन्न किया । तब ब्रह्माजीने कहा कि जब तुम कैकेयीके पासका खीर छीनकर मर्जनपर्वतपर फेकोगी । तब तुम्हारी धूत सुधृति हो जायगी और पूर्ववत् तुम अप्सरा हो जाओगी ॥ १०३-१०६ ॥ इसा कारण उस गृध्रीने खीर लेकर अंजनिगिरिपर डाल दी जिससे वह अपने अप्सरा-रूपको प्राप्त होकर पुनः स्वर्ग चली गयी ॥ १०७ ॥ बादमें कौसल्या तथा सुमित्राने अपने-अपने भागमेंसे