भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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८ आनन्दरामायणे [ सर्गः २

आशंस्तास्तां दोहदास्ते पुत्राणां भाविंकर्मभिः । पुत्राणां भाविकर्माणि विदुस्ते दोहदैर्र्जनाः ॥१०९॥ इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये सारकाण्डे प्रथमः सर्गः ॥ १ ।


द्वितीयः सर्गः

( राम लक्ष्मण भरत तथा शत्रुघ्नका जन्म )

श्रीशिव उवाच

एतस्मिन्नंतरे भूमिर्दशस्यादिपपीडिता । ब्रह्मण प्रार्थयामास विष्णुं सोऽपि तदाऽब्रवीत् ॥ १ ॥
भूम्यामवतरिष्यामि भवंतु कपयः सुराः । गंधर्वी दुंदुभीनाम्री भूम्याः कार्यार्थसिद्धये ॥ २ ॥
मंथराऽग्रे भवत्वद्वा राज्यविघ्नार्थसिद्धये पश्चात्पुनर्द्वापराते कुब्जात्वं कसमंदिरे ॥ ३ ॥
अथ विष्णुनक्षत्रमासि नवम्यां मध्यगे रवौ । सूतिकागृहमध्येऽथ कौसल्यायाः पुरोऽभवत् ।
चतुर्भुजः पीतवासा मेघश्यामो महाद्युतिः ॥ ४ ॥
माऽपि दृष्ट्वा बालभावं प्रार्थयामास तं हरिम् ततो जातस्तदा बालः क्षणाद्धेमविभूषितः ॥ ५ ॥
हेमवर्णः कंजनेत्रश्चन्द्रास्यस्तपनप्रभः अतः सुमित्रापुरतः शेषोऽभूद्बालरूपधृक् ॥ ६ ॥
आविर्भूतौ द्वौ यमलौ कैकेय्याः शंखचक्रके एवं ते जनिता बालाश्चत्वारः समये शुभे ॥ ७ ॥
देवदुंदुभयो नेदुः पुष्पवृष्टिः शुभाऽपतत् जातकर्मोदिसंस्कारान् गुरुणा नृपतिस्तदा ॥ ८ ॥
कारयामास विधिवन्नृत्यैर्वारयोषितः । ज्येष्ठं रामं तु कौसल्यातनयं प्राह वै गुरुः ॥ ९ ॥
सुमित्राननयं नाम्ना लक्ष्मणं गुरुरब्रवीत् । ततो भरतशत्रुघ्ननामनी प्राह वै गुरु ॥१०॥


थोड़ा-थोड़ा पायस कैकेयीको दे दिया इस प्रकार सबने पायस खाया और सबने गर्भ धारण किया ॥ १०८ ॥
अच्छी पुत्रोत्पत्तिके शुभचिह्नोंको देख तथा सुनकर होनहार पुत्राक द्वारा किये जानेवाले अद्भुत कार्योंको लोग पहले ही समझ गये ॥ १०९ ॥ इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये सारकाण्डे भाषाटीकायां प्रथमः सर्गः ॥ १ ॥

श्रीशिवजी बोले-हे प्रिये ! इसी बीच रावण आदि दुष्ट राक्षसोंसे पीडित होकर पृथ्वी माता ब्रह्माके साथ विष्णुभगवान्के पास गयीं और उसने अपनी तथा धर्मकी रक्षाके लिये प्रार्थना की । तब विष्णुभगवान्ने कहा कि 'मैं तुम्हारे लिये भूमिपर अवतार लूंगा' । ऐसा कहकर उन्होंने देवताओंसे कहा हे देवताओ ! तुम लोग मेरी सहायताके लिये वानररूपसे पृथ्वीपर जन्म लो । दुन्दुभी गंधर्वी पृथ्वीकी रक्षाके लिये पहिलेसे जाकर मन्थरा रूपसे जन्म ले और रामके राज्याभिषेकमें विघ्न डाले । द्वापरके अन्तमे वही जाकर कंसके यहाँ कुब्जा बनेगी ॥ १-३ ॥ कुछ काल बाद साक्षात् विष्णुभगवान् चैत महीनेके कृष्णपक्षकी नवमी तिथिको मध्य सूर्यके समय प्रसूतिकागृहमे कौसल्याके सामने चार भुजाधारी पीताम्बर पहिने हुए वर्षाऋतुकालीन मेघके समान श्यामशरीर तथा तेजस्वी रूपमे प्रगटे ॥ ४ । कौसल्याने वह रूप देखकर भगवान्से बाल्यभाव स्वीकार करनेकी प्रार्थना की । तब भगवान् क्षण भरमे स्वर्णाभरणोंसे भूषित, सुवर्णके सदृश कान्तिसम्पन्न, कमलके समान नेत्र तथा चन्द्रतुल्य मुख एवं सूर्यके समान तेजस्वी बालक बन गये । बादमे सुमित्राके गर्भसे शेषावतार लक्ष्मणजी बालभावसे प्रकट हुए। फिर कैकेयीके गर्भसे विष्णुके शंख-चक्र अवतार लेकर एक साथ भरत-शत्रुघ्न पैदा हुए । इस प्रकार ये चारों बालक शुभ समय, अच्छे लग्न और शुभ नक्षत्रमें उत्पन्न हुए ॥ ५-७ ॥ देवताओने प्रसन्न होकर नगाड़े बजाये और पुष्पवृष्टि की । राजाने गुरु वसिष्ठसे बालकोंका जातकर्म (संतानके उत्पन्न होनेपर किया जानेवाला कर्म) आदि संस्कार विधिपूर्वक करवाया । उस उत्सवपर वेश्याओ द्वारा अनेक प्रकारका नृत्य भी करवाया गया । वसिष्ठज ने कौसल्याके सबसे बड़े पुत्रका नाम राम रक्खा । सुमित्राके पुत्रका नाम लक्ष्मण और कैकेयीके दोनों पुत्रोंके नाम भरत तथा शत्रुघ्न