श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 25, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें॥ सर्गः १ ॥
बालकाण्डम्
रमणाद्राम एवासौ लक्षणैर्लक्ष्मणोऽभवत् । भरणाद्भरतो ज्ञेयः शत्रुघ्नः शत्रुनाशनात् ॥ ११॥
अथ ववृधिरे सर्वे लक्ष्मणो राघवस्य हि । शत्रुघ्नो भरतस्यापि चकार क्रीडनादिकम् ॥ १२॥
रत्नकङ्कणमञ्जीरनूपुरैस्ते विभूषिताः । केयूरग्रैवेयाङ्गदकुण्डलैर्विशोभिताः ॥ १३॥
शृङ्खलाबद्धरुक्मादिनिर्मितेषु वरेषु च । दोलकेषु च ते सर्वे दोलिता रेजिरे सुखम् ॥ १४॥
भाले स्वर्णमयाश्चन्द्रपाषाणप्रतिमास्त्विति च । मुक्ताफलप्रलम्बीनि शोभयन्ति स्म बालकान् ॥ १५॥
कण्ठे रत्नमणिव्रातमध्यदीपनखाञ्चिताः । कर्णयोः स्वर्णमयभ्राजद्रत्नार्जुनसुतारकाः ॥ १६॥
मिश्राननमणिभ्राजत्कटिसूत्रांगदेर्युताः । स्स्मितवक्त्राल्पदशना इन्द्रनीलमणिप्रभाः ॥ १७॥
अङ्गणे रिंगमाणाश्च मञ्जीरैः मञ्जुनाः शुभाः । ते तानं रञ्जयामासुर्मातृंश्चापि विशेषतः ॥ १८॥
कौशल्या नृपतिश्चापि नानावस्त्रैः सुभूषणैः । शोभय मासतुर्बालान्विगाह्यधनसादिभिः ॥ १९॥
रामः स्वपितरं दृष्ट्वा भोजनस्थं जगत्पतिः । दुद्राव कवलं पात्राद्गृहीत्वा स पुनर्बहिः ॥ २०॥
कौशल्या पालकं भर्तु दुद्राव सूनुतोदिता । न तस्याः करमभ्यागाद्योगिनामप्यगोचरः ॥ २१॥
परिवृत्य स्वयं रामः करेण मुदलेन च । कौशल्यायै नृपायैवापि कवलानकरेन्मुदा ॥ २२॥
एवं नानाकौतुकैश्च रात्रपाषाश्च राघवः । नाना शिशुक्रोडनकैश्चाहतंर्मुग्धभाषिणैः । २३॥
बालकृत्रिमपुत्रैश्च गमनैर्मुग्धगुम्फनैः । पितरौ निजचित्तार्थैर्वाह नारोहणादिभिः । २४॥
ततस्ते बालकाः सर्वे वस्त्रालंकारभूषिताः । समागत्य पितरं नत्वा तस्थुः सिहासनोपरि ॥ २५॥
अथ पित्रोपनातान्ते गुरुणा मुनिभिर्युता । गर्भाधानमरे षष्ठे जन्मतः पञ्चमे यमे ॥ २६॥
ब्रह्मवर्चसकामस्य कार्ये विप्रस्य पञ्चमे । राज्ञो बलार्थिनः षष्ठे वैश्यस्यार्थार्थिनोऽष्टमे ॥ २७॥
श्लोक ११ - १७ ॥ मनोहर तथा आनन्ददायक होनेसे राम, शुभ लक्षणोंसे युक्त होनेसे लक्ष्मण, प्रजाका भरण-पोषण करनेके कारण इनका नाम भरत और शत्रुओंका नाश करनेके कारण उनका शत्रुघ्न नाम रक्खा ॥ ११ ॥ लक्ष्मण रामके साथ और शत्रुघ्न भरतके साथ सदा दूर वन्द कर ॥ १२ ॥ सुवर्णके कड़े तथा नूपुरोंसे भूषित केयूर, ग्रैवेय तथा कुण्डल भूषणोंसे माताके सिखलाएका वस्त्र पहन हुए वे बालक सुवर्ण घटित, रत्नजटित तथा सोनेके सांकलों द्वारा युक्त किए सुन्दर पलनोंमें झूलते हुए बहुत ही सुन्दर लगते थे ॥ १३ ॥ १४ ॥ उनके ललाटोंमें सुवर्णनिर्मित चन्द्रकलाके समान आकारवाले एवं जिनके अग्रभाग पर बड़े मोती लटक रहे थे, ऐसे सुन्दर आभूषणोंने उन बालकोंकी शोभा और भी बढ़ा दी ही ईश्वरी थी। उनके कण्ठमें विविध मणियोंके मध्यमें सुशोभित हो रहे थे। कानोंमें कनकके बने हुए ग्लर्जिन्त कुण्डल लटक रहे थे। सिरपर घुंघराले बाल बहुत अच्छे लगते थे। पाँवोंमें मणिमण्डित झांझर झनकता रहा। सुन्दर बाजूबन्द और कमरमें करधनी खनखना रही थी । चन्द्रमाके सदृश शुभ हास्य भरे सुन्दर किरणोंके समान छोटे-छोटे दाँत चमकना रहे थे। इन्द्रनीलमणिके समान श्याम कान्तिवाले, अङ्गणमें घुटनोंके बल रेंगते हुए, मञ्जीरोंसे मञ्जुल और बोलनमात्रसे मन मोह लेनेवाले वे कुमार अपने माता-पिताओंके मनोंको मुग्ध करने लगे ॥ १५ - १८ ॥ कौशल्या और राजा दशरथ भी अनेक प्रकारके वस्त्र तथा गहना आदि अलङ्कारोंसे अपने बालकोंको भूषित करने लगे ॥ १९ ॥ राम अपने पिताको भोजन करते देखते तो आकर उसमेंसे एक ग्रास हाथमें लेकर बाहर भाग जाते । राजाके कहनेपर कौशल्या रामको पकड़नेके लिए जब दौड़तीं तो योगियोंको भी अगम्य राम उनके हाथ नहीं आते थे। बादमें स्वयं ही राम आकर पीछेसे आनन्दपूर्वक अपने कोमल हाथोंसे माता-पिताके मुखमें वह कौर रख देते थे ॥ २०-२२ ॥ ऐसे अनेक कौतुकयुक्त बालकीड़ा, वत्सोत्क्षा प्रमुत्सहाहा भाषण, बालकोंके कृत्रिम पुत्र, नाना प्रकारकी चालें मुखगुम्फन, और तरह-तरहकी बनावटी सवारियोंपर सवार होकर राम आदि चारों बालक माता-पिताके मनको लुभाने तथा आनन्दित करने लगे ॥ २३ ॥ २४ ॥ कालान्तरमें सब बालक वस्त्र-आभूषण आदिसे भूषित हो पिताको प्रणाम करके उनके सिंहासनपर बैठ गये। तब राजाने ऋषियों द्वारा सानन्द उनका यज्ञोपवीत संस्कार करवाया।