श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 26, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें| १० | आनन्दरामायणे | [ सर्गः ३ |
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विद्वद्भिर्योपनयनेऽयं शास्त्रेषु निर्णयः। गुरोस्त्वभ्यनुज्ञाते वेदान् सांगांश्चतुर्विधान् ॥२८॥
चक्रुर्मुखोद्गतानांच बालाः शास्त्रादिकान्यपि। ब्रह्मचर्यसमाप्तौ ते तीर्थानि जग्मुरादरात् ॥२९॥
सेनया मंत्रिसहिता वसिष्ठेन समन्विताः। षण्मासैः पुनरागत्य साकेतं विविशुर्मुदा ॥३०॥
एवं ते मतिमन्तश्च प्रिया राज्ञो वशे स्थिताः। पितरं रंजयन्त्यासुः पौरान् जानपदानपि ॥३१॥
इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये सारकाण्डे रामजन्मनाम द्वितीयः सर्गः ॥ २ ॥
तृतीयः सर्गः
( ताड़कावध-अहल्याोद्धार तथा सीतास्वयंवर )
श्रीशिव उवाच
एतस्मिन्नंतरेऽयोध्यां विश्वामित्रो ययौ मुनिः । यज्ञसंरक्षणार्थाय राजानं मुनिरब्रवीत् ॥ १ ॥
रामं च लक्ष्मणं चापि मह्यं देहि कियद्दिनम् । गुरुनामंत्र्य राजाऽपि प्रेषयामास तौ तदा ॥ २ ॥
जग्मतुर्यज्ञरक्षार्थं गाधिजेन रथस्थितौ । ततः प्रहृष्टो गाधेयः स्थित्वा कामाश्रमे पथि ॥ ३ ॥
प्रभाते स्नापयोः स्नातः प्रादाद्विद्यास्तयोर्मुदा । माहेश्वरीं च मद्दिद्यां धनुर्विद्यामनुत्तमाम् ॥ ४ ॥
शास्त्रीमस्त्रीं लौकिकीं च रथविद्यां गजोद्भवाम्। अश्वविद्यां गदाविद्यां मंत्राद्वानविसर्जने ॥ ५ ॥
क्षुत्तृट्श्रमविलोपिभ्यां बलामतिमलामपि । सर्वविद्यास्त्ववाप्याथ हन्तुमौ तौ रामलक्ष्मणौ ॥ ६ ॥
वनौकसां हितार्थाय जघ्नतुस्तत्र राक्षमान् । पथि पांथजनध्वंसकारिणीं नाम ताटिकाम् ॥ ७ ॥
राक्षसीमेकबाणेन जघान रघुनन्दनः । अप्सरा सा मुनि पूर्वं क्षोभयामास कानने ॥ ८ ॥
शास्त्रोंका भी यही सिद्धान्त है कि ब्रह्मवर्चस् (ब्रह्मतेज की इच्छावाले ब्राह्मणकुमारका यज्ञोपवीत गर्भसे छठे अथवा जन्मसे पांचवे वर्ष होना चाहिये। बल चाहनेवाले क्षत्रियका छठें और धन चाहनेवाले वैश्य-कुमारका यज्ञोपवीत आठवे वर्ष अवश्य हो जाना चाहिये ॥ २५-२७। तदनन्तर अच्छे मुहूर्त्तमें गुरुके मुखसे राम-लक्ष्मणने साङ्ग (शिक्षा कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष सहित) चारों वेद, छः शास्त्र (न्याय-वेदान्त आदि) और चौंसठ कला गाना-बजाना आदि) सीख-पढ़कर हृदयंगम कर लिया। ब्रह्मचर्यकी समाप्तिके बाद राम आदि चारो भ्राता सेनाको, मन्त्रियोंको तथा गुरु वसिष्ठको साथ लेकर सहर्ष तीर्थयात्रा करने गये। छः महीनेमें वहाँसे लौटे आये और आनन्दपूर्वक अयोध्यामे रहने लगे । २८-३०॥ इस प्रकार बुद्धिमान्, प्रजा रंजक परम भक्त, परम प्रिय तथा उनकी आज्ञापर चलनेवाले वे चारो बालक पिताको, नगरके लोगोंको तथा उस देशकी प्रजाको अपने सद्व्यवहारके द्वारा मोहित करने लगे ॥ ३१ ॥
इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये सारकाण्डे पं० रामतेजपाण्डेयकृतभाषा-टीकायां रामजन्मनाम द्वितीयः सर्गः ॥ २ ॥
श्रीशिवजी बोले—हे पार्वती ! तदनन्तर मुनि विश्वामित्र अयोध्या आये और राजा दशरथसे कहा कि यज्ञकी रक्षा करनेके लिए राम तथा लक्ष्मणको आप मुझे दे दीजिये । गुरु वसिष्ठके समझानेपर राजाने न चाहते हुए भी दोनों बालकोंको उनके साथ कर दिया ॥ १ ॥ २ ॥ तदनन्तर गाधिपुत्र विश्वामित्रके साथ रथपर बैठकर उनके यज्ञकी रक्षा करनेके लिए राम-लक्ष्मण चल दिये । रास्तेमें कामाक्षममें सबेरे स्नान करके प्रसन्न विश्वामित्रजीने स्नान किये हुए राम-लक्ष्मणको विविध विद्यायें सिखायीं। महेश्वर (शिवजीसे प्राप्त) माहेश्वरी धनुर्विद्या, शस्त्राविद्या, अस्त्रविद्या, लौकिकी विद्या रथविद्या, गजविद्या, अश्वविद्या, गदा चलानेकी विद्या, मन्त्रके द्वारा अस्त्रादिका आवाहन और विसर्जन करनेकी विद्या, भूख-प्यासको मिटानेवाली बला और अतिबला नामकी दो विद्याएं तथा अन्यान्य सब विद्याओंको प्राप्त करके राम-लक्ष्मण वनवासी ऋषि-मुनियोंके सुखके लिये राक्षसोंको मारने लगे । रास्तेमे पथिकोंको मारकर खा जानेवाली ताड़का नामकी राक्षसीको रघुनन्दन रामचन्द्रने एक ही बाणसे मार डाला । सुन्दकी स्त्री और सुकेतु यक्षकी