श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 27, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः ३] सारकाण्डम् २१
गान्धर्वी तस्य शापेन बभूव मुंडकामिनी । मारीचश्च सुबाहुश्च सुदातरख्याः सुतावुभौ ॥ ९ ॥
रामबाणार्तिसन्तप्ताः कीर्तिता मुनिना पुरा । मा प्राप्य दिव्यदेहन्वं नन्वा गर्म दिवं गता ॥ १० ॥
विश्वामित्राश्रमं रामो गत्वा तद्यज्ञघातकान् । राक्षसान्निशितैर्बाणैर्जघान रघुनन्दनः ॥ ११ ॥
प्रारम्भं रणयज्ञस्य चकार रघुनन्दनः । हत्वा सहस्रशः श्रीमान् राक्षसान् निशितैः शरैः ॥ १२ ॥
क्षिप्त्वा बाणेन मारीचं शतयोजनसागरे । हत्वा सुबाहुं चैकेन बाणेन रघूत्तमः ॥ १३ ॥
यः कृत्वा गाधिवंशस्य समाप्तिं रघुनन्दनः । नाकरोद्रणयज्ञस्य समाप्तिं स्वकृतस्य च ॥ १४ ॥
कालानलसमं तं दृष्ट्वा तन्मुनेर्हितवे । श्रुत्वा जनकगेहे वै जनकन्यायाः स्वयंवरम् ॥ १५ ॥
रामलक्ष्मणसंयुक्तो मुनिस्ते नगरं ययौ । गमनावसरे मार्गे भर्तृशप्तां शिलां मुनिः ॥ १६ ॥
मुनिरूपमिहेन्द्रेण भुक्तां रहसि शोभनाम् । गौतमस्यांगनां नाम ह्यहल्यां चारुदर्शयोः ॥ १७ ॥
ब्रह्मणा निर्मिताऽहल्या द्विमुख्यो गोः परिक्रमात् । दत्ता पुरा गौतमाय विसृज्येंद्रादिकान्सुरान् ॥ १८ ॥
तन्मस्मन् मघवा वैरी ना सुकन्या मुनिशापतः । सहस्रा भगवान् जातः सहस्रलोचनस्ततः ॥ १९ ॥
श्रीरामचन्द्रो निजपादपद्मस्पर्शेन तां गौतमधर्मपत्नीम् ।
निष्कल्मषामद्भुतरूपयुक्तां चकार देवः करुणाममुद्रः । २० ॥
नदारूपा जनस्थानेऽहल्या गौतमशापतः । रामेण भ्रमताप्येवं स्वकीयैश्चरणैःसमुद्धृता ॥ २१ ॥
कल्पभेदाद्वदन्तीत्थं मनयश्चापि केचन । नैव प्रापंऽस्ति सर्वषु कल्पेषु सत्कथा तथा ॥ २२ ॥
ततस्तौ मुण्डगन्धर्वराक्षसौ शुष्पवृष्टिभिः । दृथ्वाऽहल्यां र्ग नपान् जगमतुर्जान्हवी प्रति ॥ २३ ॥
यद्यपि ताड़का पहिले बड़ी सुन्दर अप्सरा थी । परन्तु बादमे जब उसने अगस्त्य ऋषिका वनमें सताया तब उनके शापसे वह कुकर राक्षसी बन गयी । उसके मारीच और सुबाहु ये दो राक्षस पुत्र उत्पन्न हुए ॥ ९-५ ॥ रामके बाणसे दुखी मुक्ति द्वारा मुक्ति प्राप्त मुनिने उससे कहा था । इसलिए रामवाणसे इस समय अमर तथा दिव्य शरीर धारण करके वह स्वर्गको चली गयी ॥ १० ॥ तदनन्तर तथा विश्वामित्रके आश्रममें जाकर रघुनन्दनने यज्ञमें विघ्न डालनेवाले समस्त राक्षसोंको अपने तीक्ष्ण बाणोंसे मार डाला ॥ ११ ॥ इधर श्रीरामचन्द्रने वहाँ रणयज्ञ ( युद्धरूप यज्ञ ) प्रारम्भ कर दिया । श्रीमान् रामने हजारो राक्षसोको तीक्ष्ण बाणसे मारकर मारीचको एक बाणके साथ सौ योजन ( चार सौ कोस ) दूरपर समुद्रम फेंक दिया । इन्होने दूसरे बाणसे मारीचके भाई सुबाहुको मार डाला ॥ १२ ॥ १३ ॥ विश्वामित्रजीके यज्ञको तो उन्होंने राक्षसोंको मारकर निर्विघ्न समाप्तिकर दी । परन्तु अपने द्वारा प्रारम्भ युद्धयज्ञकी समाप्ति नहीं की अर्थात् उनका क्रोध शान्त नहीं हुआ । १४ । श्रीरामके प्रलयकालीन अग्निके सदृश उस तथा युद्धसे अतृप्त देखकर मुनि विश्वामित्रने उनको तृप्तिके लिए राजा जनकके यहाँ उनकी कन्याका स्वयंवर सुनकर राम लक्ष्मणको लेकर जनकपुरको प्रयाण किया । चलते-चलते रास्तेमें मुनिने अहल्याको देखकर कहा कि यह मुनिवंशवारा इन्द्रके द्वारा भोगी गयी परमसुन्दर गौतमकी स्त्री है । यह भेद विश्वामित्रने राम लक्ष्मणको बताया ॥ १५-१७ ॥ इस अनन्य रूपवाली अहल्याको बनाकर ब्रह्माने पृथिवीका परिक्रमा करनेवाले गौतम ऋषिको दे दिया, किसी इन्द्रादि देवताको नहीं दी ॥ १८ ॥ इन्द्रने उस बैरका स्मरण करके कपटसे एकान्तमें उसके साथ भोग किया, तदनन्तर गौतम मुनिके शापसे इन्द्र हजार भग ( योनि ) वाले हो गये । फिर प्रार्थना करनेपर गौतमकी कृपासे वे हजार नेत्रवाले बन गये । अब विश्वामित्रके अनुरोधसे करुणानिधि एवं साक्षात् देवतास्वरूप रामचन्द्रने दया करके अपने चरणकमलके स्पर्शसे उस शिलास्वरूपिणी गौतमकी धर्म-पत्नी अहल्याको दोषसे मुक्त करके अति अद्भुत रूपवाली सुन्दरी स्त्री बना दिया । १९ । २० ॥ दण्डक वनके पास एक स्थानमें मुनिके शापसे शपित नदीरूपा अहल्याका अरण्यम भ्रमण करते हुए रामचन्द्रने अपने परम पवित्र चरणस्पर्शसे उद्धार कर दिया । २१ ॥ कुछ लोग इस कथाको कल्पभेदसे मानते और कहते हैं कि सब कल्पोंमें यह शापकी बात एक जैसी नहीं मिलती ॥ २२ । इसके बाद