भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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२३४ आनन्दरामायणे [ सर्गः ७


मधूर्जाश्विनमासेषु विना विष्णोर्न चेतरे । एवं देवालये स्थाप्य शोभनौ तौ ध्वजोत्तमौ ॥४०॥
संपूज्य विष्णुं विधिवत् वित्तशाठ्यं विना ततः । प्रदक्षिणमनुव्रज्य स्तोत्रेणेदमुदीरयेत् ॥४१॥
नमस्ते पुण्डरीकाक्ष नमस्ते विश्वभावन । नमस्तेऽस्तु हृषीकेश महापुरुषपूर्वज ॥४२॥
येनेदमखिलं जातं यस्मिन् सर्वं प्रतिष्ठितम् । लयमेष्यति यत्रैतत् प्रणतोऽस्मि माधवम् ॥४३॥
न जानंति परं देवं मयं ब्रह्मादयः सुराः । योगिनो यं प्रशंसति तं वंदे ज्ञानरूपिणम् ॥४४॥
अन्तरिक्षं तु यन्नाभिर्द्यामूर्धा यस्य चैव हि । पादादभूच्च वै पृथ्वीं तं वंदे विश्वरूपिणम् ॥४५॥
यस्य श्रोत्रे दिशः सर्वा यच्चक्षुर्दिनकृच्छशी । ऋक्सामयजुषो येन तं वंदे ब्रह्मरूपिणम् ॥४६॥
यन्मुखाद्ब्राह्मणा जाता यद्बाह्वोश्चाभवन्नृपाः । वैश्या यस्योद्गता जाताः पद्भ्यां शूद्रस्त्वजायत ॥४७॥
मनसश्चंद्रमा जातो दिनेशश्चक्षुषस्तथा । प्राणेभ्यः पवनो जातो मुखादग्निरजायत ॥४८॥
पापसं दाहमात्रेण वदंति पुरुषं तु यम् । स्वभावविमलं शुद्धं निर्विकारं निरंजनम् ॥४९॥
क्षीराब्धिशायिनं देवमनवद्यमपराजितम् । सहस्रकमलं विष्णुं भक्तिगम्यं नमाम्यहम् ॥५०॥
पृथ्व्यादीनि भूतानि तन्मात्राणींद्रियाणि च । सुसूक्ष्माणि च येनासंस्तं वंदे सर्वतोमुखम् ॥५१॥
यदब्रह्म परमं धाम सर्वलोकोत्तमोत्तमम् । निर्गुणं परमं सूक्ष्मं प्रणतोऽस्मि पुनः पुनः ॥५२॥
निर्विकारमजं शुद्धं सर्वज्ञं वह्निमीश्वरम् । यमामनंति योगींद्राः सर्वकारणकारणम् ॥५३॥
एको विष्णुर्महद्भूतं पृथग्भूतान्यनेकदाः । त्रीँल्लोकान् व्याप्य भूतात्मा भुंक्ते विषयमव्ययः ॥५४॥
निर्गुणः परमानंदः स मे विष्णुः प्रसीदतु । हृदयस्थोऽपि दूरस्थो मायया मोहितात्मनाम् ॥५५।
ज्ञानिनां सर्वधर्मस्थु स मे विष्णुः प्रसीदतु । चतुर्भिञ्च चतुर्भिश्च द्वाभ्यां पंचभिरेव च ॥५६।
हृयते च पुनर्द्वाभ्यां स मे विष्णुः प्रसीदतु । ज्ञानिनां कर्मणा चैव तथा भक्तिमतां नृणाम् ॥५७॥

चैत्र आश्विन तथा कार्तिक इन तीन मासामें विष्णुके सिवाय अन्य देवताकाक लिए ध्वजारोपण नहीं करना चाहिए ॥ ४० ॥ इस प्रकार वित्तशाठ्य त्यागकर देवालयपर ध्वजारोपण करक विधिवत् विष्णुको पूजा करे । तदनन्तर प्रदक्षिणा करके इस स्तोत्रका पाठ करे—। ४१ ॥ हे पुण्डरीकाक्ष ! हे हृषीकश ! हे महापुरुषपूर्वज ! आपको बनकणः प्रणाम है ॥ ४२ ॥ जिससे यह संसार उत्पन्न हुआ है, जिसके आधारपर टिका हुआ है और जिसमें लय होगर, मै उन माधव भगवान्‌को प्रणाम करता हूँ ॥ ४३ ॥ जिसका ब्रह्मादि देवता भो भला भांति नहीं जानन और योगी जिनकी प्रशंसा करते हैं, उन परब्रह्म परमा त्मक। म प्रणाम करता हूँ ॥४४॥ अन्तरिक्ष जिसको नाभि है आकाश जिसका मस्तक है ओर जिसके चरणसे भूमि उत्पन्न हुई है, मैं उस ब्रह्माण्डको प्रणाम करता हूँ ॥ ४५ ॥ दिशाए जिसके कान हैं, सूर्य एवं चन्द्र जिसके नेत्र हैं, ऋक्साम एवं यजुर्वेद जिससे उत्पन्न हुए हैं, उस ब्रह्माको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ४६ ॥ जिसके मुखस ब्राह्मण, बाहुसे क्षत्रिय, ऊरुस्थलसे वैश्य और पैरोंसे शुद्र उत्पन्न हुए हैं, उन ई वरको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ४७ ॥ स्वभावतः निरंजन, निष्कल, निर्विकार एवं शुद्ध परमात्माक नामस्मरणमात्रने समस्त पापसमूह नष्ट हो जाता है ॥ ४८ ॥ जिसके मनसे चन्द्रमा, चक्षुष सूर्य प्राणोंसे पवन एव मुखसे अग्नि उत्पन्न हुआ है, उस परमात्माको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ४९ ॥ क्षीरसागरम शयन करनेवाले, अशोक प्रेमी, भक्तिगम्य, अपराजित और अनन्तस्वरूप विष्णुको मै प्रणाम करता हूँ ॥ ५० । पृथिव्यादि पञ्चभूत, तन्मात्रा, एकादश इन्द्रियाँ और सूक्ष्म प्राणसमूह जिससे उत्पन्न हुए हैं, उन सर्वतोमुख भगवान्‌को मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ५१ ॥ जो ब्रह्म है, सर्वलोकोत्तम उत्तम है निर्गुण हे एवं परम सूक्ष्म है, उस परमात्माको मै पुन प्रणाम करता हूँ ॥ ५२ । योगन्द्रजन जिसको निर्विकार अज, शुद्ध, ईश्वर एवं संसारका आदि कारण कहते हैं, उस परब्रह्मको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ५३ ॥ जो विश्वव्यापक और अव्यय है, जो एक होता हुआ भी अलग-अलग पञ्च महाभूतों एवं तीनों लोकोंमें व्याप्त है, उस भूतात्माको मै प्रणाम करता हूँ ॥ ५४ ॥ जो निर्गुण है, परमानन्दस्वरूप है और हृदयमें रहते हुए भी जिस प्राणीको आत्मा मायासे मुग्ध है, वह उससे दूर है ॥ ५५ ॥ जो ज्ञानियोंका सर्वस्व है। वह विष्णु