भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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सर्गः ७ ] बालकाण्डम् २६५

गतिदाता विश्वगुरुः स मे विष्णुः प्रसीदतु । जगद्धितार्थे यो देहम्भारम्भालयः प्रभुः ॥५८॥
यमर्चयंति विबुधाः स मे विष्णुः प्रसीदतु । यम मनसि यं मंत्र, सर्वदाऽऽनन्दविग्रहम् ॥५९॥
निर्गुणं च गुणाधारं स मे विष्णुः प्रसीदतु । परेशः परमानन्दः परम्परात्परः प्रभुः ॥६०॥
चिद्रूपश्च परिज्ञेयः स मे विष्णुः प्रसीदतु । य इदं कीर्तयेन्नित्यं स्तोत्राणामुत्तमोत्तमम् ॥६१॥
सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोके महीयते । य इदं कीर्तयेद्विष्णुं ब्राह्मणांश्च प्रपूजयेत् ॥६२॥
आचार्यं पूजयेत्पश्चाद्भिन्नाच्छादनादिभिः । ब्राह्मणांन् भोजयेत्पश्चाद्भक्तितः सत्यभाषणः ॥६३॥
पुत्रमित्रकलत्राद्यैर्बन्धुभिः सह वाचयेत् । कुर्वीत पाष्णौ शिष्य नारायणपरायणः ॥६४॥
यस्त्वेतत्कर्म कुर्वीत ध्वजारोपणमुत्तमम् तस्य पुण्यफलं वक्ष्ये शृणुध्वं सुसमाहितः ॥६५॥
यथा ध्वजस्य वस्त्रं तु वात्येतेन वायुना । तथन्स्यपापजालानि नश्यन्त्यत्र न संशयः ॥६६॥
महापातकयुक्तो वा युक्तश्चेत्सर्वपातकैः । ध्वजं विष्णोगृहे कृत्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥६७॥
यावद्दिनानि वसति ध्वजो हरिगृहोपरि । तावद्युगसहस्राणि हरेः सामीप्यमाप्नुयात् ॥६८॥
आरोपितं ध्वजं दृष्ट्वा येऽभिवदंति धार्मिकाः । तेऽपि सद्यो विमुच्यन्ते ह्युपपातककोटिभिः । ६९॥
आरोपितं ध्वजं दृष्ट्वाऽऽयुगृहे पुनस्त्वत्रक पटम् । कर्तुः सर्वाणि पापानि नुनाति निमिषार्धतः ॥७०॥
एवं शिष्य मया प्रोक्तं यथा पृष्टं मया मम । ध्वजारोपणमाहात्म्यं सविधानं मनोरमम् ॥७१॥
समागतां प्रतिपदं ज्ञात्वा वैशासितां नृपैः । आरोपिता ध्वजाः सर्वे द्वितीयायां पृथक् पृथक् ॥७२॥
शाम्ब्रा रामं महाविष्णुं तर्पयन्त्वाद्यमंडपे । कृत्वा वैकदिनं यत्स्ववामगेहेषु पूजनम् ॥७३॥
ध्वजस्य पूजनं गेहे नवरात्र समारभेत् । यथाशक्त्यनुसारं वा नैकरात्रमथापि वा ॥७४॥
यज्ञोऽस्माद्दर्शनाच्चैव कृतमेकदिनं नृपैः । चकार रघुश्वपि पूर्वमेव ध्वजोत्सवम् ॥७५॥
माघमासे कृष्णपक्षे चातुर्दश्यां द्विजोत्तमः । तदा ध्वजैर्महोच्चैस्तैः शुशुभे गगनांगणम् । ७६।।


मुझपर प्रसन्न हों ॥ ५८ ॥ बार-बार ऋत्विकू जिनका प्रत्यर्थ हवन करते हैं, कभी द्वादा ओर कभी चौबीस तथा फिर दन्दा ऋत्विक हवन करते हैं, वे विष्णु मेरे ऊपर प्रसन्न हों ॥ ५९ ॥ जो ज्ञानिया, कर्मी एवं भक्तोकी गति हैं जो विश्वगुरू हैं, वे विष्णु मेरे ऊपर प्रसन्न हों। जो संसारके हितके लिए शरीर धारण करते हैं ॥ ५८ ॥ जिनकी विद्वान् पूजा करते हैं। मन्त्र तथा जिनको सदा आनन्दविग्रह कहते हैं, वे विष्णु मुझपर प्रसन्न हों । जो निर्गुण हैं और सगुण भी हैं। जिनका सर्वेश, परमानन्द, परमात्मा एवं चिद्रूप इन कि नामोंसे परिचय मिलता है, वे विष्णु मेरे ऊपर प्रसन्न हों ॥ ५९ । ६० ॥ जो पुरुष इस उत्तम स्तोत्रका पाठ करता है, वह समस्त पापोंसे विनिर्मुक्त होकर विष्णुलोकमें पूजित होता है। जो इसका कीर्त्तन करता चाहे वह पुत्र मित्र-कलत्रादिके साथ सत्यपरायण होकर इस स्तोत्रका कीर्तन करे पश्चात् ऋत्विज् ब्राह्मण एवं आचार्यकी पूजा करे । बादमे ब्राह्मणभोजन कराये ॥ ६१-६४ । जो पुरुष ध्वजारोपण करता है उसका पुण्यफल सावधान होकर सुनो ॥ ६५ ॥ आरोपित ध्वजाका वस्त्र वायुसे जैसे-जैसे हिलता है वैसे-वैसे उस पुरुषका सब पाप नष्ट होता जाता है ॥ ६६ । विष्णुमन्दिरके ऊपर ध्वजारोपण करनेसे एक महापातक क्या सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। वह आरोपित ध्वजा जितने दिनों तक हरिमन्दिरपर सुशोभित रहती है, उतने सहस्र युगपर्यन्त ध्वजारोपणकर्ता श्रीहरिके समीप रहता है ॥ ६७ ॥ ६८ ॥ जो धार्मिक पुरुष ध्वजाकी वन्दना करते हैं, वे कोटि उपपातकोंसे छूट जाते हैं ॥ ६९॥ वह आरोपित ध्वजा अपने वस्त्र फैलाती हुई निमिषार्धमें आरोपणकर्ताके पापोंको नष्ट कर देती है। हे शिष्य ! तुमने जो मनोहर ध्वजारोपणमाहात्म्य पूछा, वह सब विधिपूर्वक मैने कहा ॥ ७० ॥ इसलिए चैत्रशुक्ल प्रतिपदाको आया हुआ जानकर राजाओंने द्वितीयाको ध्वजाओंका आरोपण किया यज्ञमण्डपमें स्थित रामको महाविष्णु समझकर ही वे रात्रि ध्वजाका अपने अपने तम्बुओंमें अलग-अलग पूजन करने लगे । ७१-७३ ॥ पूजा नवरात्र पर्यन्त अथवा अपनी शक्तिके अनुसार करे। अथवा एक ही रात करे ॥ ७४ ॥ यज्ञो-