भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 254

२३८ आनन्दरामायणे [ सर्गः ८

जानकीसहितं यान्तं ददृशुः पथि ये शनैः। केचिदूचुरथ धन्याः परिपूर्णमनोरथाः ॥३१॥ अद्य रामं ससीतं च पश्यामोऽद्य महोत्सवे । केचिदूचुश्च नो धन्यो पितरौ न सुजन्मदौ ॥३२॥ ययोः पुण्यचयेनैव नः सीतारामदर्शनम् । एवं गच्छत्सु श्राम्यन्त्यः स्त्रियः सर्वाः परस्परम् ॥३३॥ समंञ्च पुष्पकं स्थातुं प्रार्थयन्ति स्म जानकीम् । तदा सा जानकी प्राह लक्ष्मणं पुरतः स्थितम् ॥३४॥ स्त्रियः सर्वास्त्वरा शीघ्रं नागेशालासु पुष्पके। आरोह्यायामे शक्त्यैतान् प्रार्थयन्त्यत्र मां मुहुः ॥३५॥ लक्ष्मणोऽपि तथेत्युक्त्वा ताः सर्वाश्च पुष्पक्रे, स्वरूपाऽऽरोढयामास साक्षालासु यथासुखम् ॥३६॥ ततस्ताः पुष्पकं रूढान्दृष्ट्वाजानपदैस्ततः । ददृशुः सीतया रामं ववर्षुः पुष्पवृष्टिभिः ॥३७॥ मृदङ्गशङ्खपणवधुन्धुर्यामण्डगोमुखाः । वादिताणि विचित्राणि नेदुरावभृथोत्सवे ॥३८॥ नर्तक्यो ननृतुहृष्टा गायका गृधशो जगुः । वीणावेणुसलोन्मादस्तेषां स दिवमस्पृशत् ॥३९॥ चित्रध्वजपताकाद्यैर्गजेन्द्रस्यन्दनैर्हयैः स्वलंकृतैर्भटैर्भूपा निर्ययु रुक्ममालिनः ॥४०॥ यदुसृञ्जयकाम्बोजकुरुकेकयकोसलाः । कम्पयन्तो भुव सैन्यैर्यजमानपुरःसराः ॥४१॥ सदस्यनिर्विजब्रह्मा ब्रह्मघोषं भूयसा। देवापिनिगणगन्धर्वास्तुष्टुवुः पुष्पवृष्टिभिः ॥४२॥ स्वलंकृता नरा नार्यो गन्धस्रग्भूषणाम्बरैः, विलिप्यन्त्योऽभिषिञ्चन्त्यो विजह्रुर्विविधै रसैः ॥४३॥ तैल गोरसगन्धोदहरिद्रामान्द्रकुंकुमैः । चुभिलिताः प्रलिम्पन्त्यो विजह्रुर्वारयोषितः ॥४४॥ एवं नानामयुत्वाहैः श्रीरामश्च समीनया। पश्यन्नानाकौतुकानि स्यन्दनेन यनेः शनैः ॥४५॥ अगमत्सरयूतीरे रामतीर्थं शुभावहम् । अवरुह्य रथाद्रामः मंजनार्थे सयूजले ॥४६॥ स चकार जलेष्टिं तैऋत्विग्भिः परिवेष्टितः । पत्नीसमावाजबभृथैरकरित्या ते समृद्धिजः ॥४७॥ सर्वे रामहृदे विप्रा यजमानपुरःरग । आचान्तं स्नापयाञ्चक्रुः सरय्यां सह सीतया ॥४८॥

पुष्पकस्थ जनता रास्तेमें जाते हुए भग रामका दर्शन करने लगी ॥ ३० ॥ वे कहने लगे-हम धन्य हैं और परिपूर्ण मनोरथ हैं, जो अपने नेत्रोंसे सीतारामका रूप देख रहे हैं। कोई बोले कि हमारे जन्मदाता माता पिता धन्य हैं। जिनके पुण्यसे हमको सीतारामके दर्शन हो रहे हैं ॥ ३१ । इस तरह कौतुक देखते हुए श्रीराम आगे जा रहे थे तब अन्यान्य स्त्रियां परस्पर विचार करके पुष्पकमें बैठनेके लिए जानकीसे प्रार्थना करने लगीं । ३२।३३ इनको प्रार्थना सुनकर सीतानें सामने खड़े लक्ष्मणसे कहा - । ३४। ये स्त्रियां बारम्बार मुझसे प्रार्थना कर रही हैं, अतः मेरी आज्ञासे इनको भी पुष्पकविमानकी स्वेटोंपर विश्राम बैठा दो ॥ ३५ ॥ लक्ष्मणजीने उत्तरमें 'बहुत अच्छा' कहकर उन स्त्रियोंको शीघ्र पुष्पककी नागेशालामें बिठा दिया ॥ ३६ ॥ उसपर आरूढ़ होकर प्रजाकेलोगोंने सीताको देखा और पुष्पोंकी वर्षा करने लगी ॥ ३७ ॥ उस अवभृथस्नानो-त्सवके उपलक्ष्यमें लोग मृदङ्ग, शंख, पणव ( ढोल ), दुन्धुर्भानक नगाड़े एवं गोमुख ( मेरी ) प्रभृति विचित्र विचित्र वाद्योंको बजाने लगे । ३८ ॥ नर्तकियां प्रसन्न होकर नाचने लगीं । गायकसमूह गान्धर्व गाने लगे और वीणावेणु प्रभृति वाद्योंका शब्द आकाशको गुञ्जित करने लगा ॥ ३९ । चित्र-विचित्र ध्वजा-पता-काओंसे सुशोभित हाथी घोडे तथा रथोंके द्वारा सजे हुए योद्धाओंके साथ सब राजे चल रहे थे । ४०॥ यदु, सृञ्जय, काम्बोज, कुरु, केकय एवं कोसलवंशी राजाओंका वृन्द श्रीरामको आगे करके पृथ्वीमण्डलको कँपाता हुआ चल रहा था ॥ ४१ ॥ सदस्य, ऋत्विक् एवं ब्राह्मणवृन्द वेदघोष करने लगा ओर देवता, ऋषि, पितर एवं गन्धर्व पुष्पवृष्टि करने लगे ॥ ४२ । गन्ध, माला, आभूषण एवं वस्त्रोंसे अलंकृत नारियां विविध रंगोंको छिड़कती हुई पुरुषोंके साथ विहार करने लगीं ॥ ४३ ॥ वेश्याएं भी तेल, गोरस, गन्धोदक हरिद्रा तथा गीला कुमकुम परस्परमें उंडेलती हुई उनके साथ खेलने लगी । ४४ ॥ इस तरह अनेक प्रकारके आनन्दमय कौतुक देखते हुए श्रीराम और सीता रथके द्वारा धीरे २ सरयूके तीरस्थ शुभावह र मतीर्थपर पहुँचे और वहां उतर पड़े ॥ ४५ ॥ ४६ ॥ ऋत्विजोंसे परिवेष्टित श्रीराम सरयूके जलमें जलेष्टि करने लगे । ऋत्विक लोगोंने इनको पत्नीके साथ समाज एवं अवभृथ स्नान करवाया ॥ ४७ । ब्राह्मण लोग रामतीर्थके सरयूसलिलमें सीताके