श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 253, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः ८ ] उत्तरकाण्डम् २१७
वाजिवाहे रथे वह्निं पात्राणि स्थाप्य गच्छतु । सीतां चाग्रेऽथ च गुरुश्चाग्रेऽथर्त्विजः सह ।।११। मुनयो वेदघोषांश्च सर्वे चक्रुः समन्ततः । स यत्र द्रुपदासङ्घ मध्य रुक्ममालिनम् ॥१२। ययौ शनैः शनैर्मार्गे मुदा वन्दिजनैः स्तुतः अग्रे गजाः पताकाभिश्चामरैश्चाथ वाजिनः ।।१३।। स्वस्तै तूर्यघोषाणां कर्त्तारस्तत्समन्विताः । ततस्ते राजभृत्याश्च विप्रोर्वीपाः मुदण्डिनः ।।१४।। शतो वन्दिबट्वाश्च शर्त्सङ्घा ततो गणाः । ततो देवाः सगन्धर्वास्ततो रामः स मारुतः ।।१५।। ऋषिराजन्यैर्युक्तो वह्निमुखैः स्यन्दनस्थितः । ततो मुनीश्वराः सर्वे ऋषिपत्न्यस्ततो ययुः ।।१६। हत क्षत्रियपल्याद्याः विप्राः सर्वाः समेयुः । ततस्ते क्षत्रियाः सर्वे नाना हयसमस्थिताः । ।१७।। ततस्तेषां हि सैन्यानि ततोऽन्ये राजसेवकाः । शय्यागृहपतीनां च वाग्पाश्चासन पङ्क्तु ।२०। वनश्रोष्ट्रास्तु बाणानां शकटाः शस्त्रपूरिताः । लेदकागन्धकञ्चैव चक्रकाम्पतः परम् ॥२१॥ भूमिसानप्रकर्त्तारो रज्जुहस्तैर्लहस्तकाः । ययौर्यथाक्रमं सर्वे तदा परवान्सर्वः ।।२२।। तदा निनेदुर्वाद्वानि ननृतुश्चाप्सरोगणाः । मुनिपत्न्यस्तथाप्यन्ये चक्रुः पुष्पवृष्टिभिः ।।२३। मार्गे वन्दिजनाद्याश्च तुष्टुवु रघुनन्दनम् । पङ्गादिस्खराना गन्धर्वाः प्रजगः पार्थिवे मुदा ।।२४।। चकुन्ते वेदघोषांश्च मुनयः स्वरभूवैःक्रनैः । एवं गयः शनैर्मार्गे कौतुकानि समन्ततः ।।२५।। पश्यन् जनकनन्दिन्या ययौ चामरवी जनः । तत्र रामस्य मार्ग हि सीताया मुखपङ्कजम् ।।२६।। द्रष्टुं कोलाहलं चक्रुः भृशदाम्यकला जनाः । ततस्तान्ताडयामासुः यतयो वेत्रपाणयः ।।२७।। विद्रुपेण तदानीन्म महान् कोलाहलो द्विज । तन्मदं रावयो दृष्ट्वा श्रुत्वा च प्राह लक्ष्मणम् ।।२८।। एते सर्वे पुष्पकस्था जनाः सीतां च मा सुखम् । पश्यंतु कलहो माऽभूत्तथाऽन्चिति स लक्ष्मणः ।।२९।। सर्वानारोहयामास पुष्पके तान् जनान् मुदा । ततस्ते पुष्पकारूढा जना राम मनोहरम् ।।३०।।
'अच्छा महाराज' कहकर सम्पूर्ण व्यवस्था कर दी इसके बाद ऋत्विग्गण अग्निहोत्र सामानों को एकत्र करने लगे ॥११। १२॥ घोड़े जुते रथमें अग्नि तथा पात्राको रखकर आगे गुरु वशिष्ठ और ऋत्विक् चले कराके गृह वसिष्ठ भी रथमें बैठ गये ॥ १२ जब मन्दगामी रामचन्द्र सुवर्णनिर्मित रथपर चढ़े, तब ऋत्विक लोग वेदघोष करने लगे । १४॥ बन्दीजनोंसे स्तूयमान होते हुए राम धीरे-धीरे समतीर्थको चले । आगे-आगे पताकाओंसे युक्त हाथी, उसके बाद घोड़े, इसके बाद कोडीवर चढ़े हुए दण्डनायक तथा बाजा बजानेवाले और उनके बाद सुन्दर पागड़ी पहने हुए दण्डधर ब्राह्मण चले ॥१५, १६॥ इसके बाद बन्दीजन, उसके बाद वैश्यवृन्द, उसके बाद देवता तथा गन्धर्व चले ॥ १७॥ तदनन्तर स्वसम्बन्ध तथा वह्निसंयुक्त ऋषिसमुदायके परिजनोंसहित राम और सीता चलीं । इसके बाद ऋषि और ऋषिपत्नियां चलीं ॥ १८ । उसके बाद राजपत्नी प्रभृति सम्पूर्ण स्त्रियां चलीं । इसके अनन्तर विविध वाहनपर चढ़े हुए क्षत्रिय चले ॥ १९ ॥ इसके बाद उनकी सेना तथा अन्य राजसेवक चले । इसके बाद बेत्रधारक चले ॥ २० ॥ इसके बाद बाणोंसे भरे ऊंट और शस्त्रोंसे भरे शकट चले । इसके बाद लोहक गन्धक, बारूद सब चमचे से चलाने लगे ॥ २१ ॥ इसके बाद भूमिकी नाप-जोख करनेवाले रस्सी एवं कुदाल हाथमें लिये मजदूर चलने लगे । इस तरह आनन्दमय बड़े सम्पूर्ण जनसमुदाय चलने लगा ॥ २२ । उस समय बाजे बजने लगे और अप्सराएं नाचने लगीं । मुनिपत्नियां और राजपत्नियां रामपर पुष्पवृष्टि करने लगीं । २३ । मागध बन्दीजन स्तुति करने लगे, गन्धर्व गाने लगे और मुनिलोग उच्चस्वरसे वेदघोष करने लगे ॥ २४ इस प्रकार जनकनन्दिनी सीताके साथ विविध कौतुक देखते हुए राम चले ॥ २५ ॥ उस समय राम एवं सीताके दर्शनके लिए परस्पर स्पर्धा हुई जनता में कोलाहल मच गया । उसको शान्त करनेके लिए पुलिस डंडे से जनताको ताड़ना देने लगा ॥ २६ ॥ २७ ॥ जब अधिक कोलाहल होने लगा तब रामने देखा और बुद्धिमन् बक्ता लक्ष्मणसे बोले- ॥ २८ ॥ तुम ऐसी व्यवस्था करो कि जिससे जनता हमारा दर्शन कर सके और कलह समाप्त हो जाय । इन सबको पुष्पक विमानपर चढ़ा लो । लक्ष्मणने कहा 'बहुत अच्छा' ॥ २९ ॥ इस प्रकार रामकी आज्ञासे सबको पुष्पकपर चढ़ा लिया गया । तब