भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 256

१४० आनन्दरामायणे [ सर्गः ८

सीतायाः स्वकरेणैव धृत्वा वामकरं मुदा । सभार्यो राघवः प्राह वसिष्ठं तोषयन्मुदा ॥६७॥ सीतादानमन्त्रो वक्तव्यः सीतादानं करोमि ते । तथेति प्रतिगृह्णेऽस्तु वसिष्ठश्च यथाविधि ॥६८॥ अङ्गीकृत्य सीतादानं राघवेण समर्पितम् । चकितं च तदाऽभूदं सर्वं स्थावरजङ्गमम् ॥६९॥ दत्तमार्गे न कस्यासीत्तदानींनिश्चितिश्चन । तदा सीतां मुनिः प्राह मत्सन्निधौ तिष्ठ बालिके ॥७०॥ मम दत्ताऽसि रामेण त्वां मन्येऽहं सुतोपमाम् । तन्मुनेर्वचनं श्रुत्वा सीता सा खिन्नमानसा ॥७१॥ शङ्क्यन्त्यनेकशः साध्वी मुनेः पृष्ठे ह्यपाविशत् । बाष्पाश्रुपूर्णनेत्रा सा रोमाञ्चितविग्रहा ॥७२॥ ततो रामः पुनः प्राह वसिष्ठं विनयान्वितः । रुद्राणीं सुरभिं चापि सीतायै हर्षितः पुरा ॥७३॥ मया तोषेण कैलासे मन्मथेशोपयाचिनी । मयाऽपि दातुमानीता तच्छ्रुत्वा गुरुह्यब्रवीत् ॥७४॥ राम राम महाबाहो त्वयि दाढर्यं च दर्शितम् । याचिता तव पत्नीयं मया तेऽस्तु पुनः शुभा ॥७५॥ अस्याः कुरु तुलामद्य सुवर्णेन रघूत्तम । अष्टाङ्गं प्रतुलितं सीतया रुद्रप्रमुत्तमम् ॥७६॥ मां दत्त्वैव त्वया ग्राह्या पुनः सद्यदि मद्विरा । अन्यत्किञ्चिच्छृणुष्व त्वं वचनं यन्मयोच्यते ॥७७॥ धेनुं चिन्तामणिं सीतां कौस्तुभं पुष्पकं पुरीम् । स्वयं राज्य मयोध्यां त्वं येन कस्य प्रदास्यसि ॥७८॥ अग्रे कदा तदाऽऽज्ञा मे त्वया लुप्ता भविष्यति । ममलाभहृदोषेण बहुक्लेशा भविष्यसि ॥७९॥ मदुक्तैः समधी राजन् विना यत्कर्त्तुमर्हसि । तत्तद्दत्त्वा विप्रेभ्यो त्वं सुखं प्रविचारतः ॥८०॥ तद्गुरोर्वचनं श्रुत्वा तथेत्युक्त्वा रघूत्तमः । सीतां तुलायामारोप्य सुवर्णेनाप्यतोलयत् ॥८१॥ तुलितां प्रतिजग्राह गुरोः साध्वी स्मिताननाम् । दिव्यालंकारहीनां तां कंचुकीवस्त्रसंवृताम् ॥८२॥ तदा निनेदुर्वादित्राणि ववर्षुः पुष्पवृष्टिभिः । सुरस्त्रियो विमानस्थाः सीतारामौ मुदान्विता ॥८३॥

लगा—"देख, अब रामजी क्या करते हैं" ॥६५॥ इस तरह गुरुका वचन सुना तो रामजीने हंसकर संकेतसे सब राजा और गुरु वसिष्ठको बुला लिया ॥६६॥ इसके अनन्तर सभार्य्य हो आनन्दपूर्वक अपने हाथसे सीताका हाथ पकड़कर गुरुजीका प्रसन्न करते हुए बोले ॥६७॥ 'गुरुदेव ! आप सीतादानका मन्त्र बोलिये, मैं सुन कर दान करता हूँ' वसिष्ठजीने 'तथाऽस्तु' कहकर रामके द्वारा दिये हुए सीतादानको यथाविधि स्वीकार कर लिया । उस समय सम्पूर्ण स्थावर-जङ्गम जगत् आश्चर्य्य चकित रह गया ॥६८॥६९॥ उस समय सारा संसार चित्रलिखित सा हो गया, किसी को अपनी देहकी भी सुधि नहीं रही। तब मुनि वसिष्ठ सीतासे बोले—बेटी ! मेरे पीछे आकर बैठो ॥७०॥ रामजीने दानमें मुझे दान किया है। मैं तुमको पुत्री की तरह मानता हूँ । इस तरह मुनिका वचन सुनकर दुःखिता साध्वी सीता मुनिके पीछे जाकर बैठ गयीं। उस समय उनके रोंगटे खड़े हो गये और वे फूट-फूटकर रोने लगीं ॥७१॥७२॥ तदनन्तर चित्तमें रामजी सोचने लगे कि मैंने प्रसन्न होकर कैलास पर्वतपर रुद्राणीकी सम्मति पा दी थी। अतः इस मनस्तापदायिनी रुद्राणीको भी लेलेंगे, क्योंकि आपको देनेके लिए ही मैंने इसको मंगाया था। यह सुनकर गुरु वसिष्ठ बोले— ॥७३॥७४॥ हे राम ! हे महाबाहो ! मैंने आपकी जानबूझके लिए ही सीताको मांगा था। अतएव अब मेरे द्वारा दी हुई यह आपकी भार्या हो जाय ॥७५॥ हे रघूत्तम ! सुवर्णके बराबर इसको तौलिये, आठ बार तोलनेपर जितना सुवर्ण हो, उस सब टक्कर मेरे प्रणामसे आप पुनः सीताको ले लें। और भी जो मैं कहता हूँ सुनिये ॥७६॥७७॥ धेनु, कामधेनु, चिन्तामणि, सीता, कौस्तुभ रत्न, पुष्पक विमान, अयोध्यापुरी और अपना राज्य यदि आप किसी को दोगे तो आगे अतीवगोत्रय-दोषसे अत्यन्त दुखी होवेंगे । क्योंकि आगेरुक आपके कथा में न जाने क्या बात कही है ॥७८॥७९॥ अतः हे राजन ! मुनिदिष्ट वस्तुको छोड़कर जो इच्छा हो, बिना विचार ब्राह्मणों को देकर आप सुखी हो ॥८०॥ इस तरह गुरुके वचन सुनकर रघूत्तम रामने कहा—'बहुत अच्छा गुरुदेव' और सीता का आठ बार सुवर्ण से तौलकर उनसे वापस ले लिया, तथा सब केवल कंचुकी वस्त्र पहने तथा दिव्यालंकारों से रहित भी सीता प्रसन्न हो गयीं। इसके अनन्तर बाजे बजने लगे और विमानपर बैठी हुई देवांगनाए प्रसन्न होकर सीतारामके ऊपर पुष्पवृष्टि करने