भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 257

सर्गः ९ ] यज्ञकाण्डम् २४१

पूर्वाधिकानलंकारान्वस्वदेहे जानकी दधौ । जनाः सर्वे सुसंतुष्टास्तदाऽऽसन्मुदिताननाः ॥८४॥ अथ सीता पतिं नत्वा तत्पार्श्वे सस्थिताऽभवत् । स्मिताननाऽऽनन्दमग्ना लज्जिता रामलोचना ॥८५॥ ततो रामोऽप्यनेकानि कृत्वा दानानि बिस्तरात् । ऋत्विक्सदस्यमुख्यादीनानर्च्यभिगणैर्वरैः ॥८६॥ स्वीयान्भ्रातृन्नृपान्मित्रसुहृदोऽन्यांश्च सर्वशः । अभीक्ष्ण पूजयामास वस्त्रालंकारभूषणैः ॥८७॥ सर्वे जनाः सुललितोन्मणिकुण्डलस्रग्भूष्णीषकञ्चुकदुकूलमहार्घहाराः । नार्यश्च कुण्डलयुगालकदत्तपुष्पवस्त्रश्रियः कनकमेखलया विरेजुः ॥८८॥ इति श्रीमत्सतचिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये यागकाण्डे अवभृथोत्सववर्णनं नामाष्टमः सर्गः ॥ ८ ॥


नवमः सर्गः

(अश्वमेध महायज्ञकी समाप्ति)

श्रीरामदास उवाच

श्रीरामेऽवभृथस्नाते शंभुर्ब्रह्मादिभिः सुरैः । रामं वेदस्तवैः स्तुत्वा प्रत्युवाच पुरः स्थितः ॥ १ ॥ अद्य धन्या वयं सर्वे यत्त्वां स्नानं सुमंगलम् । पश्यामो याज्ञ्यवभृथे सीतया बन्धुभिः सह ॥ २ ॥ अस्माकं हर्षकालोऽयं देवदेव दयानिधे । तस्मादयं सदा पुण्यः श्रेष्ठकालो भविष्यति ॥ ३ ॥ त्वं चाप्यंगीकुरुष्वाद्य देह्यस्मभ्यं सुबहून्वरान् । अन्यच्चात्र प्रत्यहं येन ते दर्शनं भवेत् ॥ ४ ॥ तथा कुरु रघुश्रेष्ठ तीर्थायास्मै वरान्प्रद । अन्यानि चत्वया पूर्वं यानि भूम्यां कृतानि हि ॥ ५ ॥ यात्राकाले सुतीर्थानि लिंगान्यपि निजाख्यया । तेषामपि वरानद्य वद त्वं मम वाक्यतः ॥ ६ ॥ पुरीषु श्रेष्ठाऽयोध्या स्याद्याच्याद्य राघव । नदीषु सरयूः श्रेष्ठा वरैः कार्याऽथ मन्दिरा ॥ ७ ॥ तच्छ्रुवचनं श्रुत्वा प्रहस्य रघुनन्दनः । हर्षकालेऽब्रवीद्वाक्यं यत्त्रैलोक्योपकारकम् ॥ ८ ॥


लगीं ॥ ८२-८३॥ जब जानकीजीने पहलेसे भी अधिक आभूषणोंको अपने शरीरम पहिना तो उससे जनता अत्यन्त सन्तुष्ट हुई ॥ ८४ ॥ इसके बाद पतिको प्रणाम करके हँसती हुई माताजी आनन्दमग्न होकर लज्जापूर्वक रामके पास बैठ गयीं । तदनन्तर रामजीने खूब दान दिये एवं ऋत्विक, सदस्य, राजे, मित्र, सुहृद् तथा अपने भाई-बन्धुओंका वस्त्रामूषणोंसे भली भाँति सत्कार किया ॥ ८५ । ८६ । उस समय रामजीके यज्ञमें सब पुरुष मनोहर मणियोंसे जटित कुण्डलों एवं मालाओंको पहिन तथा बहुमूल्य पगड़ी कञ्चुकी और दुबटोंम सुशोभित हो रहे थे। इसी तरह कुण्डल, रत्नजटित आभूषण तथा झांवाकी मेखला (तगड़ी) से सुशोभित स्त्रियं भी विराज रही थीं ॥ ८७ । ८८ ॥ इति श्रीमदानन्दरामायणे यागकाण्डे नव रामतेजपाण्डेयकृत-'ज्योत्स्ना' भाषाटीकायामवभृथोत्सववर्णनं नाम अष्टमः सर्गः ॥ ८ ॥

श्रीरामदासजी कहने लगे—श्रीरामने जब अवभृथ स्नान कर लिया, तब ब्रह्मादि देवोंके साथ महादेव रामजीकी स्तुति करके कहने लगे—॥ १ । आज हम लोग धन्य हैं, जो सीता एवं बन्धुओंके सहित आपको यह अश्वमेधका अवभृथ स्नान किये हुए देख रहे हैं, जो अतन्त मंगलकारक है । २ हे देवदेव ! हे कृपानिधे ! यह समय हम लोगोंके लिए बड़ा हर्षप्रद है। अतः यह सदा अत्यन्त श्रेष्ठ और पुण्यवर्द्धक होगा । ३ ॥ आप भी इसको अङ्गीकार करें और इसके लिए अच्छे एवं बहुतसे ऐसे वर दें कि जिससे हमलोगोंका प्रतिदष आपका दर्शन मिलता रहे ॥ ४ । हे रघुश्रेष्ठ ! आप इस तीर्थके लिए भी बहुतरे वरोंको द । यात्रा करते समय पहले भी आपने जिन तीर्थों एवं लिंगोंको स्थापित किया है, उनको भी मेरे कहनेसे आप वरदान दें ॥ ५ । ६ ॥ हे राघव, आज मेरे कहनेसे आप ऐसा कह दीजिये कि सब नागरिकोंके लिए श्रेष्ठ यह अयोध्या नगरी है एवं